डॉक्टर अशोक अपने शयनकक्ष की बालकनी में दोलन कुर्सी पर गुमसुम बैठे हुए हैं। डॉक्टर अशोक ने ज़िंदगी में कभी भी अपने आपको इतना निरीह और नि:सहाय महसूस नहीं किया। पिछले पूरे हफ़्ते से शर्मिला को लगातार बुखार और खाँसी हो रही थी, इसलिए उसका कोरोना-19 का परीक्षण करवाया। आज उसका परीक्षण का परिणाम पॉज़िटिव आया। परीक्षण के साथ साथ एम्बुलेंस भी आई  और शर्मिला को लेकर अस्पताल चली गई। वह कुछ न कर सका। उसका हृदय किसी अंजान आशंका से भयभीत हो रहा था।

वह बेहाल हुआ जा रहा था। अंतर्द्वंद की हालत में बार-बार उसकी स्मृति बरबस उसको खींच कर, उस दृश्य पर ले जाती है, जहाँ वह पहली बार शर्मिला को मिला था। अशोक नया-नया उस समय ट्रिनिडाड आया था और अपने एकमात्र परिचित, डॉक्टर मधुसूदन व उनकी पत्नी डॉक्टर सीमा के साथ 15 अगस्त के झंडारोहण समारोह के अवसर पर ट्रिनिडाड के भारतीय उच्चायोग में गया था। बहुत ही ख़ुशनुमा माहौल था। उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि वह हिंदुस्तान में ही है। पृष्ठभूमि में गाना बज रहा था, “ये मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी ….”

डॉक्टर मधुसूदन ने डॉक्टर अशोक का परिचय करवाया था। पहले भारतीय उच्चायुक्त तथा उनकी पत्नी से और बाद में शमिला की ओर मुख़ातिब होकर कहा था यह शमिला हैं, कभी भारतीय उच्चायोग में कोई काम हो, तो नि:संकोच इनके पास चले आना। अशोक ने भी उच्चायुक्त और उनकी पत्नी को नमस्कार किया, फिर शर्मीला की ओर मुख़ातिब होकर, नमस्कार शर्मिला बोला। शमिला को अशोक के मुँह से, शर्मिला सुनकर बहुत अच्छा लगा वह कुछ लजा सी गई थी। ट्रिनिडाड में उसको सब शमिला बोलते थे। यहाँ पर ऐसे ही सभी हिन्दुस्तानी नामों को तोड़ मरोड़ कर बोलते थे। उस समय यहाँ के लोगों को सही नामों की समझ ही नहीं थी। शमिला ने शर्माते हुए बोला,

“जी मेरा नाम शर्मिला नहीं, शमिला है,  शमिला पांडे। “

उसने अंग्रेज़ी में ही जवाब दिया और बताया मुझे हिन्दी नहीं आती है।

उस दिन शर्मिला ने गहरे हरे रंग की सुनहरी बॉर्डर वाली साड़ी और उसके साथ सुनहरे रंग का ब्लाउज़ पहना हुआ था। गले में एक मोतियों की माला और कानों में छोटे छोटे मोती के टॉप्स पहन रखे थे। बालों का जूड़ा बाँधा हुआ था। डॉक्टर अशोक को वह पहली नज़र में ही भा गई थी।

डॉक्टर अशोक ने समझा था कि वह कोई हिन्दुस्तानी लड़की है। बाद में उसे पता चला कि वह ट्रिनिडाड की है और भारतीय उच्चायोग में रिसेप्शनिस्ट है।

अगले दिन सुबह डॉक्टर अशोक भारतीय उच्चायोग, कुछ पत्रिकाएं लेने के लिए गए। भारतीय उच्चायोग में रिसेप्शन पर उन्होंने देखा, कांच की खिड़की के पीछे कुछ जाना पहचाना चेहरा लग रहा है। उसे पहचानने में एक मिनट लगा क्योंकि आज शर्मिला ने कुछ अलग ही वेश भूषा धारण कर रखी थी। वह स्लेटी रंग का ब्लाउज़ और काले रंग की स्कर्ट पहनी हुई थी। इस समय वह बिलकुल ही अलग नज़र आ रही थी। उसके बाल खुले हुए थे।

डॉक्टर अशोक ने नमस्कार शर्मिला बोला। इस बार शर्मिला ने अपने नाम को सही करने के लिए नहीं कहा। उसे शर्मिला सुनना ही अच्छा लग रहा था।

शर्मिला ने मुस्कुराते हुए पूछा,

“मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूँ।“

“शर्मीला जी, मैं हिन्दुस्तान से अभी नया नया आया हूँ। अभी नौकरी अगले हफ़्ते से शुरू करनी है। इसलिए सोचा की यहाँ आकर कुछ पत्रिकाएं ले लूँ, तो समय निकालने में आसानी होगी। मैं यहाँ पर डॉक्टर मधुसूदन और उनकी पत्नी डॉक्टर सीमा के अलावा किसी को भी जानता नहीं हूँ। अगले हफ़्ते जब मैं पोर्ट ऑफ़ स्पेन जनरल हॉस्पिटल में नौकरी शुरू करूँगा, तब शायद कुछ और लोगों से भी जान पहचान हो जाएगी। आज तो गुरुवार ही है मुझे अगले हफ़्ते सोमवार से काम शुरू करना है।”

शमिला ने अशोक को वहीं पर रखे सोफ़े पर बैठने के लिए कहा और स्वयं अंदर कुछ पत्रिकाएं लेने के लिए चली गई। थोड़ी ही देर बाद वह पत्रिकाएं लेकर वापस आई  और डॉक्टर अशोक को पत्रिकाएं दे दी।

डॉक्टर अशोक ने शर्मिला से पूछा,  “यहाँ पर देखने के लिए और करने के लिए क्या क्या है? मैं कहाँ जा सकता हूँ?” शर्मिला ने बताया,  “अधिकतर लोग यहाँ शुक्रवार की शाम को लाइमिंग के लिए जाते हैं।“

डॉक्टर अशोक ने शर्मिला की तरफ़ कुछ इस तरह देखा कि शर्मिला समझ गई कि उन्हें लाइमिंग का मतलब समझ नहीं आया। उसने बताया, “यहाँ जब अपने दोस्तों के साथ ड्रिंक्स के लिए या पार्टी में जाते हैं उसे लाइमिंग कहते हैं।“

अशोक ने कहा, ”मैं तो यहाँ डॉक्टर मधुसूदन और उनकी पत्नी के अलावा और किसी को जानता नहीं। मैं उनसे पूछूँगा शायद वो जाने के लिए तैयार हो जायें।“

शर्मिला ने बताया, “शनिवार की शाम को यहाँ पर केडोना ड्राइविंग थियेटर में हिन्दी फ़िल्म दिखाई जाती है। यदि आप चाहें तो आप डॉक्टर मधुसूदन और उनकी पत्नी के साथ वहाँ जा सकते हैं। रविवार को अधिकतर लोग यहाँ समुद्र तट पर जाते हैं, सुबह के वक़्त। उसके अलावा यहाँ देखने के लिए बहुत सारे मंदिर भी हैं।“

पत्रिकाएं लेकर डॉक्टर अशोक शर्मिला से धन्यवाद कहकर अपने घर वापस आ गए।

शाम को उन्होंने डॉक्टर मधुसूदन को फ़ोन किया और पूछा, “कल शाम को लाइमिंग पर चलना है क्या?“

डॉक्टर मधुसूदन भी हँसने लगे, “तुमको लाइमिंग का पता चल गया।”

शुक्रवार को शाम को जब वह और डॉक्टर मधुसूदन ड्रिंक्स के लिए गए तो अशोक ने पूछा, “कल केडोना ड्राइविंग थियेटर हिन्दी फ़िल्म देखने चलना चाहेंगे, आप और भाभी जी?“ डॉक्टर मधुसूदन ने बताया, “इस सप्ताहांत में, मैं और सीमा दोनों ही कॉल पर हैं, हम लोग नहीं जा सकेंगे।”

शनिवार को सुबह डॉक्टर अशोक ने शर्मिला को फ़ोन किया और बताया कि डॉक्टर मधुसूदन और डॉक्टर सीमा इस सप्ताहांत ड्यूटी पर हैं,  इसलिए हम लोग केडोना ड्राइविंग थियेटर नहीं जा सकेंगे। शर्मिला ने सुझाव दिया, “यदि आप चलना चाहते हैं तो मैं और मेरे मम्मी डैडी आप को ले जा सकते हैं और फ़िल्म के बाद आप को वापस आपके घर छोड़ देंगे।“ अशोक ने सोचा घर में पड़े बोर होने से अच्छा है हिन्दी फ़िल्म देखेंगे मन ख़ुश होगा और उसने शर्मिला से हॉं कह दिया।

शाम को सही वक़्त पर शर्मीला और उसके मम्मी पापा सही समय पर उसको लेने आ गए। वह शर्मिला और उसके मम्मी डैडी के साथ हिन्दी फ़िल्म देखने गया। वापसी में शर्मिला ने उनसे पूछा कल आप क्या कर रहे हैं तो अशोक ने बताया कि कुछ भी नहीं क्योंकि डॉक्टर मधुसूदन और उनकी पत्नी दोनों ही इस सप्ताहांत में व्यस्त हैं।

शर्मिला ने कहा, “कल सुबह मैं अपनी कुछ सहेलियों और उनके मित्रों के साथ मराकस समुद्री तट पर जा रही हूँ यदि आप चलना चाहें तो मैं आपको आपके घर से पिकअप कर लूँगी।“ अशोक ने कहा, “नहीं आप को दिक़्क़त होगी मैं फिर कभी डॉक्टर मधुसूदन के साथ जाऊँगा।“

शर्मिला ने कहा, “आपको अच्छा लगेगा चलिए डॉक्टर मधुसूदन के साथ आप दोबारा जा सकते हैं।“

कुछ सोचकर अशोक ने हाँ कर दिया। अशोक को शर्मिला और उसके मम्मी डैडी भले लोग लगे।

अगले दिन सुबह 10 बजे शर्मिला अपनी कुछ सहेलियों के साथ डॉक्टर अशोक को लेने उसके घर आ गई और वो सब एक साथ मराकस समुद्र तट पर चले गए।

जब अशोक ने शर्मिला को नीले रंग का गुलाबी फूलों वाला स्विमिंग सूट पहने हुए देखा तो देखता ही रह गया। वह शर्मिला को समुद्र की लहरों के साथ खेलते हुए देखता रहा।शर्मिला ने उसको भी समुद्र में आने के लिए कहा पर उसने मना कर दिया। वह बाहर ही सुनहरी रेत पर चटाई पर बैठकर, शर्मिला की कुछ दूसरी मित्र जो वहाँ बैठी थी, उनके साथ बैठकर बियर पीने लगा। शर्मिला पानी से बाहर आ गई, उसने तौलिया से अपने बालों को पोंछ कर, फिर उसी तौलिया को अपने बदन पर स्विमिंग सूट के ऊपर लपेट लिया और आराम से पैर फैलाकर, वहीं चटाई पर अशोक के बग़ल में आकर बैठ गई। शर्मिला ने भी कूलर में से एक बियर निकाली और पीने लगी।

अशोक को कुछ अजीब सा लग रहा था। उसने हिन्दुस्तान में लड़कियों को बियर पीते हुए नहीं देखा था। शाम को समुद्र तट से लौटने के बाद शर्मिला व उसकी सहेलियों ने अशोक को उसके घर छोड़ा। शर्मिला ने गाड़ी से बाहर आकर अशोक के गाल पर एक हल्का सा चुंबन दिया और उसको बाय कह कर वापस गाड़ी में जाकर बैठ गई।

पूरी रात अशोक को सपने में बार बार कभी शर्मिला का स्विमिंग सूट पहने, बाल पोंछते हुए चेहरा, सामने आ रहा था और कभी उसका चुंबन देना। वह इस तरह के माहौल का अभ्यस्त नहीं था। उसके मन में अजीब सी हलचल हो रही थी।

सोमवार को उसने पोर्ट ऑफ़ स्पेन अस्पताल में जाकर, अपनी नौकरी शुरू की। सारा दिन नये नये लोगों से परिचय हुआ। इस सब के बीच में भी बार बार शर्मिला का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम जाता था। शाम को घर पहुँचा तो चाय बनाने की सोच ही रहा था कि फ़ोन की घंटी बजी, दूसरी ओर शर्मिला फ़ोन पर थी। पूछ रही थी पहला दिन अस्पताल में कैसा निकला, किस किस से मिले? अशोक कुछ ढंग से बता नहीं पा रहा था। सोच रहा था, हिन्दुस्तान में भी उसने लड़कियों से बात की है। पर उसने इस तरह से कभी महसूस नहीं किया किसी लड़की के लिए।

अशोक ने सोचा, वह तो दो साल के लिए यहाँ आया है। दो साल बाद यहाँ से चला जाएगा। उसे शर्मिला से दूर ही रहना चाहिए। उसका शर्मिला के इतने नज़दीक आना अच्छा नहीं है।

सोमवार से शुक्रवार पूरा सप्ताह उसका अस्पताल की व्यस्तता में निकल गया। शुक्रवार को शाम को डॉक्टर मधुसूदन ने अस्पताल में ही उसको बोला, चलो काम के बाद ड्रिंक्स के लिए चलते हैं, एक अन्य मित्र भी चल रहे हैं साथ में।

अशोक ख़ुश था चलो कुछ और लोगों से जान पहचान हो जाएगी। जब डॉक्टर अशोक और डॉक्टर मधुसूदन अपने मित्रों के साथ मधुशाला पहुँचे तो देखा शर्मिला भी उसी मधुशाला में अपनी एक मित्र के साथ बैठी  बियर पी रही थी।

डॉक्टर मधुसूदन और डॉक्टर अशोक को देखकर शर्मिला ने हैलो कहा और फिर अपनी मित्र के साथ व्यस्त हो गई। अशोक और मधुसूदन भी अपने मित्र के साथ दूसरी मेज पर जाकर बैठे और बैरे को बियर लाने को बोला। थोड़ी देर बाद शर्मिला ने आकर कहा, यदि आप लोग चाहें तो हमारे साथ आकर बैठें। डॉक्टर अशोक और डॉक्टर मधुसूदन दोनों एक दूसरे की शक्ल देखने लगे, जैसे एक दूसरे से सहमति माँग रहे हों फिर दोनों ने एक साथ सिर हिलाया और वे तीनों आकर शर्मिला की मित्र के साथ आकर बैठ गए।

शर्मिला हर बार अशोक को एक नए रूप में ही मिलती थी। अशोक को शर्मिला का खुला खुला व्यवहार अच्छा लग रहा था। उसे शर्मिला का अंग्रेज़ी में बात करना बहुत अच्छा लगता था क्योंकि हिन्दुस्तान में तो उसके मेडिकल कॉलेज में भी आपस में सब लड़कियाँ हिंदी में ही बात करती थीं।

शर्मिला ने कुछ स्नैक्स ऑर्डर किए, सभी ने एक-दो घंटे वहाँ हँसी-मज़ाक करते हुए, कहकहे लगाते हुए बिताए। उसके बाद सब अपने-अपने घर की ओर चल दिए। डॉक्टर मधुसूदन डॉक्टर अशोक को अपने घर रात्रिभोज पर ले गए।

अगले दिन शनिवार को सुबह अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें पिछले सप्ताह तो डॉक्टर मधुसूदन और उनकी पत्नी कॉल पर थे तथा शर्मिला के साथ उसने बहुत अच्छा समय गुज़ारा था।

वह सोच रहा था क्या करें? डॉक्टर मधुसूदन को फ़ोन करके उनके घर चला जाए। पर उसे बार बार डॉक्टर मधुसूदन के घर जाना भी उचित नहीं लग रहा था। उनकी अपनी ज़िंदगी है। उनकी ज़िंदगी में इस तरह हर रोज़ दखलंदाजी ठीक नहीं। मन लगाने के लिए उसने काफ़ी देर शर्मिला से फ़ोन पर बात की। उसे शर्मिला से बात करके अच्छा लग रहा था।

उसे रहने के लिए सरकारी क्वार्टर मिल गया था। सरकारी क्वार्टर, सवाना प्लेग्राउंड से पास था, वह पैदल चलके वहाँ आ गया। वहाँ पर नारियल के पानी के ठेले खड़े हुए थे। उसने नारियल पानी पिया और वहीं पास में पड़ी एक बेंच पर बैठ गया। पार्क में बैठकर आते-जाते लोगों को देखकर उसे अच्छा लग रहा था। वह अपना मन दूसरी ओर लगाना चाह रहा था। लेकिन उसका मन बार बार शर्मिला की याद दिला रहा था। इस समय उसके दिमाग़ पर दिल का क़ाबू था।

अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए। हर वक़्त उसके दिमाग़ पर शर्मिला छायी रहती थी। सब कुछ इतनी जल्दी हो रहा था कि उसे कुछ सोचने का मौक़ा ही नहीं मिल पा रहा था। सारा दिन अस्पताल में निकल जाता। शाम को घर लौटता तो उसे लगता, काश़ शर्मिला घर पर चाय बनाकर उसका इंतज़ार कर रही होती।

उसे शर्मिला का साथ बहुत अच्छा लगता। एक शनिवार की शाम को शर्मिला का फ़ोन आया कि वह उसे लेने आ रही है। वे दोनों बाहर खाना खाने जाएंगे। अशोक भी ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गया।

आज शर्मिला स्वयं कार चलाकर अकेली आई  थी। उसने गुलाबी रंग की बहुत ही सुंदर बड़े गले की, बिना आस्तीन की, लंबी ड्रेस पहनी हुई थी। कानों में लंबे लंबे ड्रेस के मुताबिक़ गुलाबी रंग के झुमके पहने हए थे। अशोक को वह इस समय एक परी जैसी लग रही थी।

वे दोनों एक रेस्तरां में मेज़ की आमने सामने वाली कुर्सी पर बैठ गए।

अशोक ने शर्मिला से कहा, “तुम बहुत खुले दिल की लड़की हो।“ शर्मिला ने कहा, “इसका मतलब मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ?“

“नहीं, मैंने ऐसा कब कहा, मेरा मतलब तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो।“ अशोक मुस्कुराते हुए बोला।

वह दोनों ध्यान से एक दूसरे का चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। दोनों ने आज खाने के साथ वाइन भी मंगवाई थी, कुछ वाइन का सुरूर था, कुछ उम्र का।

शर्मिला ने कहा, “तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, तुम यहाँ के लड़कों से बिलकुल अलग हो।“

अशोक का मन जो अभी तक अनिश्चितता की स्थिति में था, अचानक पूछ बैठा, “मुझ से शादी करोगी शर्मिला?”

ख़ुशी के अतिरेक से शर्मिला की आँखों में आँसू आ गए।

वह भर्राए गले से बोली, ”हाँ“… अशोक मैं तो तुम्हारे प्रपोज़ करने के इंतज़ार में ही थी। दोनों एक दूसरे की हथेली पकड़कर कुछ मिनट यूँ ही बैठे रहे। फिर शर्मिला ने ही अपनी कुर्सी से उठकर अशोक की कुर्सी के पीछे खड़े होकर, पीछे से अशोक के गले में बाहें डाल दी।

खाना खाने के बाद शर्मिला अशोक को उसके घर तक छोड़ने आई। जब अशोक अंदर जाने लगा तो शर्मिला ने गाड़ी से उतरकर अशोक को एक आलिंगन दिया तथा एक हल्का सा चुंबन उसके गाल पर दिया और जाने के लिए मुड़ी।

अशोक ने कहा,  “अंदर आ जाओ, कॉफी पिएंगे।” शर्मिला अंदर जाकर कॉफी बनाई। आज दोनों सोफ़े पर सटकर बैठकर कॉफी पी रहे थे। धीरे धीरे कब दोनों एक दूजे की बाहों में आ गए, शायद उन्हें ख़ुद भी पता नहीं चला। जब उनको होश आया तब तक बात कहीं से कहीं पहुँच गई थी। शर्मिला अपने बाल और कपड़े ठीक कर अपनी गाड़ी उठाकर अपने घर चली गई। अशोक को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है।

शर्मिला के माता-पिता शर्मिला की शादी जल्द से जल्द कर देना चाहते थे।

उन दिनों हिन्दुस्तान फोन करने के लिए ट्रंक कॉल बुक करना पड़ता था। ट्रिनिडाड ऑपरेटर लंदन ऑपरेटर को फ़ोन लगाती थी, फिर लंदन ऑपरेटर दिल्ली ऑपरेटर को, फिर दिल्ली ऑपरेटर आगरा ऑपरेटर को फोन करती थी, उसके बाद आगरा ऑपरेटर घर में फ़ोन लगाती थी। अशोक के घर में फोन नहीं था। पड़ोस वाले चाचाजी जिनके यहाँ ज़ेवरात का व्यापार था, उनके यहॉं फोन लगाना पड़ता था।

पिताजी को वहीं पर बुलाकर सूचना देनी पड़ती। पिताजी पर इस सूचना का क्या असर होता, इस सब के डर से अशोक ने टेलीग्राम भेजना ज़्यादा उचित समझा।

वहाँ से टेलीग्राम का कोई जवाब नहीं आया और यहाँ पर शर्मिला के माता पिता और परिवार वालों ने मिलकर शर्मिला और अशोक की शादी कर दी।

जब तक आगरा में पिता को टेलीग्राम मिला तब तक यहाँ दोनों शादी के अटूट बंधन में बँध चुके थे। शुरू शुरू में तो अशोक के माँ बाप बहुत नाराज़ थे। फिर अपने बेटे की ख़ुशी की ख़ातिर उन्होंने घुटने टेक दिए।

दो साल बाद जब अशोक का कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म हुआ तब अशोक और शर्मिला पहली बार आगरा एक साथ गए। तब तक शर्मिला की गोद में एक प्यारी सी बेटी शिवानी भी थी, जोकि तब एक साल की हो गई थी। छोटी शिवानी और शर्मिला के अच्छे व्यवहार से सभी के गिले शिकवे दूर हो गए। दो महीने पश्चात् तीनों वापस ट्रिनिडाड आ गए।

अचानक फ़ोन की घंटी बजने से उसका ध्यान टूटा शिवानी का फ़ोन था।

“डैडी, मम्मी की तबियत अब कैसी है?

“बेटा आज अभी थोड़ी देर पहले ही मम्मी का कोविद-19 वायरस का परीक्षण पॉज़िटिव आया और एम्बुलेंस मम्मी को अस्पताल ले गई है। मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी तुम्हें फ़ोन पर बताने की। “

“चिंता नहीं करो डैडी, मम्मी शीघ्र ही ठीक होकर घर वापस आ जाएंगी।“ शिवानी बोली।

अंदर से डरते हुए पर ऊपर से अपनी आवाज़ पर संयम रखते हुए अशोक ने कहा, “हाँ बेटा मैं जानता हूँ, तुम्हारी मम्मी जल्दी ही ठीक होकर घर आ जाएंगी। मैं डॉक्टर हूँ फिर भी एम्बुलैंस वालों ने मुझे साथ ले जाने के लिए मना कर दिया। कहा, आपके लिए भी ख़तरा है, आप घर पर ही रहें। आप रिटायर हो चुके हैं। 60 से ज़्यादा ऊपर वाली उम्र के लोगों के लिए यह बीमारी ज़्यादा ख़तरनाक है। हम आपको हर गतिविधि से सूचित करते रहेंगे।

अंदर से तो शिवानी और अशोक दोनों ही डर रहे थे लेकिन ऊपर से दोनों एक दूसरे को कह रहे थे, शर्मिला जल्दी ही ठीक हो जाएगी।

शिवानी के फ़ोन रखते ही फिर से डॉक्टर अशोक का दिमाग़ स्मृतियों में खींच ले गया।

शिवानी धीरे धीरे बड़ी होने लगी थी वह तीनों हर दो वर्ष के बाद, दो महीने की छुट्टी में भारत वर्ष जाते। परिवार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी छुट्टियाँ बिताते और वापस आ जाते। समय कब पंख लगाकर उड़ गया, पता ही नहीं चला। जब शिवानी १८ साल की थी, वह अमेरिका पढ़ने के लिए चली गई। फिर उसने वहीं पर एक अमेरिकन लड़के को पसंद कर लिया और अशोक व शर्मिला ने अमेरिका जाकर उन दोनों की शादी कर दी। अब तो उसके दो प्यारे-प्यारे बेटे हैं। एक आठ साल का क्षितिज और दूसरा चार साल का मिलिंद।

क्षितिज और मिलिंद के साथ खेलने में मुझे और शर्मिला को कितना मज़ा आता था। सोचते सोचते अशोक की नींद लग गई। वह वहीं कुर्सी पर ही सो गया।

अगले दिन सुबह फ़ोन की घंटी से फिर उसकी नींद टूटी। अस्पताल से फ़ोन था। डॉक्टर ने बताया, “शर्मिला को साँस लेने में तक़लीफ़ है, इसलिए उस को वेंटिलेटर पर रख दिया है। चिंता की कोई बात नहीं है। वह जल्द ही ठीक हो जाएगी।”

अशोक का हृदय बहुत ज़ोरों से धड़क रहा था, लेकिन वह शिवानी को बताकर उसको परेशान नहीं करना चाहता था। इसलिए अपने आप को क़ाबू में किया।

थोड़ी देर बाद ही शिवानी का फ़ोन आ गया। तब उसने शिवानी को बताया। रोज़ दिन में 3 बार शिवानी डैडी से बात करती है। दोनों एक दूसरे को समझाते रहते हैं।

एयरपोर्ट बंद है। सभी फ्लाइट्स बंद हैं। शिवानी चाहते हुए भी ट्रिनिडाड नहीं आ सकती है। सिर्फ़ फ़ोन पर ही बात कर सकती है।

डॉक्टर अशोक एक दम एक निरीह बच्चे से हो गए। इतने बरसों में ट्रिनिडाड में उसके कुछ अच्छे मित्र बन गए थे। जिनके साथ एक परिवार की तरह ही उनका मिलना जुलना हो गया था। लेकिन कोविद-19 के कारण आजकल कोई भी किसी के घर आता-जाता नहीं। आजकल सभी मित्र वाट्सएप वीडियो पर ही बात करते हैं। कभी कभी सब मित्र इकट्ठा बैठकर जूम पर या गूगल डुओ पर बात कर लेते हैं।

वह एक बार फिर उसी पड़ाव पर पहुँच गया था जब हिंदुस्तान से यहाँ आया था। वह सोचने लगा अब तो लॉक डाउन खुलने के बाद हवाई अड्डा खुलने के बाद भी हिन्दुस्तान जाकर भी क्या उसका मन लगेगा? माँ बाप को गुज़रे हुये कई वर्ष बीत गए। बहन-भाई सब अपनी-अपनी घर गृहस्थी में व्यस्त हैं। वहाँ किसके पास उसके लिए समय होगा। हिन्दुस्तान के बचपन के मित्रों से इतने बरसों में धीरे धीरे संबंध लगभग ख़त्म हो गए थे।

यहाँ के मित्रों के साथ फिर भी कम से कम सप्ताहांत में साथ उठना बैठना है। यह तो वह समझता है कि पति पत्नी एक साथ दुनिया से नहीं जाते, लेकिन फिर भी उसने इस परिस्थिति की कभी परिकल्पना भी नहीं की थीI

आज अशोक का मन बार बार उस दृश्य पर जा रहा है, जब शर्मिला को एम्बुलेंस लेने आई  थी। शर्मिला कितनी डरी हुई, मायूस लग रही थी। अशोक ने शर्मिला का हाथ पकड़कर, उसका माथा चूमा और कहा था, “शर्मिला हम दोनों को कोरोना वायरस अलग नहीं कर सकता। तुम बिल्कुल नहीं घबराना, तुम शीघ्र ही ठीक होकर, घर आ जाओगी। मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।”

शर्मिला धीरे से मुस्कुरा कर बोली थी “मुझे पता है, इतनी जल्दी मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ने वाली, अभी देखो यूँ गई और यूँ वापस आई।”

डॉक्टर अशोक खड़े खड़े एम्बुलेंस को देखते रहे और एम्बुलेंस उसकी आँखों के सामने से शर्मिला को लेकर ओझल हो गई। आज उसे समझ में आ रहा था कि वह शर्मिला को कितना प्यार करता है। शर्मिला ने भी अपनी पूरी ज़िंदगी उस पर न्योछावर कर दी थी। वह यहाँ ट्रिनिडाड में अपने देश से दूर, अपने परिवार से दूर बिल्कुल अकेला था। पर शर्मिला ने कभी भी कोई कमी महसूस नहीं होने दी।

वेंटिलेटर पर जाने से पहले तक वह शर्मिला से थोड़ी देर फ़ोन पर बात कर लेते थे। अस्पताल में मरीज़ों को फ़ोन पर ज़्यादा बात करने की अनुमति नहीं थी। फ़ोन करने का समय भी निश्चित था। पर जब से वह वेंटिलेटर पर गई है, फ़ोन पर भी बात नहीं होती है।

शर्मिला पूजा पाठ करती थी, मंदिर जाती थी, भजन सुनती थी। पर अशोक का कभी भी इन सब बातों में मन नहीं लगा। आज वह अपने आपको इतना नि:सहाय महसूस कर रहे हैं। वह बार बार उन्ही भजनों को कॉम्पैक्ट डिस्क पर सुन रहे हैं, जिन्हें शर्मिला सुना करती थी, और प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं, प्रभु मेरी शर्मिला को ठीक कर दो।मैं उसके बिना नहीं रह सकता।

जिन भजनों को उसने कभी नहीं सुना। आज उन्ही भजनों को सुनकर, उसे कुछ राहत महसूस हो रही है।

शर्मिला अस्पताल में वेंटिलेटर पर है। वहाँ पर लेटे लेटे वह पूरे वक़्त अशोक के बारे में ही सोचती रहती है। वह अशोक को अकेला छोड़कर कैसे जा सकेगी। अशोक कभी भी अकेला नहीं रह सकता। वेंटिलेटर पर लेटे लेटे, प्रार्थना करती रहती है। उसके दिल और दिमाग़ में हर वक़्त अशोक के कहे हुये शब्द गूँजते रहते हैं। “शर्मिला में तुम्हारा इंतज़ार करूँगा, तुम जल्द ही ठीक होकर घर आ जाओगी।”

आज जब अस्पताल में डॉक्टर शर्मिला के परीक्षण के लिए आए, तो डॉक्टर स्वयं भी, शर्मिला के स्वास्थ्य में अचानक इतना सुधार आने से अचम्भित हो गए।

शर्मिला धीरे धीरे ठीक होने लगी थी। शर्मिला का अशोक के प्रति प्यार और ईश्वर में आस्था दोनों ने ही चमत्कार कर दिखाया।

एक सप्ताह बाद आज उसका कोरोना का परीक्षण भी निगेटिव आया। वह बहुत प्रसन्न थी। उसने तुरंत डॉक्टर अशोक को शुभ समाचार देने के लिए फ़ोन लगाया। उन दोनों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।

शर्मिला आज फिर से डॉक्टर अशोक के ख्वाबों में खो गई थी तथा स्वयं से कह रही थी “देखो अशोक मैं तुम्हारे लिए कोरोना से लड़कर वापस आ रही हूँ।“ आज वह फिर अपने आपको डॉक्टर अशोक के प्यार में पूरी तरह सराबोर महसूस कर रही है। वह अगले दिन की सुबह की सूर्य की किरणों का इंतज़ार कर रही है। वह किरणें जो उसकी ज़िंदगी में एक नयी लालिमा भर देंगी।

-आशा मोर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »