अतीत के पन्नों से
मेरी यादों का फलक
वो कहते हैं न, ‘स्काई इज द लिमिट’ कुछ ऐसे ही मेरे जीवन की पगडंडियों के निशान हैं जो अब धरती के चरण स्पर्श के बाद मेरी सोच के साथ सफ़र करते हुए आसमान को छूने लगे हैं.
जब भी कोई याद ज़हन में ताज़ा हो उठती है तो वह और अधिक निखरी हुई, मुस्कुराती हुई मुझसे मिलती है, शायद इसलिए कि जीवन के हर मोड़ पर मैंने अपने ज़हन के हर कोने में उन्हें आश्रय दिया है. वक़्त बेवक़्त वे मेरे दिल की धड़कनों में घुल मिलकर बिना आहट मेरी यादों के आकाश की सैर करते हुए मुझे पुचकारती हैं, बहलाती हैं, ललकारती हैं…और मैं… क़लम से कागज़ पर उनके सजीव चित्रण को उकेर पाती हूँ.
याद की बूँदें हैं बरसी बनके शबनम आज यूँ
दूरियां नज़दीकियों में हो रही तब्दील ज्यूँ
यह दिल भी क्या चीज़ है, जो माप तौल में तो मुट्ठी भर का है, पर अपने अंदर न जाने कितने तहखाने, तहखानों में तहखाने, जिनकी भीतरी सुरंगों से गुज़रते उम्र का अरसा बीत जाता है. पता ही नहीं चलता कि सफर कहां से शुरूहुआ, यह भी पता नहीं चलता कि खत्म कहां होगा?
बस बेपरवाही व बेख़बरी में चले जा रहे हैं अपने ही उन्मादों के दायरे में, ठीक वैसे, जैसे एक बैल जिसकी आँखों पर पट्टी बंधी हो और वह हल में जोता हुआ एक कील से बंधा हुआ निरंतर गोल गोल घूम रहा हो. जब वह मुक्ति द्वार के सामने से गुज़रता है तो बिलकुल बेख़बर सा रह जाता है. शायद जीवन के इस मोह माया के चलन में वह इतना रच-बस गया हो, कि यही जीवन का सार उसे भा गया हो.
ये जीवन है… इस जीवन का…
यही है…यही है… रंग रूप…
थोड़े ग़म हैं…थोड़ी खुशियां…
यही है…यही है…छांव धूप…
यही जीवन की रीत है जिसे अपनाने के सिवा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं. अपनी मर्ज़ी से बेपनाह इच्छाओं की चादर ओढ़ लेते हैं, जो कभी पूरी होती हैं कभी नहीं. फिर निराशा का सिलसिला जुड़ता चला जाता है. संघर्षों की चट्टान से सर को टकराकर रास्ता निकालने का प्रयास ज़ारी रहता है, और जीवन के ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर चलते-चलते जीवन की शाम आ जाती है. सामने सूर्यास्त का विस्तार दिखाई देता है, और जीवन में भागते भागते बहुत कुछ पाने के बाद भी ‘कुछ’ न पाने का अहसास मन में एक अफ़सोस की भावना भर देता है. पर कुछ कर पाने और न कर पाने की अवस्था से गुज़रते हुए कालचक्र के उसी मोड़ पर चाहे अनचाहे ही ठहराव् पाना पड़ता है.
लो, मैं भी कहाँ से कहाँ ख्यालों की बाढ़ में बहती चली जा रही हूँ. दिल के तहखाने के पहले पड़ाव की कुछ रेखाएं, कुछ आप बीती की बातें जग बीती के साथ तो जोड़ लूं. वक़्त अब है, कब तक है कह नहीं सकती…पर सफ़र तो सफ़र है… रुकना नहीं है… बस चलते जाना है…आगे और आगे…
देवी नागरानी
