परदेसी मन की संवेदनाएँ : सात समंदर पार भी धड़कता है भारत – विजय नगरकर

परदेसी मन की संवेदनाएँ : सात समंदर पार भी धड़कता है भारत

न्यूज़ीलैंड से रोहित ने जगाई बलिदानों की स्मृति

कार्यक्रम के प्रारंभ में न्यूज़ीलैंड से जुड़े रोहित की काव्य-प्रस्तुति ने स्वतंत्रता दिवस को गंभीर और आत्ममंथनकारी स्वर दिया। उन्होंने श्रोताओं का ध्यान स्वतंत्रता के पीछे छिपे असंख्य बलिदानों की ओर आकर्षित किया।

उनकी कविता ने उन वीरों को याद किया, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, विशेष रूप से उन क्रांतिकारियों को, जो हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए। प्रस्तुति में देशभक्ति के साथ आत्मपरीक्षण का स्वर भी था।

रोहित ने वर्तमान पीढ़ी से जुड़े कुछ प्रश्न भी उठाए—

“क्या हमें याद है वह दिन, जब हमारे वीर हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए थे?
क्या हमने उन बलिदानों का मान रखा है?
क्या हम उस आज़ादी की अहमियत समझते हैं?”

इन प्रश्नों में राष्ट्रीय स्मृति और नागरिक उत्तरदायित्व का भाव निहित है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि स्वतंत्रता सहज नहीं, बल्कि संघर्ष और त्याग से मिली है।

उनकी कविता का केंद्रीय प्रश्न था—“आज़ादी मिलने के बाद हमने उसके साथ क्या किया?” यही विचार उनकी प्रस्तुति को विशेष अर्थ देता है।

आराधना श्रीवास्तव ने की प्रस्तुति की सराहना

रोहित की प्रस्तुति के बाद आराधना श्रीवास्तव ने उनकी प्रभावशाली शुरुआत की सराहना करते हुए उन्हें एक बेहतर ‘ओपनिंग बल्लेबाज़’ कहा। उन्होंने उनकी वेब-पत्रिका के शोधपरक कार्यों की भी प्रशंसा की।

रोहित की प्रस्तुति ने पूरे कार्यक्रम के लिए भावभूमि तैयार कर दी—आज़ादी केवल उत्सव नहीं, बल्कि स्मृति और उत्तरदायित्व भी है।

‘वैश्विक हिंदी परिवार’ की स्वतंत्रता दिवस विशेष काव्य-गोष्ठी में प्रवासी भारतीयों के मन में बसे देश, माटी, स्मृति और संस्कृति का भावपूर्ण काव्यात्मक अभिव्यक्ति

भारत से हजारों मील दूर रहने वाला व्यक्ति भौगोलिक रूप से भले ही अपनी जन्मभूमि से दूर हो जाए, लेकिन उसकी स्मृतियों में देश की गलियाँ, घर का आँगन, माँ की आवाज, मिट्टी की गंध, त्योहारों की रौनक और अपनी भाषा की मिठास हमेशा जीवित रहती है। यही भाव प्रवासी भारतीयों को अपनी मातृभूमि से जोड़े रखते हैं।

15 अगस्त2026 स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित ‘वैश्विक हिंदी परिवार’ की साप्ताहिक काव्य-गोष्ठी ‘परदेसी मन की संवेदनाएँ’ इसी भाव-संसार की अत्यंत आत्मीय और संवेदनशील अभिव्यक्ति बनकर सामने आई।

दुनिया के अलग-अलग देशों में बसे हिंदी-प्रेमियों और प्रवासी भारतीयों ने अपनी कविताओं के माध्यम से यह प्रमाणित किया कि दूरी केवल भौगोलिक होती है; भावनाओं और स्मृतियों की दुनिया में मातृभूमि हमेशा पास रहती है। ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, कतर, नीदरलैंड, ब्रिटेन, थाईलैंड और अमेरिका जैसे देशों से जुड़े कवियों ने भारत के प्रति अपने प्रेम, बदलते देश की तस्वीर, प्रवासी जीवन की चुनौतियों, परिवार और बचपन की स्मृतियों तथा अपनी सांस्कृतिक जड़ों को शब्द दिए।

प्रवासी मन : दूरी में भी निकटता

प्रवास मनुष्य को नई दुनिया देता है, लेकिन उसके भीतर एक दूसरी दुनिया लगातार जीवित रहती है—वह दुनिया जिसमें उसका बचपन बीता होता है। आधुनिक महानगरों की चमक, चौड़ी सड़कें, व्यवस्थित जीवन और सुविधाओं के बीच भी कभी-कभी मन अचानक अपने गाँव, शहर, घर या माँ के आँगन में लौट जाता है।

‘परदेसी मन की संवेदनाएँ’ की कविताओं में यही मानसिक यात्रा दिखाई दी। इन रचनाओं में केवल देशभक्ति का औपचारिक स्वर नहीं था, बल्कि देश के साथ जुड़ी व्यक्तिगत स्मृतियाँ थीं। कहीं भारत माता के चरणों में नमन था, कहीं परदेश की राहों पर चलते हुए देश को साथ लेकर चलने की अनुभूति; कहीं बदलते भारत को देखकर प्रसन्नता थी तो कहीं प्रवास के अंतर्द्वंद्व और अकेलेपन की कसक।

इस दृष्टि से यह काव्य-गोष्ठी केवल स्वतंत्रता दिवस का साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रवासी भारतीय मानस का भावात्मक दस्तावेज भी कही जा सकती है।

आत्मीय संचालन ने बाँधा कार्यक्रम को

कार्यक्रम का संचालन आराधना श्रीवास्तव ने अत्यंत प्रभावी और आत्मीय ढंग से किया। उन्होंने देश-विदेश से जुड़े सभी रचनाकारों का जिस अपनत्व के साथ मंच पर स्वागत किया, उससे कार्यक्रम में औपचारिकता के स्थान पर पारिवारिक वातावरण निर्मित हुआ।

‘वैश्विक हिंदी परिवार’ नाम अपने आप में एक ऐसी अवधारणा को व्यक्त करता है जिसमें हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि दुनिया भर में बसे भारतीयों को जोड़ने वाला सांस्कृतिक सेतु बन जाती है। आराधना जी के संचालन में इस भाव की स्पष्ट अनुभूति हुई।

बाद में उन्होंने अपनी रचना ‘देश बहता है रगों में’ के माध्यम से भी इसी भाव को स्वर दिया—

«“देश बहता है रगों में, देह में है प्राण बनके,
इस जहां में हम जहां भी एक अमिट पहचान बनके।”»

इन पंक्तियों में प्रवासी भारतीय की पहचान का सार निहित है—वह जिस देश में रहता है, वहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का हिस्सा बनता है, लेकिन उसकी भारतीय पहचान उसके भीतर निरंतर जीवित रहती है।

ऑस्ट्रेलिया से गूँजी मातृभूमि-वंदना

कार्यक्रम की प्रारंभिक प्रस्तुतियों में रेखा राजवंशी (ऑस्ट्रेलिया) की कविता ने मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और वंदना का स्वर उपस्थित किया। उनकी रचना ‘रोली अक्षत चंदन लेकर’ में भारतीय परंपरा के मंगल-चिह्नों के माध्यम से भारत माता को नमन किया गया।

«“रोली अक्षत चंदन लेकर भारत मां को नमन करूं,
गगन धरा को और प्रकृति पावन माटी को नमन करूं।”»

रोली, अक्षत और चंदन जैसे शब्द केवल पूजा की सामग्री नहीं हैं; वे भारतीय सांस्कृतिक स्मृति के प्रतीक हैं। ऑस्ट्रेलिया में रह रही कवयित्री जब इन्हीं प्रतीकों के माध्यम से भारत को नमन करती हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रवास के बाद भी सांस्कृतिक संस्कार कितनी गहराई से व्यक्ति के भीतर सुरक्षित रहते हैं।

यह कविता भारत को केवल एक भौगोलिक भूभाग के रूप में नहीं, बल्कि आकाश, धरती, प्रकृति और पावन माटी से निर्मित एक भावलोक के रूप में देखती है।

जर्मनी से आई देश की याद

डॉ. शिप्रा शिल्पी सक्सेना (जर्मनी) की प्रस्तुति ने प्रवासी जीवन के उस पक्ष को सामने रखा जिसमें आधुनिक और सुविधासंपन्न जीवन के बावजूद मन अपने देश को तलाशता रहता है। उनकी कविता ‘परदेश की चौड़ी राहों पर’ प्रवासी मन की इसी बेचैनी और देशप्रेम को स्वर देती है—

«“परदेश की चौड़ी राहों पर चलता है मन देश लिए,
आंखों में अपनों की छाया होठों पर देश का गान लिए।”»

‘चौड़ी राहों’ और ‘मन देश लिए’ के बीच का विरोधाभास कविता को विशेष अर्थ प्रदान करता है। रास्ते चाहे कितने ही आधुनिक और विस्तृत क्यों न हों, मन अपने साथ देश की स्मृतियाँ लेकर चलता है।

प्रवासी जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि व्यक्ति दो भौगोलिक संसारों के बीच जीता है। वर्तमान उसे परदेश में मिलता है और स्मृतियाँ उसे बार-बार अपने देश में ले जाती हैं।

कतर से बदलते भारत की तस्वीर

शालिनी वर्मा (कतर) ने अपनी कविता ‘बदलता मेरा देश’ में भारत के विकास और परिवर्तन को सकारात्मक दृष्टि से देखा। उनकी पंक्तियाँ हैं—

«“बदला बदला सा मेरा यह देश
पर यह बदलाव अच्छा लगता है,
विकासशील से विकसित होता मेरा देश
पर ये बदलाव अच्छा लगता है।”»

यहाँ प्रवासी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। विदेश में रहते हुए भारत में होने वाले परिवर्तन को देखना अपने आप में एक अलग अनुभव है। सड़कें, तकनीक, डिजिटल सेवाएँ, शिक्षा, उद्योग, अंतरिक्ष और अधोसंरचना—भारत के बदलते स्वरूप की खबरें प्रवासी भारतीयों तक निरंतर पहुँचती हैं।

कवयित्री का ‘बदलाव अच्छा लगता है’ कहना केवल आर्थिक विकास की प्रशंसा नहीं, बल्कि उस देश के आगे बढ़ने पर प्रवासी मन के गर्व की अभिव्यक्ति है जिसे वह दूर रहकर भी अपना मानता है।

नीदरलैंड से आजादी का संदेश

मनीष पांडे (नीदरलैंड) ने अपनी रचनाओं में स्वतंत्रता, भारत के गौरव और सामाजिक सौहार्द का संदेश दिया। उनकी कविता ‘कुछ थे सपने’ की प्रस्तुति स्वतंत्रता दिवस के मूल भाव से जुड़ती है।

उनकी पंक्तियाँ—

«“मिलजुलकर खुशियां बांटें प्रेम भाव के साथ रहें,
आजादी के शुभ दिन पर जय भारत जय हिंद कहें।”»

स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है। स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है जब समाज में परस्पर प्रेम, सहयोग और सद्भाव बना रहे। मनीष पांडे की कविता इसी व्यापक अर्थ की ओर संकेत करती है।

प्रवास में रहते हुए भारत के स्वतंत्रता दिवस को मनाना अपने आप में एक सांस्कृतिक पुनर्स्मरण है। राष्ट्रीय पर्व विदेशों में बसे भारतीयों को उनकी साझा राष्ट्रीय स्मृति से जोड़ते हैं।

ब्रिटेन से प्रवासी जीवन का अंतर्द्वंद

आस्था देव (ब्रिटेन) की रचना ‘मेरा पहला पड़ाव’ ने कार्यक्रम को एक अलग संवेदनात्मक धरातल प्रदान किया। उनकी कविता में प्रवास केवल देश से दूरी नहीं, बल्कि भीतर चलने वाला अंतर्द्वंद्व है।

प्रवास में व्यक्ति को अनेक बार अपने अतीत और वर्तमान के बीच चुनाव करना पड़ता है। नई जगह अपनानी होती है, नई संस्कृति से परिचित होना पड़ता है और जीवन को नए सिरे से व्यवस्थित करना पड़ता है। लेकिन मन के भीतर पुरानी स्मृतियाँ अपना स्थान बनाए रखती हैं।

उनकी पंक्तियों में यह द्वंद्व तीव्रता से उभरता है—

«“अंतर्द्वंद तलाशती हूं तेली में टाटा पर,
जब देखती हूं बगीचे से घर चुभती है हरियाली भी।”»

इन पंक्तियों में परदेश की हरियाली भी कभी-कभी अपने देश की स्मृतियों को और गहरा कर देती है। जो दृश्य किसी अन्य व्यक्ति के लिए सुंदर है, वही प्रवासी के लिए स्मृति का द्वार बन सकता है।

यही प्रवासी संवेदना की जटिलता है—सुंदरता भी कभी-कभी विरह का कारण बन जाती है।

थाईलैंड से ‘माटी की पुकार’

कार्यक्रम की अत्यंत मार्मिक प्रस्तुतियों में शिखा रस्तोगी (थाईलैंड) की कविता ‘माटी की पुकार’ विशेष उल्लेखनीय रही।

उन्होंने माटी को केवल भौतिक पदार्थ न मानकर स्मृतियों, रिश्तों और पीढ़ियों की धरोहर के रूप में देखा—

«“माटी केवल माटी नहीं होती,
उसमें हमारे बचपन के पच्चे होते हैं,
हमारे पुरखों की स्मृतियां होती हैं।”»

‘माटी’ भारतीय साहित्य और संस्कृति में सदैव अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक रही है। किसान के लिए वह जीवन है, सैनिक के लिए मातृभूमि है, बच्चे के लिए खेल का मैदान है और प्रवासी के लिए स्मृति का सबसे गहरा आधार।

इस कविता की संवेदना इसलिए सार्वभौमिक हो जाती है क्योंकि दुनिया के किसी भी हिस्से में चला गया मनुष्य अपनी जड़ों को पूरी तरह नहीं छोड़ सकता। माटी में बचपन, परिवार, पुरखे और अपना इतिहास समाया रहता है।

अमेरिका से ‘प्रवास में बेटी’

आस्था नवल (यूएसए) ने ‘प्रवास में बेटी’ सहित अपनी रचनाओं के माध्यम से परिवार और स्मृति के अत्यंत भावुक पक्ष को सामने रखा।

उनकी पंक्तियाँ—

«“बदल गया है सब कुछ लेकिन नहीं बदलता तो बस मन है मेरा,
जो अब भी मां के घर में ही टिका हुआ है।”»

इन पंक्तियों में प्रवासी भारतीय परिवार की एक सार्वभौमिक अनुभूति दिखाई देती है। जीवन बदल जाता है, पता बदल जाता है, देश बदल जाता है, समय बदल जाता है—लेकिन माँ का घर मन में उसी रूप में बना रहता है।

विशेषकर बेटी के संदर्भ में ‘माँ का घर’ केवल एक स्थान नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा, बचपन और अपनत्व का प्रतीक है। विवाह, प्रवास और जीवन की बदलती परिस्थितियों के बावजूद मायके की स्मृतियाँ मन में अपना स्थायी घर बनाए रखती हैं।

अनिल जोशी की प्रस्तुति

कार्यक्रम में अनिल जोशी का मार्गदर्शन भी उल्लेखनीय रहा। उनकी रचना ‘नींद कहाँ है’ ने कार्यक्रम के भाव-संसार को एक और आयाम दिया। प्रवासी मन की बेचैनी, स्मृति और संवेदनशीलता में नींद का टूटना एक प्रतीक की तरह देखा जा सकता है।

जिस मन में देश, परिवार, स्मृतियाँ और बीते हुए समय की अनेक तस्वीरें बसी हों, वह मन सहज ही शांत नहीं होता। प्रवासी जीवन की उपलब्धियों के साथ उसके भीतर छिपी बेचैनियों को समझने के लिए ऐसी रचनाएँ महत्वपूर्ण हैं।

डॉ. पुष्पिता अवस्थी का अध्यक्षीय उद्बोधन

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. पुष्पिता अवस्थी (नीदरलैंड) ने की। उन्होंने सभी कवियों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कविताओं की जीवंतता और प्रवासी मन की संवेदनाओं को रेखांकित किया।

उनका यह विचार विशेष महत्व रखता है कि कविताएँ हमेशा जीवंत होती हैं और प्रवासी मन की संवेदनाओं का प्रतिबिंब बनती हैं।

वास्तव में इस पूरे कार्यक्रम की कविताओं को देखें तो यही बात स्पष्ट होती है। इन रचनाओं में इतिहास की बड़ी घटनाओं से अधिक व्यक्तिगत अनुभव हैं। भारत इन कविताओं में किसी पाठ्यपुस्तक का विषय नहीं, बल्कि अनुभव है—माँ का घर है, बचपन की माटी है, देश की खुशबू है, परिवार की स्मृति है और अपनी पहचान है।

हिंदी : प्रवासी भारतीयों को जोड़ने वाला सांस्कृतिक सेतु

‘परदेसी मन की संवेदनाएँ’ का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हिंदी की भूमिका है। दुनिया के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों ने अपनी भावनाओं को हिंदी में व्यक्त किया। इससे हिंदी की वैश्विक प्रकृति और उसकी भावात्मक शक्ति दोनों सामने आती हैं।

भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती। वह स्मृतियों की संरक्षक भी होती है। प्रवासी परिवारों में हिंदी के माध्यम से बच्चे अपने दादा-दादी, नाना-नानी, परिवार और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ सकते हैं।

‘वैश्विक हिंदी परिवार’ जैसे मंच इसी सांस्कृतिक निरंतरता को मजबूत करते हैं। ऑनलाइन माध्यमों ने इस कार्य को और आसान बना दिया है। अब ऑस्ट्रेलिया में रहने वाला कवि, जर्मनी की कवयित्री, कतर की रचनाकार, नीदरलैंड का कवि, ब्रिटेन की साहित्यकार, थाईलैंड की कवयित्री और अमेरिका में रहने वाली लेखिका एक ही साहित्यिक मंच पर आकर अपनी संवेदनाएँ साझा कर सकते हैं।

यह दृश्य हिंदी के वैश्विक विस्तार की संभावनाओं का सुंदर उदाहरण है।

स्वतंत्रता दिवस और प्रवासी भारतीय

स्वतंत्रता दिवस भारत में रहने वाले नागरिकों के लिए जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही विदेशों में बसे भारतीयों के लिए भी। बल्कि कई बार दूरी राष्ट्रीय भावना को और अधिक तीव्र बना देती है।

अपने देश से दूर रहकर राष्ट्रीय पर्व मनाते समय व्यक्ति को अपनी जड़ों का अधिक गहरा अनुभव होता है। तिरंगा, राष्ट्रगान, हिंदी गीत, देशभक्ति की कविता और भारतीय व्यंजन—ये सभी उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं।

इस काव्य-गोष्ठी में स्वतंत्रता दिवस का उत्सव किसी औपचारिक राष्ट्रगान या भाषण तक सीमित नहीं रहा। कवियों ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से स्वतंत्रता, देशप्रेम और भारतीयता को जीवंत बनाया।

कविता बनी स्मृति और वर्तमान के बीच सेतु

इस कार्यक्रम की कविताओं को एक साथ देखें तो उनमें कुछ प्रमुख भाव-सूत्र स्पष्ट दिखाई देते हैं—

मातृभूमि-वंदन,
देशप्रेम,
भारत के विकास पर गर्व,
प्रवासी जीवन की चुनौतियाँ,
माँ और परिवार की स्मृतियाँ,
बचपन और माटी से जुड़ाव,
भारतीय संस्कृति और पहचान, तथा
स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव।

इन सभी भावों को जोड़ने वाला सूत्र है—अपनी जड़ों से जुड़ाव।

प्रवास व्यक्ति को अपनी जड़ों का महत्व और अधिक समझाता है। जो चीजें अपने देश में रहते हुए सामान्य लगती हैं, वे विदेश में जाकर विशेष हो जाती हैं। अपनी भाषा की आवाज, अपने त्योहार, अपनी बोली, अपने शहर का नाम, अपने घर का भोजन और बचपन की गलियाँ—सब कुछ स्मृति में अनमोल हो जाता है।

वैश्विक हिंदी परिवार का सांस्कृतिक संकल्प

‘वैश्विक हिंदी परिवार’ का यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि हिंदी आज केवल भारत की सीमाओं में सीमित भाषा नहीं रही। दुनिया के अनेक देशों में हिंदी साहित्य का सृजन, पाठ और संवाद हो रहा है।

ऐसे आयोजन प्रवासी भारतीयों को साहित्यिक मंच देने के साथ-साथ हिंदी को वैश्विक सांस्कृतिक संवाद की भाषा बनाने में भी योगदान देते हैं। विशेष रूप से डिजिटल माध्यमों ने हिंदी साहित्य के वैश्वीकरण को एक नई गति दी है।

इस कार्यक्रम में अनिल जोशी का मार्गदर्शन, आराधना श्रीवास्तव का आत्मीय संचालन, डॉ. पुष्पिता अवस्थी की अध्यक्षीय दृष्टि और देश-विदेश से जुड़े कवियों की सक्रिय भागीदारी ने इसे एक व्यापक सांस्कृतिक आयोजन का स्वरूप दिया।

निष्कर्ष : दूरी बढ़ी, संबंध नहीं

‘परदेसी मन की संवेदनाएँ’ को केवल एक ऑनलाइन काव्य-गोष्ठी कहना उसके महत्व को सीमित करना होगा। यह आयोजन वास्तव में उस भावभूमि का उत्सव था जहाँ भौगोलिक दूरी के बावजूद मातृभूमि मन से दूर नहीं होती।

ऑस्ट्रेलिया से भारत माता को नमन करती रेखा राजवंशी हों, जर्मनी की धरती से देश का गीत गाती डॉ. शिप्रा शिल्पी सक्सेना, कतर से बदलते भारत को देखती शालिनी वर्मा, नीदरलैंड से आजादी का संदेश देते मनीष पांडे, ब्रिटेन से प्रवास के अंतर्द्वंद को व्यक्त करती आस्था देव, थाईलैंड से माटी की पुकार सुनाती शिखा रस्तोगी या अमेरिका से माँ के घर को याद करती आस्था नवल—सभी की संवेदनाओं का केंद्र अंततः भारत ही है।

इन कविताओं ने यह संदेश दिया कि प्रवास केवल स्थान परिवर्तन है, जड़ों का विस्थापन नहीं।

देश से हजारों किलोमीटर दूर बैठा भारतीय जब कहता है कि “देश बहता है रगों में”, तो वह केवल कविता नहीं लिख रहा होता; वह अपनी पहचान का उद्घोष कर रहा होता है।

यही इस काव्य-गोष्ठी की सबसे बड़ी उपलब्धि है—इसने परदेसी मन की उस आवाज को मंच दिया, जो कहती है कि देश आँखों से दूर हो सकता है, स्मृतियों से नहीं; घर पीछे छूट सकता है, मन से नहीं; और मातृभूमि की माटी से दूरी बढ़ सकती है, उसका आकर्षण कभी समाप्त नहीं होता।

‘वैश्विक हिंदी परिवार’ का यह आयोजन इसी अमर भाव का साहित्यिक उत्सव था—जहाँ सात समंदर पार से भी भारत की धड़कन स्पष्ट सुनाई देती रही।

संचालन एवं अध्यक्षीय उद्बोधन
कार्यक्रम का अत्यंत प्रभावी और आत्मीय संचालन आराधना श्रीवास्तव जी द्वारा किया गया। उन्होंने प्रत्येक कवि को सम्मानपूर्वक मंच प्रदान किया और अपनी पंक्तियों से देशभक्ति के भाव को निरंतर बनाए रखा।
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए नीदरलैंड से डॉ. पुष्पिता अवस्थी ने रचनाओं की सराहना की। उन्होंने रेखांकित किया कि काव्य पंक्तियां प्रवासी जीवन के संघर्षों, स्मृतियों और संवेदनाओं का जीवंत प्रतिबिंब होती हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार अनिल जोशी जी के मार्गदर्शन और सभी सदस्यों की सक्रिय सहभागिता ने यह स्पष्ट कर दिया कि ‘वैश्विक हिंदी परिवार’ विश्व पटल पर हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखने के अपने संकल्प की दिशा में निरंतर अग्रसर है। यह आयोजन दूर देश में बैठे भारतीयों के लिए अपनी माटी से जुड़ने का एक अविस्मरणीय पड़ाव साबित हुआ।

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