“मोरपंख”- प्रवीण ‘बनजारा’

सब उन्हें माताजी के नाम से जानते थे।
उस दिन बड़े तड़के जब नींद खुली तो अंधेरा ही दिखा। गली के एक खम्भे के लाटू की रोशनी जाने कहाँ से चुपके से आकर नंदलाल जी के केश पर लगी एक चमकी को टकरा रही थी। वही छोटी सी रोशनी अंधेरे में एक चमक मार रही थी।
वे उठ कर बैठ गयीं और कृष्ण बंसीवाले को हाथ जोड़ प्रणाम किया।

‘गोपाला गोपाला! तू ही है जो मेरी जान में ऊर्जा भर मुझे चला रहा है। तू ही है जो मेरे अंधेरे को रोशन कर रहा है। तू ही मेरा बल है मनोबल है। मेरी लाठी को पकड़ सहारा देता है कि मैं चल सकूं।‘

देह में थोड़ी ऊर्जा आयी और ‘हरे हरे कृष्ण कृष्ण’ कहते हुए चादर उतारकर पलंग के नीचे पांवों से टटोलकर चप्पलें डालीं और पूरा जोर लगाकर पलंग का सहारा लेकर उठ खड़ी हुईं।

‘गोपाल, तू तो मेरे आसपास ही है, तेरा ही सहारा है। तू ही बेड़ा पार लगाइयो।‘ ‘गोपाला गोपाला’, कहते हुए उन्होंने किवाड़ खोला।

कमरे से निकल माताजी ने सर उठाकर मिचमिचाती आँखों से आसमान की ओर देखा। आसपास के मकानों की दीवारों से घिरा हुआ आसमान का टुकड़ा कुछ सितारे लिये बैठा था, जो गली के खम्भे से लटके लाटू की चौंध में धुंधले पड़ रहे थे। आसमान ने भी मानो हंसी ठट्ठे में कहा, ‘माता जी, जैसे तुम सबकी माता हो वैसे ही मेरी भी हो। तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था। लो, ये थोड़े से प्रकाश कण बचे हैं। आँखों से इनको समेट लो। फिर तो सूरज अपने घोड़े लेकर आयेगा और ये बेचारे अपनी जान बचाकर घर को दौड़ेंगे!’ माताजी ने हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया, ‘गोपाला गोपाला’ फिर शीतल जल से हाथ मुंह धोकर रसोई के सामने आ खड़ी हुईं।

किवाड़ पर ऊपर सांकल लगी थी। अभी शरीर सीधा नहीं हुआ चाहता था। एक गहरी साँस ली और सांकल की ओर हाथ बढ़ाया। – ‘हाथ पहुंच गया तो खोल लेती हूँ।‘ – हाथ पहुंच ही गया पहली बार जब लाजो ने रसोई देखी थी तो मुँह बिचका लिया था। ‘इतनी छोटी रसोई?’और सांकल खुली।


पहली बार जब लाजो ने रसोई देखी थी तो मुँह बिचका लिया था। ‘इतनी छोटी रसोई?’


‘लाजो, इतनी छोटी भी ना है!’ हंस ने झेंप कर कहा था।

‘अरे ना!’ लाजो ने सकुचाते हुए कहा, ‘बहुत ही भली रसोई है अपनी!’

बस, फिर तो लाजो लग गई थी घर सजाने में। इधर से उधर दौड़ते हुए लाजो के पांव थकते ना थे। दो दिन मैं घर लग गया था। सामान ही कितना था दो जन का! थोड़े ही दिन बाद ऊपर वाले कमरे एक परिवार को किराए पर दे दिये गए। बहुत दिन तक लाजो फूली नहीं समाती थी।

जब लाजो पहली बार गांव से हंस के साथ दिल्ली आयी थी तो एक कमरे के मकान में रही। किराये पर। पास पड़ोस अच्छा था। करोल बाग का इलाका। चारों ओर गहमा गहमी। मिलनसार लोग। हंस के नौकरी पर निकल जाने के उपरांत दिन कैसे निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था।

हंस ने लाजो को शहर लाते समय कहा था, ’गांव में तो अब कुछ रखा ना है। जमीन इतनी बंट गयी है कि परिवार का गुजारा भी ना होता। मां बाप ने पढ़ा लिखा दिया। अब बस अपनी शिक्षा के बूते पर ही समाज में अपना स्थान बनाना है। तेरे लिये शहर नया है। मन छोटा ना कीजो। सब ठीक हो जावेगा हौले हौले। बस हौसला रख! एक बार गाड़ी चलेगी तो चल निकलेगी।’

हंस की बातें लाजो के मन में जोश भर देती थीं।…वह भविष्य के सुनहरे सपने देखने लगती और दुनिया उसे सुंदर लगती।

‘क्यों री लाजो, कैसा लग रहा है यहां?’ हम लोग ज्यादा बुरे तो ना हैं?’, पड़ोस की उर्मिला ताई ने ठिठोली में पूछा था जब वे पहली बार मिली थीं।

उर्मी ताई पड़ोस से थीं। बनिया परिवार था। पति की चांदनी चौक में दुकान थी। भरा पूरा परिवार था। पांच स्कूल कालेज जाने वाले बच्चे। समय के साथ लाजो को उर्मी ताई अच्छी लगने लगी। उन्‍होंने ही उसे दिल्ली के तौर तरीके सिखाये। सुख दु:ख की सब बातें लाजो उनसे कर लिया करती थी। बहुत कुछ सिखाया समझाया उन्‍होंने – लाजो को एक अबोध बालिका से सुघड़ गृहिणी बनाने में उर्मी ताई का बहुत बड़ा हाथ था। सास के घर तो अधिक रही नहीं थी। मायके में लाड़ प्यार में दाल-रोटी-सब्ज़ी बनाना भर सीखा था। बस इतना कि उसका और हंस का गुजारा हो जाता था। बाकी की शिक्षा उर्मी ताई ने दी। रसोई भी सिदी और बहुत कुछ दुनियादारी भी।

‘देख लाजो’, वे कहती थीं, ‘इस दुनिया में उसी की इज्जत है जो अपनी पैरों पर खड़ा है! नहीं तो अपने सगे भी न पूछें। मेरी ये बात गांठ बांध ले।‘ एक अच्छे विद्यार्थी की तरह लाजो ने उनकी इस बात को और अन्य बहुत सी बातों को भीतर तक समझा था और गांठ बांध लिया थ।

‘क्यों लाजो चलेगी दिल्ली घूमने?’ – उनका भाव होता था कि उन्हें कुछ खरीदारी करनी है जिसके लिये आसपास के बाजारों में दुकानों को छानना होगा। लाजो भी चल पड़ती खुशी खुशी।

‘आज ब्लाऊज के लिये कपड़ा लेना है। वहाँ कमल रुबिआ कोर्नर एक दुकान है। लाला सारे रंग रखता है। चल तुझे भी दिखा दूँ।‘, दुकान पर जाकर पॉपलीन के बहुत सारे लट्ठे निकलवाये जाते और अंत में लाला से मोल तोल कर दाम भी घटवाया जाता।

यों पूरी होती उर्मी ताई की खरीदारी।

फिर आते आते रास्ते में ही, ‘लाजो यहाँ सिंधी के छोले भटूरे की दुकान है। चल तुझे खिलाती हूँ। उंगलियाँ चाटती रह जायेगी! छुट्टी वाले दिन भाईसाहब को भी लेकर आइयो। पसंद आवेगा उन्हें भी।

छोले भटूरे उससे भी कहीं ज़्यादा स्वादिष्ट थे जितने उर्मी ताई ने बखाने थे। और तो और साथ में दिया अचार तो और भी कातिल निकला! और साथ में प्याज के टुकड़े जो चबाये गये तो जैसे बैकुंठ ही छू लिया। अंत मैं दही भल्ले मंगवाये गये जिन्हें समाप्त करते करते लाजो का तो पेट गले तक ही भर गया। इतना भर पेट खाने के बाद तो घर लौटना ही कठिन हो रहा था। आँखें तो बंद हुआ चाहती थीं। घर पहुंच कर लाजो चारपाई पर ऐसी गिरी कि शाम को हंस ने जब सांकल खटकाई तब जाकर नींद टूटी!

फिर तो हंस और लाजो का सिंधी के यहाँ कई बार जाना हुआ।

एक शाम हंस लाजो से बोला, ‘कुछ विद्यार्थी ट्यूशन पढ़ाने को कह रहे हैं। उनके माता पिता भी आये थे। सोचता हूँ उनके घर जाकर पढ़ा दिया करूं। कुछ आमदनी भी बढ़ेगी।‘

‘हाँ हाँ क्यों ना!’ लाजो बोली।

कालांतर में हंस के छात्र बढ़ते गए। पैदल सब के यहाँ जाना कठिन लगने लगा तो साइकिल खरीद ली गयी। छात्रों को पढ़ाने वह पहाड़ गंज, गोल मार्केट, सराय रोहिल्ला और ना जाने कहाँ कहाँ चला जाया करता थ। लाजो सारा सारा दिन उसकी प्रतीक्षा करती रहती। — पर कोई बात नहीं! गांव से यही सोच्र कर तो निकले थे कि अपने पैरों खड़ा होना है। कुछ त्याग तो करना ही पड़ेगा। अपने पैर जम जायेंगे तो जीवन सरल हो जायेगा।– यही सोचकर लाजो अपने आपको दिलासा देती और विभिन्न गतिविधियों में स्वयं को व्यस्त रखती। कभी अपने कपड़े सिल लेती, कभी मट्ठियां बना लेती, और कभी स्वेटर बुन लेती।

जाड़ों की धूप में उर्मी ताई की छत पर कई महिलाओं का जमावड़ा हो जाता था। वे सब एक साथ बैठकर अपने कुछ काज निबटा लिया करती थीं और एक दूसरे की और गली मोहल्ले की खोज खबर भी ले लिया करती थीं। ऐसे ही एक दिन बतकही भी चल रही थी और काम काज भी हो रहा था। जाड़ों की धूप बदन को बड़ी भली लग रही थी। लाजो भी सुबह का
काम निबटा एक स्वैटर ले आयी थी बुनने को। अभी उसने सिलाइयां चलाना शुरु न किया था; थोड़ा सुस्ताने का मन कर रहा था। वह स्वैटर के ड़िज़ाईन को मन ही मन दोहरा रही थी ताकि कोई गलती ना हो जाये, क्योंकि एक बार जब सिलाइयां चल पड़ती हैं तो एक सिलायी समाप्त करके ही रुकती हैं। दो फंदे सीधे, चार उलटे, दो सीधे चार उलटे। उसके बाद पांच सिलायी तक उलटे फंदे घटाते जाओ, सीधे बढ़ाते जाओ। पांच सिलायी बाद इसके ठीक उलट – उलटे बढ़ाते जाओ सीधे घटाते जाओ, और बस डब्बेदार डिज़ाईन उभरने लगेगा।

‘अच्छा बुनती है लाजो! सिलाई भी आती है तुझे लेडीज़ सूट की?’

‘नहीं, दीदी! बस स्वैटर बुनने तक ही सीखा है।‘

पूछने वाली पुष्पा थी जो उसके घर की सामने वाली कतार में पांच घर छोड़कर रहती थी। लाजो ने सुन रखा था कि वह सिलाई का काम करती है। निकट रहने वाली महिलाएं अपने वस्त्र उसी से सिलवा लिया करती थीं। सुना था अच्छा काम चलता है। कपड़ों का ढेर ही लगा रहता था।

पुष्पा बोली, ‘लाजो, अभी तो तेरे कोई बाल बच्चा नहीं है। सारा दिन समय भी ना कटता होगा। मन लगाने को मेरा हाथ बटा दिया कर्। बोल, करेगी?’

लाजो हंस दी। सिलायी तो उसे आती ना थी। ‘ तुझे वही काम दूंगी जो तू कर सकती है। पुष्पा ने उसके मन की बात भांप कर कहा।

उस समय तो लाजो ने बात टाल दी। संध्या को जब हंस वापस आया तो उससे बात छेड़ी। हंस ने उसकी हिम्मत बढ़ाते हुए कहा, ‘कर ले, लाजो। कोई भी कला सीखने में हमारी बेहतरी ही होती है। हमेशा नया नया कुछ सीखते रहना चाहिये। अच्छा ना लगेगा तो छोड़ दीजो। जब अपनी मेहनत से तेरी कमाई होगी तो तुझे अच्छा ही लगेगा!’

लाजो को बात भा गई। अगले ही दिन वह पुष्पा के पास पहुँच गई। पहले पहल तो पुष्प उसे आसान काम दे दिया करती थी। धीरे धीरे उसने सिलाई का सारा काम सीख लिया। दोनों जन आपस में काम बाँट लिया करती थीं। काम भी बढ़ा और आमदनी भी। और लाजो की खुशी भी!

एक शाम हंस और लाजो बैठे चाय पी रहे थे।

‘लाजो, अब तो तू भी कमाऊ वीरबानी बन गयी!’ हंस ने मुसकुराते हुए कहा।

लाजो ने लजाते हुए कहा,’ कहाँ जी, मैं तो बस यूं ही टैम पास कर लूं हूँ!’

‘अच्छी बात है न, ऐसे तू जल्दी ही एक घर की मालकिन भी बन जायेगी!’

हंस उसे अक्सर कहता था कि यह घर बहुत छोटा लगता है। क्यों न अपना ही घर बनाया जाये। गांव में खुला रहते थे। इतना बड़ा घर था। बड़ी छत, बड़ा आंगन। कुआं भी अपना था। आंगन में नीम का पेड़ ठंडी छांव देता थ। यहां इस छोटी सी खोली में रहने को मन नहीं मानता था। वह चाहता था कि अपना ही घर लिया जाये। लाजो खुश थी कि इस कार्य में उसका भी योगदान होगा।


माताजी ने सांकल खोली और बत्ती जलाकर अंगीठी मैं आंच जलाकर छोड़ दी। अंगीठी अब हौले हौले आग पकड़ती रहेगी।

फिर वे स्नान पानी को चल दीं।


अभी कुछ दिन पहले की ही बात है: माताजी आंगन में बैठी पड़ोस से आयी कुछ लड़कियों से अपने मन की बात कह रही थीं। हमेशा की तरह इस बार भी वे जन्माष्टमी के अवसर पर अपने आंगन में कृष्ण और गोपियों का नृत्य आयोजित करना चाहती थीं। हर बरस का उनका यह क्रम रहा था कि वे पड़ोस के कुछ छोटे बच्चों को एकत्र कर उन्हें नृत्य की तैयारी करवाती थीं। कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूरी साज सज्जा और श्रृंगार के साथ नृत्य होता था। आसपास से आयी कई ब्याही और कुंवारी कन्याओं का जमावड़ा लग जाता था। माताजी एक के बाद एक भजन छेड़ती थीं और बच्चों की टोली उनपर नृत्य करती थी।

अनिता, पुष्पा, कंचन और गुलशन – ये तो अभी उपस्थित थीं। इन्होंने ये बीड़ा उठाया कि वे अन्य महिलाओं को भी इस उपक्रम में सम्मिलित कर लेंगी और मिल जुल कर बहुत ही उत्साह से यह कार्यक्रम सम्पन्न किया जायेगा!

माताजी प्रसन्न! उनकी तो मन की मुराद पूरी हो गयी। हर बार की तरह इस बार भी उनका आंगन सजेगा, संगीत की धारा बहेगी, और बच्चों की पदताल से आंगन चहक उठेगा। बहुत ही आनंदित होकर उन्होंने लड़कियों के काम बांट दिये। अनिता बच्चों को अभ्यास करवाएगी, पुष्पा खाने में उनका हाथ बंटायेगी, कंचन संगीत सुर साज संभालेगी। और गुलशन सारा सामान असबाब लाने और एकत्र करने का कार्य देखेगी।

बड़ी ही उत्फुल्लता से सारे आयोजन का खाका खींचा गया। संध्या तक माता जी उत्तेजना से क्लांत हो चुकी थीं, परंतु मन बहुत सुखी था। उन्होंने रात को निद्रा से पहले गोपाल का भजन गाया और सोने का उपक्रम करने लगीं। सुबह उठकर बहुत से कार्य करने थे।


स्नान पानी करके माता जी आयीं तो सूर्य अपना खेल खेल चुका था। दो चार हठी तारों को छोड़कर बाकी सब अपनी आभा खो अनंत में विलीन हो चुके थे।

माता जी ने जाकर पहले रसोई सँभाली। एक जन को जीवित रहने को अधिक नहीं चाहिये; पर चाहिये तो! वे नित्य अपने लिये भोजन अवश्य तैयार करती थीं। अकेली होने पर भी उन्होंने अपनी जिजीविषा को क्षीण नहीं होने दिया था।

दो समय का खाना तैयार कर वे कमरे में आयीं जो कि उनका मंदिर भी था। सब देवताओं को साफ कर धूप दिया जलाया, भोग लगाया और बैठ गयीं नित्य की भांति पूजा पाठ करने। भजनों का एक अच्छा संग्रह उन्होंने जोड़ रखा था, उन्हीं में से कुछेक भजन वे नित्य किया करती थीं। कृष्ण के भजनों से उन्हें विशेष लगाव था।

आज उन्होंने शुरुआत की इस भजन से –

भोर भये निरखत हरि कौ मुख
प्रमुदित जसुमति, हर्षित नंद।

दिनकर किरन कमाल ज्यौं विकसत
निरखत उर उपजत आनंद॥

माता जी ने अनेक भजन गाये हरि की स्तुति में।

भजन गाते गाते एक विचित्र आनन्द की अनुभूति उन्हें हो आयी। भजनों का क्रम समाप्त होने के बाद भी वे आंखें बंद किए विभोर हो कुछ देर बैठी रहीं। कृष्ण के कई सुंदर रूप उनकी पलकों में आये और गये। फिर कृष्ण एक चपल बालक के रूप में यहां वहां रेंगते हुए अपनी मन मोहक लीलाएं दिखाते रहे!

अति प्रसन्न मन से वे उठीं और रसोई में जाकर अपने लिये भोजन परोसा। साथ में एक बड़ा गिलास गुड़ की चाय। और धीमे धीमे भोजन करने लगीं।


हंस ने ताला खोला, सांकल हटायी, दरवाज़े को ठेल कर खोला और बोला, ‘ तो लाजो, यह रहा अपना घर!’

लाजो ने दो पौड़ी चढ़ जैसे ही बरामदे में कदम रखा उसके पैर जम गये, आंखों में आंसू आ गये, गला रुंध गया और भाव विह्वल होकर उसने हंस को सीने से थाम लिया। उसने ज़रा शरम ना की कि गली मोहल्ले के लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे! न, लाजो को इतना होश ही ना था! वह कुछ पल हंस को पकड़े ऐसे ही खड़ी रही जब तक उसका मन स्थिर नहीं हो गया। फिर अलग हो बोली, ‘कित्ता तो सुंदर है अपना घर!’

‘हां, अपना जो है!’ हंस हंस पड़ा। गली से अंदर होते ही बरामदा था, ऊपर खुला आसमान, एक तरफ को गुसल इत्यादि। आगे जाकर एक ओर को रसोई, सामने दो कमरे। कमरों के ऊपर एक माला और बना हुआ था। उसके ऊपर छत्।

दोनों ने पहले नीचे वाला माला देखा फिर ऊपर वाला। इसके उपरांत छत पर जाकर पूरा नज़ारा देखा। सामने मकानों की कई कतारें दिख रही थीं। नीचे गली में कुछ आदमी बैठे थे। एक ओर कुछ महिलाएं बैठी बतिया रही थीं। बच्चे गली में भाग दौड़ करते खेल कूद में मगन थे।

दोनों को घर और आसपास का वातावरण बहुत भाया। बहुत देर वे छत पर खड़े चारों ओर का नज़ारा देखते रहे। ऊपर आसमान में चीलें उड़ रही थीं। एक सफेद कबूतरों का झुंड गोलाकार चक्कर लगा रहा थ। गली के कोने वाले घर की छत पर एक पंद्रह सोलह साल का लड़का इन्हें हाँके दे रहा था।

जब देखते देखते मन परचा गया तो वे नीचे आये और करौल बाग वाले घर की तरफ चल दिये। राह में कुछ मिठाई भी खरीद ली।

उर्मी भाभी ने मिठाई ली तो साथ ही लाजो को गले से लगा लिया, ‘लाजो, तू सोच नहीं सकती मैं कितनी खुश हूँ। पर मन भारी भी है कि तेरा साथ छूट जायेगा अब। मेरे संग चलकर छोले भटूरे कौन खायेगा अब? भूल तो ना जायेगी अपनी भाभी को? तू तो घर की ही सी हो गयी थी: अब तो बच्चों को भी तेरा इंतज़ार रहता है।‘ उर्मी ने हंसकर बोला।

‘भाभी आपका साथ कभी छूटेगा नहीं, यह तो मेरा दिल जानता है! आप तो मेरी सगी बहन की तरह ही हो; कहती मैं चाहे आपको भाभी हूं!’

देखते देखते समय निकल गया और लाजो और हंस अपने घर आकर रहने लगे।


माताजी ने सुबह के गृह कार्य निबटाये, झाड़ू बुहार किया और कमरे की साफ सफाई करने लगीं। मंदिर की सफाई करते हुए उन्हें एक मोरपंख दिखा। उन्हें अचानक ध्यान आया कि यह तो कल मुन्ना ने दिया था। उन्होंने उसे मंदिर में रख दिया था यह सोचकर कि बाद में देखेंगे इसका क्या करना है। एक पल को उन्हें सूझा नहीं कि उसका क्या करें। उन्होंने उस मोरपंख को ऊपर के एक आले में रख दिया। — वह मुन्ना फिर दिखेगा तो उसे लौटा देंगी। यहां आसानी से हाथ पहुंच भी जायेगा –

उन्होंने वस्त्र बदले, कमरे को बंद किया, बाहर आकर सीढ़ियाँ उतरीं और सांकल लगाकर ताला लगा दिया। अब वे धीमे धीमे अपने गंतव्य को चलने लगीं।…उन्होंने अनुभव किया कि उनके पांव में कुछ शिथिलता आ गयी थी। शरीर की ऊर्जा जैसे समाप्त हो गयी थी और मन बुझा बुझा लग रहा था। वे आगे बढ़ीं तो गली में खेलते कुछ बच्चों ने उन्हें ‘राम राम’ कही। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया: बच्चे प्रतीक्षा करते ही रह गये। आगे जाकर कमला मिली जो अपने घर के द्वार पर ही खड़ी थी। उन्हें देखते ही बोली, ‘प्रणाम माता जी! आइये आज मैंने सेवइयां बनायी हैं, खाकर जाना।‘ उन्होंने बस सर हिला दिया और चलती रहीं। आगे
जाकर धोबन मिली जो अपने घर के आगे एक मेज़ लगाकर इस्त्री कर रही थी। उसने कुछ कहा पर माताजी ने सुना नहीं: हाथ हिलाकर इंगित किया कि उन्हें जाना है और चलती रहीं। आगे सड़क, फिर चौराहा, और चार गलियां छोड़कर पाँचवीं गली में उनका गंतव्य स्थान था जहां पहुंचकर माताजी ने किवाड़ खटखटाया। यहाँ एक महिला दर्जिन से उन्हें सिलायी का काम नियमित रूप से मिला करता था। उन्होंने वस्त्र पकड़े और वापस हो लीं। घर लौटकर उन्होंने मशीन लगायी और सिलाई का कार्य करने लगीं, वही काम जो वह अभी लेकर आयी थीं। दोपहर तो उनकी इसी में निकल जायेगी। बीच में वे बस एक बार खाने को उठीं और फिर काम चालू कर दिया। ऊर्जा में कमी वे अब भी अनुभव कर रही थीं और मन भी थोड़ा भारी सा था।


हंस की एक आदत से लाजो को बहुत लाज भी आती थी परंतु अच्छा भी लगता थ। हंस को फिल्मी गीत गाने का बहुत शौक था। आवाज़ भी बहुत अच्छी थी और गाता भी अच्छा था।वहां तक तो ठीक था। परंतु अक्सर वह लाजो के समक्ष फिल्मों के रोमांटिक गीत छेड़ देता और देर तक एक के बाद एक गीत गाता रहता। हद तो तब होती जब लाजो रसोई में होती और वह सामने बरामदे में खड़ा होकर गाने लगता – यहां से उसके गाए गीत कुछ पड़ोस के घरों में भी सुनते ही होंगे।…कभी तो – ‘तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नज़र ना लगे, चश्मे बद्दूर!’ – और कभी – ‘सुभान अल्लाह हाय, हसीं चेहरा हाय!’

लाजो गीत सुनते हुए खुश भी होती रहती थी और शरम से लाल भी होती रहती थी। चेहरे पर मंद मुस्कान लिये वह काम करती रहती। अंदर यह ठसक भी रहती थी कि पड़ोस की औरतें इन्हीं गीतों का हवाला देकर खूब ठिठोली करेंगी उससे।

एक दिन हंस बोला, ‘लाजो, बस एक कसर रह गयी है। इस घर में जब छोटे छोटे पैर दौड़ेंगे तो जीवन सम्पूर्ण हो जायेगा। ईश्वर हमें यह खुशी जल्द दे दे तो कितना अच्छा रहेगा।‘

लाजो ने सब तो व्रत उपवास किये। सब मंदिरों में गयी। सब पूजा पाठ किये। कितने ही साधु महात्माओं से मिल आयी और क्या क्या विधि विधान न किये। हंस ने एक बाल गोपाल की मूरत लाकर उसे दी। बाल गोपाल को लाजो ने अपने मंदिर में सजाया और बहुत लगन से उसकी पूजा अर्चना प्रारम्भ की। बहुत तन्मयता से वह आराधना करती और हरि से अपनी मनोकामना पूर्ण करने की मनुहार करती। बाल गोपाल को उसने इतना आराधा कि उसकी सूरत उसकी आंखों में बैठ गयी। हर समय कल्पना करती तो यही कि यही सूरत उसके आंगन मैं छोटे छोटे पैरों पर पटर पटर दौड़ रही है; वही सूरत उसकी गोद में खेल रही है, नाच रही है, शोर कर रही है और हंस के कंधों पर झूल रही है।

समय बीतता गया लेकिन हंस और लाजो का आंगन सूना ही रहा। बाल गोपाल के आने की प्रतीक्षा सदा ही बनी रही।


कुछ काम निबटा माताजी जब सुसताने बैठीं तो वही बाल गोपाल की मूरत उनके सामने मंदिर में बैठी थी। मासूम मुस्कुराहट लिये वह चेहरा शरीर पर ओढ़े पीत वस्त्र और सर पर सज्जित मोरपंख से और खिल रहा था। कपड़े तो लाजो स्वयं पहनाती थी। पीतल की बनी उस मूरत पर मोरपंख भी पीतल का बना था जो कि उस मूरत का ही हिस्सा था: उसपर बहुत ही सुंदर काम किया हुआ था और रंगों से सजाकर एक असली मोरपंख जैसा रूप दिया गया था। वह मुख की सुंदरता को और निखार देता था और मूरत को एक संपूर्णता प्रदान करता था।

लाजो को वे दिन याद आने लगे जब हंस के साथ उसे जीवन में यूं तो सब कुछ मिला था परंतु संतान की कमी हर खुशी को खोखला कर जाती थी। वे दोनों आस पास के छोटे बच्चों से हिल मिल कर अपने जीवन में ममता की तृष्णा को बुझाने की चेष्टा करते थे। लाजो छोटे छोटे बच्चों को घर ले आती, उन्हें पकवान खिलाती, उनके साथ खेलती, उनकी भोली भाली बातें सुनती।

इसी गहमा गहमी को अनुभव करने को वे जन्माष्टमी को बालकों को एकत्र करते, उन्हें भोजन कराते और उन्हें खिलौने बांटते।


हंस और लाजो का यह अपूर्ण परंतु प्रेमपूर्ण जीवन यूं ही चलता रहता यदि प्रकृति ने वह एक अनहोनी न कर दी होती जो कि लाजो ने अपने बुरे से बुरे सपने में भी न सोची थी।…

उस रात लाजो भोजन तैयार कर हंस की प्रतीक्षा कर रही थी। हंस अपनी साइकिल पर बच्चों को पढ़ाने गया था। बहुत देर हो गयी प्रतीक्षा करते, रात के नौ बज गये। उस समय के नौ बजना ऐसा था मानो आज का मध्यरात्रि हो जाना।

लाजो जब बहुत परेशान हो गई तो ऊपर रहने वाले परिवार के पास गयी और उन्हें सब हाल सुनाया। उन्हें भी जानकारी नहीं थी कि हंस कहाँ कहाँ जाते हैं, फिर भी उस घर के सज्जन पुरुष अपनी साइकिल पर पता करने निकल गये। तब तक आस पास की कुछ महिलाएं भी एकत्र हो गयीं और लाजो को ढारस बंधाने लगीं। दो घंटे इंतज़ार करने के बाद भी एक महिला ने अपने पति को पुलिस स्टेशन भेजा और एक ने आस पास के अस्पतालों में पूछताछ को भेज दिया। तब तक ऊपर रहने वाले सज्जन भी वापस आ चुके थे।

‘कुछ पता लगा भाई साहब?’
‘न भाभी जी कुछ पता नहीं लग पाया।‘

अब तो बैठ कर प्रतीक्षा करने के अलावा कोई चारा ना था। तब तक आसपास के आठ दस लोग वहाँ एकत्र हो चुके थे। हंस के करीबी दोस्तों के यहाँ भी पता लगाया गया पर कोई लाभ नहीं – किसी को कुछ जानकारी नहीं थी। लाजो स्वयं को कोस रही थी कि उसने सब नाम पते क्यों ना अपने पास रखे जहाँ भी हंस पढ़ाने जाते थे। पर अब तो यह सब सोचकर कोई लाभ नहीं था। हाय वह क्या करे, कहाँ जाये किससे पूछे? कहाँ होंगे हंस?

आखिर सुबह तीन बजे एक व्यक्ति वह सूचना लेकर आया जिसका डर सब के मस्तिष्क में घूम तो रहा था पर जिसके सच न होने की ईश्वर से सब प्रार्थना कर रहे थे!

लाजो तो खड़े खड़े ही जैसे चल बसी।…

आगे जो भी हुआ वह सब एक बेहोशी में घटित होने वाली घटनायें थीं जिनमें लाजो का शरीर तो शामिल था पर दिल और दिमाग कहाँ थे उसे मालूम नहीं! यंत्रवत्‌ लाजो ने वह सब किया जो करना था।

जब इस बवंडर की धूल छंटी तो लाजो ने इतने बड़े घर में स्वयं को अकेला पाया। उसने ससुराल जाने से मना कर दिया था। हंस का दिया घर उसके लिये पर्याप्त था। वह यहीं रहेगी। इस घर के चप्पे चप्पे पर हंस की और उनके द्वारा बिताये गये सुखमय जीवन की छाप थी! जीवन सूना ज़रूर हो गया था पर वह यहाँ अकेली नहीं थी। हंस की बातें, उसके गीत, उसकी गंध पूरे वातावरण में विद्यमान थी। वह उसे हमेशा अपनी आसपास अनुभव करती थी और करती रहेगी।

हाँ, लाजो ने जीवन चुना। उसने मृत्यु को चुनौती दी और उसे निहत्था कर दिया। वह अकेले ही पर्याप्त है! वास्तव में तो वह अकेली कभी हो ही नहीं सकती। हंस का साथ हमेशा उसके साथ रहेगा। उनके पूर्ण और अपूर्ण सब स्वप्नों के साथ वह यहीं अपना जीवन जीयेगी और हंस को कभी लाजो पर लज्जित न होने देगी।


लाजो के मानस में एक प्रकाश की किरण कौंधी और उसे एक पल में यह भान हो गया कि उसे ऊर्जा की कमी क्यों अनुभव हो रही थी। उसका राज़ उस मोरपंख में निहित था जो अब आले में रखा था। उसे सब तार जुड़ते हुये दिखायी दिये और अपनी उदासी का कारण समझ में आने लगा। जब उसे सब समझ में आ गया तो उसने स्वयं को बहुत हलका भी अनुभव किया और स्वयं पर लज्जा भी आयी; न लाजो, तुझसे ऐसी उम्मीद न थी!…

…कल जब लाजो आसपास की बच्चियों के साथ बैठी जन्माष्टमी की तैयारी में जुटी थी तो कुछ इस तरह की बातें हो रही थीं –

कंचन – दो छोटी बच्चियाँ तो मेरे आंगन से आ जायेंगी।

अनिता – एक बच्ची मेरे ऊपर वाली आंटी की है। उसको मैं तैयार कर लूंगी।

गुलशन – तीन बच्चियाँ मैं भी जैसे तैसे ले ही आऊंगी।

इस तरह करीब बारह बच्चियाँ, जिनकी आयु नौ से बारह बरस थी, की सूची बनायी जा चुकी थी। इन बच्चियों की माताओं से बात कर उनकी अनुमति ली जायेगी, जो कि उम्मीद है मिल ही जायेगी, और फिर उन बच्चियों को नृत्य के लिये तैयार किया जायेगा।

अनिता अच्छा नृत्य करती है; सीख भी रही है, शौक भी बहुत है। किसी भी मौके का नृत्य झट से तैयार कर आनन फानन में बानगी दे देती है। उसने ही कृष्ण-गोपी नृत्य तैयार करने का बीड़ा उठाया है। लाजो को उसपर पूरा विश्वास है। इन छोटी बच्चियों में से ही किसी को कृष्ण बना दिया जायेगा। बाकी की गोपियां बन जायेंगी। आवश्यकता पड़ने पर किसी को यशोदा और किसी को नंद भी बनाया जा सकता है। नृत्य क्या रहेगा और उसमें क्या कथा दर्शायी जायेगी यह कल तक निर्धारित कर ही लिया जायेगा।

तभी कंचन चहक उठी, ‘माता जी, प्रसाद क्या बनेगा इस बार?’

‘अरे चटोरी तुझे प्रसाद की अभी से चिंता होने लगी! प्रसाद तो कुछ बनेगा ही ना!’ लाजो ने हंसकर कहा।

‘माता जी इस बार धनिया पंजीरी अवश्य बनाना। पिछली बार तो आपने कमाल ही कर दिया था।‘, सरोज बोली।

अनिता – ‘श्रीखंड बनाओगी माताजी?’

‘हां।‘

‘और पेड़ा?’

‘और खीर?’

फरमाइशें थीं कि बढ़ती ही जा रही थीं।

लाजो ने बहुत ही प्रेम से कहा, ‘ बच्चिओ, सब बनेगा। बस, थोड़ा हाथ बटाना पड़ेगा तुम लोगों को मेरे साथ्।‘

अनिता बोली, ‘आप चिंता मत कीजिये। मैं और गुलशन आपका साथ देंगी। क्यों री गुलशन गुलशन ने सर हिलाकर अपनी सहमती जतायी।

‘प्रणाम माता जी!’, लाजो ने देखा उनकी गली की ही एक महिला उनके सामने हाथ जोड़े खड़ी थी। वह श्रीलता थी, जो उनके पास कभी कभार सिलाई का अपना कुछ काम लेकर आती रहती थी। लाजो सदा ही उसका कार्य कर दिया करती थी। बातचीत में विनम्र थी, अपितु औपचारिक बातों के अतिरिक्त कोई और बात उसके साथ नहीं हुई थी। लाजो बोली, ‘आ लता बैठ। कैसे आना हुआ? कुछ काम था क्या?’

‘नहीं माता जी कुछ काम वाम नहीं था, बस वैसे ही आ गई।‘

कुछ देर इधर उधर की बातचीत करने के बाद श्रीलता ने सकुचाते हुए कहा, ‘माता जी, यह मुन्ना है। इसे देखा तो होगा आपने?’ उसने अपने साथ आये एक पांच छः साल के बच्चे की तरफ इंगित करते हुए कहा।

लाजो ने एक नज़र देखा। वह उस बच्चे को पहचानती थी। उनके घर के सामने वह अन्य बच्चों के साथ मिलकर अकसर खेलता रहता था।

‘हाँ, लता बेटा, देखा है मैंने। तेरा बेटा है ना? बहुत नट्खट है।‘

‘हाँ माता जी! कल से मेरे पीछे पड़ा है कि माता जी के पास जाना है। मुझे भी जन्माष्टमी के नृत्य मैं भाग लेना है! और कह रहा है कि मुझे कृष्ण बना दो!’ श्रीलता ने झेंपते हुये हंसकर कहा।

लाजो ने बात को टालने की गरज़ से कहा, ’ नृत्य में भाग लेने वाले बच्चों का चयन तो हो चुका है।‘ लाजो ने एक संकोच के साथ अनुभव किया कि ‘बच्चिओं’ के स्थान पर ‘बच्चों’ का प्रयोग कर रही थी। क्यों? वह स्पष्ट क्यों नहीं कह देती कि वह केवल बच्चिओं को ही नृत्य के लिये बुलाती है? और लड़कों का उसके आँगन में आना वर्जित है। यह छोटी सी बात वह अपने अवचेतन से बाहर न आने देती थी। क्योंकि उसका अंतर्मन इतनी छोटी आयु के बालकों और बालिकाओं में अंतर करना स्वीकार नहीं कर पाता था। यदि अंतर नहीं था तो यह भेदभाव क्यों? यह विरोधाभास उसके मन को जब समझ में न आया तो एक उदासी उसके अंतस्‌ में छाने लगी।

श्रीलता से भी लाजो के चेहरे की हंसी गायब होते छुपी न रही। उसने सोचा कि माता जी को उसका आग्रह पसंद नहीं आ रहा है। उसने अपने बच्चे की ओर मुखातिब होकर कहा,’बेटा अब नृत्य करने वालों का चयन हो चुका है। चल अब चलते हैं, माता जी को अपने काम करने दो’।

मुन्ना ने मनुहार करते हुये कहा,’मुझे मालूम है अभी कृष्ण के लिये किसी को चुना नहीं गया है!’उस छोटे बच्चे को यह स्पष्ट नहीं हो रहा था कि जब किसी लड़के को लिया ही नहीं गया है तो कृष्ण का पात्र कौन खेलेगा। उसके निष्कपट मन में तो यह स्पष्ट था इस खेल में लड़कियां बनेंगी गोपियां और लड़का बनेगा कृष्ण! और कोई लड़का अब तक जब लिया ही नहीं गया है तो उसे क्यों नहीं लिया जा रहा?

‘मम्मी मुझे कृष्ण का पार्ट खेलना है। मैं वादा करता हूँ कि मैं बहुत ही अच्छा नृत्य करूंगा। साथ वाले घर की गिन्नी और नन्नी दोनों ही इस नृत्य में भाग ले रही हैं। मैं भी लूंगा। मैं कृष्ण बनूंगा।‘

लता ने डांटते हुए कहा,’अच्छा ज़िद नहीं करते। जब माता जी कह रही हैं सब फाईनल हो गया है तो कहने वाली कोई बात ही नहीं बची है! चलो घर अब, तुम्हें अपना स्कूल का काम भी करना है। जब से आया है गली में खेल ही रहा है! अच्छा माता जी चलती हूं। यह तो बच्चा है, इसे समझा लूंगी मैं। नमस्ते!’

श्रीलता अभी मुन्ना का हाथ पकड़ कर ले जा ही रही थी कि मुन्ना एकदम से शांत हो गया, बोला, ’अच्छा मम्मी ज़रा ठहरो!’

फिर वह दरवाज़े से वापस आया और अपने कपड़ों में से एक मोरपंख निकाल कर लाजो की ओर बढ़ा दिया,’माता जी यह मोरपंख आप रख लो। जो भी कृष्ण बनेगा उसके मुकुट में लगा देना।‘

लाजो ने उस बढ़े हुये हाथ को एक पल देखा फिर उसके ऊपर बालक के चेहरे पर जिसपर दो बड़ी बड़ी आँखें उसकी ओर एकटक देख रही थीं जिनमें एक ललक और निराशा दोनों ही एकसाथ टिमटिमा रहे थे। ललक इस बात की कि वह नहीं भी कृष्ण बनेगा तो उसका मोरपंख तो कृष्ण के ऊपर सजेगा ही; और निराश तो वह था ही स्वयं के कृष्ण न बन पाने
से!

श्रीलता ने झेंपते हुये कहा, ’यह मोरपंख कल इसकी बुआ इसको दे गयी थीं। इसको बोल रही थीं तू ही तो हमारा कन्हैया है। यह मोरपंख मैं तेरे लिये लायी हूं। बस तब से यह मोरपंख साथ लिये लिये घूम रहा है। सोया भी इसको संग लेकर ही था!’

लाजो वह मोरपंख लेना नहीं चाहती थी। इस बच्चे को कृष्ण न बनाकर इसका मोरपंख किसी और बच्चे के मुकुट में लगाना – न, न यह तो बच्चे के साथ न्याय नहीं होगा: लाजो को ग्लानि होने लगी।

लेकिन उस बालक के नेत्रों में झलक रही भावनाओं ने उसे विवश कर दिया; उसकी बाजू अपने आप ही उठ गयी और उसके हाथों ने मोरपंख को थाम लिया। बालक ने उसके कुछ बोलने की प्रतीक्षा नहीं की। – ‘अच्छा माता जी, इसे सम्भाल कर रख लेना। मैं जन्माष्टमि वाले दिन आऊंगा।‘- यह कहकर वह अपनी मां के साथ चला गया।

वह तो चला गया परंतु बहुत सी भावनाओं का चक्रवात लाजो के भीतर छोड़ गया।…मगर उन भावनाओं का उस उद्गम बालक में नहीं था, इसलिये उसे दोष देना तो उचित नहीं; भावनाओं का उद्गम तो लाजो के भीतर ही कहीं था!

वही चक्रवात अब एक घनी उदासी बनकर लाजो के मानस में छाया हुआ था!


सांझ होने को थोड़ा समय था। लाजो सो नहीं पा रही थी। दोपहर को सोना उसका नित्य का नियम था। परंतु आज यह सम्भव नहीं हो पा रहा था। लाजो बहुत चेष्टा करने पर भी सो नहीं पायी। कल सांझ को आंगन में हुई सब बातें उसके मस्तिष्क में रह रह कर आ रही थीं।

जब हंस थे तो उनके आंगन में खेलने वाले बच्चों में लड़के और लड़कियां दोनों ही सम्मिलित रहते थे। परंतु हंस के जाने के बाद लड़कों का आना कम होता गया और अंततः एक समय ऐसा आया कि केवल लड़कियां ही आती थीं। लाजो को यह अहसास हुआ कि इसमें उसका स्वयं का व्यवहार ही निर्णायक रहा होगा। जहां लड़कियों को उसके यहाँ आना सुखकर लगता होगा, वहां कदाचित्‌ लड़कों को लाजो का शुष्क व्यवहार झेलना पड़ता होगा। बच्चे तो होते ही हैं कोमल हृदय, उन्होंने इस बात को भाँप लिया और उस के अनुसार स्वयं को ढाल लिया। हाँ इतना अवश्य है कि बाहर आते जाते जो भी बच्चे उसे मिला करते थे वे ‘नमस्ते माता जी’ कहकर उसका अभिनंदन अवश्य किया करते थे। – यह पुरानी ममता की स्मृति थी जो उनके व्यवहार में प्रतिबिंबित होती थी। – इतना कहने के उपरांत वे अपने खेल में पुनः व्यस्त हो जाया करते थे।

मोरपंख की छवि लाजो की आंखों के सामने आती रही। बात सरल थी; परंतु लाजो अपने जीवन की कमिओं को इतना प्रत्यक्ष अनुभव करने का बल नहीं रखती थी। उसने जीवन को बहुत बहादुरी से जीया था। उसके वर्तमान हालात में भी वह एक संतोष का जीवन जी रही थी – जो अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। ऐसे हालात में कितने जन तो भीतर से
टूट ही जाते हैं। – लेकिन उस बच्चे के साथ हुए संवाद ने लाजो के बहुत ही दारुण अभावों को उसके सामने नग्न करके खड़ा कर दिया था। उसने मोरपंख को थामा तो बहुत देर तक उसका मस्तिष्क अवसन्न रहा। वह मोरपंख को लिये बैठी रही। उन बच्चियों के साथ हुई बातचीत के दौरान भी वह मोरपंख हाथ में लिये बैठी रही थी। उनके जाने के बाद भी वह मोरपंख बहुत देर तक उसके हाथ में ही रहा था।

अब वही मोरपंख उसकी आंखों के सामने था। वह मोरपंख उसका हंस था। वह मोरपंख उसका बाल गोपाल था। एक मोरपंख तो हमेशा के लिये चला गया एक शून्य का गह्वर अपने पीछे छोड़कर। और दूसरा मोरपंख उसके यहां पधारा ही नहीं और एक शून्य की टीस हमेशा देता रहा।

एक नपुंसक क्रोध लाजो के भीतर भरने लगा। एक दुख का गुबार लाजो के भीतर उठा और लाजो फफक कर रोने लगी। रोते रोते उसकी साड़ी का एक हिस्सा पूरा भीग गया। पर आंसू थे कि थमने का नाम ही न ले रहे थे।

बहुत देर तक लाजो रोती रही। उस कमरे का एकांत और कृष्ण और गोपाल की आकृतियां ही उसकी साक्षी थीं।

रोते रोते जब वह थक गयी और आंसू सूख गये तो लाजो का मन हलका होने लगा। एक रोशनी की किरण उसे दिखने लगी, जिसने लाजो को कभी भी पूर्णतः छोड़ा नहीं था। वह प्रकाश की किरण शायद थोड़ी क्षीण हो गयी थी, जिस कारण यह आघात लाजो को सहना पड़ा। परंतु लाजो न कभी हारी है ना हारेगी! उसने तब भी जीवन चुना था वह अब भी जीवन ही चुनेगी। उस किरण की रोशनी में उसने स्पष्ट देखा कि वह क्या करेगी।

लाजो ने धीरे से पलंग के नीचे पांव रखे। हलके से कमरे का किवाड़ खोला। बाहर सूरज की कोमल रोशनी आंगन की हर वस्तु को बहुत सुंदर बना रही थी। यह रोशनी लाजो को अच्छी लगी!

वह चल दी अपना मुंह धोने। लड़कियां आती ही होंगी। एक लड़की को भेजकर मुन्ना को उसके घर से बुलाया जायेगा। मुन्ना कृष्ण बनेगा। मोरपंख उसके मुकुट पर सजेगा।


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