बस दौड़ रहा आदमी… ( कविता ) : मंजु गुप्ता

बच्चों मे भोलापन, मासूमियत
किशोरों में जिज्ञासा, कौतूहल
युवाओं में स्वप्नदर्शिता और जीवन में आस्था, विश्वास
इत्र की खुली शीशी – सी गायब है पूर्णतः
जो बचा है. .—- बस वक्त का बीतना/ उम्र का बढ़ना, जनमना
सबके बीच होकर भी अजनबी, एकाकी रह जाना
अंतहीन महत्वाकांक्षाओं की सुरसा ने लील लिया सब कुछ
लालसा – दीमक ने कर दिया खोखला
न घर में अपनापन है, न बाहर याराना
हँसने में सहजता और गायब है सरलता
दोस्ती में जज्बा नहीं / छल है, छद्म है
हर तरफ बिछा चिड़ीमार का जाल है
सहज हँसी हँसता आदमी, लगता है सर्कस का जोकर
मनुष्य, मनुष्य नहीं, रोबोट हो गया है
मशीनों की रेलमपेल में, खो गया आदमी
मरना
आदमीयत लावारिस बच्चों- सी, सड़कों, चौराहों पर मांग रही है भीख
प्रेमगीतों में घुस आया है बाज़ार
विज्ञापनों की आकर्षक मुद्राएं हो गया है मानव शरी
जीभ निकाले,लार टपकाते श्वान-झुंडों -सी आदमियों की भीड़
दिखती है गलियों, बाजारों मे हर तरफ भौंकती, ललचाती
इन सबके बीच वह सहज, सरल आदमी कहाँ खो गया
जो चोट लगने पर रोता और गिरे हुए घायल को देख, रुककर उठाता था
अस्पताल पहुँचाता था
अब तो बस रील बनती है, मरते हुए आदमी की
बिकती है धड़ाघड़, हाथोंहाथ रफ्तार के नशे में किसी के कुचले जाने पर, नहीं रोती आत्मा
अपराध से बचने की तलाशी जाती है तरकीब
चल रही है ज़िंदगी, दौड़ रहा आदमी / जेट गति से
अवसर की तलाश में खांसता, खंखारता
बस दौड़ रहा आदमी……..

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