
अबूझ
– सरस दरबारी, कनाडा
“दीदी आपको शादी में आना ही होगा।”
“पर स्वाति मैं किसी को नहीं जानती।”
“मुझे तो जानती हैं न। यह भी जानती हैं कि मेरे जीवन में आपकी क्या अहमियत है। क्या इतना काफी नहीं।”
“हाँ हाँ जानती हूँ स्वाति, पर…।”
” दीदी, मेरे लिए आ जाइए प्लीज।”
और मैं पहुँच गई। इतने आग्रह, इतने अधिकार से कोई बुलाए तो कैसे मना करती।
कितनी अजीब सी बात है, जिन्हें आप कुछ वर्ष पहले तक जानते भी नहीं थे, वे अचानक दिल के कितने करीब हो जाते हैं। अपने प्रेम से, मन में एक ऐसा कोना, दिल में एक ऐसी जगह बना लेते हैं, जो खून से जुड़े रिश्ते से भी अधिक घनिष्ठ, अधिक अपने, लगते हैं। स्वाति से कुछ ऐसा ही रिश्ता था। एक बार उसने भावुक पलों में, मेरा हाथ थामकर कहा था, “दीदी आप में माँ की छवि देखती हूँ। माँ तो बहुत साल पहले ही रूठ गईं थीं, अपनी मर्ज़ी से जो शादी की थी। और फिर ऐसे ही चली भी गईं। उस प्यार के लिए तरसती रह गई। अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हुए। उस एक रिश्ते को बहुत मिस करती थी। आपसे मिली तो वह कमी पूरी हो गई ।
नियति के खेल भी निराले हैं, जब किसी को मिलाना होता है, तो रास्ते भी खुद ब खुद निकल आते हैं। स्वाति से मिलना बहुत ही रोचक परिस्थिति में हुआ था।
हम दोनों के पति एक साथ काम करते थे। उसके पति एक इंटीरियर डिजाइनर थे और मेरे रियल एस्टेट से सरोकार रखते थे। जब भी कोई सौदा होता, तो मेरे पतिदेव घर की सजावट का कॉन्ट्रैक्ट सुभाष, यानि स्वाति के पति को दिलवा देते। व्यवसाय के रहते दोनों बहुत घनिष्ठ मित्र बन गए थे। काम के चक्कर में सुभाष जी अक्सर घर आया करते। बहुत ही मिलनसार स्वभाव के थे। बस एक बात से दिक्कत होती, वे जब आते, कुछ न कुछ लेकर आते, कभी मिठाई तो कभी ड्राइ फ्रूइट्स। उन्हें कई बार टोका भी, ” भाईसाहब इस फॉर्मेलिटी की क्या ज़रूरत है, इसके बिना भी आपका घर में स्वागत अच्छे से होगा।”
और वे हँसकर कहते, ” भाभीजी मुझे खुशी मिलती है लाने में।” उसके बाद फिर क्या कहती, चुपचाप रख लेती। दोनों में इतनी घनिष्ठता के बावजूद यह संयोग ही था कि उनकी पत्नियाँ आपस में कभी नहीं मिली थीं।
एक दिन इन्हें किसी काम से कानपुर जाना था।
हम से बोले चलो तुम भी चली चलो।
“पर तुम तो अपने काम में व्यस्त हो जाओगे फिर मैं क्या करूँगी।” पर इनहोने ज़िद की,
“अरे चलो तो, सुभाष कानपुर में ही रहता है, और इस बार बहुत आग्रह किया है, कि मैं कानपुर आऊँ तो तुम्हें भी लेकर आऊँ।”
“अरे इस बार कौनसी खास बात हो गई।”
“बस हो गई”, कहकर वे हँस दिए।
“क्या बात है, क्या छिपा रहे हो।”
“अरे यार अजीब बात हुई। तुम्हारी किताबें मेज़ पर रखी हुई थीं। किसी क्लाइंट का फोन आया तो मैं बाहर चला गया। लौटा तो उसके हाथ में तुम्हारी किताब थी। उसने पूछा,
“भाभीजी लिखती हैं क्या।”
मैंने बताया , कि शौकिया लिखती हैं।
बात खत्म हो गई । अगली बार मिला तो साश्चर्य बोला, “भाभीजी तो काफी प्रसिद्ध हैं, आप कह रहे थे शौकिया लिखती हैं।”
उसने बताया कि एक दिन उसकी पत्नी उससे बोली, मैं कुछ लोगों को पढ़ती हूँ, और उनसे मिलने का बहुत मन है। तभी उसने तुम्हारी तस्वीर, उसे दिखाई। उसे देख वह बोले “अरे इन्हें तो मैं जानता हूँ।”
“तुम कैसे जानते हो।”
“अरे भाई मेरे मित्र की वाइफ हैं।”
” चल झूठे, सच बताओ।”
“ अरे, झूठ क्यों बोलूँगा”
“अच्छा तो क्या मुझे मिलवा सकते हो”
“जब कहो तब मिलवा दें।”
“बस इसीलिए उसने रिक्वेस्ट की है, कि इस बार कानपुर आइएगा तो भाभीजी को जरूर लाइएगा।”
मुझे आश्चर्य हुआ। “अरे मैं कौनसी बड़ी लेखिका हूँ, थोड़ा बहुत शौकिया लिख लेती हूँ, मुझसे कोई क्यों मिलना चाहेगा।”
“अब मैं क्या जानूँ। उसने बहुत आग्रह से बुलाया है, सोचा जा रहा हूँ, तुम भी साथ चली चलो। सफर भी बढ़िया कट जाएगा।”
“चलो इसी बहाने, जनाब को एहसास तो हुआ। भला हो उसकी पत्नी का, जो उसने मिलने की इच्छा जाहिर की। वरना तो साहब हर बार की तरह हाथ हिलाकर निकल जाते, बिना एक बार भी यह सोचे, कि मेरा समय कैसे कटता होगा।”
“अच्छा अच्छा बोली कसना बंद करो। तैयारी कर लेना, कल सुबह सुबह निकल चलेंगे।”
अगले दिन हम दोनों सुबह ही कार से रवाना हो गए। बनारस से करीब पाँच, सवा पाँच घंटे का सफर था, सो सुबह सुबह ट्रैफिक बढ़ने से पहले ही निकल पड़े।
कितना सुहाना सफर था। दूर तक फैली हरियाली, धान की ताजी कोपलों पर नर्तन करती सूर्य किरणें, हवा के झोखे से लहलहाती घास पर खुद को साधती ओस की बूंदें। पेड़ों पर चिड़ियों का कलरव। मानो पूरी कायनात ने आँखें खोल अंगड़ाई ली हो। यह बगल में गाड़ी चला रहे थे, और मैं उन दृश्यों को घूँट घूँट जज़्ब कर रही थी, जो रोज के क्रिया कलापों में गुम हो गए थे। तभी इनकी आवाज से तंद्रा टूटी।
“सुनो, एक बात सोच रहा हूँ। “
“क्या “
“तुम क्या वाकई इतनी बड़ी राइटर हो कि तुमसे कोई मिलना चाहे।”
” सच पूछो तो यही विचार मेरे मन में भी कई बार उठ चुका है।”
“वह कहीं तुम्हें कोई और तो नहीं समझ रही।”
“धुकपुकी तो मुझे भी लगी है। पता चला बड़ी शान से किसी और उम्मीद में पहुँचे, और वह अजनबियों की तरह मिले, तब तो वाकई भद्द उड़ जाएगी।”
वे जोर से ठहाका मारकर हँसे।
“अगर वाकई ऐसा हो गया तो।”
“चुप रहो। ऐसे ही टेंशनिया रही हूँ, और तुम हो कि और आग में घी डाले जा रहे हो।”
घर के सामने गाड़ी रुकी।
“क्यों तैयार हो, शोडॉउन के लिए”, इन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा
“चुप भी रहो, खूब चुहल सूझ रही है तुम्हें”
“अब ओखली में सिर दे ही दिया है, तो देख लेते हैं,” इन्होंने फिर छेड़ा।
खैर, डोरबेल बजायी।
” आओ आओ सिन्हा। नमस्ते भाभीजी। शुक्रिया आपने मेरी बात रख ली। आइए अंदर आइए।”
खूब सुंदर सजे हुए ड्राइंग रूम में हम दोनों बैठ गए।
“मैं अभी आया।” कहकर भाईसाहब भीतर चले गए।
बहुत करीने से सजा हुआ घर, हर चीज अपने निश्चित स्थान पर, मानो इसी कोने के लिए बनी हो। घर की सज्जा से जाहिर हो रहा था कि एक इंटीरियर डिजाइनर का घर है, और रख रखाव गृहिणी की सुघड़ता का परिचय दे रहा था। हम दोनों ने एक दूसरे को ‘ अब भेद खुला ‘ वाली दृष्टि से देखा। यह मुस्कुराए, तभी ड्राइंग रूम में एक प्यारी सी लड़की नमूदार हुई। मुस्कुराहट बिखेरती हाथ जोड़, वह इतने तपाक से मिली, कि सारा संदेह एक पल में समाप्त..!
“आपसे मिलने का बहुत मन था। जब इन्होंने बताया कि आप आनेवाली हैं, तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ।”
वह बोल कम रही थी, मुस्कुरा अधिक रही थी। खुशी उफनी आ रही थी और वह हर कोने से उसे बहने से रोक रही थी। चौंककर बोली,
“अरे सॉरी दी, दी बोल सकती हूँ न। मारे खुशी के शिष्टाचार भी भूल गयी। नमस्ते भाईसाहब।”
“यही तो मैं भी देख रहा हूँ। पानी लाओ, कुछ मीठा लाओ, इतना लंबा सफर तय करके आए हैं।”
“यह स्वाति है मेरी पत्नी, भाभीजी की बहुत बड़ी फैन। अब तो मान गईं, कि मैं इन्हें जानता हूँ,” उन्होने स्वाति से पूछा।
“जी जी आप बैठिए मैं अभी आयी।”
और मैं स्वातीमय हो गई। इतनी ऊर्जा, इतनी खुशी, मुझसे मिलकर …!
सर्वथा नया अनुभव। उम्मीद से ज्यादा जब कुछ मिलता है तो एक विचित्र सी स्थिति हो जाती है मन की। मैं उसी मनःस्थिति से सामंजस्य बैठाने का प्रयास कर रही थी। आदत जो नहीं थी। मुझे स्थिर होने में थोड़ा समय लगा।
“क्षमा कीजिए भाभीजी, वह ऐसी ही है।”
“बहुत प्यारी है भाईसाहब। पलभर में अपना बना लिया।”
तो यह थी मेरी स्वाति से पहली मुलाक़ात। उसके बाद जितनी बार मिले, घनिष्ठता बढ़ती गई, और पता ही नहीं चला कब मैं उसे एक बेटी की तरह दुलारने लगी। दस साल बीत गए। इस बीच स्वाति ने लेखन के क्षेत्र में कदम रख खूब नाम कमाया। जहाँ देखो छाई हुई थी। उसकी तरक्की देख बहुत खुशी होती।
यही उसका स्वभाव था। वह जिस भी चीज में हाथ डालती, तन मन से उसमें रम जाती। चाहे वह परिवार की जिम्मेदारी हो, ससुराल के प्रति उसके दायित्व हो, बच्चों की परवरिश हो या लेखन के क्षेत्र में उसका दखल। इतने कम समय में उसने इतनी तरक्की कर ली कि वाकई उसकी ऊर्जा और काबिलियत देख ताज्जुब होता।
फोन पर उसने अपने बेटे की सगाई की खबर कुछ इस तरह दी,
” दी आपके बेटे की सगाई हो गई है। बहुत छोटा सा फंक्शन था। लड़की मेरी पसंद की है। आप देखकर बताइएगा, मेरी पसंद सही है या गलत। और हाँ दी, सगाई में किसी को नहीं बुलाया था। बस एक छोटे से फंक्शन में रिंग सेरेमनी कर ली।”
” पर शादी में आपको आना है, इसलिए सबसे पहले आपको खबर दे रही हूँ। कोई बहाना नहीं चलेगा।”
संकोच अब हक़ बन चुका था।
फोन रखकर बहुत देर तक उसी के बारे में सोचती रही। कौन है यह , क्या लगती है मेरी, सोचो तो कुछ भी नहीं, फिर क्यों उसके पाश से बंधा पाती हूँ खुद को। क्यों उसकी बीमारी की बात सुन, बेचैन हो जाती हूँ ।
उससे तो मेरा कोई रिश्ता था भी नहीं। रिश्ता तो उसके पति का इनसे था। इनके जाने के बाद वह रिश्ता भी खत्म हो चुका था। फिर क्या था जो हमें बाँधे रहा। और आज किस बात की सफाई दे रही थी वह, मुझे ना बुलाने की? उसने किसी रिश्तेदार तक को खबर नहीं की थी, सिर्फ घर के चार सदस्य और बहु के घरवाले। बस इस छोटे से समारोह में मेरा स्थान था ही कहाँ, फिर उसके स्वर में इतनी ग्लानि क्यों?
और अब उसका फोन पर यूँ आग्रह..!
टाल न सकी और पहुँच गई, ऐन शादी के एक दिन पहले।
ट्रेन से उतरी तो भाईसाहब खुद लेने आए थे।
देखते ही बढ़कर मेरे हाथ से अटैची ले ली।
“अरे भाईसाहब, रहने दीजिए, भारी नहीं है।”
“क्या भाभी, स्वाति से पिटवाना चाहती हैं। अगर उसे पता चला कि अटैची आप उठाए हुए थीं, तो बवाल हो जाएगा शादी के घर में।”
घर मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था। मेरे पहुँचते ही तपाक से आकर गले मिली।
“थैंक्यू दी, आपने मेरी बात रख ली।”
“अरे कैसी बात करती हो स्वाति, तुमने कहा था आपके बेटे की शादी है, तो कैसे नहीं आती।”
“दी आपके रहने से ढ़ाढस बना रहता है।”
मैं चुप रही। क्या था यह । इतने रिश्तेदारों के बीच, ‘ मेरे रहने’ से ढ़ाढस मिलता है…!
और फिर जितनी भी रस्में हुईं बुला बुला कर मुझसे हर रस्म करवाई।
यह ..यह तो मेरे परिवार की शादी में भी नहीं हुआ था। हमारा समाज एक विधवा को मान नहीं देता।
हर शुभ कार्य से उसे परोक्ष रूप से दूर ही रखा जाता है। अपमान करके नहीं, अपितु अवहेलित कर। उसे तेल चढ़ाने के लिए नहीं बुलाया जाता, क्योंकि यह शुभ काम तो सुहागनें करती हैं। उसे मेंहदी नहीं लगाई जाती, क्योंकि वह अधिकार तो वह खो चुकी होती है।
मैं आदि हो चुकी थी उसकी। इनके जाने के बाद परिवार में दो विवाह हुए। मैं घर की सबसे बड़ी बहु थी, पर मुझे किसी ने नहीं पुकारा। मुझसे छोटी बहुऐं तेल और हल्दी चढ़ा, नेग लेकर किनारे बैठ गईं। मैं वहाँ होकर भी नहीं थी। घर की बड़ी बुजुर्गों के बीच बैठी रही।
वह तो मेरा अपना परिवार था, मेरा ससुराल, वह सभी मेरे अपने, जो कभी सिर आँखों पर बिठाये रखते थे। पर किसी ने मेरी सुध नहीं ली।
एक विवाह मेरे मायके में पड़ा। वहाँ भी मुझे नहीं पुकारा गया। सभी भाभियाँ और दूसरी बहनें, रस्में अदा करती रहीं, किसी ने जानना भी नहीं चाहा कि मैं कहाँ हूँ ।झूठ मूठ को भी नहीं बुलाया।
बस मैं चुपचाप सारी रस्में होती देखती रही। चोट खाती रही। पर आज मैं यहाँ पूरी तैयारी से आई थी। सच स्वीकार लो, तो दर्द नहीं होता।
तभी एक स्पर्श उस चुभन से निकाल लाया।
“दीदी आज आपको मेंहदी लगवाने चलना है।”
“मेंहदी? क्यों? क्या जरूरत है ?”
“अरे वाह जरूरत कैसे नहीं। बस काम निबटाकर चलते हैं।”
मैं मना करती रही और वह मुझे गाड़ी में बैठा पास के बाजार में मेंहदी लगवाने ले गई। रात के 10 बज रहे थे और वह मेंहदी आर्टिस्ट हमारी ही राह देख रहा था।
“सॉरी भैया, थोड़ी देर हो गई। आप तो जानते हैं शादी का घर है, दस काम निकल आते हैं।”
“अरे कोई बात नहीं मैडम। हम आप के लिए ही रुके थे।”
“थैंक्यू भैया। चलो बढ़िया सी मेंहदी लगाओ दी को, दोनों हाथ भर देना।”
“अरे नहीं, बस एक हाथ में शगुन की मेंहदी लगवाऊँगी।”
“अरे दी यह क्या बात हुई।”
“बात मानो स्वाति।” मैने समझाने की कोशिश की।
“अच्छा ठीक है लगवानी तो दोनों हाथों में होगी, चलो जैसी दी कहें वैसी लगा दो।”
और वह मेंहदी लगवाकर ही मानी।
तेल चढ़ाते समय मैं जान बूझकर भीड़ में पीछे बैठी थी, कि आँखों से ओझल रहूँ।
तभी अपने नाम की हाँक सुनी।
“दी कहाँ हैं? दी को बुलाओ”
“मैं यहाँ हूँ स्वाति”,
“वहाँ क्या कर रही हैं, यहाँ आइए, बेटे को तेल चढ़ाइए।”
“अरे इतने सारे लोग हैं तो। मेरी क्या जरूरत, मुझे रहने दो।”
“दी यह बड़ों का आशीष होता है। क्या आप आशीष नहीं देंगी?”
“अरे नहीं स्वाति वह बात नहीं।”
“फिर चलिए, तेल चढ़ाइए।”
और मैं चुपचाप तेल चढ़ाने लगी। मन के भीतर की घुमड़न बाहर आने को बेचैन। बड़ी मुश्किल से रोका था उसे। अपशकुनी नहीं बनना था।
सारी रस्मों के बाद फोटो सेशन हो रहा था।
सभी रिश्तेदारों में तस्वीरें खिंचवाने की होड लगी थी।
मैं चुपचाप पीछे खड़ी थी। भीड़ में स्वाति का उचका हुआ सिर दिखा।
“दी यहाँ आइए।”
“अरे रहने दे स्वाति, बहुत भीड़ है, मैं यहीं ठीक हूँ।”
” ठहरिए मैं आती हूँ,” और भीड़ में जगह बनाती हुई वह मुझे ले गयी, और मेरा हाथ पकड़ सब रिश्तेदारों के सामने खड़ा कर दिया। और अंत तक हाथ पकड़े रही, कि कहीं चली न जाऊँ। यही हाल हर रस्म में रहा, जब तक बहू विदा होकर घर नहीं आ गई, वह साथ साथ लगी रही।
बहू की मुँह दिखाई में खूब नाच गाना हुआ। बहू से मुझे खास तौर पर उसने मिलाया। “इन्हें पहचान लो, यह घर की बड़ी है, मेरी बहुत खास।” बहू ने तपाक से पैर छूए।
उस रात सारा घर सो रहा था। पर मेरी आँखों से नींद नदारद थी। बस एक ही बात मन में घुमड़ रही थी।
इस अबूझ रिश्ते को क्या नाम दूँ…!
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