“सौ ग्राम जिंदगी”- डॉ. नीना छिब्बर
अकल्पनीय है
सांसों की पूंजी को
कंजूसी से खर्चना
तोला माशा का हिसाब रख
फूंक -फूंक कर गर्म पलों को
ठंडा कर के देना खुद सुकून
जब जानते हो हम
बस बची है हमारे पास सौ ग्राम जिंदगी।
कतरा – कतरा जोड़ के
सजा देते हैं घर द्वार
बिते भर की खुशी का
मनाते हैं त्योहार
बड़े से दुख को बांध कर रखें
अंधेरे कोने में छिपा
जब बची हो हमारे पास
सौ ग्राम जिंदगी।
