अपने भीतर के क़लमकार से मुलाक़ात (डायरी)

अपने अंदर छुपे हुए इस रचनाकार से में अपरिचित थी, पर जब पहचान हुई तो लगा हम अजनबी थे ही नहीं, साथ-साथ एक दूसरे के साया बनकर चल रहे थे, ठीक उसी तरह जैसे ज़िंदगी के साथ-साथ दर्द भी चलता रहता है। दर्द को अगर ज़िंदगी से निकाल भी दिया जाए तो शायद ज़िंदगी उतनी हसीन न हो पाएगी जितनी हम समझते हैं. अपने भीतर छुपी कई बातें अक्स बनकर अंदर मन की तहों में धंस जाती है। जब कलम उन यादों, उन अनुभूतियों को अभिव्यक्ति तक ले आता है, तब जाकर एक हकीक़त सामने आती है जब खुद से मिलना होता है, जानना होता है, पहचानना होता है। हमारे आस-पास के अहसास हवाओं के साथ घुलमिलकर कहीं न कहीं हमारे भीतर ही समा जाते हैं, जिनका हमें ज्ञान ही नहीं रहता। एक दिन सुबह फोन आया “मामा नहीं रहे, शाम को पाँच बजे उठाएंगे।“ मेरी शादी के बाद यह पहला अवसर था जो मैं किसी शोक सभा में शामिल हुई. सास के साथ मामी के घर पहुंची, आगे बढ़कर उन्हें गले लगाया। चारों तरफ सन्नाटे की सरसराहट, हर चेहरे पर उदासी का आवरण, ज़मीन पर लेटे मृत शरीर के आस-पास रोते-बिलखते बेबस ‘अपने’, बस सुर में सुर मिलाकर दुख के आलाप कर
रहे थे. माहौल का सरमाया था-मन की अकुलाहट आँखों को नम भरती रही। शायद दर्द का रंग ही ऐसा कुछ है जो सबका सांझा होता है इसलिए गले से लगते ही छलक पड़ता है, और यह किसी न किसी रूप में अभिव्यक्ति का माध्यम भी बन
जाता है-फिर चाहे वह आंसुओं की भाषा हो या शब्दों की, या निशब्दता की . मेरे साथ भी यही कुछ हुआ. पढ़ी लिखी होते हुए भी कभी कुछ ऐसा लिखने के लिए क़लम उठाई न थी, हाँ उठाती रही कभी धोबी के कपड़े लिखने के लिए, या बाज़ार के सामान की सूचि ले आने के लिए, या महीने भर की आमदनी और ख़र्च के बीच का हिसाब-किताब लिखने के लिए। पर आज विचारों में जो तहलका मचा था उसका मंथन करते हुए जाना कि इस दुख की उम्र भी हमारी दिनचर्या में वही महत्व रखती है जैसे सूरज, जो सुबह को उभरकर शाम ढले अपनी समस्त अस्तित्व के साथ ढल भी जाता है। उसी रात के पिछले पहर बच्चों को सुलाकर पहली बार अपने मनोभावों को कागज़ पर उतारती रही। विचारों के सिलसिले में अनेकों कड़ियाँ जुड़कर, टूटती
रही, सोचों में आकृतियाँ बनती और बिगड़ती रही। जब मैं मामी के पास ज़मीन पर बैठी थी तो वहीं ज़मीन पर पड़ी उस लाल बिंदी पर नज़र गयी, जिसे मिलने वालों के आते-जाते पावों की कतारों ने न जाने कितनी बार रौंदा। पाँवों की धूल से वह बिंदी मटमैली पड़ गयी थी, पर मेरी नज़र भी घूम घूम कर फिर उसी पर आकर टिकती। सफ़ेद कपड़ों से लिपटा हुआ मेरा तन और ज़मीन पर लेटा हुआ निर्जीव मामा का तन सफ़ेद कफ़न से ढका हुआ. जाने कैसा तालमेल है इस बेरंग सफेदी का जो शोक सभा में सभी बेरंग से होकर आते हैं। सोच की सिलवटें खुलने लगी—“कल तक यह माथे पर दमक रही थी, वही आज पाँव की धूल भी नहीं…” तब मन में एक अनजानी हूक चीखते हुए कहती रही कि किसी अपने का होना कितना महत्त्व रखता है. तुम पास रहो / जन्मों जन्मों का दुख मुझे मंजूर है बागी सोच की विचार-श्रंखला पूरे वेग के साथ मन में हलचल मचाती रही। ये कैसा नियम है दुनियादारी का, रिश्तों का, रिश्तेदारों का? क्या इंसान का इच्छाओं का, मनोभावनाओं का यही महत्व है? अगर एक दिन मरना ही है तो फिर कोई भी लक्ष्य हासिल करना, कोई माइने नहीं रखता, अगर ज़िंदगी में आने का कोई खास मक्सद है जैसे ‘बुध’ ने खोजा और पाया, तो क्या हम उस राह के पथिक बनने का प्रयास भी कर रहे है या अंधेरी गोलाकार नगरी में फिरते ही चले जा रहे हैं? जब जब मन ऐसी मनोस्थिति के दौर से गुज़रता है तब दूसरे के दुख में हम अपने दुख की परछाई देखने लगते हैं। इस सिलसिले में पुराने वर्क पलटते हुए जब पढ़ती हूँ तो लगता है कुछ भी नया नहीं है। बस दिल के घाव पुराने है जो नासूर बन कर अन्तर्मन में बस जाते हैं. और सोच सवालों के जवाब पाने की ललक में कुछ और नए रास्ते फलांगती रहती है.

झेले हैं मैंने सन्नाटे/ लम्बे लम्बे गहरे गहरे
तब मैं सुन पाया हूँ कुछ कुछ/ अपने अंतस के तारों के/
मीड़ मीड़ के, झंकृत होते/ मधुर मधुर संगीत भरे स्वर
महादेवी जी का कथन “हमारे असंख्य सुख हमें चाहे मनुष्यता की पहली सीढ़ी तक भी न पहुंचा सके, किन्तु हमारा एक बूंद आँसू भी जीवन को अधिक मधुर, अधिक उर्वर बनाए बिना नहीं गिर सकता।“

जिंदगी किताब भी है और उस्ताद भी
 जिंदगी के सफ़र में जो कुछ सुना देखा और जिया वह कहीं किसी किताब में दर्ज न था. कहते हैं जिंदगी सबसे बड़ी किताब भी है और उस्ताद भी, जो अपनी मर्ज़ी से हर रोज जीवन का एक ऐसा पन्ना खोलती है जिसका सबक न नया होता है न पुराना, बावजूद इसके हर एक को वह पन्ना पढ़ना ही पड़ता है, शायद वही उसके लिए ज़रूरी भी है और मुनासिब भी. Life is like a buffet:  यही जीवन की सच्चाई है. Buffet में हर एक तरह के पकवान परोसे जाते हैं, जिसे जो पसंद हो वह अपनी प्लेट में परोसे, खाए और उसके स्वाद का ज़ायका ले. जो अच्छा न लगे उसे ना ले, शायद वह किसी और की पसंद हो. ठीक इसी तरह जीवन की पगडंडियों पर भी चलते चलते, कभी ऊबड़-खाबड़ पथरीली सड़क से दर गुज़र करना पड़ता है, तो कभी सीधी सड़क पर चलना होता है. यही तो जीवन है जो ऊंट की मानिंद करवटें बदलने से कभी बाज़ नहीं आता. इन्हीं राहों पर हिचकोले खाते इंसान के बाहर भीतर की कसौटी वक़्त की धार पर अपना परिचय देती है. जो कल बीता वह इतिहास बन गया, आने वाला ‘कल’ जो आज के गर्भ में छुपा हुआ है वह अनजाना (मिस्ट्री) है, बस एक ‘आज’ ही है जो हमारा है जिसमें हम जी रहे हैं, सांस ले रहे हैं अपनी मर्ज़ी से, कुछ कर पाने में सक्षम हैं चाहे वह खुद के लिए भला हो या बुरा. किसी का इसमें हस्तक्षेप नहीं है. All actions by thought, word, and speech are voluntary. और यह भी एक सच है कि उस किए हुए कर्म के हम खुद ही जिम्मेदार हैं, जिसका फल भी हमें ही चुकता करना है. कब-कहाँ-कैसे यह नियति का निर्णय है. हमें सिर्फ कुछ करने की आज़ादी है पर अपने हक़ में फैसला करने की नहीं. सदियों से चले आ रहे इस क्रम में हर इंसान अपनी अपनी सलाहियत के
अनुसार जो कुछ भी सीखता है वह उसके तजुर्बात में दर्ज हो जाता है. उसकी पसंद नापसंद का मात्र चुनाव करना भी उसके बस में नहीं. वह तो सिर्फ अपने मर्ज़ी के अनुसार तजुर्बों की अनुभूतियों को अभिव्यक्ति के माध्यम से ज़ाहिर करता है.

जीवन की पाठशाला में दाखिला…
ज़िन्दगी की किताब से पन्ना दर पन्ना हर रोज़ पढ़ना पड़ता है. यही जीवन का सार है, जो ज़िन्दगी सिखाती है. जीवन एक तवील सफ़र है, जिसके साथ और कई सफर चलते रहते हैं. कहते हैं, कहकशां में कहकशां हैं और भी… जिंदगी को मैंने जैसे जाना, पहचाना उससे प्यार किया है. आज भी कोई शिकायत नहीं, और आज तक न ऐसा कोई  गणित ईजाद हुआ है जिससे
मूल्यांकन किया जाय कि जिंदगी ने हमें क्या दिया और क्या छीना? कोई मापदंड भी नहीं कि अपने आप को परख पाएं. वैसे भी सेल्फ जजमेंट सही हो इसकी भी तो कोई  खातिरी नहीं. मेरी आस्था उस पैदा करने वाले पर शायद, शायद नहीं, निश्चित ही तब भी थी जब मेरी जीवन रूपी नैया गिर्दाब में धंस रही थी, और आज भी वही आस्था क़ायम है, कि करने वाला भी वही और कराने वाला भी वही है. मैं तो फ़क़त एकमात्र वसीला हूँ. आगाज़ और अंजाम के बीच का फासला तय करने में मैं प्रयत्नशील, कुछ इस तरह जैसे कोई अस्थाई जॉब मिला हुआ हो, जो क़दम दर क़दम आगे बढ़कर कार्य को संपूर्ण करके तजुर्बों के शुमार में दर्ज करती हूँ. कच्चे मटके को पक्का करना, काम उस कुंभार का. मैं मात्रा मिट्टी, वह भी कच्ची. बचपन, विभाजन के दौर में गुज़रा. लड्पडाण (विस्थापन) बस जाने में बाधा बनता चला गया, कुछ भी आसान न था, अपने उखड़े वजूद को फिर से नई मिट्टी में रोपना एक संघर्ष क दौर रहा जो हममें से बहुतों ने देखा और भोगा है. उसका दंश अब तक नसों के तहों में सरसराहट पैदा करता है. हैदराबाद दक्षिण में आकर बस जाना हुआ. शुरूवाती शिक्षा हिंदी में, फिर अंग्रेजी में हुई. उस प्रांत में तेलुगू बोली दूसरी भाषा के रूप में पढ़ने की अनिवार्यता थी, जिसकी मान्यता ने मुझे दक्षिण भारत की उस भाषा से परिचित करवाया. वह
दौर भी खत्म हुआ, क़दम आगे बढ़े. ज़िन्दगी का एक और पड़ाव आया, यूँ कहें कि दूसरा जन्म रहा, जो हर औरत के जीवन का अहम् हिस्सा होता है, अपनी स्थापना करने व् अपनी निजी पहचान पाने का. 1961 में शादी के बाद मुंबई में बस जाना पड़ा. यहाँ औरत के हिस्से में अनेक जवाबदारियाँ आती है, एक पत्नी की, बच्चों के बाद एक माँ की, और अनेक दूसरे रिश्तो को निभाने की रस्म अता करनी पड़ती है. हर एक इन्सान के जीवन में यही मौसम आकर गुज़र जाते हैं. स्थाई कोई दौर नहीं. बदलते हुए मौसमों की मानिंद, धूप-छांव की तरह आती-जाती अवस्थाएं-बालपन, जवानी और अधेड़ उम्र की दहलीज़ से होकर जीवन की राह आगे बढ़ती है. आज का दिन गुज़रता है, जो महसूस किया, जिया, वह हर पल हमें आत्मविश्वास की डगर पर ला खड़ा करता है. मैं भी सभी रिश्तों की डोर में बंधी हुई नारी मात्र नहीं, एक पत्नी, एक माँ, एक बहू, बेटी होने के साथ साथ कई और जवाबदारियों व् गर्दिशों के दौर से गुज़री. हर आज़माइश के पड़ाव को पार करते हुए आज सूरज के सामने खड़ी हूँ.
जिंदगी यही है सबके लिए-यकसी, सूरज की रोशनी की तरह. बस नज़रिया अलग अलग रहता है, सूरज को दरवाजा खोल कर देखें, या फिर खिड़की.
1972 में नागरानी साहब के देहांत के पश्चात, पहाड़ जैसी मुश्किलातें, सामने मुंह उठाये खड़ी रहीं. किसी के होने और न होने का अहसास क्या होता है, यह तब जाना. तीस साल की उम्र में तीन बच्चों के साथ इस जीवन के महासागर के मंझधार में मेरी नैया पार लगाने वाला भी यकीनन वही जग का पालनहार है. यह मेरी अटूट आस्था है जो आज तक मुझे इन पगडंडियों से पार, यहाँ तक ले आई है. कोई तो है जिसके पदचिन्ह मेरी राहों को सुगमता बख्शते हैं, जिनपर चलना मेरे लिए ज़ियादा मुश्किल नहीं हुआ. मुश्किलें तो और होती है यह उनसे पूछो जो दिन रात जिंदगी बसर करते हुए यह भी नहीं जानते हैं कि दुख क्या है
सुख क्या है अंधेरा क्या है, रोशनी क्या है? वह कशमकश का कौन सा दौर था, नहीं जानती. जिसने शिद्दते-शौक को अंजाम
तक लाने में मेरी मदद की. क्यों वक़्त मुझसे यह सब कुछ करवाता गया, किस कारण, नहीं जानती पर, इस बात का संपूर्ण विश्वास है इस करने कराने के पीछे उस विधाता की रम्ज़ रही. नेमतें रोज हमारे सामने रक्स करतीं हैं, शायद हमें पहचानने वाली वह नज़र नहीं है, या शायद हम कुछ और ढूंढ रहे हैं जो हमारे हिस्से में नहीं है. पाना और खोना-अगर हम इस महाजाल की सतह से ऊपर उठकर देखें तो हमें आभास होगा कि सूरज उगने के साथ, कुदरत हमें एक दूसरा नया दिन जीने के लिए देती है,
खुद को जानने व् पहचानने के लिए, अपना कुछ निजी काम करने के लिए.
Life is a gift to live, to enjoy, to serve and to attain the purpose of
human birth. कुछ इस तरह सोच कर चलने के लिए कि- It is the first day
of the rest of my life.
फिर तो रोशनी ही रोशनी होगी और हम!
एक शायर के ख़याल की तरह इस करिश्मे का अहसास महसूस किया जा सकता
है जो कहता है–
“नुक्ते के हेर फेर से उस से जुदा हुआ
नुक्ता पलट कर रख दिया, वही खुदा हुआ”
रुककर, पलटकर, पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि जीवन मुझपर मेहरबान रहा है- कुछ छीनकर, ज़्यादा दिया है: एक रोशनी पाई जो मेरे मन के वहमों, भरमों के अंधेरों से निकालकर मुझे जीवन के रौशन शाही मार्ग पर ले आई. सबसे
बड़ी नियामत जो जिंदगी ने मुझे तोहफ़े में दी है वह है मेरी प्यारी सिंधी भाषा, मेरे वतन की बोली, जो मैंने बचपन में न तो पढ़ी, न लिखी, पर बड़ी उम्र के इस पड़ाव पर उस भाषा को लिखना-पढ़ना सीखकर यह पाठ पढ़ा कि अपनी मात्रभाषा हमारे अस्तित्व की बुनियादी नींव है, हमारी असली पहचान है, हमारी तखलीक की लौ है. और आज इन पगडंडियों पर चलते हुए इस बेइंतहा लम्बे सफर के बाद यह अहसास मन में विश्वास बनकर बस गया है: “I walk on the footsteps of one who walks before me.” न जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे मैं किसी मकसद के लिए उन्हीं रास्तों पर चल रही हूँ, जो कुदरत ने मेरे लिए तय किए हैं. वही मेरे सामने के बंद रास्ते खोलते रहती है, और यह भी सच है जिन रास्तों पर मुझे नहीं चलना है वे दर बंद कर देती है. इस खुलने और बंद होने की तहों में मैं जिंदा हूँ, वह कोई और थी जो मेरे भीतर मर गई- वह डरी हुई सहमी सहमी नारी,
वह कमजोर माँ. दोनों लड़कियों की शादी 1983-1986 में हो गई. तद पश्चात मेरे कांधों का बोझ कम हो गया. मेरी जवाबदारियों को काफ़ी राहत मिली, और 1994-1995 में मुझे जैसे सिंधी भाषा की पाठशाला में दाखिला मिली. मैंने अपने दिल के दरवाज़े खोल कर ज़िन्दगी को आगोश में भर लिया है. जैसी थी और जैसी है, मुझे स्वीकार है. कोई शिकायत नहीं, कोई शिकवा नहीं. बस एक तमन्ना शुक्रगुज़ारी की कायम रहती है-कि यह क़लम मेरा साथ निभाते आई है, इसकी धार ही मेरी सोच को शब्दों में कलमबंद कर पाई है. हर नए सफर के नए मोड़ पर, नई आशाएं, नई आकांक्षाएं लिए मेरी भावनाएं खुद को ज़ाहिर करने के
लिए छटपटाती हैं, यही अभिव्यक्ति है का सार है, यही मेरा रचना संसार.
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– देवी नागरानी

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