सूर्य की तलाश ( कहानी ) – रेखा राजवंशी

विश्वास नहीं होता कि वह दुनिया से चल बसी। गोरी-चिट्टी, तीखे नाक-नक्श, हमेशा करीने से कटे हुए बॉबकट बाल। उसे देखो तो चेहरे से नज़र न हटे। इस उम्र में भी बला की आकर्षक। आज भी जब उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर देखती हूँ तो लगता है जैसे अभी उठेगी, अपनी वही मीठी मुस्कान के साथ कहेगी – “अरे, तुम यहाँ! कितने दिनों बाद मिली हो!”

वह करीब पचास वर्ष की होगी जब मैं पहली बार उसे मिली थी। नाम था मारग्रेट…मारग्रेट बकली। मारग्रेट का परिवार उन शुरुआती ब्रिटिश परिवारों में से था, जो ऑस्ट्रेलिया में बसने आए थे। उसके दादा यू.के. से आए थे – बेहतर मौसम, बेहतर ज़िंदगी और नए भविष्य की तलाश में। मारग्रेट अक्सर हँसकर कहती,

“मेरे दादा कहते थे – सूर्य की तलाश करो उसका प्रकाश हमें जीवन देता है।” शायद उसी कहावत ने उसे भी जीवन भर रोशनी ढूँढना सिखाया।

स्कूल में शुरुआती मुलाक़ात मैं और मारग्रेट एक ही स्कूल में काम करते थे। मैं स्पेशल नीड्स के बच्चों को पढ़ाती थी और वह टीचर एड के रूप में मेरी सहायता करती। उसका स्वभाव इतना सुलझा हुआ, इतना शांत था कि कभी-कभी मैं सोचती, क्या इस औरत के जीवन में कभी कोई तूफ़ान आया भी होगा? लंच के समय हम स्टाफरूम में मिलते। वहाँ छोटी-सी गोल मेज़ थी, जिस पर हमेशा किसी न किसी ने बनाना ब्रेड या कुकीज़ रखी होतीं। हम अक्सर अपने बच्चों, घर, रिश्तों और दुनिया-भर की बातों पर खुलकर चर्चा करते। उसी समय मुझे उसकी निजी ज़िंदगी की पहली झलक मिली।

मारग्रेट ने एक दिन बड़ी सहजता से कहा – “मैं इन दिनों किसी को डेट कर रही हूँ… इमरान नाम है उसका। ईरान से है, उम्र में मुझसे उन्नीस साल छोटा है।”

स्टाफरूम में एक पल को जैसे सब शांत हो गए। फिर किसी ने धीरे से कहा, “ओह, वाओ… ?” मैंने देखा, मारग्रेट बस मुस्कुरा रही थी – वही शांत, आत्मविश्वास भरी मुस्कान।

“उम्र सिर्फ एक नंबर है,” उसने कहा, “उसके साथ मैं ख़ुश हूँ, बस यही मायने रखता है।”

धीरे-धीरे उसने हमें बताया कि उसका बॉयफ्रेंड ईरान वापस नहीं जा सकता था, इसलिए वह खुद उसकी माँ से मिलने ईरान जाने का प्लान बना रही है।

हमने समझाने की बहुत कोशिश की – “अकेले ईरान? तुम्हें भाषा आती है? तुम ठीक हो?”

लेकिन मारग्रेट सुनने वालों में से नहीं थी।

“मैं बुर्क़ा पहन लूंगी, उसके पैसे को लोकल करेंसी में कन्वर्ट करवा लूंगी… मैं पर्शियन सीख रही हूँ। इमरान अपनी माँ को पैसे भेजना चाहता है। कुछ महत्वपूर्ण पेपर्स भी उसे पहुँचाने हैं। अब वह तो जा नहीं सकता तो मुझे उसकी हेल्प तो करनी होगी न। सब मैनेज हो जाएगा,” उसने गर्व से बताया। और ऐसा ही हुआ। वह गई, इमरान की माँ से मिली, महीनों घूमी और सुरक्षित लौट आई। तभी मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मारग्रेट जितनी बाहर से सादी लगती थी, उतनी ही भीतर ज्वालामुखी
थी – बेख़ौफ़, बेपरवाह।

जब तक मैंने उस स्कूल में काम किया हमारे संबंध अच्छे रहे। कसरीब दस साल उस स्कूल में पढ़ाने के बाद मैंने ट्रांसफर ले लिया। स्कूल छोड़ने के बाद भी उससे बाहर कॉफ़ी पर मिलना हुआ। फिर धीरे-धीरे हम अपनी व्यस्तताओं में खो गए।

समय बीता… पंद्रह साल बाद अब स्कूल छोड़े मुझे पंद्रह साल हो चुके थे। जीवन में स्कूल, नौकरी, स्टाफ सब बदल गया था। लेकिन एक रोज़ पुरानी साथी आना का मैसेज आया –

“क्या तुमने मारग्रेट की खबर सुनी?”

“क्या हुआ?” मैंने जैसे दिल थाम लिया।

आना ने सिर्फ एक लाइन भेजी –“वो अब हमारे बीच नहीं रही। पिछले महीने हमें छोड़कर चली गई।“

मुझसे रुका न गया। मैंने तुरंत आना को फोन किया।

“अरे इतनी कम उम्र में ? कैसे ? वो तो बिलकुल ठीक थी न?” मेरे मुंह से निकला।

“हाँ, बहुत तेजी से हुआ। कुछ महीने पहले जब उसे प्रोस्टेट कैंसर का पता चला तब तक देर हो चुकी थी। कैंसर आखिरी स्टेज में था।” आना ने कहा।

“पर आजकल तो सभी बीमारियों का निदान है” मैंने पूछा।

“हाँ, ऑपरेशन का विकल्प था। पर डॉ ने बता दिया था, बचने के चान्सेस बहुत कम हैं। तो मारग्रेट ने शांति से बचा खुचा समय बिताने और मर जाने का विकल्प चुना।

वह 73 साल में चल रही थी, हालाँकि लगती साठ की ही थी। यंग, फुल ऑफ़ लाइफ। ऑपरेशन, कीमोथेरेपी के कष्ट झेलना नहीं चाहती थी। उसने आख़िरी समय प्रार्थना और अच्छे कर्म करने, बाइबिल पढ़ने में बिताया। वीकेंड में उसकी बेटी जूली उसके पास आकर रहने लगी, उसकी बेटी सोनिया उसकी लाइफलाइन थी।”

जब आना यह सब बता रही थी तब मैं सोच रही थी ऐसे सोशल मीडिया का क्या लाभ? वैसे फेसबुक पर मेरे हज़ारों मित्र पर जो अपडेट हमें मिलने चाहिए, मिलते नहीं। बड़ा अफ़सोस हुआ कि मैंने कभी उसका स्टेटस नहीं देखा। देखती तो शायद पता चल जाता। उस दिन लगा कि फेसबुक फ़ेकबुक है।

मैंने तुरंत फेसबुक खोला। उसकी प्रोफ़ाइल पर वही मुस्कुराता हुआ चेहरा – बिस्तर पर आराम करती, पर आँखों में वही पुरानी चमक। पहली पोस्ट उसके फ़्यूनरल की थी। दूसरी में वह अपने ग्रैंडचिल्ड्रन के लिए गाना गा रही थी – चीनी की तरह मीठी आवाज़। उसकी मुस्कान जितनी चमकती थी, शायद उतना ही दर्द उसने अपने भीतर छिपा रखा था, पर मुझे तब पता नहीं था कि उसकी ज़िंदगी में कितने अँधेरे थे।

मैं और आना ने मिलने का प्लान बनाया। मिलने पर उसने मारग्रेट की ज़िंदगी की कई परतें उधेड़ कर सामने रखीं – जिनका मुझे तनिक भी आभास न था।

मारग्रेट की पहली शादी डेविड से हुई थी। शुरू के साल ठीक रहे। कुल मिलाकर छह साल में वह चार बच्चों की माँ बन चुकी थी। पर डेविड धीरे-धीरे शराब और फिर ड्रग्स का आदी हो गया। नशे में घर आता और मारग्रेट को मारता-पीटता। आना ने बताया, एक रात तो उसने मारग्रेट को सीढ़ियों से नीचे फेंक दिया था… वो किसी तरह अपनी जान बचाकर बच्चों के कमरे में भाग गई थी।

अब लगभग हर रोज यही होने लगा। गाली गलौज, मार पीट यह उसका डेली रूटीन बन गया था। एक नाज़ुक, सुन्दर, पतली दुबली स्त्री कब तक सहती। आख़िर एक दिन मारग्रेट बच्चों, घर, सामान – सब कुछ पीछे छोड़कर भाग गई।

“वह सिर्फ अपनी जान बचाकर निकली थी,” आना बोली, “पर उसको सबसे बड़ा आघात बाद में लगा…”

मैंने पूछा – “क्या?”

जब सिडनी आने के कुछ महीनों बाद उसने बच्चों से संपर्क करना चाहा तो किसी ने भी उससे बात करने से इंकार कर दिया। उसके बच्चे उससे नफरत करने लगे। खासकर बड़ी बेटी। मार्गरेट तो निकल गई पर उसकी बेटी ने उसकी जगह ले ली। सारी प्रताड़ना उसे झेलनी पड़ती। दिन भर छोटे भाई बहनों की देखभाल और रात को उसके पिता का दोस्त शराब पीकर उसे रेप करता था।

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई थी। जब वही आदमी उसके छोटे भाइयों तक पहुँचने लगा… तब जाकर उसने पुलिस रिपोर्ट की। लेकिन बेटी ने अपनी बर्बादी के लिए मारग्रेट को पूरी ज़िन्दगी माफ़ नहीं किया। उसे लगता था जिस माँ ने उन्हें पैदा किया था उन्हें पालना उसकी ज़िम्मेदारी थी। और मार्गरेट भी पूरी ज़िन्दगी इसी अपराध भाव को मन में पाले रही। वह भी खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकी।

मारग्रेट मेलबर्न छोड़कर सिडनी आई। उसने एक छोटा-सा कोर्स किया और स्कूल में नौकरी शुरू की। बच्चों को बहुत याद करती थी, पर वे उससे कोई संबंध नहीं रखना चाहते थे। कई बार लंच में वह बच्चों की बातें छेड़ देती। फिर अचानक चुप हो जाती।

“वे खुश रहें,” यही कहकर बात खत्म कर देती। मैंने कभी नहीं जाना कि उसका दिल कितना टूटा हुआ था।

पर जीवन की गति रूकती कहाँ है ?

सिडनी आने के लगभग दस साल बाद वह अपनी सहेली के साथ एक पार्टी में गई। वहाँ उसकी मुलाक़ात जेकब से हुई – न्यूज़ीलैंड नेवी में काम करता था। मारग्रेट अक्सर मुस्कुराकर उस मुलाक़ात का ज़िक्र करती –

“जेकब कितना हैंडसम था। जैसे ही मुझे देखा, बोला – तुम्हारी मुस्कान मेरे दिल को अद्भुत रौशनी से भर देती है। यू आर सो ब्यूटीफुल! “

दोनों के बीच कुछ महीनों तक संबंध रहे। मारग्रेट ने बहुत समय बाद किसी पर भरोसा किया था। उसने बताया था, “मैं फिर से जी रही थी… जैसे कोई खिड़की खुल गई हो, और सुबह का सूर्य उसमें प्रकाश भर रहा हो।”

फिर एक सुबह वह प्रेग्नेंट होने की गुड न्यूज़ लेकर जेकब के पास पहुँची। जेकब ने उसे चूम लिया। उसने कहा कि उसे कुछ समय के लिए न्यूज़ीलैंड जाना पड़ेगा और वह जल्दी लौट आएगा।

पर वह कभी नहीं लौटा। उसे बहुत फोन किया पर शायद उसका फोन नंबर बदल गया था। मारग्रेट अकेली थी, गर्भवती थी। उसने बच्ची को जन्म दिया, और उसका नाम रखा और उसका नाम रखा – जूली।

जूली – माँ का सहारा, माँ की खुशी जूली बड़ी हो रही थी – खुश, समझदार, शांत। मुझे याद आया कि मारग्रेट उसके बारे में स्कूल में अक्सर बताती।

“जूली जूली बहुत अच्छा गाती है,” “उसका ड्रामा में सलेक्शन हुआ है,” “उसने मेरे लिए कार्ड बनाया है…” उसके शब्दों में इतनी गर्मी, इतनी ममता होती थी कि मुझे लगता, मारग्रेट के जीवन में पहली बार धूप आई थी। जब जूली सोलह साल की थी, तभी मारग्रेट को इमरान मिला। उन्नीस साल छोटा, आकर्षक, बातों में मीठा। मारग्रेट उससे बहुत खुश थी। कई साल डेटिंग के बाद जब उन्होंने शादी करने का निर्णय लिया, मारग्रेट 65 की थी और इमरान 46 का।

मारग्रेट के चेहरे पर वह पुरानी चमक लौट आई थी। लेकिन यह सुख भी ज़्यादा दिन नहीं चला। इमरान धीरे-धीरे ड्रग्स का आदी हो गया। मारग्रेट ने समझाने की कोशिश की – “इमरान, यह ठीक नहीं है। छोड़ दो…” लेकिन नशे में वह उसे गाली देता, बरतन फेंकता, कभी-कभी उसे धक्का देता। एक दिन मारग्रेट ने पुलिस को बुलाया और उसे घर से निकलवा दिया। वह कई दिनों तक स्कूल में उदास रहती।

“मैं इतनी बेवकूफ़ क्यों हूँ?” वह पूछती। मैं उसे क्या जवाब देती?

आना बता रही थी और मैं चुपचाप सुन रही थी।

पिछले पाँच साल मारग्रेट बिल्कुल अकेली थी। जूली की शादी हो चुकी थी और वह अपनी माँ के संपर्क में रहती थी। मारग्रेट के लिए उसके नाती-नातिन ही जीवन की सबसे बड़ी खुशी थे।

कुछ महीने पहले डॉक्टरों ने बताया कि मारग्रेट को प्रोस्टेट कैंसर है – और वह भी अंतिम स्टेज में।

“वह बहुत दर्द में थी,” आना बोली, “लेकिन बच्चों को देखकर जैसे दर्द भूल जाती। गुनगुनाती रहती थी।”

जब आना बोल रही थी, मुझे उसकी फेसबुक पोस्ट याद आई जिसमें वह बिस्तर पर लेटी हुई भी मुस्कुराकर अपने ग्रैंडचिल्ड्रन को गाना सुना रही थी, जैसे दुनिया की सारी पीड़ा उस मुस्कान से धुल जाती हो।

और फिर… एक दिन वह चली गई। शांत, मुस्कुराती, गुनगुनाती – जैसे जीवन भर दर्द से लड़ते-लड़ते आखिरकार कोई कह दे, “बस, अब थक गई हूँ।”

आना जब चुप हुई तो हम दोनों की आँखों में आँसू थे। विदा लेने के पहले हमने एक दूसरे को गले लगाया और बाय कहते हुए हमने विदा ली।

मैं कई दिनों तक उसे याद करती रही। कभी सोचती हूँ कि क्या मार्गरेट की कहानी का अंत और सुंदर नहीं हो सकता था? क्या वह अपनी बेटी से, अपने बच्चों से, दुनिया से थोड़ा और प्यार नहीं पा सकती थी? क्या उसे कोई ऐसा साथी नहीं मिल सकता था जो उसकी मुस्कान की कीमत समझता?

मारग्रेट जीवन भर रोशनी ढूँढती रही। शायद वह उसी रोशनी में समा गई। और यह सोचकर मन को थोड़ा सा सुकून मिलता है— कुछ लोग जीवन को नहीं, जीवन उन लोगों को चुनता है। मारग्रेट उन्हीं में से एक थी।

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