दिन विशेष युवा लेखन में ओम चतुर्वेदी की कविता
ओम चतुर्वेदी हिन्दी के विद्यार्थी एवं युवा रचनाकार हैं। वे मूलतः उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद के निवासी हैं। वर्तमान में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में एम.ए. की पढ़ाई कर रहे हैं। उनकी रचनाओं में समकालीन जीवन, प्रकृति, लोक-संवेदना और मानवीय सरोकारों का सशक्त एवं संवेदनशील चित्रण देखने को मिलता है। उनकी लेखनी जीवन के विविध पक्षों को सहजता, संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टि के साथ अभिव्यक्त करती है।

बह रहा है जीवन
छज्जों पर
पल रहे हैं बच्चे।
मैदानों को निगल गया
भ्रष्टाचार।
जकड़ गया है बचपन
बीच लोहों के।
यौवन को कुचल रही है
कृत्रिमता।
कंबल लपेटे लेटा है
बुढ़ापा।
अब कुछ ऐसे ही
चल रहा है जीवन।
अब जीना बस
साँसो का आना-जाना है।
Facebook की फोटो, और
Insta पर रील बनाना है।
भावनाएँ भाप बन गई हैं
और बह रहा है जीवन ।
अगली पीढ़ी
मेरे गाँव में खिचड़ी बनी
पत्तल बंट गए
बाजा बजने लगा
बैठ गए सब खाने
हाथ धोकर
न था चावल, न थी दाल
पैसे परोसे गए
पत्तल में,
नोट को जेब में रखकर
सबने डकार ली
वाह ! क्या बात है
ऐसी सुंदर खिचड़ी
घर पर आकर,
सो गए सब….
कुछ दिनों बाद
गाँव से स्कूल गायब हो गया
खत्म हो गयी सड़कें
मरने लगे लोग,
भूख से।
नदी का पानी सूख गया
और हर तरफ़ बहने लगा
सिर्फ़,
खून! खून! खून!
खिचड़ी खाने वाले तो मर गए
पर अगली पीढ़ी रोज़ मर रही है।
अंतिम स्वांस
एक दिन अंतिम स्वास होगी
उस साँस के बाद कोई आँस न होगी
जीवन के सारे कर्म चारो ओर खड़े होंगे
अपना हिसाब
बारी-बारी से कर रहे होंगे
सांस टूट रही होगी
शरीर साथ छोड़ रहा होगा
आत्मा जल्दी में होगी
कुछ कर्म बकाया रहेंगे
अगले जन्म को
अभी सांस टूट जायेगी.
तभी मेरे राम आयेंगे
हम समा जायेंगे |
