दिन विशेष विमर्श में मृदुला भटनागर की कहानी कहीं कुछ तो होगा
चर्चित कथाकार मृदुला भटनागर की यह कहानी आज के पढ़े-लिखे परिवारों में भी कभी दहेज़ तो कभी पसंद-नापसंद के नाम पर महिलाओं से होने वाले दुर्व्यवहार और बंदिशों पर पैनी नज़र डालती है।
कथा नायिका प्रतिभा जब सोचती है – कि वह भी बाहर निकले कोई नौकरी करे। कितना अच्छा लगता है उन सभी सजी-धजी औरतों को तैयार होकर नौकरी के लिये जाते देख कर। काश वह भी कुछ कर पाती। इस सवाल का जवाब उसकी दोस्त नन्दिता से मिलता है। जब वह कहती है – लोगों को कितनी गलतफहमी रहती है कि वर्किंग वीमेन दुनिया की सबसे सुखी औरतें होती हैं। सच ही तो है कि दूसरे के घर की घास ज्यादा हरी लगती है। फिर कैसे नंदिता अपनी दोस्त को इस स्थिति से निकाल कर उसे भी काम-काजी बना देती है, पढिये इस रोचक कहानी मे। – ( मनोज अबोध )
परिचय : मृदुला भटनागर का जन्म 11 नवंबर 1944 को हुआ। उन्होंने एम.ए. (इतिहास) तथा संगीत शिरोमणि (तबला-डिप्लोमा एवं प्राचीन संगीत समिति) की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने मेरठ में लगभग तीन वर्षों तक नवमी-दसवीं कक्षा की शिक्षिका तथा एक वर्ष तक डी.जी.टी. संगीत शिक्षिका के रूप में कार्य किया। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘पहचान में तलाश में मानस के कुछ पत्र’, ‘एक मुट्ठी धूप’, ‘चुप्पी के स्वर तथा अन्य कहानियाँ’, ‘तलाश में की’ और ‘सुनो सिया’ शामिल हैं। उनकी रचनाओं को विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। वे अनेक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी रही हैं तथा ‘नारी उद्बोधन’ पत्रिका की सह-संपादिका भी रही हैं। उनका साहित्यिक योगदान कहानी, कविता और स्वतंत्र लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय है।

“कहीं कुछ तो होगा“
“ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो।”
जगजीत सिंह की खूबसूरत गज़ल से ड्राइंग रूम का माहौल बेहद खुशनुमा हो उठा था। एक बार मुग्ध हो कर ड्राइंगरूम को फिर से निहारा, गुलदान में सजे हुए खूबसूरत फूल, डाइनिंग टेबिल पर रखी हुई क्राकरी सभी कुछ तो किसी को मोहित करने के लिये बहुत काफी है। और आज तो उसकी प्यारी सखी नन्दिता आ रही है। कितने जमाने बाद आज उससे मिलेगी। शादी से पहले का सब कुछ इतना पराया-पराया सा क्यूं होने लगता है। उसकी की पसन्द की गज़लें, उसी की पसन्द के फूल और उसकी की पसन्द का खाना। यूं ही मुस्कुरा उठी प्रतिभा। कल ही तो उसने फोन करके कहा था, ‘कल आ रही हूँ तुझसे मिलने, खाने का झंझट मत करना, बाहर खायेंगे। बस उत्साह का भूत सवार हो गया, अक्षय के और बच्चों के जाते हीं सारे काम निबटा लिये, अब आराम से बैठ कर गज़ले सुनेंगे और गपें मारेंगे। कितना लम्बा वक्त गुजर गया। खुद भी वह कलफ लगी कॉटन की साड़ी पहन कर जूड़ा बना कर तैयार हो गई थी। आइने में एक बार खुद को देखा न, कितनी भी गहरी मित्र हो नन्दिता, पर भीतर मन तक नहीं पहुँच पायेगी। घंटी की आवाज सुन कर दरवाजा खोला तो आदित्य खड़ा था, एक बार एक नजर ड्राइंग रूम पर डाली, और गजल की आवाज सुन कर ही चिल्ला उठा, ‘फिर तुमने अपनी वही रोने धोने की गजले शुरू कर दी? वैसे ही क्या कम रोना धोना है इस घर में कि गाने भी यही सुने? तब तक खुले दरवाजे से नन्दिता भीतर आ चुकी थी, और एक चौदह पन्द्रह साल के लड़के के मुंह से ऐसी पकी-पकी बातें सुन कर आश्चर्यचकित सी खड़ी थी।’
‘अरे, नन्दिता, आ गई तू, आ चल बैठ, मैं तेरे लिये चाय बनाती हूँ।’ फिर एक बार उसे गौर से ऊपर से नीचे तक देखा, ‘बाप रे, पिछले गुजारे हुए सालों की किस पोटली में छुपा कर रख चुकी है, बिल्कुल वैसी की वैसी ही है, उमंग और उत्साह से प्रतिभा को चाय का कप थमा दिया।
‘बात को सजा संवार के कहने का हुनर अभी भी तुझमें बरकरार है। घर भी खूब सुन्दर सजा हुआ है, और उस पर जगजीत सिंह की गज़लें– वाह ऐसा माहौल मिल जाये तो भला कौन बेवकूफ रेस्तरां जाने की बात सोचेगा? लगता है खाना वाना भी बना चुकी है, और वही अपने फेवरेट कलर की कलफ की साड़ी।
‘चल छोड़, सुना कैसी है तू? घर में सब ठीक चल रहा है न? मैंने सुना था तेरा प्रोमोशन होने वाला था? सच नन्दिता तुझे देख कर इतना गर्व होता है, अपनी चंडाल चौकड़ी में एक तू ही इतना आगे बढ़ सकी, इतनी उन्नति कर सकी।’
‘हालांकि उस चंडाल चौकड़ी की सबसे मेधावी छात्रा तू थी।’
‘सिर्फ कहने भर में क्या कुछ होता है, नन्दिता, जो सामने दीखे वही तो इन्सान स्वीकार करेगा। अच्छा अपने प्रोमोशन की बात तो बता, राघव तो बहुत खुश हुए होंगे?’
‘छोड़ यार, कहते है न, हर किसी को दूसरे के घर की घास ज्यादा हरी दीखती है। सो मेरे साथ में मेरे काम को लेकर मेरे बॉस, मेरे कुलीग सभी प्रभावित रहते है, राघव बैंक में काम करते हैं, उन्हें अपनी तरक्की और प्रोमोशन के लिये कोई आग्रह नहीं है, यूं भी वहाँ प्रोमोशन समायानुसार ही होते है। पिछले हफ्ते हुआ था मेरा प्रोमोशन, सभी मित्रों ने बधाई दी, मैं भी थोड़े गर्व और खुशी के साथ मिठाई लेकर घर पहुंची थी। वही लॉन मे राघव, मां के साथ बैठे बात कर रहे थे। मैंने आगे बढ़ कर मां के पैर छू लिये और कहा, ‘मां प्रसाद लीजिये, मेरा प्रोमोशन हो गया है।’ हे भगवान, मुझे तो प्रतिभा अन्दाजा भी नहीं था कि इस बात से मां इतना गुस्सा हो सकती हैं। उन्होंने मेरे हाथ से छीन कर वो मिठाई का डिब्बा जमीन पर फेंक दिया, ‘शर्म नहीं आती, सारा-सारा दिन आफिस में जाकर गुलछर्रें उड़ाती हो, कभी ध्यान आता है कि मर्द बेचारा घर बैठ कर बच्चे खिला रहा होगा। कहाँ गई थी ऑफिस के बाद, इतनी देर क्यूं हो गई?’
मैंने आश्चर्य से राघव की ओर देखा, वो बड़ी तन्मयता से सौमित्र को गोद में लिये बैठे थे जैसे इस दृश्य से उनका कोई लेना देना है नहीं। पता नहीं क्यूं हम औरतें तमाम उम्र इसी विश्वास पर अपनी जिन्दगी गुजार देते हैं कि हर मुश्किल घड़ी में हमारा हमसफर हमारा साथ देगा। पर राघव का तो जैसे इस स्थिति से कुछ लेना देना ही नहीं था। मैने खुद को संभालते हुए ही कहा, ‘ऑफिस के दोस्त पार्टी मांग रहे थे, सो उन्हें कॉफी पिलाने लेकर गई थी।’
एक बार भी ध्यान नहीं आया कि ये बेचारा थका मांदा आकर घर पर एक कप चाय के लिये इन्तजार कर रहा होगा।
लौटने में थोड़ी देर हो गई मां, ट्रैफिक भी बहुत था, फिर प्रसाद भी चढ़ाना था। राघव तो मन्दिर जाते नहीं, सो…।
‘बस करो अपनी बहानेबाजी। जाओ अब चाय बनाओ, कब से तो इन्तजार कर रहा है।’
‘पर बसन्ती भी तो थी न, चाय तो…।’
‘देखो, मुझे लेक्चर देने की कोशिश भी मत करना। अगर बसन्ती चाय बनायेगी तो सोमित्र को कौन संभालेगा?’
सो ऐसा हुआ मेरे प्रोमोशन का दिन। लोगों को कितनी गलतफहमी रहती है कि वर्किंग वीमेन दुनिया की सबसे सुखी औरतें होती हैं। मुझे मेरे काम की ही इतनी लम्बी चौड़ी सैलरी मिलती है, पर वो मुझे हर वक्त राघव से नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़तीं। पहले मैं ये शब्द सुनकर चिढ़ती थी ‘मम्माज बॉय’ पर मैंने घर में ही इस शब्द को देखा और महसूस किया है। कितने तरीके से मां मुझे अपमानित करती रहती हैं, पर कभी मैंने नहीं देखा कि इन्होंने एक शब्द भी मेरे लिये कहा हो।
‘घर भी देखो, ऑफिस भी देखो, एक गिलास पानी भी कोई दे देगा, इसकी उम्मीद ही छोड़ दी सौमित्र को भी देखना होता है। थक जाती हूँ तन से भी मन से भी।’ चुप हो गई नन्दिता।
कुछ देर चुप रह कर प्रतिभा बोली, ‘सच कहूँ नन्दिता मैं भी यही समझती थी।’ “मैं जानती हूँ, और समझती हूँ कि इतनी मेहनत घर परिवार, ऑफिस सब कुछ संभालने के बाद भी अगर हमारी झोली में वही सब आ रहा है, तो हमसे हजार दर्जें अच्छी होती है गृहणियां, कम से कम उस घर परिवार की रानी तो होती हैं, पिता बच्चे सबके लिये कुछ करके भी दो पल अपने लिये भी तो निकाल लेती हैं।” आवाज भीग आई थी नन्दिता की।
प्रतिभा कुछ देर तक चुप रही, जब तक असलियत पर पर्दा पड़ा रहे, अच्छा ही है। बच्चे भी आते ही होंगे। उसने घड़ी देखी।
‘चल खाना लगाती हूँ, गर्म-गर्म कचौरी खायेगी मेरे हाथ की, तो मूड ठीक हो जायेगा।’ चेहरे पर उजास सा दिखाती हुई प्रतिभा उठ खड़ी हुई।
‘हां भई, खिला तो अपने शान्दार व्यंजन, जमाना हो गया बढ़िया खाना खाये हुए। रात को इतनी थकी हुई होती हूँ कि लगता है उल्टा सीधा बना कर खत्म करो।’
‘आ बैठ, ले तेरे पसन्द के दही बड़े, और ये मलाई कोफ्ता, खाकर देख।’
अचानक ही धड़ से दरवाजा खुला और शिरीष और किनका ड्राइंग रूम के सोफे पर बैग फेंकते हुए अन्दर घुसे। सामने कोई भद्र महिला बैठी है, उन्हें अभिवादन करने की जरूरत भी उन्होंने नहीं समझी।
‘आ गये बेटा, आओ आन्टी से मिलो, ये मेरी बहुत पुरानी सहेली।’
‘अरे, खाना दो पहले, भूख लग रही है।’
‘अरे, हां दे रही हूँ, हाथ धोकर आओ, और पहले आन्टी से नमस्ते कहो।’
प्रतिभा के स्वर में कुछ ऐसा था कि दोनों ने उन्हें नमस्ते की और ऊपर अपने कमरे में चले गये।
पांच मिनट बाद ही शिरीष आया, ‘क्या बनाया है खाना?’
‘आज तो आपकी आन्टी की पसन्द का खाना है, पर आप भी खायेंगे तो खुश हो जायेंगे।’
‘उंह… मैं समझ गया, मुझे नहीं खाना ये उल्टा सीधा खाना। आपसे कितनी बार कहा है कि कुकिंग कोर्स कर लो, कम से कम कभी तो अच्छा खाना मिले हमें भी। स्वरा की मॉम इतना बढ़िया चाइनीज बनाती हैं, और सौरब की मां के हाथ का खाना।
अच्छा ठीक है, अभी तो यही खा लो।
‘नहीं मैं आदित्य भइया से कह कर पीजा मंगा लूंगा। नहीं खाऊंगा ये बेकार खाना– पैर पटकता हुआ शिरीष फिर ऊपर चला गया, पीछे-पीछे किनका भी चली गई।
नन्दिता हाथ में प्लेट लिये उन बच्चों का व्यवहार देख रही थी।
प्रतिभा ने खिसिया कर बात संभालते हुए कहा, ‘आजकल के इन बच्चों का दिमाग मां बाप लाड़ प्यार करके आसमान पर चढ़ा देते हैं, फिर पछताते हैं।’
बात कुछ बनी नहीं, ये प्रतिभा भी समझ गई थी। कितने शौक से उसने नन्दिता की पसन्द का खाना बनाया था, पर कैसा वातावरण हो गया, दोनों का उत्साह ही खत्म हो गया। एक चम्मच दही भल्ला मुंह में रख कर नन्दिता उठ खड़ी हुई।
‘चलती हूँ प्रतिभा, फिर किसी दिन खाऊंगी
