डॉ. ममता खेड़े की पुस्तक “लोकावतरण“ के लोकार्पण पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए : मनोज श्रीवास्तव

डॉ. ममता खेड़े की यह पुस्तक “लोकावतरण” १० वैदिक सूक्तों का निमाड़ी में अनुवाद है। यह शीर्षक मुझे इस पूरी पुस्तक के संदर्भ में बहुत सार्थक लगता है। वेद की ग्राम्यता, ऋचाओं का लोक-संसार, निमाड़ और नर्मदा की सांस्कृतिक स्मृति, और संस्कृत से निमाड़ी में डॉ. ममता खेड़े का यह रूपान्तरण—उन सबको एक ही शब्द में पकड़ने की क्षमता ‘लोकावतरण’ में है।
इसे अनुवाद कहना अपेक्षाकृत छोटा शब्द होता। उसमें एक भाषा से दूसरी भाषा में अर्थ ले जाने का बोध प्रमुख है। “लोकावतरण” में केवल भाषा बदलने की बात नहीं है; किसी ज्ञान, अनुभूति और सांस्कृतिक स्मृति का लोक में अवतरण है।अवतरण का अर्थ केवल नीचे उतरना नहीं है। भारतीय सांस्कृतिक शब्दावली में अवतरण का अर्थ है—किसी ऊर्ध्व, सूक्ष्म, दिव्य या व्यापक सत्ता का किसी सुलभ रूप में प्रकट होना। इस अर्थ में “लोकावतरण” कहता है कि वेद लोक में उतरता नहीं मात्र, लोक में प्रकट होता है।
जिसे आधुनिक शिक्षित समाज अक्सर “लोक” के ऊपर स्थित मानता है—वेद, शास्त्र, दर्शन, संस्कृत—वह इस पुस्तक में लोक के भीतर आ रहा है। लेकिन इसे “उच्च का निम्न में पतन” समझना भूल होगी। यह ऊँचाई का अपनी व्यापकता सिद्ध करने के लिए लोक में आना है। वेद यदि केवल संस्कृत जानने वाले विद्वान की पुस्तक बना रहे, तो वह सुरक्षित तो रह सकता है, लेकिन जीवित कितना रहेगा? किसी संस्कृति का शास्त्र तब अधिक जीवित होता है जब वह अपनी मूल भाषा के अतिरिक्त दूसरी भाषाओं में भी स्वप्न देखने लगे।
इसीलिए लोकावतरण का अर्थ शास्त्र का सरलीकरण नहीं है।लोकभाषा में कोई कठिन बात कहना उसे “सरल” बना देना नहीं है। कई बार लोकभाषा उस अनुभव को अधिक सघन और अधिक जीवित बना देती है जिसे शास्त्रीय भाषा की दूरी ने अमूर्त कर दिया था। मसलन, नदी सूक्त को निमाड़ी में पढ़ना केवल ऋग्वेद की ऋचा को निमाड़ी शब्द दे देना नहीं है।
निमाड़ी में “नदी” केवल dictionary का river नहीं रहती। वह नर्मदा के किनारे जन्मे हुए अनुभवों, बाढ़, खेत, घाट, नाव, मछली, परिक्रमा, मातृत्व और लोक-स्मृति से घिर जाती है। तब ऋचा का अर्थ नहीं बदलता, लेकिन उसका अनुभव-क्षेत्र बदल जाता है।
यही ममता खेड़े की इस पुस्तक लोकावतरण की असली शक्ति है।
लोक का अर्थ केवल गाँव नहीं है।लोक वह सामूहिक जीवन-जगत है जिसमें भाषा केवल communication का माध्यम नहीं, जीवन का संचय होती है। उसमें कहावतें हैं, गालियाँ हैं, लोरी हैं, खेत हैं, ऋतु हैं, पशु हैं, नदी है, मृत्यु है, विवाह है, देवता हैं, श्रम है, हास्य है, भय है और आशा है।इसलिए जब कोई वैदिक ऋचा लोकभाषा में आती है, तो वह केवल दूसरी भाषा में नहीं जाती।वह दूसरे जीवन-जगत में प्रवेश करती है। ममता जी की लोकावतरण वह कृति है जिसमें शास्त्र लोक की भाषा सीखता है और लोक शास्त्र में अपनी आवाज़ पहचानता है और यह एकतरफा movement नहीं है। केवल वेद लोक में नहीं आता।लोक भी वेद के भीतर प्रवेश करता है।
यहाँ मुझे याद आता है कि जिस काम को ममता जी ने इतनी सहजता से कर लिया है वह इसलिए कि वे भारत में हैं। यूरोप में दूसरी ओर, विशेषकर medieval Latin-Christian और Reformation के संघर्षों में, vernacular Scripture कई जगह religious authority के प्रश्न से जुड़ गया। Waldensians को persecution झेलना पड़ा; Lollards पर दमन हुआ; continental Europe में reformers और dissenters जले; Low Countries और France में executions हुए; और चौदहवीं शताब्दी में John Wycliffe और उनके अनुयायियों का आंदोलन इस संघर्ष को इंग्लैंड में ले आता है। Tyndale भी 1536 में heresy के आरोप में मृत्युदंड पाए।कई लोगों ने बाइबिल का यूरोपीय देशज भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद करने पर मृत्युदंड पाया। वहाँ धार्मिक सत्य Latin पढ़ने वाले clergy के पास इस तरह था कि धार्मिक ज्ञान की एक निश्चित institutional geography बनती थी।
उधर भारत में संस्कृत ग्रंथों को लोकभाषाओं में लाने की परम्परा एक ही व्यक्ति या एक ही आंदोलन की देन नहीं है। यह अनेक शताब्दियों में अनेक भाषाओं में विकसित हुई।
ज्ञानदेव ने भगवद्गीता को मराठी में “ज्ञानेश्वरी” के रूप में पुनःकहा।यह केवल translation नहीं था। यह संस्कृत दार्शनिक ग्रंथ का Marathi literary-philosophical पुनर्सृजन था।तुलसीदास ने रामकथा को अवधी में पुनःरचा।सूरदास ने कृष्ण-भक्ति को ब्रजभाषा में गाया।एकनाथ ने भागवत परम्परा को मराठी में विस्तृत किया।कबीर ने संस्कृत शास्त्रीय vocabulary के अधिकार को स्वीकार किए बिना आध्यात्मिक सत्य पर लोकभाषा में प्रश्न किए। गुरु नानक और गुरु परम्परा ने बहुभाषिक धार्मिक संसार में वाणी को प्रतिष्ठित किया।दक्षिण भारत में तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम की धार्मिक साहित्यिक धाराओं ने संस्कृत परम्पराओं को अपने भाषिक संसार में ग्रहण किया।यहाँ एक विलक्षण phenomenon पैदा हुआ:एक ही sacred tradition कई भाषाओं में एक साथ जीवित रह सकती थी।गीता संस्कृत में भी रही।और मराठी में भी बोलती रही।रामायण संस्कृत में भी रही।और अवधी में भी।पुराण संस्कृत में भी रहे।और ब्रज, बंगला, मराठी, गुजराती, तमिल तथा अन्य भाषाओं में भी अपनी-अपनी नई कथात्मक देह ग्रहण करते रहे।मूल नष्ट नहीं हुआ।लोकभाषा ने मूल का स्थान नहीं छीना।लोकभाषा ने sacred tradition का विस्तार किया।यही भारतीय अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।
इस पुस्तक में यह नहीं हुआ है कि ममता जी ने किसी संस्कृत सूक्त का mechanical translation कर दिया हो।बल्कि—शास्त्र → भाव → आख्यान → लोकभाषा → लोकानुभव
की एक पूरी प्रक्रिया चली। उनकी संस्कृत से लोकभाषा की यात्रा केवल translation की यात्रा नहीं है; यह sacred knowledge के vernacularization की यात्रा है।
आपको याद हो कि मैक्समूलर आदि यूरोप के विद्वानों ने वेदों की हँसी उड़ाई थी। उनकी ग्राम्यता को लेकर उन्हें गड़रियों के गीत कहा था। उन्हें एक pastoral/agricultural समाज की चीज कहा था। मैं इस मौके पर उस बहस में नहीं पड़ना चाहता था। पर चलिए यदि ऐसा था भी तब ममता जी के लिए लोक की उस स्पिरिट में उतरना और आसान हो गया।
ऋग्वेद के सूक्तों का निमाड़ी जैसी लोकभाषा में अनुवाद पहली दृष्टि में भाषा का एक साधारण परिवर्तन दिखाई दे सकता है—संस्कृत से निमाड़ी। लेकिन गहरे स्तर पर यह केवल भाषांतर नहीं है। यह दो अलग-अलग कालों के ग्राम्य संसारों के बीच पुनः संवाद स्थापित करना है। यदि ऋग्वेद को उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में पढ़ें तो वह किसी आधुनिक महानगरीय सभ्यता का साहित्य नहीं है। उसमें पशु हैं, चरागाह हैं, वर्षा है, नदी है, खेत है, रथ है, अग्नि है, परिवार है, कुल है, जन है, युद्ध है, दान है, ऋतु है और प्रकृति के साथ मनुष्य का लगभग अविच्छिन्न सहजीवन है। निमाड़ी भी अपने ऐतिहासिक लोक-संसार में इन्हीं चीजों की गंध, ध्वनि और स्मृति लेकर चलती है। इसलिए ऋग्वेद को निमाड़ी में उतारना किसी “नीची” भाषा में “ऊँचे” ग्रंथ को उतारना नहीं; बल्कि एक प्राचीन लोक-काव्य को दूसरे जीवित लोक-काव्य के घर में वापस ले जाना है। यहीं “ग्राम्यता” शब्द को सावधानी से समझना आवश्यक है। ग्राम्यता का अर्थ अशिक्षा, अपरिष्कार या बौद्धिक पिछड़ापन नहीं है। संस्कृत काव्यशास्त्र में ग्राम् का अर्थ एक विशिष्ट अर्थ-क्षेत्र रखता है, लेकिन यहाँ जिस ग्राम्यता की बात है वह सामाजिक और संवेदनात्मक है—जिसमें मनुष्य का संसार अभी प्रकृति से अलग होकर कोई कृत्रिम autonomous urban world नहीं बना है। ऋग्वेद का मनुष्य नदी को केवल geographical feature की तरह नहीं देखता; नदी जीवन की शक्ति है। वर्षा केवल मौसम नहीं; अस्तित्व की शर्त है। गौ केवल पशु नहीं; अर्थव्यवस्था, समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार है। अग्नि केवल combustion नहीं; गृह, यज्ञ, देवता और मनुष्य के बीच जीवित संबंध है।निमाड़ी का लोक-संसार भी ऐसे ही संबंधों से बना है। निमाड़ की बोली में खेत केवल “agricultural land” नहीं है। वह जीवन है। नदी केवल नदी नहीं; नर्मदा है। बैल केवल पशु नहीं; खेती का सहचर है। वर्षा केवल precipitation नहीं; पूरे ग्रामीण अस्तित्व की प्रतीक्षा है। आकाश, मिट्टी, फसल, पशु, नदी और मनुष्य के बीच जो भावात्मक संबंध लोकभाषा में सुरक्षित रहता है, वह कभी-कभी संस्कृत के अत्यन्त संस्कारित शास्त्रीय अनुवाद में खो सकता है।
यहीं निमाड़ी अनुवाद की असाधारण सम्भावना सामने आती है।
लोकभाषा कभी-कभी प्राचीनता को समझाने से अधिक उसे सुनने योग्य बना देती है।
ऋग्वेद की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह मूलतः श्रुति है। वह पहले पढ़ा जाने वाला ग्रंथ नहीं, सुना जाने वाला काव्य है। उसके छन्द, आवर्तन, ध्वनि-संयोजन और उच्चारण की शक्ति उसके अर्थ का हिस्सा हैं। आधुनिक भारतीय भाषाओं में जब कोई लोकबोली अपने स्वाभाविक लयात्मक मुहावरों के साथ ऋचा को ग्रहण करती है, तब वह अनुवाद को केवल lexical equivalence नहीं रहने देती; वह उसे फिर से oral performance की दिशा में ले जाती है।निमाड़ी में किसी ऋचा का अनुवाद यदि सचमुच निमाड़ी की अपनी लय, संबोधन, क्रियापद, लोक-उपमा और ध्वनि-संस्कार में किया जाए, तो वह पाठ को केवल समझाता नहीं—उसे बोलता हुआ बनाता है।यहाँ डॉ. ममता खेड़े के कार्य का महत्व इसी बिंदु पर समझा जा सकता है। यदि उनका उद्देश्य ऋग्वैदिक सूक्तों को निमाड़ी के स्वाभाविक मुहावरों में उतारना है, तो वे मूलतः एक प्रकार का decolonisation of register कर रही हैं। ऋग्वेद को समझने की आधुनिक शैक्षणिक परम्परा ने लंबे समय तक संस्कृत को एक अत्यन्त औपचारिक, विशिष्ट, अभिजात और philological वस्तु की तरह प्रस्तुत किया। उसके बाद उसके अनुवाद प्रायः अंग्रेज़ी या अत्यन्त मानकीकृत आधुनिक भारतीय भाषाओं में हुए। इससे पाठ का अर्थ उपलब्ध हुआ, लेकिन उसका सामाजिक तापमान कई बार कम हो गया। ममता जी इस तापमान को अपनी पुस्तक में वापस ला सकी हैं, इसी में उनकी सफलता है ।
उदाहरण के लिए ऋग्वेद में जब गो, अश्व, वृष्टि, उषस्, नदी, क्षेत्र, धेनु, पयस्, अन्न, जैसी वस्तुएँ आती हैं, तो उन्हें केवल शब्दकोशीय अर्थों में समझना पर्याप्त नहीं। ये उस सभ्यता के lived categories हैं। अंग्रेज़ी में cow, horse, rain, dawn, river, field कह देने से referent तो मिल जाता है, लेकिन cultural resonance हमेशा नहीं मिलती। इसी प्रकार अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में भी धेनु, वृष्टि, उषा, पयस् आदि रख देने से पाठ कभी-कभी पाठक से दूर हो सकता है। ममता जी की निमाड़ी उस दूरी को घटा देती है, क्योंकि वह इन चीजों को “अनुवादित वस्तु” नहीं, जीवित अनुभव के रूप में जानती है।
ऋग्वैदिक क्षितिज और निमाड़ी लोक का क्षितिज एक नहीं है; लेकिन दोनों में ऐसी experiential संरचनाएँ हैं जो संवाद कर सकती हैं।यही इस अनुवाद को विशिष्ट बनाता है।यह पुस्तक ऋग्वेद को “लोकप्रिय” नहीं करती; वह उसे लोक में पुनः स्थित करती है।
लोकप्रियकरण में शास्त्रीय वस्तु को सरल बनाकर जनता के उपभोग योग्य बनाया जाता है। लोक में पुनःस्थापन में प्रश्न उलटा होता है—क्या इस महान ग्रंथ में पहले से कोई लोक था, जिसे हमारी आधुनिक अभिजात भाषा ने ढँक दिया है? ऋग्वेद के मामले में उत्तर काफी हद तक हाँ है। क्योंकि ऋग्वेद का कवि अपने देवताओं से जिस तरह बात करता है उसमें असाधारण निकटता है। वह देवता को केवल दार्शनिक principle नहीं बनाता। वह उसे बुलाता है, मनाता है, उससे सहायता माँगता है, उसके रथ की कल्पना करता है, उसके आगमन का वर्णन करता है। यह भाषा किसी दूर बैठे metaphysical God की भाषा नहीं; यह निकट देवता की भाषा है। लोकभाषाओं की सबसे बड़ी शक्ति भी यही है—वे संबोधन में दूरी कम करती हैं।
यदि ऋग्वेद का एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक आधार pastoral था, तो उसके पशुपालक जीवन-संसार को ऐसी भाषा में अनूदित करना जो स्वयं ग्रामीण और कृषक-पशुपालक अनुभवों से बनी हो, एक गहरी सांस्कृतिक संगति पैदा करता है।
क्योंकि ऋग्वेद को केवल “religious text” बनाकर पढ़ने पर उसकी materiality गायब हो जाती है। लोकभाषा उसे फिर से मिट्टी, पशु, जल और मनुष्य के संसार में रख सकती है।
इसलिए डॉ. ममता खेड़े का निमाड़ी अनुवाद, इसी चेतना के साथ किया गया है, इसलिये उसका सांस्कृतिक महत्व बहुत बड़ा है। वह यह नहीं कह रहा कि “संस्कृत कठिन है, इसलिए इसे सरल भाषा में समझाइए।” वह उससे कहीं अधिक साहसी बात कह रहा है—
जिस समाज की जीवन-संवेदना से यह कविता निकली थी, उसके कुछ दूर के प्रतिध्वनि-क्षेत्र आज भी भारतीय लोकभाषाओं में जीवित हैं।
यहाँ अनुवादक एक पुल नहीं, बल्कि एक प्रतिध्वनि-कक्ष निर्मित करती हैं। ऋचा की आवाज़ उसमें प्रवेश करती है और निमाड़ी के अनुभव से टकराकर दूसरी आवाज़ में लौटती है।
इस दृष्टि से निमाड़ी में ऋग्वेद या अथर्ववेद के अंशों का यह अनुवाद संस्कृत से निमाड़ी की यात्रा भर नहीं है। यह एक चक्र पूरा करता है।
ऋचा कभी लोकजीवन से उठी थी।वह शास्त्र बनी। फिर शास्त्रीय अध्ययन की वस्तु बनी।
फिर विश्वविद्यालयों की philology में पहुँची।और अब लोकभाषा में फिर लौटती है।
अर्थात—लोक → मंत्र → शास्त्र → अकादमी → लोक।यह वापसी प्रतिगमन नहीं है। यह सांस्कृतिक पुनर्चक्रण है।
ध्यान दें कि निमाड़ का एक विशाल सांस्कृतिक भूगोल है—मान्धाता का राजर्षि, मार्कण्डेय का तीर्थ,नारद की प्रेरणा,अगस्त्य का विन्ध्य, विन्ध्य की तपस्या,गोविन्दपाद की गुफा,शंकराचार्य की दीक्षा,और नर्मदा की अखण्ड धारा। तब डॉ. खेड़े का काम एक बहुत सुंदर अर्थ ग्रहण करता है। जिस भूमि ने ऋषियों की तपस्या की स्मृति सँभालकर रखी, उसी भूमि की लोकभाषा में अब ऋषियों की ऋचाएँ फिर बोल रही हैं।
यहाँ “ग्राम्यता” शब्द भी अपने सही अर्थ में लौटता है।वह अशिक्षित का संसार नहीं, जीवित अनुभव का संसार है।और शायद इसीलिए निमाड़ी में नासदीय सूक्त का उतरना भी उतना ही स्वाभाविक है जितना भूमि सूक्त का। क्योंकि जिस मनुष्य ने नर्मदा के किनारे खड़े होकर यह अनुभव किया है कि नदी उसके जीवन से बड़ी है, वही मनुष्य एक दिन आकाश की ओर देखकर पूछ सकता है—जब कुछ भी नहीं था, तब क्या था?” यही वह बिंदु है जहाँ निमाड़ की मिट्टी और नासदीय सूक्त का ब्रह्माण्ड एक-दूसरे को पहचानते हैं।
यही जादू ममता जी ने अपनी इस कृति में दिखाया है।
