योग : भारतीय संस्कृति और वैश्विक उपहार विषयक वैश्विक संगोष्ठी सम्पन्न

दिनांक : 21 जून 2026 (रविवार), विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा “योग : भारतीय संस्कृति और वैश्विक उपहार” विषय पर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ श्रीमती सरोज शर्मा के अभिनंदन वक्तव्य तथा सुश्री स्वरांगी साने (लेखिका) के स्वागत उद्बोधन से हुआ। तत्पश्चात श्री दीपचंद्र पंत ( योग विशेषज्ञ ) ने अपने मधुर एवं प्रभावशाली संचालन से कार्यक्रम को गति प्रदान की। इस अवसर पर दीपशिखा कौशिक द्वारा योग-साधना के क्षेत्र में योगदान हेतु योग साधक सम्मान प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। सम्मानित व्यक्तित्वों में श्रीमती नीता भंडारी, श्रीमती सरोज शर्मा, श्री दीपचंद्र पंत, श्री कृष्णचंद्र वर्मा तथा श्रीमती वृंदा शर्मा शामिल रहे। विशेष प्रस्तुति सुश्री अलका प्रकाश (वरिष्ठ प्राध्यापिका, सिंगापुर) ने योग के मूल उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि योग का लक्ष्य चित्त की शुद्धि तथा मानसिक विकारों से मुक्ति प्राप्त करना है। उन्होंने स्वस्थ जीवन शैली, एकाग्रता एवं आंतरिक संतुलन के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने योग के प्रमुख अंगों पर विस्तार से चर्चा की— आसन : आसनों में शरीर की संरचना एवं मुद्रा पर ध्यान दिया जाता है। नियमित अभ्यास से कलाई दर्द, पेट दर्द, गैस संबंधी समस्याओं तथा अन्य शारीरिक कष्टों में लाभ मिलता है। प्राणायाम : प्राणायाम श्वास को संतुलित करने की प्रक्रिया है, जिससे शरीर को अधिक ऑक्सीजन प्राप्त होती है। अनुलोम-विलोम, कपालभाति आदि क्रियाओं के अनेक स्वास्थ्यवर्धक लाभ हैं। ध्यान : प्रारम्भ में ध्यान चुनौतीपूर्ण प्रतीत हो सकता है, किंतु निरंतर अभ्यास से तनाव कम होता है तथा इंद्रियों का संतुलन स्थापित होता है। स्वस्थ शरीर और संतुलित मन ही व्यक्ति को अपने लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। मुख्य वक्तव्य सोमवीर आर्य (प्रसिद्ध योग शिक्षक, संस्कृति केंद्र, सूरीनाम) ने योग को भारत का वैश्विक उपहार बताते हुए कहा कि योग मानवता को जोड़ने का माध्यम है। उन्होंने योग दिवस प्रोटोकॉल की जानकारी देते हुए संवाद और सहयोग की संस्कृति को बढ़ावा देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि योग में जाति, धर्म, लिंग, शिक्षा अथवा क्षेत्र का कोई भेदभाव नहीं है। पतंजलि योगसूत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि हिंसा, अशुद्धि, लालच और क्रोध जैसे नकारात्मक भाव दुख के कारण बनते हैं, जबकि इनके विपरीत आचरण से सुख एवं शांति की प्राप्ति होती है। विशिष्ट अतिथि मृदुल कीर्ति (वरिष्ठ साहित्यकार, ऑस्ट्रेलिया) ने अपने वक्तव्य में कहा कि योग प्रवृत्ति से निवृत्ति की यात्रा है। उन्होंने पतंजलि योगदर्शन को योग का व्यवहारिक स्वरूप बताते हुए कहा कि अनुशासित जीवन योग की प्रथम शर्त है। उन्होंने “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” सूत्र की व्याख्या करते हुए बताया कि चित्त की वृत्तियों का नियंत्रण ही योग का वास्तविक स्वरूप है। चित्त की एकाग्र अवस्था को योग की उच्चतम उपलब्धियों में से एक बताया गया। मुख्य अतिथि सुश्री सविता तिवारी (अध्यक्ष, महिला पतंजलि समिति, दिल्ली) ने जीवन में योग के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि अनुशासन ही योग का आधार है। उन्होंने बताया कि प्राणायाम शरीर के विभिन्न केंद्रों को संतुलित करता है तथा अनुलोम-विलोम जैसी प्रक्रियाएँ निर्णय क्षमता को सुदृढ़ बनाती हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशालता का उल्लेख करते हुए कहा कि संतुलित आहार, स्वस्थ वातावरण तथा अनुशासित जीवन योग की सफलता के लिए आवश्यक हैं। सान्निध्य वक्तव्य अनिल शर्मा जोशी (अध्यक्ष, वैश्विक हिंदी परिवार) ने आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न रोगों और मानसिक तनावों की चर्चा करते हुए कहा कि योग इन समस्याओं का प्रभावी समाधान है। उन्होंने कोविड-19 काल में योग की उपयोगिता का उल्लेख करते हुए कहा कि योग व्यक्ति को आत्मनिर्भर, स्वस्थ और मानसिक रूप से सशक्त बनाता है। उन्होंने कहा कि योग भारतीय सनातन परंपरा की अमूल्य धरोहर है और आज संपूर्ण विश्व इसकी उपयोगिता को स्वीकार कर रहा है।

कार्यक्रम अध्यक्षीय उद्बोधन धनंजय कुमार (मास्टर योग शिक्षक एवं चिकित्सक, अमेरिका) ने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन का समग्र विज्ञान है। उन्होंने प्रत्याहार, धारणा और ध्यान की अवधारणाओं को स्पष्ट करते हुए बताया कि इंद्रियों का संयम और मन की एकाग्रता योग साधना की महत्वपूर्ण अवस्थाएँ हैं। उन्होंने कहा कि योग कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि ऐसा मार्ग है जो मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचाता है। योग के माध्यम से चित्तवृत्तियों का परिष्कार एवं व्यक्तित्व का विकास संभव है। उन्होंने ऋग्वेद तथा उपनिषदों में वर्णित योग की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि योग का वास्तविक अर्थ जोड़ना और एकत्व स्थापित करना है। विशेष प्रस्तुति कविता शर्मा (ध्यान विशेषज्ञ) ने मानवीय चेतना, ऊर्जा एवं चक्रों के विषय में विस्तार से विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि नियमित अभ्यास से चक्रों को जागृत किया जा सकता है तथा अष्टांग योग के माध्यम से जीवन के विभिन्न लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है। उन्होंने मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठाम चक्र तथा उनके शारीरिक, सूक्ष्म एवं आध्यात्मिक प्रभावों की चर्चा करते हुए बताया कि योग व्यक्ति की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा प्रदान करता है।विशिष्ट अतिथि श्रीमती इंदिरा बढ़ेरा (ध्यान विशेषज्ञ, कनाडा) ने सभी प्रतिभागियों को ध्यान की व्यावहारिक प्रक्रिया करवाई। उन्होंने ध्यान के विभिन्न चरणों को सरलता से समझाते हुए मानसिक शांति, आत्मचेतना एवं सकारात्मक चिंतन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने “तमसो मा ज्योतिर्गमय” के भाव को स्पष्ट करते हुए अज्ञान से ज्ञान और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी।
धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम के अंत में श्री विनयशील चतुर्वेदी (मानक निदेशक, वैश्विक हिंदी परिवार) ने अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, श्रोताओं तथा सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया और कार्यक्रम की सफलता हेतु सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया। मार्गदर्शक मंडल संगोष्ठी में मार्गदर्शक के रूप में श्री नारायण कुमार तथा प्रो. तोमियो मिजोकामी जैसे वरिष्ठ एवं सम्मानित व्यक्तित्वों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
संगोष्ठी में योग के दार्शनिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक पक्षों पर गंभीर एवं सारगर्भित विमर्श हुआ। विभिन्न देशों से जुड़े विद्वानों, योगाचार्यों एवं विशेषज्ञों ने योग को भारतीय संस्कृति का वैश्विक उपहार बताते हुए उसके सार्वभौमिक महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम ने स्वस्थ, संतुलित एवं अनुशासित जीवन के लिए योग की प्रासंगिकता को प्रभावी रूप से स्थापित किया।
रिपोर्ट :— अजय शर्मा
