दिन विशेष : डॉ. परशुराम की हिंदी कविता का मराठी अनुवाद — प्रो. धन्यकुमार द्वारा।

परिचय
धन्यकुमार जिनपाल बिराजदार
ज्ञात भाषा : हिन्दी, मराठी, कन्नड़, अंग्रेज़ी प्रकाशित
13 प्रकशित कृतियाँ तथा विभिन्न समाचार पत्रों व राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 150 आलेख प्रकाशित।: सोलापुर आकाशवाणी से 80 विषयों पर हिन्दी वार्ता तथा साक्षात्कार प्रसारित।
110 राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में बीजवक्ता, सत्राध्यक्ष, विषय प्रवर्तक के रूप में मार्गदर्शन। वेबिनार : 50 राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय वेबिनार में विषय प्रवर्तक के रूप में मार्गदर्शन।
:शासकीय कार्यालयों, विद्यालयों-महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में 534 व्याख्यान। साहित्य पर अब तक 28 शोधपत्र प्रकाशित। राष्ट्रीय महामन्त्री : अखिल भारतीय हिन्दी महासभा, दिल्ली। अनेक सम्मान एवं पुरस्कार : महाराष्ट्र सरकार की महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी, मुम्बई द्वारा ‘मुंशी प्रेमचन्द कांस्य पुरस्कार’ सहित 22 पुरस्कार प्राप्त।
सम्प्रति : हरिभाई देवकरण महाविद्यालय, रेलवे लाइन्स, सोलापुर-413001, महाराष्ट्र।

“असं का करता?” : धन्यकुमार जिनपाल बिराजदार

सदा करा जीवांची सेवा,
मम्मी मला तू सांगती ।
पण बिचाऱ्या धनिरामला,
नेहमीच तू मारती ।।

पप्पांचे नेहमी म्हणणे असते,
खोटं कधी बोलू नको ।
पण घरी राहूनी मलाच म्हणतील,
दार कधी तू उघडू नको ।।

कधी-कधी कुणी येतील तेंव्हा,
मुलांसारखे तुम्ही लपता ।
‘पप्पा पंजाबला गेलेत’,
असं माझ्याकडूनच सांगता ।।

नाना-नानी, आजी-आजोबा,
सगळे असं का करता बा?
म्हणता एक, करता एक,
घाबरता सत्याला का इतकं ?

ऐसा क्यों करते : डॉ. परशुराम शुक्ल

सदा करो जीवों की सेवा,
मम्मी तुम बतलातीं ।
पर बेचारे धनीराम को,
हरदम मार लगातीं ।।

पापा भी मुझसे कहते हैं,
झूठ कभी मत बोलो ।
पर घर में रह कर कह देते,
दरवाजा मत खोलो ।।

कभी-कभी कोई आता तो,
बच्चों सा छिप जाते ।
‘पापा जी पंजाब गये हैं’
मुझसे ही कहलाते ।।

दादा दादी, नाना नानी,
सब ऐसा क्यों करते ?
कहते हैं कुछ, करते हैं कुछ,
सच से इतना डरते !

संदर्भ :- प्रतिनिधि बाल कविताएँ
प्रकाशक :- रामश्री प्रकाशन, आइवरी 23 प्लैटिनम पार्क, भोपाल, (मध्य प्रदेश) 462003
प्रथम संस्करण 2015 , पृष्ठ क्रमांक 32

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