दिन विशेष पुस्तक समीक्षा विमर्श : डॉ. सुनील देवधर की पुस्तक “कविता के साए में शब्द” पर संध्या टिकेकर की समीक्षात्मक दृष्टि
परिचय : डॉ. संध्या टिकेकर बीना, जिला सागर, मध्य प्रदेश की प्रतिष्ठित कवयित्री, लेखिका, समीक्षक एवं अनुवादक हैं। साहित्य के विविध क्षेत्रों में सक्रिय डॉ. टिकेकर अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति, समीक्षात्मक दृष्टि और अनुवाद-कौशल के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रही हैं।


पुस्तक समीक्षा-
पुस्तक: “कविता के साए में शब्द” (मराठी कवियों का साझा काव्य संग्रह)
अनुवादक और संकलक: डॉ. सुनील देवधर
प्रकाशक: शैलजा प्रकाशन, कानपुर (उत्तर प्रदेश)
समीक्षक: डॉ. संध्या टिकेकर, बीना
मूल्य- ₹650/-
“हिन्दी भाषा के दर्पण में मराठी कविताओं का अक्स”
डॉ. सुनील देवधर, रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित नाम है। कविता, गीत, लेख, समीक्षा और अनुवाद में भी उनकी प्रतिभा का एक अलग ही सिक्का है। हाल ही में उनके द्वारा विभिन्न मराठी कविताओं का हिंदी अनुवाद प्राप्त हुआ. इस साझा काव्य संग्रह का शीर्षक है: “कविता के साए में शब्द” जिसे पढ़ने का अवसर मुझे मिला. संग्रह में मराठी साहित्य के पच्चीस यशस्वी कवियों की एक या एकाधिक रचनाओं को उनके कालानुक्रम रूप संगृहीत किया गया है। महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के बैनर तले प्रकाशित इस संग्रह का अपना एक विशेष महत्त्व है।
मराठी भाषा की साहित्य-सम्पदा अत्यंत समृद्ध है। संत-काव्य परंपरा से आरम्भ होकर वर्तमान के सरोकारों तक प्रवाहित होते हुए यह साहित्य, मराठी काव्य धारा में आए विभिन्न परिवर्तनों को बिंबित करता है। डॉ.सुनील का यह अनुवाद-कार्य इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अनुवाद के लिए कविताओं का चयन करते हुए मराठी कविता की यात्रा को समग्रता से इस संग्रह में शामिल किया है। इस प्रकार हिन्दी का पाठक इन कविताओं के आस्वादन के साथ-साथ मराठी कविता के विकास से भी परिचित होगा।
अनुवाद एक जटिल और श्रम-साध्य प्रक्रिया है। किसी सरल गीत को गाना प्रायः आसान लगता है किन्तु गाते हुए उसे निभाना, उतना आसान नहीं होता। ठीक यही स्थिति अनुवाद की है। अनुवाद के मैदान में उतरने वाले अनुवादक को दोनों भाषाओं की अनेक समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। उसे दो संस्कृतियों को जानना-समझना पडता है
डॉ. देवधर की मातृभाषा मराठी है अर्थात यह उनकी सहजात भाषा है; जन्म से, संस्कारों से मिली भाषा है। हिन्दी उनकी अर्जित भाषा है, जो स्वाध्याय और स्वाभ्यास से उन्हें मिली है। उनका वातावरण भिन्न रहा है. उल्लेख्य है कि डॉ. देवधर महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा ‘मराठी भाषी हिन्दी लेखक’ के रूप में पुरस्कृत हैं।
मराठी कविता के विस्तृत फलक से कविताओं का चयन करना तथा उनका अनुवाद करना निश्चित ही चुनौतीपूर्ण कार्य है. किन्तु, डॉ. देवधर ने इसे कुशलतापूर्वक किया है। मराठी कवियों के संबंध में उनका संक्षिप्त एवं सारगर्भित परिचय देना और उनकी कविताओं का हिंदी अनुवाद करना—जटिल कार्य है जिसका निष्पादन उन्होंने बेहतर ढंग से किया है।
मुद्रण नियोजन कुछ इस प्रकार हुआ है कि मराठी कविता और उसकी अनूदित रूप में हिंदी कविता को साथ-साथ रखा गया है। इस साझा संग्रह में बीते समय के वीर सावरकर, बा.सी. मर्ढेकर, कुसुमाग्रज, विंदा करंदीकर, वसंत बापट, नारायण सुर्वे, शंकर वैद्य, मंगेश पाडगावकर आदि प्रतिनिधि कवियों से आरंभ होकर वर्तमान के प्रताप पाटिल, सुजीत कदम तक के कवियों की कविताओं को संकलित किया गया है।
इसके अतिरिक्त कविता विधा, उसकी सृजन-प्रक्रिया तथा उसके प्रभाव आदि को लेकर चिंतन से उपजे भावों को डॉ. देवधर ने किसी पुष्प गुच्छ की भाँति सजाया है. वह कहते हैं कि ” कविता का प्रस्फुटन भावना का प्रसंस्करण है, मन का तरलीकरण और मनुष्य का मानवीकरण है।”
”यदि साहित्य समाज को समझने, उससे जूझने और ताकत पाने के लिए पढ़ा जाता है तो ऐसी कई कविताएँ हैं, जिनकी एक-एक पंक्ति के सहारे पूरा जीवन काटा जा सकता है। ”
”कविता सुकून का नहीं, बैचेनी का अक्स होती है। वह कुछ चुभते हुए सवालों से दो-चार होती है और बिखर जाती है कागज़ों पर।”
संग्रह के कुछ अनुवाद, जो ध्यान खींचते हैं, उनमें है – सावरकर जी का प्रसिद्ध गीत ‘जयोस्तुते’, कुसमाग्रज की छोटी-छोटी कविताएँ, नारायण सुर्वे की कविता ‘दुःख’, शंकर वैद्य की ‘किताबें’, ‘बारिश’-‘ऐसी इस बरसात के समय /कोई तो साथ होना ही चाहिए/छाता छोटा है, समा लेगा दोनों को/समझदारी से चलें अगर तो ही…”. सुधाकर देशपांडे का गीत ” जान हथेली पर लेकर, जो सीमा पर लड़ते हैं/उन वीरों के चेहरे मुझको, सभी ओर दिखते हैं।” नीलिमा गुंडी की कविता-”मैं कविता लिखती हूँ तब/खोज रही होती हूँ एक राह/एक ही समय में, मुझे ले जाने वाली/मुझ तक और सब तक।” प्रफुल्ल शिलेदार की कविता-”कोई गिरता दिखते ही/दौड़कर सम्हालें/सूखता हुआ दिखते ही, पानी बन जड़ों तक पहुँचें।” प्रताप पाटिल की ग़ज़ल- ”उन घर की दीवारों पर, हौले से हाथ फिराया/और कमरों को सुनते-सुनते, याद तुम्हारी आई। ”
डॉ. देवधर ने इस संग्रह की कविताओं, गीतों, ग़ज़लों का संभवतः भावानुवाद किया है। यद्यपि उन्होंने अनूदित कविताओं के स्वरुप को लेकर भूमिका में किसी प्रकार का कोई उल्लेख नहीं किया है; फिर भी, साहित्य में सामान्यतः भावानुवाद ही किया जाता है। इस संग्रह की कई कविताओं में शब्दानुवाद मिलता है, जैसे–किती तरी दिवसात, नाही चांदण्यात गेलो/किती तरी दिवसात, नाही नदीत डुंबलो.” “कितने ही दिनों से, नहीं चाँदनी में गया/कितने ही दिनों से, नदी में नहीं डूबा।”
इस अनूदित काव्य संग्रह की भूमिका में डॉ. देवधर ने यह उल्लेख किया है कि कविताओं के चयन से लेकर उनके अनुवाद तक का कार्य उन्हें २० दिसंबर तक पूरा कर साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. शीतला प्रसाद दुबे जी को सौंपना था। अर्थात समय-सीमा में देना था, जबकि अनुवाद का यह जटिल कार्य पर्याप्त समय की अपेक्षा रखता है। यूँ तो, इस संग्रह की कविताओं में अनेकानेक त्रुटियाँ सतही तौर पर नज़र आ जाती हैं; लेकिन कुल मिलाकर यह संग्रह एक सराहनीय प्रयास है. वैश्वीकरण के इस युग में अब पाठक मात्र अच्छा ही नहीं, कुछ अलग, श्रेष्ठ मराठी में कहें तो उच्च कोटि की रचनाएँ पढ़ना चाहता है अतः अनुवाद की चुनौतियाँ और भी बढ़ गई हैं।
अनुवादक डॉ. सुनील देवधर ने हिन्दी भाषा के दर्पण में मराठी कविताओं के अक्स को कुशलता से उतारा है। साथ ही, यह मराठी की उत्कृष्ट रचनाओं का सुन्दर संग्रह भी है। मूल कविता और उसके अनूदित रूप को साथ-साथ पढ़ने का अपना अलग ही आनंद है। संग्रह का मुख पृष्ठ एवं अंतिम पृष्ठ सादगी और गरिमापूर्ण है।
इस महत्वपूर्ण सर्जनात्मक कार्य के लिए डॉ. सुनील देवघर जी का अभिनन्दन एवं उनकी भावी साहित्यिक यात्रा के लिए उन्हें अनंत शुभकामनाएँ!

बहुत सुंदर संग्रह। इतनी अच्छी मराठी कविताएं हमें पढने को मिलेंगी। आदरणीय देवधर जी बहुत बहुत बधाई। टिकेकर मैडम को धन्यवाद।