समीक्षा : जन से मिलने चले जगन्नाथ : जहाँ देवता रथ पर नहीं, जनता के हृदय पर आरूढ़ हैं – विशाल पाण्डेय

जब-जब आषाढ़ का आकाश मेघों से भरता है, पुरी की धरती पर रथ ही नहीं चलते, भारतीय संस्कृति का सहस्राब्दियों पुराना स्मृति-चक्र गतिमान हो उठता है। लाखों हाथ रथ की रस्सियाँ थामते हैं, पर वस्तुतः वे भारतीय लोकजीवन की उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे होते हैं जिसमें ईश्वर सिंहासन पर नहीं, जनमानस के बीच प्रतिष्ठित होता है। यही कारण है कि जगन्नाथ की रथयात्रा भारतीय लोकचेतना का सबसे विराट लोकतांत्रिक पर्व है। आज जब पुनः भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण पर निकले हैं, तब कथाकार चंद्रकांता का यात्रा-वृत्तांत ‘जन से मिलने चले जगन्नाथ!’ जो बीते साल पढ़ा था, याद आ रहा है।
चंद्रकांता ने भारतीय संस्कृति की धड़कनों को शब्द दिए हैं। वे यात्रा के पहले ही दृश्य में लिखती हैं, “आषाढ़ शुक्ल द्वितीया! श्रीक्षेत्र में जगन्नाथ रत्नवेदी से उठकर गुंडिचा घर जा रहे हैं, अपनी मौसी माँ के घर!” यह भारतीय लोक-मानस में देवत्व के मानवीकरण का सबसे सुंदर दृश्य है। आगे “जय जगन्नाथ, जय चक्कानयन” और “जगन्नाथ स्वामी, नयनपथगामी भवतुमे” के उद्घोषों से दिशाओं का गूँज उठना इस यात्रा को जन-उत्सव में बदल देता है।
चंद्रकांता की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वे यात्रा-वर्णन को इतिहास, पुराण और लोकविश्वास के साथ इस तरह जोड़ती हैं कि पाठ कभी बोझिल नहीं होता। वे स्पष्ट लिखती हैं, “जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं। इनमें राम, कृष्ण, बुद्ध, नारायण, महायान का शून्य और अद्वैत का ब्रह्म समाहित है।” यह एक वाक्य ही जगन्नाथ संस्कृति के समन्वयवादी चरित्र को उद्घाटित कर देता है। लेखिका बताती हैं कि जगन्नाथ किसी एक संप्रदाय के देवता नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के विविध आध्यात्मिक प्रवाहों के संगम हैं। इसी कारण वे कहते हैं, “सब मनसा मी पाजा” अर्थात सब मनुष्य मेरी प्रजा हैं। इस विचार में भारतीय लोकतांत्रिक सांस्कृतिक चेतना का गहरा स्वर निहित है।
यात्रा-वृत्तांत का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि चंद्रकांता आस्था का गुणगान ही नहीं करतीं, उसके ऐतिहासिक और सामाजिक आधारों की भी पड़ताल करती हैं। नीलमाधव से जगन्नाथ बनने की कथा, सबर जनजाति की भूमिका, राजा इन्द्रद्युम्न की कथा तथा विश्वकर्मा द्वारा अधूरी मूर्तियों के निर्माण का प्रसंग इस पाठ को लोकगाथाओं की अद्भुत दुनिया से जोड़ देता है। लेखिका लिखती हैं,“नीलमाधव से जगन्नाथ नाम तक की एक लंबी यात्रा है।” यह यात्रा भारतीय संस्कृति के निरंतर विकसित होते हुए बहुलतावादी स्वरूप की यात्रा है।
रचना का सबसे प्रभावशाली पक्ष उसका सामाजिक विमर्श है। लेखिका बताती हैं कि रथयात्रा के दिनों में भगवान की सेवा का दायित्व सबर जाति के द्वैतापतियों के हाथों में होता है। वे लिखती हैं“ सभी इस बात को मानते हैं और अवर्णों के हाथ का बना प्रसाद श्रद्धा से ग्रहण कर लेते हैं।” यह दृश्य भारतीय समाज में जातिगत विभाजनों के बीच समरसता को दिखाता है।
रचना में प्रकृति का चित्रण भी अत्यंत आकर्षक है। “बंगाल की खाड़ी के साथ-साथ चलते पुरी जाइए, तो महोदधि से उठती उत्ताल फेनिल तरंगों… तन-मन भीगने लगेंगे।” इस प्रकार के दृश्य पाठक को यात्रा का प्रत्यक्ष अनुभव कराते हैं। प्रकृति, इतिहास और लोकजीवन का यह त्रिवेणी-संगम यात्रा-साहित्य की श्रेष्ठ परंपरा का परिचायक है।
लेखिका की भाषा भी इस यात्रा-वृत्तांत की बड़ी उपलब्धि है। कहीं वह लोकगीतों-सी सहज है, कहीं इतिहासकार की गंभीरता लिए हुए है और कहीं संवेदनशील कथाकार की तरह भावप्रवण। मिथक और इतिहास के बीच उनकी भाषा एक ऐसा सेतु बनाती है जो पाठक को लगातार बाँधे रखता है। संवाद शैली, प्रश्नोत्तर, लोककथाएँ और सांस्कृतिक प्रसंग रचना को अत्यंत जीवंत बना देते हैं।
यात्रा-वृत्तांत का सबसे बड़ा संदेश उसके अंतिम निष्कर्ष में निहित है। लेखिका लिखती हैं,“जन को जन से जोड़ने का अद्भुत प्रयास है इन्द्रधनुषी रंगों से सराबोर जगन्नाथ की यह रथ यात्रा।” यही इस रचना का केंद्रीय भाव है। यहाँ रथ देवमूर्ति का वाहन नहीं, बल्कि भारतीय समाज को जोड़ने वाला सांस्कृतिक प्रतीक है। यह यात्रा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है, जाति को जाति से, धर्म को धर्म से और इतिहास को वर्तमान से।
चंद्रकांता का यह यात्रा-वृत्तांत पढ़ते हुए लगता है कि रथ पुरी की सड़कों पर नहीं, भारतीय संस्कृति की आत्मा के भीतर चल रहा है।
