प्रवासी रचना : “मनमीत” – दीपा ‘दिनेशनील’

दीपा ‘दिनेशनील’ : मीडिया कर्मी, रचनाकार एवं अध्येता।

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (गोल्ड मेडलिस्ट)। पत्रकारिता की शुरुआत ‘आज तक’, ‘हिन्दुस्तान’ एवं ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ से की। फिल्मों एवं दूरदर्शन के लिए स्वतंत्र लेखन। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार) के मुंबई, बेंगलुरु, पटना एवं भुवनेश्वर परिसरों में दस वर्षों का शैक्षणिक अनुभव।

हिन्दी के विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समूहों में सक्रिय भागीदारी। समसामयिक विषयों पर लेख एवं फिल्म समीक्षाओं का नियमित प्रकाशन। यूट्यूब चैनलों के लिए कहानी-लेखन। वर्ष 2023 से बर्लिन में प्रवास। हिन्दी एवं अंग्रेज़ी की ऑनलाइन पत्रिकाओं में लेखन, संपादन एवं नियमित प्रकाशन।

रचनात्मक एवं क्रियात्मक कार्यों में विशेष रुचि। नित नए सृजनात्मक प्रयोगों और गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी।

Deepaa deneshneel

सुबह के 10 बज रहे हैं। आज कई दिनों बाद तृषा घर पर अकेली है। पति और बच्चे अपने-अपने काम पर निकल चुके हैं। तृषा के दो बच्चे हैं। दोनों अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी कर रहे हैं। चार सदस्यों का हँसता-खेलता परिवार है। तृषा अपने जीवन से बहुत खुश और संतुष्ट है, किंतु पिछले कुछ दिनों से उसे तनाव महसूस हो रहा है। कारण उसे पता नहीं, क्योंकि घर और दफ़्तर, दोनों जगह सब कुछ सामान्य है। फिर भी कुछ दिनों से उसका मन बेचैन था। इसीलिए आज उसने छुट्टी लेकर आराम करने का तय किया।

सुबह सबको विदा करके और घर के सारे काम निपटाकर वह अभी बैठी ही थी कि उसके मोबाइल की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर एक जाना-पहचाना नंबर दिखाई दिया। वह याद करने की कोशिश करती है, मगर पहचान नहीं पाती और कॉल उठा लेती है।

“हेलो!”

“कैसी हो?”

“अरुण!!! आज इतने सालों बाद कैसे याद आई मेरी?”

“कमाल है, आवाज़ पहचानने में एक सेकंड भी नहीं लगाया तुमने?”

“हद करते हो! तुम्हारी आवाज़ कैसे भूल सकती हूँ?”

“सुनकर अच्छा लगा!”

“बड़े फ़ॉर्मल लग रहे हो। अचानक मेरी याद कैसे आई?”

“याद तो हमेशा ही आती है, मगर तुम्हारे वादे ने रोक रखा था।”

“कैसा वादा?”

“यही कि तुमसे कभी संपर्क नहीं करूँगा। याद नहीं क्या तुम्हें?”

“कितनी पुरानी बात हो गई वह! तुम अब भी वहीं अटके हो क्या?”

“काश! काश हम आज भी वहीं होते।”

“तीस साल बाद तुमने यह बताने के लिए कॉल किया है!”

“तीस साल, सात महीने, दस दिन और चार घंटे बाद!”

“सेकंड छूट गया!”

“जब कॉल किया था, तब 38 सेकंड हुए थे। अब पता नहीं…”

“तुम ज़रा भी नहीं बदले, अरुण… आज भी वही पागलपन!”

“पागल था… अब तो नॉर्मल हूँ… जैसा तुम चाहती थीं।”

“तुम भी तो यही चाहते थे, नहीं?”

“तुम्हें क्या लगता है?”

“यही कि मैंने गलती की तुम्हारा कॉल रिसीव करके!”

“कॉल कैसे नहीं उठाती तुम!”

“इतने कॉन्फिडेंस से कैसे कह सकते हो?”

“बस पता था मुझे!”

“अरुण, बस करो! मैं रखती हूँ! बाय!”

“अरे सुनो, प्लीज़ फ़ोन मत काटना।”

“तुम्हारी ‘दिल तो पागल है’ टाइप बातें सुनने के लिए मेरे पास वक़्त नहीं है। कुछ ज़रूरी हो तो बोलो… वरना…”

“गुस्सा आज भी नाक की नोक पर है।”

“तुम बातें ही ऐसी कर रहे हो।”

“अरे! इतने सालों बाद बात हो रही है हमारी, न कोई खोज-खबर। उल्टा गुस्सा दिखा रही हो। तुमने जैसा चाहा, वैसा ही करता आया हूँ।”

“फिर आज क्यों कॉल किया? बात तो कभी संपर्क न करने की हुई थी।”

“उसी वादे ने बाँध रखा था!”

“फिर आज क्या हुआ?”

“कुछ ऐसा, जिसके लिए कॉल करना ज़रूरी था।”

“तो बोलो न!”

“बहुत मिस कर रहा हूँ तुम्हें।”

सुनकर तृषा सहम गई। कुछ पल का सन्नाटा छाया और फिर एक आह के साथ आवाज़ आई—

“अरुण! बस करो! बाय!”

“तृषा!!!”

मगर तब तक तृषा कॉल काट चुकी थी। मोबाइल हाथ में लिए वह कुछ देर वहीं जड़-सी हो गई। मन में अचानक सैकड़ों संवेदनाएँ उमड़ने लगीं। तीस साल बाद आज अचानक अरुण का कॉल आना संयोग तो नहीं हो सकता। ऐसा क्या हुआ होगा कि अरुण को अपना वादा तोड़ना पड़ा?

जब से दोनों अलग हुए थे, एक-दूसरे के विषय में जानने का एकमात्र सहारा सोशल मीडिया था। यह कोई योजना बनाकर नहीं किया गया था, किंतु वे जानते थे कि इस तरह उन्हें एक-दूसरे से जुड़े रहने का भ्रम होता रहेगा। अरुण महीने-दो महीने में कभी एक-आध पोस्ट डाल दिया करता था, जबकि तृषा अपने सभी अकाउंट्स पर बहुत सक्रिय थी। फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, लिंक्डइन—सभी पर वह लगभग सब कुछ साझा करती थी। उसे यकीन था कि अरुण उसे ज़रूर फ़ॉलो करता होगा। इन प्लेटफ़ॉर्म्स पर अरुण की कम उपस्थिति से वह खुश नहीं थी, किंतु अरुण इंटरनेट के इस युग का नहीं है, यह वह भली-भाँति जानती थी।

अरुण उसके जीवन से कई वर्ष पहले जा चुका था। यह केवल तृषा का मन जानता था कि अरुण आज भी उसके अकेलेपन का साथी था। आज अचानक उसकी आवाज़ सुनकर वह अतीत में गुम हो गई थी। वह असमंजस में थी कि इतने सालों बाद अरुण ने उससे क्यों संपर्क किया है। अरुण के बात करने का अंदाज़ ज़रा भी नहीं बदला था, मानो वह कभी अलग ही न हुआ हो।

वह यह सब सोच ही रही थी कि मोबाइल की घंटी दोबारा बजी। कॉल उसी नंबर से था। इस उधेड़बुन में कि कॉल उठाए या नहीं, एक कॉल छूट गया। स्क्रीन पर आँखें गड़ाए वह सोचती रही कि फिर घंटी बजी। इस बार उसने झट से कॉल उठा लिया।

“कुछ ज़रूरी है तो बोलो, वरना मुझे तुमसे बात नहीं करनी।” अपने चिर-परिचित अंदाज़ में तृषा ने कहा।

“तृषा, तुम बिल्कुल नहीं बदली! पहले भी ऐसे ही गुस्से से मेरा फ़ोन काट दिया करती थीं। कॉल बैक करना तो दूर, मेरे बार-बार रिंग करने पर भी फ़ोन नहीं उठाती थीं। और जब मैं थककर रुक जाता था, तुम कॉल करके डाँट लगाती थीं—कॉल करते क्यों नहीं रहे? याद है? आज भी वही तेवर!!! शर्मा जी के साथ भी इतने ही नखरे करती हो?”

तृषा कहना चाहती थी—शर्मा जी कहाँ झेल पाएँगे इतने नखरे! तुमने तो मुझे सिर पर चढ़ा रखा था। उतने नखरे मेरे मम्मी-पापा तक नहीं झेल पाते थे, शर्मा जी कैसे झेल लेते? मगर वह ऐसा कुछ नहीं कह सकी। उसके मुँह से निकला—

“मैं नखरे नहीं करती, समझदार हो गई हूँ।”

“मुझे तो तुम्हारा वही बचपना याद है—छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हँस देना… मेरे देर से आने पर मुँह फुलाना… कैफ़े में बैठे-बैठे सुबह से शाम कर देना और तब भी घर न जाने की ज़िद करना… बिल की परवाह किए बिना मेन्यू कार्ड का एक-एक आइटम ऑर्डर कर देना, मानो मेरे पैसों पर तुम्हारा एकाधिकार हो…”

“बस करो, अरुण! क्या हो गया है तुम्हें? आर यू ऑल राइट?”

“सच बताना, तृषा, तुम्हें नहीं याद आता क्या वह सब?” इस बार अरुण की आवाज़ में लाचारी थी।

“आता भी है तो क्या? बीती बातों को याद करके क्या होगा?”

“तुम तो सच में समझदार हो गई हो यार! मगर मैं क्या करूँ? मैं कभी भूल ही नहीं सका वह सब!”

तृषा बोलना चाहती थी—मेरी स्थिति तुमसे अलग कहाँ है, अरुण! मुझे भी तुम्हारी याद आती रही है। तुम अलग क्या हुए, मैं एकदम अकेली पड़ गई थी। मेरी सोच और असलियत के बीच का फ़ासला आज तक माप रही हूँ। असल ज़िंदगी में सिर्फ़ ज़िम्मेदारियाँ होती हैं, अपेक्षाएँ होती हैं और होती है उन पर खरा उतरने की जद्दोजहद… तुमने मुझे कभी क्यों नहीं समझाया? मगर तृषा के मुँह से निकला—

“मेरे पास इन सब बातों के लिए वक़्त नहीं है।”

“जानता हूँ, पहले भी यही कहा करती थीं तुम।”

“ख़ैर, छोड़ो पुरानी बातें। यह बताओ, तुम्हें हुआ क्या है?”

“तुम्हें ऐसा क्यों लगा कि मुझे कुछ हुआ है?”

“अच्छे से जानती हूँ तुम्हें!”

“इतने सालों बाद भी तुमने मुझे पहचानने में एक पल नहीं लगाया। अमेज़िंग! वैसे, तुमने एक सप्ताह पहले मुझे मैसेज क्यों किया था?”

“ओह! तो इसीलिए कॉल किया है तुमने? मगर मैसेज का रिप्लाई मैसेज से करना था!”

“कुछ देर के लिए भूल जाओ सारे कायदे-कानून। बोलो न, क्यों किया था मैसेज? और पूछा भी तो क्या—ऑल वेल?”

“हम्म! पता नहीं। मुझे भी अजीब लगा था, मगर उस दिन न जाने मन क्यों बेचैन था।”

“बेचैन?”

“तुम यकीन नहीं करोगे, मगर मुझे लगा था जैसे तुम तकलीफ़ में हो। रात भर कानों में तुम्हारी आवाज़ गूँजती रही, जैसे तुम मेरा नाम ले रहे हो। उससे पहले इतनी बेचैनी कभी नहीं हुई थी। सुबह भी मन बेचैन रहा। जब कुछ नहीं सूझा तो तुम्हें मैसेज कर दिया।”

“नंबर याद था तुम्हें?”

“सरप्राइजिंगली, जब नंबर टाइप कर रही थी, अपने आप तुम्हारा नंबर दबता गया।”

“इसे क्या समझूँ मैं?”

“इसमें समझने वाली क्या बात है?”

“कुछ नहीं, तुम नहीं समझोगी। मगर तुम्हारे मैसेज ने उस दिन जादू कर दिया था।”

“जादू! वह कैसे?”

“बस यह समझ लो कि तुमने मेरी जान बचा ली।”

“व्हाट आर यू सेइंग, अरुण? यह भी कोई मज़ाक की बात है!” तृषा ने झल्लाते हुए कहा।

“अरे यार! मैं सच में मर रहा हूँ!”

“मुझसे बात करने का इससे अच्छा बहाना नहीं मिला तुम्हें?”

“यार, तुम मुझे कभी तो सीरियसली ले लिया करो।”

“सीरियसली! ऐसे कौन मरता है?”

“तो कैसे मरता है?”

“मुझे क्या पता?” तृषा ने झल्लाते हुए कहा।

“जानती ही क्या हो मेरे बारे में? जब से छोड़कर गई हो, एक बार भी मुड़कर नहीं देखा तुमने।”

“तुम भी तो कभी मेरी सुध लेने नहीं आए।” ओह! यह क्या बोल गई तृषा!

दोनों तरफ़ चुप्पी छा गई। शिकायतें दोनों को थीं। एक-दूसरे की कमी दोनों ने महसूस की थी। अपने जज़्बातों को लेकर अरुण जितना मुखर था, तृषा उतनी ही बेपरवाह थी।

बचपन के दिनों में अरुण तृषा का पड़ोसी था। वह तृषा से दस साल बड़ा था। पड़ोसी होने के नाते वह अक्सर तृषा को अपनी बाइक से स्कूल छोड़ दिया करता था या स्कूल से घर ले आया करता था। कभी ट्यूशन तो कभी शॉपिंग कराने के लिए भी तृषा के घरवाले उसे अरुण के साथ भेज दिया करते थे। इस तरह अरुण तृषा के नज़दीक आता गया।

तृषा पढ़ाई में हमेशा अव्वल आती थी, जबकि अरुण के लिए पढ़ाई डिग्री हासिल करने का साधन मात्र थी। कॉमर्स से ग्रेजुएशन करने के बाद उसने बनारस में ही एक प्राइवेट नौकरी शुरू कर दी थी, जबकि तृषा इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने आईआईटी रुड़की चली गई थी।

हालाँकि अरुण की कमाई बहुत अच्छी थी और उसके पास पैतृक संपत्ति की भी कमी नहीं थी, मगर दोनों परिवारों के संस्कार अलग थे। तृषा का परिवार ऊँची-ऊँची डिग्रियों से लैस, उच्च शिक्षित और योग्य पेशेवरों से भरा था, जबकि अरुण के घर में सामान्य ग्रेजुएट्स और प्राइवेट नौकरियों में कार्यरत लोगों की भरमार थी।

इंजीनियरिंग ख़त्म होने से पहले ही तृषा की नौकरी बैंगलोर स्थित एक मल्टीनेशनल कंपनी में लग गई थी। लाखों का पैकेज, बैंगलोर में घर—कंपनी की तरफ़ से तृषा को बहुत-सी सुविधाएँ मिली थीं। उधर अरुण बनारस से बाहर निकलने की कल्पना से घबरा जाता था। अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना उसके लिए आसान नहीं था और तृषा के पंख बनारस तक सिमटे रहना नहीं चाहते थे।

अरुण जानता था कि तृषा उसकी पहुँच से बाहर है, मगर फिर भी वह खुद को उससे प्यार करने से रोक नहीं सका था। तृषा यह सब समझने के लिए बहुत छोटी थी। उधर अरुण को देखकर कोई भी समझ सकता था कि वह तृषा को कितना चाहता था।

उसे तृषा की हर बात निराली लगती थी। तृषा के मुँह में फ़िल्टर नहीं था—बात किसी को अच्छी लगे या बुरी, वह बेधड़क बोल देती थी। समाज के सारे तौर-तरीक़ों को धता बताते हुए वह बस अपने मन की करती थी। लड़के-लड़की का भेद उसकी समझ से बाहर था। समाज के दोहरे मापदंडों और दकियानूसी विचारों को वह खुलेआम चुनौती देती थी और अपनी बातों का बचाव करने के लिए किसी से भी उलझ पड़ती थी।

सच से उसे विशेष प्रेम था। उसके लिए सब कुछ ब्लैक एंड व्हाइट था—उसके जीवन में कुछ ग्रे था ही नहीं।

दस साल बड़ा होने के बावजूद अरुण को तृषा की बातें क्रांतिकारी लगती थीं। वह अक्सर सोच में पड़ जाता था कि तृषा भी तो बनारस की इन्हीं गलियों में पली-बढ़ी है, फिर उसके विचार इतने स्वच्छंद कैसे हो गए।

“खाना सिर्फ़ माँ ही क्यों बनाएगी? बाकी लोग क्या नहीं खाते? माना कि माँ के हाथों में स्वाद है, मगर घर के बाकी लोग अन्य कामों में तो हाथ बँटा ही सकते हैं। घर का काम सिर्फ़ औरतों को ही क्यों आना चाहिए? पुरुषों को घर के काम क्यों नहीं सिखाए जाते? जब औरतें घर-बाहर दोनों सँभाल सकती हैं, तो पुरुष क्यों यह ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकते? घर के काम का बँटवारा घर के सभी सदस्यों के बीच क्यों नहीं होता? लड़के और लड़कियाँ एक साथ क्यों नहीं खेल सकते? किसी को कुछ भी छिपाकर करने की ज़रूरत क्यों पड़ती है? लोग भ्रष्टाचार क्यों करते हैं? लोग झूठ क्यों बोलते हैं? लोगों के कहने और करने में अंतर क्यों होता है?”

अरुण को तृषा की ये बातें एलियन जैसी लगती थीं। जिन बातों को अरुण जीवन भर सामान्य समझता रहा, उन पर ऐसे विचार पहली बार कोई उसके सामने रख रहा था। उसके पास तृषा की बातों का कोई जवाब नहीं था। यह सब उसकी समझ के दायरे में भी नहीं था।

मगर तृषा की सोहबत में वह एक बेहतर इंसान ज़रूर बन गया था। अब वह महिलाओं के प्रति संवेदनशील हो गया था, देश का एक ज़िम्मेदार नागरिक बन गया था और ऐसा करके उसे खुद पर गर्व भी होने लगा था। कुल मिलाकर, तृषा की सोहबत से उसका जीवन बेहतर होता गया था।

उधर तृषा भी अरुण पर निर्भर होती गई थी। घर-बाहर के हर छोटे-बड़े काम के लिए वह अरुण के पास दौड़ती थी। अरुण कभी किसी काम के लिए मना नहीं कर पाता था और इसीलिए तृषा को वह बड़ा रोचक लगता था।

एकमात्र अरुण ही था, जो उसकी क्रांतिकारी बातों से ऊबता नहीं था। वरना समाज के तौर-तरीक़ों पर तृषा के तीखे प्रहारों से आस-पास के लोग उससे ख़ौफ़ खाते थे। तृषा को उन प्रतिक्रियाओं से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था, क्योंकि अरुण हर बात में उसका पक्ष लेता था।

अरुण तृषा को अपने सपनों की दुनिया में जाने की छूट देता था—एक ऐसी दुनिया, जहाँ सब एक थे। जाति-धर्म, स्त्री-पुरुष, अमीर-ग़रीब का कोई भेद नहीं था। लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे के भोलेपन का फ़ायदा नहीं उठाते थे, बल्कि एक-दूसरे को समझते थे और एक-दूसरे की इज़्ज़त करते थे।

तृषा अरुण के सामने अपने सपनों की दुनिया गढ़ती रहती थी और अरुण उसमें शामिल होता जाता था। तृषा की सपनीली दुनिया अरुण को इतनी भा गई थी कि वह भी उसी का हिस्सा बनना चाहता था। अरुण की मनःस्थिति से अनजान तृषा अपने अल्हड़पन में मस्त रहा करती थी।

अरुण से दूर होने के बाद धीरे-धीरे उसे अरुण के साथ बिताए पलों का अर्थ समझ में आया। उसे एहसास हुआ कि अरुण कैसे उसे पलकों पर बिठाकर रखता था और उसकी छोटी-छोटी ख़ुशियों में शामिल होता था। मगर जब उसे यह बात समझ में आई, तब तक वह अपने पारिवारिक जीवन में उलझ चुकी थी और वास्तविकता समझने लगी थी।

आज अरुण से बात करते हुए वह मन की वे खिड़कियाँ खोल रही थी, जिन्हें वह सालों पहले बंद कर चुकी थी। अरुण की आवाज़ उसे एक बार फिर वर्तमान में ले आई—

“क्या कहा तुमने? मैं नहीं आया तुम्हारी सुध लेने! आना था क्या?”

“सॉरी, आई डिडन्ट मीन दैट!”

“बट आई गेट इट! ज़रूरत नहीं पड़ी। सोशल मीडिया पर काफ़ी एक्टिव हो तुम।”

“अच्छा! स्टॉक करते हो मुझे?”

“स्टॉक! वह क्या होता है?”

“अहम… छोड़ो!”

तृषा भूल गई थी कि इंटरनेट की दुनिया की यह नई शब्दावली अरुण को नहीं पता होगी। वह न तो टेक-सेवी है, न ही उसे इंटरनेट से कोई सरोकार है। वेब ब्राउज़िंग भी उसने तृषा के चक्कर में ही सीखी थी।

“मैं बस इतना पूछ रही थी कि मेरे सारे पोस्ट देखते हो क्या?” उसने समझाते हुए कहा।

“हाँ, सारे के सारे। एक वही तो था तुमसे जुड़े रहने का ज़रिया। तुम नहीं देखती क्या मेरे पोस्ट?”

“बोल तो ऐसे रहे हो, जैसे रोज़ ही डालते हो।”

“हम्म, इसका मतलब तुम भी मुझे फ़ॉलो करती हो।”

“गिनकर चार पोस्ट डाले होंगे तुमने। फ्रेंड लिस्ट में हो, तो अपडेट आ जाता है।”

“चार तो नहीं, मगर तुम्हारी तरह हर बात नहीं बताता फिरता मैं दुनिया को।”

“बताने के लिए कुछ होता नहीं होगा न।”

“तुम जो सोचो। वैसे अच्छा लगता है तुम्हें खुश देखकर।”

“तस्वीरों में तुम्हारी ज़िंदगी भी अच्छी ही नज़र आती है।”

“सोशल मीडिया पर कब किसी को दुखी देखा है तुमने?”

“यानी तुम यह कह रहे हो कि तुम खुश नहीं हो?”

“नहीं, तृषा। मैं यह कह रहा हूँ कि मैं मर रहा हूँ।”

“अरुण! फिर मज़ाक!”

“मज़ाक नहीं, सच है यह।”

इस बार अरुण की आवाज़ में एक गंभीरता थी। तृषा कुछ न कह सकी। अरुण उसकी ख़ामोशी भाँप चुका था। उसने फिर कहना शुरू किया—

“जिस दिन तुमने मैसेज किया था, मैं आईसीयू में एडमिट हो रहा था। मोबाइल किरण के पास था, सो उसी ने मैसेज देखा। मैं उस वक़्त तो उसे कन्विंस भी नहीं कर सका कि यह बस एक संयोग है। उसे लगा कि मैं अब भी तुम्हारे टच में हूँ।”

“उसे पता है मेरे बारे में?”

“शादी के पहले दिन से!”

“अरुण!”

“मैं क्या करता, तृषा? तुम्हारा ज़िक्र किए बिना उसके साथ न्याय नहीं कर पाता।”

“मगर हम तो कभी टच में थे ही नहीं, अरुण। न कल, न आज। तुमने समझाया नहीं उसे?”

“उसकी ज़रूरत नहीं पड़ी।”

“क्या मतलब?”

“मतलब, वह समझ चुकी है कि तुम मेरे लिए क्या हो।”

“अरुण, तुम यह क्या बोल रहे हो! आई रियली डोंट अंडरस्टैंड तुम्हें क्या हुआ है।”

“तुम्हें जानने की ज़रूरत भी नहीं है। मैं जान गया, जो मुझे जानना था।”

“क्या?”

“कुछ तो रहा होगा हमारे बीच, जो इतने सालों बाद तुमने ठीक उसी दिन संपर्क किया, जिस दिन मैं मर रहा था। यह महज़ संयोग तो नहीं हो सकता!”

“कुछ नहीं था यह… इसे कोई थ्योरी मत बनाओ!”

“इसी को दिल का रिश्ता कहते हैं!”

“अरुण! ज़्यादा मेलोड्रामैटिक होने की ज़रूरत नहीं है।”

“मैं मेलोड्रामैटिक हो रहा हूँ! ठीक है, तो बताओ, जिस दिन मैं रात भर तकलीफ़ में था, तुम्हें उसी दिन मेरा ख़याल क्यों आया? मैं रात भर तुम्हारा नाम लेकर कराह रहा था और उधर तुम्हारे कानों में मेरी आवाज़ गूँज रही थी। इधर मैं एम्बुलेंस में सवार हो रहा था और उधर तुम मैसेज भेजती हो—‘ऑल वेल?’ इसे क्या कहोगी तुम?”

“ओह! तुम एकदम फ़िल्मी साउंड कर रहे हो।”

“हा! हा! फ़िल्मी तो था, क्योंकि मोबाइल किरण के हाथ में था।”

“ओह! फिर?”

“फिर क्या, एम्बुलेंस में वह भी साथ थी। मैंने पूछा, किसका मैसेज है, तो मुझे स्क्रीन दिखा दिया।”

“ओह माय गॉड! और इसीलिए तुमने तभी कोई रिप्लाई नहीं किया! इधर मैं सोचती रही कि मैंने मैसेज भेजकर गलती कर दी।”

“गलती! लाइफ़ सेविंग मैसेज था वह।”

“अरे, ऐसे मत बोलो! मरे तुम्हारे दुश्मन!”

“सच कह रहा हूँ, तृषा! तुम्हारे उस एक मैसेज ने मुझमें जैसे जान फूँक दी थी, वरना मेरा राम नाम सत्य उसी दिन तय था।”

“मगर तुम्हें हुआ क्या था?”

“कुछ ख़ास नहीं। डॉक्टर्स कह रहे हैं, मेरा लीवर पूरी तरह से डैमेज हो चुका है। मैं ज़िंदा हूँ, इस पर उन्हें आश्चर्य हो रहा है।”

“लीवर? मगर तुम तो सिगरेट-शराब नहीं पीते थे। डोंट टेल मी कि मुझसे अलग होने के ग़म में देवदास बनकर घूमने लगे थे।”

“हा! हा! सिगरेट तो नहीं, कभी-कभार शराब ज़रूर पीता था। मगर इतनी भी नहीं कि बात लीवर तक पहुँच जाए। एक्चुअल रीजन बता पाना बहुत मुश्किल है…”

“शुगर या बीपी… कुछ है क्या?”

“दोनों, कई सालों से… कुछ-कुछ हेल्थ इश्यूज़ तो हमेशा से रहे हैं।”

“एक्सरसाइज़ तो करते नहीं होगे तुम?”

“कितना जानती हो तुम मुझे! वह तो मैं कभी नहीं कर पाया।”

“ख़ैर, छोड़ो! अब क्या फ़ायदा? वैसे आजकल लीवर ट्रांसप्लांट हो जाता है। मेरे पास मुंबई आ जाओ, आई विल हैंडल एवरीथिंग!”

“हाँ, हाँ, क्यों नहीं! शर्मा जी तो जैसे मेरे लिए ही कमा रहे हैं!”

“शर्मा जी क्यों? तुम्हारा इलाज तो मैं ही करवा सकती हूँ। इतना तो कमा ही लेती हूँ कि तुम्हें अपने बूते सँभाल सकूँ।”

“जब बैंगलोर में अकेली रहती थीं, तब कभी बुलाया नहीं, अब मुंबई बुला रही हो, वह भी पूरे परिवार के बीच…”

“अरे! कहाँ पुरानी बातों में अटके हो तुम। काफ़ी कूल हैं शर्मा जी।”

“तो क्या तुमने भी मेरे बारे में बता रखा है?”

“और नहीं तो क्या?”

“कहा नहीं होगा कभी, मगर मन ही मन चिढ़ते होंगे मुझसे।”

“इसमें चिढ़ने वाली क्या बात है? तुम कोई एक्स थोड़े ही हो, जिसे छिपाऊँ। वैसे अगर एक्स होते, तब भी बता ही देती।”

“जानता हूँ, यह सच्चाई का कीड़ा मेरे अंदर भी तुम्हीं ने डाला था। शायद इसी कारण मैं भी किरण को तुम्हारे बारे में बता पाया था।”

“देखा जाए तो इसमें हर्ज़ ही क्या था? छिपाने वाली कोई बात भी तो नहीं थी।”

तृषा ने कह तो दिया, मगर यह वह भी जानती थी कि जिसे वह केवल जान-पहचान समझती रही, दरअसल वह रिश्ता मन के अंदर ऐसा समा चुका था कि जीवन भर उसकी कमी महसूस की थी उसने। जब उसे स्वयं ही समझने में इतना समय लग गया, तब अब इसे ज़ाहिर करके क्या हासिल होता।

“हाँ, मगर जिस बात को हमेशा छिपाया, वह अपने आप ज़ाहिर हो गई।”

“कौन-सी बात?”

“यही कि हम खुद से कितना भी झूठ कह लें, सच सामने आ ही जाता है।”

“कैसा सच? पहेलियाँ मत बुझाओ! साफ़-साफ़ कहो न!”

“यह प्यार नहीं तो और क्या है, तृषा? मैं जीवन भर इसे एकतरफ़ा समझता रहा, मगर उस दिन तुम्हारा संदेश पाकर पहली बार लगा कि मैं कितना ग़लत था। अब समझ में आया कि तुमने कभी न मिलने का वादा क्यों लिया था मुझसे।”

“यह सब तुम क्या कह रहे हो, अरुण?”

“वही, जो तुम कभी नहीं कह पाती और वही, जो सुने बिना मैं मर नहीं पा रहा हूँ।”

“तुम कहाँ हो अभी?” अपनी असहजता छिपाते हुए तृषा ने बात बदलने की कोशिश की।

“अस्पताल में… अब तो आईसीयू से भी निकाल दिया है। कहते हैं, घरवालों को बुला लीजिए।”

“किरण और बच्चे कहाँ हैं?”

“किरण वरुण और वान्या, वरुण की वाइफ, के पास इसी अस्पताल के मैटरनिटी वार्ड में है। वान्या प्रेग्नेंट है, उसकी डिलीवरी कभी भी हो सकती है।”

“सारे विचित्र संयोग तुम्हारे साथ ही हो रहे हैं। इधर तुम जाओगे और उधर वह पैदा होगा, तुम्हारा पुनर्जन्म!”

“हा! हा! सेंस ऑफ ह्यूमर गया नहीं तुम्हारा। यहाँ तो सब ऐसे सदमे में हैं जैसे मैं ऑलरेडी मर चुका हूँ। रो-रोकर किरण की आँखें सूज चुकी हैं। बच्चे रोनी सूरत लेकर सामने खड़े हो जाते हैं। उनकी हालत देख मुझे भी रोना आ जाता है।”

“मैं सोच भी नहीं सकती उन पर क्या गुज़र रही होगी!”

“अब तुम भी शुरू मत हो जाओ। यहाँ सुबह से मातम का माहौल है।”

“इस वक़्त तुम्हें उनके साथ होना चाहिए।”

“उनके ही साथ था। यह मत समझना कि मैंने उनके साथ कोई अन्याय किया है। किरण की बहुत इज़्ज़त की है मैंने। बच्चों को भी बहुत प्यार करता हूँ, मगर तुम्हारी कमी हर वक़्त महसूस की है। ऐसा नहीं था कि जीवन में कोई कष्ट था, मगर तुम्हारे बिना जीवन अधूरा-सा लगा।”

तृषा के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। वह मौन थी।

“तृषा, तुम सुन रही हो न?”

“हाँ, मैं सुन रही हूँ।”

“काश, हम कभी अलग नहीं हुए होते।”

तृषा की हालत अरुण जैसी ही थी। प्यार उसकी समझ में नहीं आता था। जो अरुण के साथ महसूस होता था, वह कभी शर्मा जी के साथ महसूस नहीं हुआ। मगर जब अरुण साथ में था, तब उसे कुछ महसूस ही नहीं हुआ। अरुण उसे सपनों में उड़ने की आज़ादी देता था, शर्मा जी उसे हक़ीक़त की धरातल पर ले आते हैं। अरुण उसके लिए घंटों इंतज़ार कर सकता था, शर्मा जी पल भर में ऊब जाते हैं। अरुण उसकी छोटी-छोटी बातें याद रखता था, शर्मा जी तो ज़रूरी बातें भी भूल जाते हैं। अरुण के लिए तृषा उसकी पूरी दुनिया थी, शर्मा जी के लिए तृषा उनके जीवन का एक अभिन्न अंग। तृषा को नहीं पता कि अरुण के साथ उसकी ज़िंदगी कैसी होती, मगर शर्मा जी के साथ उसकी ज़िंदगी अच्छी ही गुज़र रही है। अरुण तृषा के अल्हड़पन का साथी था और शर्मा जी उसकी समझदारी के साझेदार। शर्मा जी और अरुण में कोई समानता नहीं है, मगर शर्मा जी के होते हुए भी तृषा ने अरुण की कमी महसूस की है। इसमें प्यार को कहाँ और कैसे फिट होना चाहिए, यह तृषा की समझ से परे है।

“मुझे तुमसे ये सब सुनना बहुत अजीब लग रहा है, अरुण!”

अरुण की बातों से तृषा असमंजस में थी। मन में उसके प्रति उमड़ती भावनाएँ न वह समझ पा रही थी, न व्यक्त कर पा रही थी। जब उसे कुछ नहीं सूझा तो उसने एक बार फिर बातचीत का मुद्दा बदल दिया।

“तुम्हारी बेटी नहीं आई क्या?”

“हाँ, आई है न। तीन दिन पहले ही आ गई थी। अविनाश आज सुबह पहुँचा है। तुम जानती हो न अविनाश को? विद्या का पति।”

“हाँ, उनकी शादी की फ़ोटो देखी थीं मैंने।”

“सच में, कभी-कभी लगता है कि ये सोशल मीडिया न होता तो पता नहीं मैं क्या कर बैठता। तुमसे जोड़े रखने में बहुत बड़ी भूमिका रही है उसकी।”

“किरण को ये सब पता चलेगा तो उस पर क्या बीतेगी?”

“उसे आभास है।”

“ऐसा क्यों लगता है तुम्हें?”

“क्योंकि उसके कहने पर ही मैं तुमसे बात कर रहा हूँ।”

“आई डोंट बिलीव दिस!”

“सच कह रहा हूँ, तृषा। जब उसे पता चला कि तुम्हारा संदेश आना एक संयोग था, हमारा एक-दूसरे से सालों से कोई संपर्क नहीं हुआ है, तब उसी ने तुमसे बात करने की सलाह दी। उसे लगता है मेरी जान तुमसे बात करने के लिए ही अटकी है।”

तृषा की आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। उसकी आवाज़ अटक-सी गई।

“अरुण!”

“तुम रो क्यों रही हो?”

“मैं रो कहाँ रही हूँ! सुन रही हूँ तुम्हें।”

“एक बात कहूँ, यकीन करोगी? मैं तुम्हें एक पल के लिए भी नहीं भूल पाया, तृषा।”

तृषा का कलेजा जैसे मुँह को आ गया। भूली तो वह भी नहीं थी, मगर यह स्वीकारने की हिम्मत उसमें आज भी नहीं थी। वह ख़ामोश रही।

“चुप क्यों हो गई? मुझे पता है यह सब सुनना तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा होगा, मगर आज मत रोको, प्लीज़! बोलने दो मुझे। तुम्हें शायद याद न हो, मगर मुझे याद है, मैंने कहा था कि जीने के लिए तुम्हारे बिना जी लूँगा, मगर मरने के लिए तुम्हारे पास ही आऊँगा!”

तृषा की आँखों के आगे अरुण की कही एक-एक बात किसी फ़िल्म की तरह चलने लगी। उसे सब कुछ अक्षरशः याद था, मगर उसने कहा, “हमारे बीच ऐसी कोई बात नहीं हुई थी!”

“मुझे पता था, तुम यही बोलोगी!”

“अरुण!” तृषा सिर्फ़ इतना ही कह सकी। वह अरुण से बहुत कुछ कहना चाहती थी, मगर उसने ख़ामोश रहना चुना।

“इतने दिनों तक तुमने जैसा चाहा, वैसा ही हुआ। तुम अपनी लाइफ़ में खुश थीं, मैं अपनी… मगर जब अंत समय आया तो ठीक उसी समय तुम्हारा वापस आना… ये प्यार नहीं तो और क्या है, तृषा?”

अरुण बोले जा रहा था और तृषा के गालों से अश्रुधारा लगातार बहती जा रही थी।

“डोंट से दिस, अरुण! प्लीज़ डोंट से दिस!”

“यार, मैं तुम्हारे लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करना चाहता, बट आई कांट हेल्प इट।”

“नहीं, नहीं, कोई मुश्किल नहीं है मेरे लिए। मैं सुन रही हूँ।”

“तुम्हें पता है, लाइफ़ में सब कुछ अच्छा होते हुए भी हमेशा तुम्हारी कमी महसूस की है मैंने। तुम्हारी हँसी, तुम्हारा गुस्सा, तुम्हारी शक्लें बनाना, कभी चुटकी काटना, कभी थपकी देना… तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारा मेरे बालों पर हाथ फेरना… वो सब बहुत स्पेशल था… सिर्फ़ तुम्हारे पास है वो जादू… और कहीं नहीं… तुम सुन रही हो न?”

“हाँ, अरुण, मुझे नहीं पता था तुम इतने सीरियस थे मुझे लेकर।”

“तुम कभी मेरी कोई बात सीरियसली लेती कहाँ थी, अपनी ही धुन में रहती थी बस।”

“ऐसा मत बोल, अरुण!”

“जिस प्यार को मैंने सालों छुपाया, वो मेरे जाते-जाते किरण के सामने आ गया। मुझे माफ़ कर देना, तृषा।”

“अरे! कैसी बातें कर रहे हो तुम?”

“काश कि तुम्हें भी मुझसे प्यार हो पाता।”

“हाँ, डफ़र! डोंट यू गेट इट! प्यार होने के लिए साथ रहना ज़रूरी है क्या? ये प्यार नहीं तो और क्या है, अरुण?”

तृषा इस बार यह कहने से खुद को नहीं रोक सकी।

“बस मुझे यही सुनना था। तुम अपना ख़्याल रखना।”

“अरुण! अरुण!”

“अरे, मरा नहीं हूँ अभी! बस एक बात और—तुम्हें मुझसे ज़्यादा कोई प्यार नहीं करता है, तृषा!”

“मैं जानती हूँ, अरुण! मैं जानती हूँ!”

“अरुण! अरुण! हेलो! हेलो!”

फ़ोन पर सन्नाटा छा गया। तृषा रोते-रोते हेलो-हेलो चिल्लाती रही। कुछ देर दोनों तरफ़ ख़ामोशी छाई रही। फिर तृषा को किसी महिला की आवाज़ आई—

“अरुण अब नहीं रहे।”

“किरण?”

“हाँ!”

“आई एम सॉरी, किरण!”

“थैंक यू, तृषा! आप बात न करतीं तो इनकी साँस अटकी रह जाती। मेरे पति को मुक्त करने के लिए थैंक यू।”

किरण की बात सुनकर तृषा सुन्न हो गई। किरण ने लाइन डिस्कनेक्ट कर दी थी, मगर तृषा अभी भी मोबाइल कान से सटाए शून्य को निहारती जा रही थी। अरुण, जिसके होने के एहसास-भर से वह खुश रहती थी, आज सही मायनों में जा चुका है—इस बार सचमुच, फिर कभी नहीं आने के लिए।

शाम को घर आने पर शर्मा जी ने तृषा का मायूस चेहरा देखते ही पूछा, “क्या हुआ, तुम्हारी शक्ल पर बारह क्यों बजे हैं? एवरीथिंग फाइन?”

“अरुण याद है तुम्हें?”

“हाँ, हाँ, वो तुम्हारा पड़ोसी, जो तुम पर जान छिड़कता था, वही न? क्या हुआ, सब ठीक तो है न?”

इतना सुनना था कि तृषा की आँखें फिर गीली हो गईं। रुंधे गले से उसने कहा, “आज उसका फ़ोन आया था। ही इज़ नो मोर!”

“क्या मतलब? उसने खुद तुम्हें बताया कि अब वो नहीं रहा?”

“शर्मा जी! फिर मज़ाक! उसने फ़ोन पर मेरे सामने दम तोड़ दिया। बाद में उसकी पत्नी से बात हुई। बहुत मुश्किल था वो पल!”

शर्मा जी ने तृषा को गले से लगा लिया।

“ओह, तृषा! आई एम सॉरी! मुझे पता है अरुण तुम्हारे लिए क्या मायने रखता था। संभाल खुद को! मैं हूँ न।”

शर्मा जी का इतना कहना था कि तृषा फूट-फूटकर रोने लगी। शर्मा जी की छाती से लिपटकर न जाने वह कब तक रोई। शर्मा जी ने भी उसे जी भरकर रोने दिया। इतने सालों से कैद मन के जज़्बात का आँसुओं के ज़रिए निकल जाना ही बेहतर था।

तृषा को अपनी किस्मत पर आश्चर्य हो रहा था। ऐसे समाज में जहाँ छोटी-छोटी बातों पर पति-पत्नी एक-दूसरे पर अविश्वास करने लगते हैं, उसका जीवनसाथी उसके अतीत के साथी को खोने के दुःख में उसके साथ खड़ा है।

आज तृषा को एहसास हुआ कि प्रेम सोच-समझकर नहीं किया जाता, वह बस हो जाता है। प्रेम की सफलता उसे कोई पहचान दिलाने में नहीं, बल्कि अपने साथी का मान रखने में है। प्रेम मन की वह मनोदशा है जहाँ कोई शर्त नहीं होती, कोई अगर-मगर नहीं होता। प्रेम बस महसूस किया जा सकता है, न बताया जा सकता है, न समझाया जा सकता है।

आज उसके मन का एक बहुत बड़ा बोझ हल्का हो गया। अरुण के लिए अपनी भावनाओं के कारण वह अक्सर इस कुंठा में रहती थी कि कहीं वह शर्मा जी के साथ अन्याय तो नहीं कर रही है। वैसे करने को कुछ किया कभी नहीं, किंतु मन के भावों से ही असमंजस की स्थिति बनी रहती थी। किरण और शर्मा जी की स्वीकृति ने उसे अपनी इस मनोदशा को समझने में बड़ी मदद कर दी।

अरुण ने जाते-जाते उसे संतुष्टि की सौगात जो दे दी थी। प्रेम के इस अद्भुत रूप को जानकर वह अब शांत थी—अविचल, अविरल और हमेशा की तरह निश्छल।

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