बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना (व्यंग्य)
कहावत है— “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”, पर यहाँ तो अब्दुल्ला ने बाकायदा ‘को-ऑर्ड’ सेट पहना है और रील बनाने के लिए दीवाना हुआ जा रहा है। हमारे पंच महाराज, जो कल तक मोहल्ले के नुक्कड़ पर बैठकर दुनिया को ‘डिप्रेशन’ का सर्टिफिकेट बाँटते थे, आज न जाने कौन सा ‘फोमो’ जाग उठा कि अपना पुराना डार्क सर्कल वाला चेहरा चमकाकर मेले में निकल पड़े। मेला क्या था, बस ‘दिखावे का एक कबाड़खाना’ था, जहाँ हर कोई अपनी गरीबी को फिल्टर के पीछे छिपाकर खुद को ‘मेन कैरेक्टर’ समझ रहा था।
एक तरफ देखिए— “हटो-बचो-साइड दो”, हुड़दंग मचाती एक टोली आ रही है। ये हैं हमारे ‘इन्फ्लुएंसर’ महाराज। बदन पर कपड़े इतने कम कि रफू कराने को मांस भी न मिले, और गालों पर ‘हाइलाइटर’ ऐसा कि सूरज भी शर्म से बादलों में मुँह छिपा ले। हाथ में जिम्बल पकड़े ऐसे मटक रहे हैं जैसे इंद्र की सभा में अप्सराओं का डेटा पैक खत्म हो गया हो और सारा दारोमदार इन्हीं की कमर पर हो। “ओ भाई! ज़रा एंगल देख के,”—कोचवान तो अब रहा नहीं, अब तो ओला-उबर के ड्राइवर को डाँट रहे हैं, “ब्लॉग खराब हो गया तो रेंट नहीं मिलेगा।” ये राय दुर्लभचन्द के पोते नहीं, बल्कि ‘क्रिएटर इकोनॉमी’ के नए दामाद हैं। मुँह कुकरै काटा नहीं, बल्कि ‘बोटॉक्स’ ने ऐसा सिकोड़ा है कि विधाता भी पहचान पत्र माँगे तो ये अपनी ‘ब्लू टिक’ वाली प्रोफाइल दिखा दें। ब्रह्मा जी भी सोच रहे होंगे कि इसे बनाते वक्त उन्होंने ‘लुक एंड लाफ’ वाला ऐप डाउनलोड कर लिया था या बस कीबोर्ड पर कोहनी लग गई थी।
तभी बगल से एक और नमूना गुज़रा— ‘रियासत की गठरी’ तो दादाजी बेच खाए, अब ये ‘नेपो-बेबी’ अपनी ‘एंग्जायटी’ का बोझ ढो रहे हैं। चेहरा पीला, जैसे हल्दी के ड्रम में डुबकी लगाकर आए हों, पर एटीट्यूड ऐसा कि जैसे पूरी दुनिया इनके ‘पिंपल्स’ की ऋणी हो। नशे और रात भर की ‘गेमिंग’ ने आँखों के नीचे वो खाइयां खोद दी हैं कि उनमें पूरा मोहल्ला डूब मरे। साथ में एक और कुन्दे-नातराश हैं— इनके पूर्वजों ने कभी किताब को हाथ लगाया होता तो शायद आज ये ‘सिग्मा मेल’ बनने के चक्कर में अल्फाबेट न भूल जाते। ये कहते हैं, “पढ़ाई-लिखाई तो स्कैम है भाई, सारा ज्ञान तो पॉडकास्ट में है।” इनके लिए ‘बीफ’ और ‘व्हिस्की’ ही मॉर्डन होने का लाइसेंस है। घर में भले ही चूल्हा ‘ईएमआई’ पर जल रहा हो, पर बाहर ये ‘मिस्टर जान बुल’ बनकर ऐसी अंग्रेज़ी झाड़ते हैं कि शेक्सपियर भी अपनी कब्र में ‘डिक्शनरी’ ढूंढने लगे।
तभी भीड़ में एक ‘मुछंदर’ दिखाई दिया। बालों में तेल इतना कि अगर कोई माचिस दिखा दे तो पूरा मेला ‘दिवाली’ बन जाए। जेब में धेला नहीं, पर हाथ में ‘आईफोन’ का वो लेटेस्ट मॉडल है जिसकी किश्तें इनके पोते चुकाएंगे। खिलौने वाले से पूछते हैं, “भाई, इसमें आरजीबी लाइट है क्या?” जब उसने दाम बताया तो ‘पाकेट खाली’ की वही पुरानी बीमारी उभर आई। बेचारे की पोल क्या खोलनी, ये तो ‘सेल्फ-डिक्लेयर्ड’ नवाब हैं, जिनका वज़ीर भी अब इन्हें उधार नहीं देता।
और वो देखो! रंग-बिरंगी ‘फिल्टर्ड’ सेना। कहीं नियॉन पिंक, कहीं इलेक्ट्रिक ब्लू—ये हमारी ‘क्वीन’ और ‘दिवा’ लोग हैं। हुस्न ऐसा कि मेकअप की परत उतार दो तो असली चेहरा ‘मिसिंग’ रिपोर्ट लिखवाने लायक निकले। ये वो प्रेम के पंछी हैं जो दिल नहीं, ‘क्रेडिट कार्ड’ देखकर फंदे में फंसते हैं। और इनके पीछे पीछे वो ‘सिम्प’ (Simp) महाशय, जो अपनी मर्दानगी को इनके हैंडबैग के नीचे दबाकर चल रहे हैं। ये वही हैं जो किसी ज़माने में मटियाबुर्ज के नवाब रहे होंगे, पर अब बस इंस्टाग्राम की स्टोरी में ‘कैप्शन’ बनकर रह गए हैं।
अंत में हमारे पंडित जी और सेठ जी भी ‘डिजिटल जय गोपाल’ करते हुए दिख गए। कोई ‘तिलिस्म’ है, कोई ‘फेनोमेना’ है, तो कोई बस ‘एआई जनरेटेड’ सा लग रहा है। जवानी के तूफ़ान में ऐसे अंधे हुए हैं कि ‘लॉजिक’ और ‘लाज’ दोनों को ब्लॉक मार दिया है। पंच महाराज ने जब देखा कि यहाँ हर कोई अपनी बेवकूफी को ‘कंटेंट’ कह रहा है, तो उनका बचा-कुचा उदासीन मन भी उब गया। उन्होंने माथा पीटा और मन ही मन संकल्प किया कि “भाई, इससे अच्छा तो अपना कोना और अपनी तन्हाई भली।” घर लौटते हुए बस यही गुनगुना रहे थे कि दुनिया में कुढंगों की कमी नहीं, बस उन्हें एक मेले और एक अच्छे ‘कैमरे’ की तलाश है।
– डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
