हिरोशिमा की त्रासदी से परमाणु-मुक्त विश्व की पुकार

6 अगस्त और 9 अगस्त को हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए थे। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने वाला देश संयुक्त राज्य अमेरिका था। द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन के आदेश पर अमेरिकी वायुसेना ने इन हमलों को अंजाम दिया था। मानव इतिहास में युद्ध के दौरान परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का यह पहला और एकमात्र उदाहरण है।

2017 में परमाणु हथियारों को समाप्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय अभियान (ICAN) की ओर से दिया गया सेत्सुको थर्लो (Setsuko Thurlow) का नोबेल शांति पुरस्कार स्वीकृति भाषण इतिहास के सबसे मार्मिक और शक्तिशाली भाषणों में से एक है।

नोबेल शांति पुरस्कार स्वीकृति भाषण (2017)

वक्ता: सेत्सुको थर्लो

परम पावन राजा और रानी, नोबेल समिति के सम्मानित सदस्य, मेरे प्यारे साथियों, देवियों और सज्जनों,

मैं यहाँ इस पुरस्कार को स्वीकार करते हुए अत्यधिक सम्मान महसूस कर रही हूँ, जिसे मैं उन सभी असाधारण लोगों की ओर से प्राप्त कर रही हूँ, जो ICAN आंदोलन का हिस्सा रहे हैं। आपने हम सभी को एक अद्भुत उम्मीद और नई ऊर्जा दी है।

मैं इस मंच पर उन सभी ‘हिबाकुशा’ (परमाणु बम विस्फोट में जीवित बचे लोग) की उपस्थिति को महसूस कर रही हूँ, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर यह सुनिश्चित किया कि जो भयावहता उन्होंने झेली है, वह कभी किसी और को न भुगतनी पड़े।

जब मैं आज यहाँ बात कर रही हूँ, तो मुझे 6 अगस्त 1945 की वह सुबह याद आ रही है। मैं तब केवल 13 वर्ष की एक स्कूली छात्रा थी। सुबह के 8:15 बजे थे और अचानक खिड़की से एक तेज़, नीली-सफेद रोशनी चमकी। मुझे याद है कि हवा में तैरने जैसा अहसास हुआ था।

जब मुझे होश आया, तो मैं पूरी तरह से अंधेरे में थी और मलबे के नीचे दबी हुई थी। मुझे चारों तरफ से अपने सहपाठियों की चीखें सुनाई दे रही थीं—“माँ, मेरी मदद करो! भगवान, मेरी मदद करो!”

अचानक, एक अजनबी का हाथ मेरे कंधे पर आया। उसने मुझसे कहा, “हार मत मानो! बाहर निकलने की कोशिश करो। मैं तुम्हें यहाँ से निकाल रहा हूँ। उस रोशनी की तरफ देखो और उसकी तरफ रेंगने की कोशिश करो।”

जब मैं किसी तरह उस मलबे से बाहर निकली, तो वह पूरी इमारत आग की लपटों में घिर चुकी थी। मेरे अधिकांश सहपाठी उस मलबे में जलकर मारे गए।

मेरे चारों ओर केवल विनाश और तबाही का मंज़र था। जो लोग ज़िंदा बचे थे, वे भूतों की तरह चल रहे थे। उनके कपड़े फटे हुए थे और उनके शरीर बुरी तरह झुलस गए थे। एक पूरी की पूरी बस्ती राख में तब्दील हो चुकी थी।

मेरी चार साल की भतीजी, ईजी, उस समय बुरी तरह झुलस चुकी थी। वह लगातार पानी के लिए तड़प रही थी और मैंने उसे अपनी आँखों के सामने दम तोड़ते देखा।

उस एक दिन में मेरे शहर हिरोशिमा को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। मरने वाले अधिकांश लोग आम नागरिक थे, जो आग और मलबे की चपेट में आ गए। उनमें मेरी माँ, मेरे पिता और मेरे कई रिश्तेदार भी थे।

आने वाले हफ्तों, महीनों और वर्षों में हज़ारों और लोग विकिरण के रहस्यमयी और भयानक प्रभावों के कारण मरते रहे। आज भी विकिरण हिबाकुशा के शरीरों को धीरे-धीरे प्रभावित कर रहा है।

जब भी मैं हिरोशिमा को याद करती हूँ, मेरी आँखों के सामने सबसे पहली छवि उस चार साल की मासूम बच्ची ईजी की आती है। वह दृश्य आज भी मेरे सीने में एक चीख बनकर गूँजता है। वह बच्ची उस परमाणु युग की शुरुआत का प्रतीक बन गई, जो आज पूरी मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा है।

दशकों तक हमें हमारे ही अनुभवों के बारे में बात करने से रोका गया। परमाणु परीक्षणों और बमों के प्रभाव पर सेंसरशिप लगा दी गई। लेकिन हमने चुप रहने से इनकार कर दिया। हमने अपनी पीड़ा को केवल इतिहास की एक घटना नहीं बनने दिया, बल्कि इसे भविष्य के लिए एक चेतावनी बनाया।

हम हिबाकुशा ने दुनिया को आगाह किया कि परमाणु हथियार कोई सामान्य युद्ध के हथियार नहीं हैं। ये मानवता के खिलाफ अपराध हैं। यदि इनका दोबारा इस्तेमाल किया गया, तो यह पूरी पृथ्वी के लिए विनाशकारी होगा।

आज दुनिया भर के नौ देशों के पास अब भी हज़ारों परमाणु हथियार मौजूद हैं। ये हथियार शहरों को मलबे में बदलने और जीवन को पूरी तरह से समाप्त करने की क्षमता रखते हैं। यह बेहद क्रूर और अनैतिक है।

जुलाई 2017 में संयुक्त राष्ट्र (UN) में परमाणु हथियारों के निषेध की संधि (Treaty on the Prohibition of Nuclear Weapons) को अपनाया गया। उस ऐतिहासिक दिन पर मैं खुशी के मारे रो पड़ी थी। यह संधि परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन की दिशा में पहला बड़ा कदम है।

मैं दुनिया के सभी देशों के नेताओं से और विशेषकर उन देशों से, जो परमाणु सुरक्षा के भ्रम में जी रहे हैं, अपील करती हूँ—हमारी बात सुनिए। हमारी चेतावनी पर ध्यान दीजिए। परमाणु हथियार सुरक्षा की गारंटी नहीं हैं, ये विनाश का निमंत्रण हैं। इन्हें हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों से मिटा दिया जाना चाहिए।

जब मैं 13 वर्ष की बच्ची थी और मलबे में दबी हुई थी, तब एक अजनबी ने मुझसे कहा था—“हार मत मानो! उस रोशनी की तरफ बढ़ो।” आज वही आवाज़ मैं आप सभी तक पहुँचाना चाहती हूँ। मानवता के भविष्य को बचाने के लिए आइए, हम सब मिलकर इस अंधेरे से बाहर निकलें और परमाणु-मुक्त विश्व की उस रोशनी की तरफ बढ़ें।

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