योग : भारतीय संस्कृति और वैश्विक उपहार विषयक वैश्विक संगोष्ठी सम्पन्न

विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा “योग : भारतीय संस्कृति और वैश्विक उपहार” विषय पर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ श्रीमती सरोज शर्मा के अभिनंदन वक्तव्य तथा सुश्री स्वरांगी साने के स्वागत उद्बोधन से हुआ। श्री दीपचंद्र पंत ने प्रभावी संचालन किया। इस अवसर पर योग-साधना के क्षेत्र में योगदान हेतु श्रीमती नीता भंडारी, श्रीमती सरोज शर्मा, श्री दीपचंद्र पंत, श्री कृष्णचंद्र वर्मा तथा श्रीमती वृंदा शर्मा को योग साधक सम्मान प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। अध्यक्षीय उद्बोधन में अमेरिका से मास्टर योग शिक्षक एवं चिकित्सक श्री धनंजय कुमार ने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन का समग्र विज्ञान है। उन्होंने प्रत्याहार, धारणा और ध्यान की अवधारणाओं को स्पष्ट करते हुए बताया कि योग व्यक्ति को लक्ष्य तक पहुँचाने वाला मार्ग है। ऋग्वेद एवं उपनिषदों का उल्लेख करते हुए उन्होंने योग को एकत्व और आत्मविकास का माध्यम बताया। मुख्य अतिथि सुश्री सविता तिवारी ने कहा कि अनुशासन योग का आधार है। उन्होंने प्राणायाम एवं अनुलोम-विलोम के लाभों पर प्रकाश डालते हुए संतुलित आहार, स्वस्थ वातावरण और अनुशासित जीवन को योग की सफलता के लिए आवश्यक बताया। विशिष्ट अतिथि ऑस्ट्रेलिया की वरिष्ठ साहित्यकार मृदुल कीर्ति ने योग को प्रवृत्ति से निवृत्ति की यात्रा बताते हुए “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” सूत्र की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि चित्त की वृत्तियों का नियंत्रण और एकाग्रता ही योग का वास्तविक स्वरूप है। कनाडा की ध्यान विशेषज्ञ श्रीमती इंदिरा बढ़ेरा ने प्रतिभागियों को ध्यान का व्यावहारिक अभ्यास कराया तथा मानसिक शांति, आत्मचेतना और सकारात्मक चिंतन के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने “तमसो मा ज्योतिर्गमय” के संदेश को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। मुख्य वक्ता सूरीनाम के प्रसिद्ध योग शिक्षक सोमवीर आर्य ने योग को भारत का वैश्विक उपहार बताते हुए कहा कि यह मानवता को जोड़ने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने योग दिवस प्रोटोकॉल, संवाद और सहयोग की संस्कृति पर बल देते हुए योग की समावेशी एवं सार्वभौमिक भावना को रेखांकित किया।

सान्निध्य वक्तव्य में वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष अनिल शर्मा जोशी ने आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न रोगों और मानसिक तनावों के समाधान के रूप में योग की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि योग भारतीय सनातन परंपरा की अमूल्य धरोहर है जिसे आज पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है। विशेष प्रस्तुति में सिंगापुर की वरिष्ठ प्राध्यापिका सुश्री अलका प्रकाश ने योग के मूल उद्देश्य—चित्तशुद्धि और मानसिक संतुलन—पर प्रकाश डाला। उन्होंने आसन, प्राणायाम और ध्यान के महत्व को समझाते हुए कहा कि स्वस्थ शरीर और संतुलित मन ही जीवन में सफलता का आधार हैं। ध्यान विशेषज्ञ कविता शर्मा ने मानवीय चेतना, ऊर्जा एवं चक्रों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि नियमित योगाभ्यास से चक्रों का संतुलन एवं जागरण संभव है तथा अष्टांग योग व्यक्ति के समग्र विकास में सहायक है। संगोष्ठी में मार्गदर्शक के रूप में श्री नारायण कुमार तथा प्रो. तोमियो मिजोकामी की गरिमामयी उपस्थिति रही। अंत में वैश्विक हिंदी परिवार के मानद निदेशक श्री विनयशील चतुर्वेदी ने अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, श्रोताओं तथा सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम की सफलता के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
रिपोर्ट :— अजय शर्मा
