दिन विशेष प्रवासी रचना : “माँ की भूली-बिसरी स्मृतियों में” – सुधा गोयल
माँ की स्मृतियों में खोई हुई लेखिका का यह संस्मरण मन को आत्मविभोर कर जाएगा। इसमें लेखिका अपनी स्वर्गवासी माँ के साथ गुज़ारे दिनों को याद कर भाव-विह्वल हो जाती है। वह विभिन्न घटनाओं को याद करते हुए ममतामयी माँ की स्मृतियों को कमाई गई पूँजी की भाँति सहेजकर रखना चाहती है। इस संस्मरण को पढकर आप भी अपनी माँ के साथ गुजारे गए दिनों को अवश्य सहेजना चाहेंगे। – संपादक, डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र

• अधिवास : बुलंदशहर, उ.प्र.
• पता : 290- ए, कृष्णा नगर, डा दत्ता लेन, बुलंदशहर -203001
माँ बहुत कुछ मेरे मन है। कुछ भी नहीं भूली हूँ। आपके स्नेह के कुछ पल आपसे बांटना चाहती हूँ। मैं जानती हूँ कि आप नहीं है; पर, आप मुझमें हैं। आपके बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है। मैं जो सुनाऊंगी, आप सुन लेंगी–यह मैं जानती हूँ। तभी जब चाहे आपसे बतियाने लगती हूँ और है ही कौन, जिससे अपने मन की बातें साझा करुं?
सावन का महीना आया। आप, भाई या बाबूजी से कहकर सामने मंदिर में पीपल के पेड़ पर झूला डलवा देती। मैं अपनी सहेलियों को बुलाती। भाभी भी आ जातीं। कभी आप भी आकर खड़ी हो जातीं। आपके मुंह से मल्हारें निकलतीं। आप एक झूला-गीत की धुन पर, आजादी पर भी गातीं थीं; अब उसके बोल याद नहीं आ रहे। हम सबके साथ, आप और भाभी भी झूलतीं। झूलने के बाद आप सभी को गुझिया घेवर खिलातीं। वह सब आपके द्वारा बनाया गया होता। कितने अच्छे दिन थे। झूला छूटे ज़माना हो गया। अब तो कहीं से भी मल्हारों की धुन नहीं सुनाई देती। तीज आती हैं; अब झूला-गीत नहीं लौटने वाले।
माँ आपने अपने अंतिम समय के पास आने पर अपने सभी बेटा-बेटियों को रुपए दिए और मुझे अपनी वे किताबें दीं, जिन्हें आप पढ़ा करती थीं। आपने किताबें देते समय मुझसे कहा था, “तुझे पढ़ने का शौक है।“ तब, मैंने उन्हें माथे से लगाकर आपका आशीर्वाद सहेज लिया। वे किताबें आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। जब भी आपकी याद आती है, उनके पृष्ठ पलटने लगती हूँ। लगता है, आपको छू रही हूँ। आपके दिए गए वे रुपए सबके पास से तभी समाप्त हो गये; पर, मैं आपका आशीर्वाद थामे आज भी खड़ी हूँ।
आपका वहीं स्नेहमय चेहरा याद आता है जब चोट लगने पर आप फूंक मार देती थी और मैं चोट का दर्द भूल जाती। कितनी भी ठंड पड़ रही होती मैं आपकी गोद में लेटकर, आपकी साड़ी का आँचल ओढ़ लेती थी; तब आप प्यार से बालों में अंगुली फिराती थीं और मैं गहरी नींद में सो जाती थी। ऐसी कौन सी जादू की छड़ी आपके पास थी, पता नहीं। आप चलीं गईं; पर, मेरा सकून भी चला गया। उतनी गहरी नींद कभी नहीं सोई। बालों में मालिश नहीं हुई।
मुझे याद है जब मैं स्कूल से लौटती, आप आम-रोटी पकड़ा देती। पांच सितारा होटल के खाने में क्या स्वाद होगा, जो उस आम-रोटी में होता था। माँ आप जैसा कोई गुण मुझमें क्यों नहीं आया? आपकी सुनाई कहानियां, आपका टोकना, दो चोटी बनाकर रिबन डाल, फूल बांधना, आपके आँचल से हाथ-मुंह पोंछना; अपने आँचल की गांठ खोल पैसे देना, आँचल की गांठ ही आपकी अलमारी थी। अब तो आँचल ही नहीं है।
स्कूल में जितने भी उपहार मिलते, सब आपको लाकर दे देती।आपको कभी खुश होकर सिर सहलाते नहीं देखा। बस,आप सब उपहार संभालकर रख देती और जब ससुराल के लिए विदाई हुई आपने सब उपहार मेरे साथ रख दिए। मेरा मुझे लौटा दिया। वे सब आपके नहीं थे। मेरे थे। मेरी यादें थीं, मेरा ग़ुरुर था। आपने अपने पास कुछ भी नहीं रखा। क्या मेरी यादें भी? बहुत कुछ सोच चुकी हूँ। आपका मुट्ठीभर प्यार समेटे बैठी हूँ और सोच रही हूँ क्या! क्या याद करुं? माँ, बस तुम मेरे सामने हो और जैसे कह रही हो-चिंता क्यों करती है? सब ठीक होगा। माँ तुम्हारे आशीर्वाद का कवच मेरे चारों ओर लिपटा है। फिर, मुझे चिंता क्या? माँ तुम जहां भी हो, मुझे पढ़ रही होगी।
