दिन विशेष (व्यंग्य) में ‘छींक पुराण’ : डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र
परिचय : डॉ. मनोज श्रीवास्तव, जिनका लेखकीय नाम ‘मनोज मोक्षेन्द्र’ है, समकालीन हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकार, व्यंग्यकार, कथाकार, कवि, उपन्यासकार, नाटककार, संपादक, अनुवादक, चित्रकार और पत्रकार हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में पीएच.डी. की हैं। डॉ. मोक्षेन्द्र ने कविता, कहानी, व्यंग्य, उपन्यास, नाटक, बाल साहित्य तथा राजभाषा विषयक साहित्य सहित अनेक विधाओं में दो दर्जन से अधिक पुस्तकों का सृजन किया है। उनकी प्रमुख कृतियों में “पगडंडियां”, “चाहता हूँ पागल भीड़”, “मुखाग्नि”, “प्रेमदंश”, “संतगिरी”, “दूसरे अंग्रेज़”, “उस दौर से इस दौर तक”, “रावण उदास है”, “तरल तथ्यों के दौर में” तथा “भैंस भड़ाँस तथा अन्य व्यंग्य” उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाएँ देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, वेब पत्रिकाओं तथा कविता कोश, गद्य कोश और हिंदी समय जैसे प्रमुख साहित्यिक मंचों पर व्यापक रूप से प्रकाशित हुई हैं। वे अनेक महत्वपूर्ण साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित हो चुके हैं, जिनमें कमलेश्वर सम्मान, भगवतप्रसाद कथा सम्मान, साहित्य-भूषण सम्मान, साहित्य-रत्न सम्मान तथा साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान प्रमुख हैं। वे विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों के सक्रिय संयोजक और संचालक रहे हैं। भारतीय संसद में पूर्व संयुक्त निदेशक के रूप में सेवाएँ देने के साथ-साथ वे राज्यसभा की पत्रिका ‘नूतन प्रतिबिंब’ के पूर्व संपादक भी रहे हैं। वर्तमान में डॉ. मनोज श्रीवास्तव ‘मनोज मोक्षेन्द्र’ साहित्य-लेखन, संपादन, सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों तथा हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय रूप से योगदान कर रहे हैं।

‘छींक पुराण’
हमारे पौराणिक राष्ट्र में हर मानवीय गतिविधि का एक इतिहास-सम्मत पुराण है। लोगबाग अपनी बतकहियों में पौराणिक दृष्टांत देकर अपनी बातों पर सच का ठप्पा लगाते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि पौराणिक उदाहरण देकर परंपराओं की इज़्ज़त करना हमारी तहज़ीब का अहम हिस्सा बन चुका है। सुच्चे भारतीयों में पुराण-ज्ञान सहज व्याप्त होता है। अब जिस बहसबाज शख़्स के भेजे में अवसर के मुताबिक पौराणिक उदाहरण नहीं समाता, उसे हमारा समाज कभी बुद्धिजीवी स्वीकार ही नहीं करता। सो, अगर बुद्धिजीवी होने का तग़मा अपने मत्थे मढ़ना है तो बेशक हमें महासागर से भी गहरे पौराणिक गाथाओं में डुबकी लगानी ही होगी। पुराण बखान कर अपनी बात को मज़बूत नींव पर खड़ा करने की कुव्वत तो हम भारतीयों में ही होती है। यदि यह गुण हममें से किसी में नहीं है तो वह भारतीय हो ही नहीं सकता। चुनांचे, अगर कोई व्यक्ति अंगूठाछाप होने के कारण ऐसा नहीं कर सकता है अर्थात वह पुराणों का अध्ययन नहीं कर सकता है तो उसे मनगढ़ंत पुराण गढ़ने के फ़न में महारत हासिल करनी होगी। हमें इस बात की तहकीकात करनी होगी कि पुराण-गाथाओं से अनभिज्ञ और पुराण गढ़ने की क्षमता न रखने वाले व्यक्ति में कहीं किसी विदेशज रक्त की मिलावट तो नहीं है! निःसंदेह, इस महासंक्रमणशील दौर में रक्त में अशुद्ध मिलावट की संभाव्यता से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।
बहरहाल, गाथाएं गढ़कर उन्हें पुराण बनाने की कला भारतीयों से ज़्यादा और किसमें हो सकती है–यह बात तो जग-ज़ाहिर है। दरअसल, पौराणिक गाथाओं का निर्माण भी इसी प्रकार से हुआ है। कालांतर में लोगबाग ऐसी ही गढ़ी गई गाथाओं को पौराणिक उद्धरणों में शामिल करके उन्हें कसौटियों पर खरा उतारने लगते हैं। किसे क्या पता कि फलां पौराणिक गाथा अट्ठारह पुराणों में से किस पुराण की है? वैसे भी ढेरों पौराणिक गाथाएं दस्तावेज़ी रूप में पहले कहाँ उपलब्ध रही हैं? किंवदंतियों के आधार पर ही उन्हें कह-सुनकर ज़िंदा रखा जाता रहा है। आज के समय में उन्हें ठोस रूप में लाने के लिए मुद्रक यंत्रों को शुक्रिया है।
यह दंत्य कथाओं वाला देश है और सदियों से कही-सुनी जा रही दंत्य कथाओं को सहेजने के लिए कहीं कोई संग्रहालय भी नहीं बना हुआ है। बस, पुरखों की ज़बानी हम भी सुनते-कहते आ रहे हैं। सो, हर समस्या के निदान के लिए पुराणों में गोते लगाकर ही हम एक सर्व-सम्मत समाधान की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। वर्ना, हमें बुद्धिजीवी नागरिक कभी नहीं माना जाएगा; हम दुनिया की नज़रों में कूप-मंडूक ही बने रहेंगे; फ़िसड्डी के फ़िसड्डी ही रहेंगे।
चूंकि हर बात, हर आचरण और हर घटना की पृष्ठभूमि में हम पुराण की तलाश करते हैं; इसलिए, आइए, हम भारतीयों के एक सहज-स्वाभाविक प्रवृत्ति अर्थात उनकी छींकों की पृष्ठभूमि और छींकों के महाप्रभाव पर शोध-संधान करें। यह छींक ही है जो कभी भी, कहीं भी आ सकती है। छींकों का प्रेरणा-स्रोत कहाँ है, इस विषय को लेकर विज्ञान भी चुप्पी साधे हुए है। विज्ञान आम आदमी की आस्थाओं और भावनाओं के साथ कोई मजाक नहीं करना चाहता। इसीलिए, वह ऐसे विषयों पर यथासंभव चुप्पी साधे रहने के लिए वचनबद्ध है। इस वैज्ञानिक चुप्पी का निहिताशय यह है कि छींकों का प्रेरणा-स्रोत दैवीय ही होता है। चूंकि इसका कोई ख़ास समय नहीं होता, इसलिए दैवीय प्रेरणाओं से आने वाली छींकों से मानवीय कार्यकलापों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सारा हिंदुस्तान डरा-सहमा रहता है। इन पर कोई नियम-कानून नहीं लागू होता। बस, आप मान लीजिए कि इस छींक का ज़िंदगी और मौत से गहरा रिश्ता है। सफलता-असफलता, हानि-लाभ, जीवन-मरण आदि सब कुछ छींकों की प्रभावकारिता पर निर्भर करता है। बताया जाता है कि चूंकि छींक का उद्भव शरीर के अंतरंग से होता है जहाँ तर्क और विज्ञान का भी कोई वश नहीं चलता, इसलिए इसके बारे में ढेरों मान्यताएं और धारणाएं जुड़ी हुई हैं। इसे दैवी प्रतिक्रिया भी मानते हैं क्योंकि किसी कार्य को शुरू करने या शुरू करने के लिए निर्णय लेने से पहले ही इसका प्रगटीकरण हो जाता है। आख़िर, कोई काम शुरू करने से पहले ही छींक क्यों आ जाती है? मतलब साफ़ है। यह शकुन या अपशकुन का द्योतक है। इसके प्रगटीकरण के बाद इसके प्रभावों के बारे में नाना प्रकार से मन-मंथन होने लगता है। पर, यह तो तय है कि यह छींक है बड़ी असरदार चीज़। शायद ही ऐसा कोई भारतीय होगा जो छींक की महिमा से अवगत न हो। अगर छींक महिमा से कोई व्यक्ति परिचित नहीं है तो हमें बेशक उसकी हिंदुस्तानी पैदाइश पर संदेह करना चाहिए। हाँ, यही उचित है।
बूढ़े-बासी सज्जन अच्छी तरह जानते हैं कि किस समय, किस स्थान पर, किस बच्चे-बूढ़े के द्वारा और किस काम के शुरू होने पर छींकने से उसका क्या परिणाम निकलता है। ज्योतिषियों के पास विविधधर्मी छींकों के परिणाम दर्शाने वाला फ़ेहरिस्त उपलब्ध होता है और उनसे संपर्क साधकर छींक से पड़ने वाले प्रभावों के बारे में समुचित ज्ञान हासिल किया जा सकता है। कौन-सी छींक किसी का बनता काम बिगाड़ सकती है या किस छींक के द्वारा बिगड़ा काम भी बेहतर अंज़ाम तक पहुंच सकता है? मेरा दावा है कि इतिहास और अन्य प्रकार की गाथाओं में जो गड़बड़झालाएं हुई हैं, उनके पीछे प्रभावशाली छींकों की ही भूमिका रही है। हाँ, हमारे पास ऐसे दस्तावेज़ी सबूत नहीं हैं जिनसे हम यह साबित कर सकें कि अमुक काम के बिगड़ने के पीछे छींक की ही भूमिका है या अमुक काम के सफल होने के पीछे छींक का ही योगदान है। पर, छींकों के सबंध में जनसाधारण का आज़माया हुआ अनुभव है।
कुछ ऐतिहासिक-पौराणिक दृष्टांतों पर भी हमें ग़ौर फरमाना होगा। मसलन, आख़िर भली-मानस मंथरा का मिज़ाज़ क्यों बिगड़ा और उसने कैकेयी को दशरथ से भरत के लिए राजपाट मांगने की गुस्ताखी क्यों की? इसीलिए की कि उसकी कमसिन नातिन ने ठीक उस समय छींक मारी थी जबकि वह राम के बारे में अच्छी-अच्छी बातें सोच रही थी और राम को अयोध्या का युवराज घोषित करने के बाद उनके राज्याभिषेक की तैयारी चल रही थी। तो बस, नातिन के छींक मारते ही मंथरा का मिज़ाज़ बिगड़ा; उसको चक्कर-सा आया और उसका दिमाग़ फ़िर गया। ऐसे में, उसके मन में राम के ख़िलाफ़ अनर्गल बातें पैदा होने लगीं। तब उसने कैकेई रानी को बरगलाया और रानी को दशरथ से उनके पुत्र भरत के लिए राजसिंहासन सुरक्षित करने को दो वरदान मांगने के लिए उकसाया। कहिए, है ना, यह कोई दैवी प्रभाव जैसी बात! बहरहाल, उस छींक के परिणामस्वरूप, राम के बजाय, भरत युवराज बने और राम के वनवास होने पर दशरथ की पुत्र-वियोग में मृत्यु हुई। पर, इस पूरे घटनाक्रम में जो बड़ा काम हुआ, वो यह था कि वन में रावण द्वारा सीता के हरण के बाद राम-रावण का भीषण संघर्ष हुआ तथा महापापी रावण का सर्वनाश हुआ और राम-राज्य जैसे अच्छे दिन आए। हाँ, बीसवीं शताब्दी के अस्ताचल से ही हम उसी अच्छे दिन का इंतज़ार इस इक्कीसवी शताब्दी में कर रहे हैं। देखिए, हमारे इंतज़ार का यह सब्र-संतोष कहाँ तक फलीभूत होता है?
एक दूसरा पौराणिक उद्धरण भी प्रस्तुत है: अर्थात महाभारत युद्ध के होने के पीछे महाविनाशक छींक की ही भूमिका रही है। उधर अमन-चैन के माहौल में पांडवों और कौरवों के बीच सत्ता-विभाजन के लिए गहन विमर्श चल रहा था; इधर रानी गांधारी ने इतनी जोर से छींक मारी कि सभागार में भूडौल-सा आ गया। विचार-विमर्श के बीच ही दुर्योधन को मितली-सी आई और उसने झट बाहर निकलकर पांडवों के ख़िलाफ़ साज़िशों का पहाड़ खड़ा कर दिया। उसके बाद उसने अपशकुन शकुनी के बहकावे में पांडवों के साथ चौपड़ का खेल खेला और उस खेल में उसने उन्हें जो शिकस्त दी कि पांडव बारह वर्षों के लिए अज्ञातवास काटने के लिए मज़बूर हो गए। जब वे लौटकर आए तो उन्हें अठारह दिनों के महाभारत संग्राम में कौरवों के साथ भिड़ना पड़ा। पर, अच्छी बात यह हुई कि दुष्कर्मी कौरवों के ख़ात्मे के बाद विशाल भारत की नींव पड़ी और जनता के अच्छे दिन आए।
मेरा मानना है कि छींकों का प्रभाव अच्छा ही पड़ता रहा है। अब किसी को क्या पता कि यूनानी आक्रांता सिकंदर संपूर्ण भारत पर आधिपत्य जमाने से पहले ही वापस क्यों लौट गया? यह सब दैवीय प्रेरणा से ही हुआ। दरअसल, उसके विजय-अभियान के दौरान ही उसके सेनापति सेल्युकस निकेटर ने उसके बाजू में बैठकर कई जोरदार छींकें मारी थीं। इसके दुष्परिणामस्वरूप, पूरे भारत को हथियाने पर आमादा उसकी सेना में यक-ब-यक गृह-वापसी के लिए विद्रोह होने लगा और तब झख-मार कर सिकंदर को यूनान के लिए वापस कूच करना पड़ा। बताया जाता है गृह-वापसी के समय रास्ते में एक स्थान पर एक कबीले के बच्चे ने उसकी पत्नी रोक्सेन के आगे छींक मारी। जो रोक्सेन सिकंदर को बेइंतेहा प्यार करती थी, वह रातो-रात अपने पति की जानी दुश्मन बन गई और उसने उसे ज़हर देकर मार डाला। पर, सबसे अच्छी बात यह हुई कि सिकंदर के पतन के बाद भारतवर्ष में मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई और सदियों तक जनता ने सुख-ऐश्वर्य के अच्छे दिन देखे।
सो, छींक का शुरुआती प्रभाव तो देखने में बुरा-सा लगता है; पर, उसका दूरगामी प्रभाव समाज और व्यक्ति के लिए हितकर होता है। लिहाज़ा, हमारे देशवासी भले ही किसी भी वर्ण या संप्रदाय से ताल्लुक क्यों न रखते हों, वे इन्हीं छीकों से डरे-सहमे रहते हैं। कुछ भी नया शुरू करने से पहले वे इंसानी सोहबत से इसलिए भागते रहते हैं कि कहीं वह छींक कर उनके मंसूबे पर पानी न फ़ेर दे। दरअसल, उनका विश्वास है कि मानव छींक का अंज़ाम हमेशा बुरा ही होता है। पर, नाबदान में बिलबिलाते कीड़ों की भाँति इस भीषण आबादी वाले देश में न आदमी से, न ही उसकी छींक से पिंड छुड़ाया जा सकता है। ऐसे में, कुछ नया करने वाला व्यक्ति निरुपाय हो जाता है। लेकिन, ज़रा आत्म-मंथन कीजिए; इन छींकों से बचने के लिए कोई-न-कोई उपाय तो निकाला ही जा सकता है। हाँ, आप कोई अहम काम शुरू करने से पहले एक टोपी पहनकर ही निकलें और उस पर एक चेतावनी लिखवा लें–‘मैं एक ज़रूरी काम को पूरा करने निकला हूँ; कृपया, मेरे आगे छींक मारने की कोशिश न करें। सहयोग के लिए शुक्रिया!’
लिहाज़ा, इस घोर पापोन्मुख कलियुग में छींकें बुरा परिणाम देने लगी हैं। अब ज़्यादातर छींकें अपशकुन की द्योतक हैं। जैसे अच्छे लोगों का दुर्भिक्ष पड़ता जा रहा है, उसी तरह अच्छे परिणाम देने वाली छींकें भी दुर्लभ हो गई हैं। अब यह नहीं बताया जा सकता कि फलानी छींक का कैसा परिणाम आएगा। इसलिए, सम्हल जाइए। ऐहतियातन, मेरा मशविरा है कि जाड़े या बरसात में कोई व्यक्ति किसी महत्वपूर्ण काम की शुरुआत ही न करे। क्योंकि सर्दी-ज़ुकाम के इन मौसमों में कितनी भी रोकथाम कर लीजिए, बेहया छींकें आ ही जाती हैं। इस बात में कोई संशय नहीं है कि मंथरा की नातिन, गांधारी तथा सेल्यूकस को इन्हीं मौसमों में छींकें आई होंगी। अगर राम का राज्याभिषेक तथा पांडवों और कौरवों का सत्ता-विभाजन के लिए आयोजित मंत्रणा आदि गर्मी के मौसम में आयोजित किए गए होते तो न तो राम को वनवास मिला होता और न ही महाभारत युद्ध छिड़ा होता। इसी प्रकार, जब सिंकदर की सेना गृह-वापसी के लिए उतावली हो रही थी तो उसे भी गर्मी के आने तक कहीं कैंप डालकर अनुकूल मौसम की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी।
मेरे एक अनुरोध पर आप अवश्य अमल करें। यानी अगर आप अपनी बिटिया के लिए वर की तलाश में निकले हों, नौकरी के लिए किसी कम्पटीशन या इंटरव्यू में शामिल होने जा रहे हों या अपनी प्रेमिका से प्रणय-निवेदन करने का मन बना रहे हों तो बाहर तब निकलें जबकि सड़कें सुन्नसान हों और एक भी चिड़िया पंख न मार रही हो। ऐसी बेला तो रात्रि का तीसरा पहर ही है। सो, रात के तीसरे पहर में घुप्प अंधेरे में ही बाहर निकलें और अपने गंतव्य तक तब पहुंचें जबकि वहाँ कोई इंसान मौज़ूद ही न हो। छींकों के प्रतिकूल होने के इस दौर में ऐसा पूर्वोपाय करना निहायत ज़रूरी है।
