दिन विशेष कहानी में डॉ. अंजना गर्ग की कहानी “चार खुश औरतें“
डॉ अंजना गर्ग की यह कहानी “चार खुश औरतें” जीवन के प्रति एक नए दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती है । कहानी परिवार में अकेलेपन,विधवा जीवन और बढ़ती उम्र के साथ जीवन को अपनी तरीक़े से जीने और खुश रखने की बात करती है ।
कहानी में ये टिप्पणियाँ ही कहानी का सार-संक्षेप हैं: विधवा होने के बाद जीवन बस इंतज़ार बन जाता है… पर अब लगता है हम कोशिश करें तो जीवन का दूसरा अध्याय शुरू कर सकते है।”
“शायद जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा वही होता है जो हम खुद लिखते हैं।”
“हम चारों पहले अलग-अलग घरों में चार उदास औरतें थीं… अब एक घर में चार खुश औरतें हैं।”
पढ़कर आपको लगेगा जैसे आप इन उदास और बाद में खुश औरतों को बखूबी पहचानते हैं – मनोज अबोध
परिचय : डॉ. अंजना गर्ग, पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष लोक प्रशासन विभाग एवं पूर्व निर्देशक हरियाणा अध्ययन केंद्र , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक का जन्म पंजाब के बठिंडा में हुआ।
डॉ. अंजना गर्ग शिक्षा, सांस्कृतिक गतिविधियों , खेल और विद्यार्थी राजनीति का एक दुर्लभ योग है। उन्होंने स्पेन, संयुक्त राज्य अमेरिका ,भूटान, आयरलैंड, फ्रांस, दुबई , स्कॉटलैंड इत्यादि देशों का शैक्षणिक उद्देश्य से भ्रमण किया।
डॉ. अंजना गर्ग पिछले 44 वर्षों से अनुसंधान का कार्य कर रही है। उनके मार्गदर्शन में बहुत से छात्र-छात्राएं शोध कर चुके हैं। उनकी अब तक नौ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।

“चार खुश औरतें”
शाम ढल रही थी। सूरज की आख़िरी किरणें कॉलोनी के बड़े-बड़े मकानों की दीवारों पर फिसलती हुई मानो यह पूछ रही थीं कि इतने विशाल घरों में आखिर इतनी खामोशी क्यों है।
इनमें से एक घर में संध्या रहती थी। कभी यही घर हँसी से भरा रहता था—पति, बच्चे, मेहमान, रिश्तेदार। मगर अब संध्या के लिए यह घर जैसे एक लंबा गलियारा बन गया था जिसमें कदमों की आवाज़ भी उसे चौंका देती थी। पति से वर्षों पहले तलाक हो चुका था। बच्चे पढ़ाई के लिए बाहर गए और वहीं बस गए।
दिन भर का समय काटना उसके लिए एक पहेली बन गया था। सुबह चाय बनाती, अख़बार पढ़ती, थोड़ा-सा खाना बनाती और फिर खिड़की से सड़क को देखती रहती—जैसे किसी का इंतज़ार हो, जिसका आना तय ही न हो।
एक दिन वह पास के पार्क में टहलने गई। वहीं उसकी मुलाक़ात मीरा से हुई। मीरा की आँखों में एक स्थायी थकान थी, जैसे जीवन ने बहुत जल्दी उससे कुछ छीन लिया हो। बातचीत में पता चला कि मीरा की शादी को मुश्किल से पाँच साल हुए थे जब एक सड़क दुर्घटना में उसके पति की मृत्यु हो गई थी।
मीरा ने हँसने की कोशिश करते हुए कहा,
“लोग कहते हैं समय सब ठीक कर देता है… पर कुछ खालीपन ऐसे होते हैं जिनमें समय भी कदम रखने से डरता है।”
संध्या ने महसूस किया कि दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बन रहा है—अकेलेपन का रिश्ता।
धीरे-धीरे पार्क में रोज़ मिलने का सिलसिला शुरू हो गया। दोनों साथ टहलतीं, कभी चाय पीतीं, कभी यूँ ही बातें करतीं।
एक दिन पार्क की बेंच पर बैठी दोनों बातें कर रही थीं कि पास की पगडंडी से दो महिलाएँ आती दिखीं—शकुंतला जी और कमला जी। दोनों की उम्र लगभग पैंसठ के आसपास रही होगी। सफ़ेद बाल, हल्की मुस्कान, और आँखों में वह गहराई जो केवल लंबे अनुभव से आती है।
किसी परिचित ने उनका परिचय करवाया। पता चला कि दोनों कुछ साल पहले ही विधवा हुई थीं। बच्चों ने बहुत कहा कि उनके साथ चलकर रहें, मगर दोनों ने मना कर दिया।
“बेटे-बहू सुबह से रात तक ऑफिस में रहते हैं। बच्चे स्कूल और ट्यूशन में। वहाँ जाकर भी क्या करेंगे?”
कमला जी ने हँसते हुए कहा,
“यहाँ कम से कम अपनी मर्जी से जी रहे हैं। अपना शहर है कुछ लोग जानकार भी हैं। वहां तो बस बच्चों की माँ और सास बन कर रह जाते हैं। यहां कम से कम लोग हमें हमारे नाम से तो जानते हैं।”
उस दिन के बाद पार्क में चार औरतों की छोटी-सी टोली बन गई।
समय के साथ चारों की दोस्ती गहरी होती गई। हर शाम वे एक ही बेंच पर बैठतीं और जीवन की परतें धीरे-धीरे खुलती जातीं।
संध्या ने एक दिन कहा,
“इतना बड़ा घर है मेरा… लेकिन कई बार लगता है कि मैं किसी संग्रहालय में रहती हूँ।”
मीरा ने सिर हिलाया,
“मेरे घर में तो आवाज़ भी गूँजती है। कभी-कभी टीवी सिर्फ इसलिए चलाती हूँ कि सन्नाटा टूटे।”
शकुंतला जी बोलीं,
“बच्चे कहते हैं हमारे पास आ जाओ… लेकिन उनके जीवन में जगह कहाँ है?”
कमला जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“हम सबके पास घर तो बहुत बड़े हैं… पर जीवन में कुछ बचा नहीं है।”
चारों हँसीं, मगर उस हँसी में एक गहरा दर्द छिपा था।
मीरा अचानक बोली,
“एक बात कहूँ… आप लोग हंसना मत।”
संध्या ने उत्सुकता से पूछा,
“क्या बात है?”
मीरा ने थोड़ा झिझकते हुए कहा,
“हम चारों इतने बड़े-बड़े घरों में अकेली रहती हैं… क्यों न हम सब एक ही घर में एक साथ रहें?”
तीनों एक पल के लिए चुप रह गईं।
कमला जी ने भौंह उठाई,
“मतलब… हम चारों एक घर में एक साथ?”
मीरा ने कहा,
“हाँ… सोचिए। चार घरों का खर्चा, चार नौकर, चार किचन… और चारों में अकेलापन। अगर हम एक घर में रहें तो?”
शकुंतला जी की आँखों में चमक आ गई।
“और बाकी घर किराये पर दे दें!”
संध्या अचानक हँस पड़ी।
“और जब बच्चे आएँ तो होटल में ठहर जाएँ… किराये के पैसे से आराम से हो जाएगा!”
चारों ज़ोर से हँस पड़ीं।
पर धीरे-धीरे यह मज़ाक एक गंभीर विचार में बदल गया।
कुछ हफ्तों की चर्चा के बाद उन्होंने फैसला कर लिया।
संध्या का घर सबसे बड़ा था और पार्क के भी सबसे करीब। इसलिए तय हुआ कि वही उनका नया घर बनेगा।
बाकी तीनों ने अपने-अपने घर किराये पर दे दिए।
एक कुक रख लिया गया, जो सुबह-शाम खाना बना देता। एक कामवाली आकर सफ़ाई कर जाती।
अब घर में चार कमरे नहीं, चार संसार थे।
पहले संध्या की सुबहें बहुत चुप होती थीं। अब सुबह होते ही किचन से आवाज़ आती—
“कमला जी, चाय में चीनी कम रखूँ?”
“अरे नहीं, आज थोड़ी ज़्यादा… आज मेरा मूड अच्छा है!”
मीरा योगा मैट लेकर आँगन में बैठ जाती।
शकुंतला जी तुलसी के पास दीया जलातीं।
संध्या कभी-कभी सोचती—
“घर तो वही है, पर अब यह सचमुच घर लगने लगा है।”
अब हर दिन कोई न कोई छोटा उत्सव होता।
कभी चारों मिलकर पकौड़े बनातीं।
कभी पुरानी फ़िल्में देखतीं।
कभी छत पर बैठकर चाँद देखते हुए पुरानी बातें करतीं।
मीरा ने एक दिन गिटार निकाल लिया जो वर्षों से अलमारी में पड़ा था।
कमला जी ने कहा,
“अरे वाह! अब तो हमारे घर में संगीत भी होगा।”
शकुंतला जी ने हँसते हुए कहा,
“और मैं श्रोता बनूँगी!”
कुछ हफ्तों बाद जब बच्चों को पता चला कि उनकी माँएँ एक साथ रहने लगी हैं तो वे थोड़ा हैरान हुए।
संध्या की बेटी ने फोन पर कहा,
“माँ, आपको अजीब नहीं लग रहा अंजान औरतों के साथ ?”
संध्या मुस्कुराई,
“अंजान? अब तो हम इतना धमाल करते हैं कि लगता है जैसे बरसों से जानते हैं। इतना शोर रहता है कि कभी-कभी शांति ढूँढनी पड़ती है।”
मीरा के बेटे ने पूछा,
“माँ, जब हम आएँगे तो कहाँ रुकेंगे?”
मीरा ने हँसते हुए कहा,
“पास के होटल में। वैसे भी तुम लोग दो-तीन दिन ही रहते हो।”
फोन के उस पार कुछ पल चुप्पी रही… फिर दोनों हँस पड़े।
धीरे-धीरे उनकी यह व्यवस्था पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गई।
लोग कहते,
“देखो, इन चारों ने अकेलेपन का कितना सुंदर हल ढूँढ लिया।”
कभी-कभी पड़ोस की महिलाएँ भी चाय पीने आ जातीं।
एक दिन पार्क में बैठी संध्या ने कहा,
“पता है… पहले मैं हर दिन बच्चों का इंतज़ार करती थी और उनकी छुट्टियों को कैलेंडर पर निशान लगा कर दिन गिनती रहती थी।अब समय ही नहीं मिलता इंतज़ार करने का।”
कमला जी बोलीं,
“और मुझे लगता था कि विधवा होने के बाद जीवन बस इंतज़ार बन जाता है… पर अब लगता है हम कोशिश करे तो जीवन का दूसरा अध्याय शुरू कर सकते है।”
मीरा ने आसमान की ओर देखते हुए कहा,
“शायद जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा वही होता है जो हम खुद लिखते हैं।”
एक शाम चारों छत पर बैठी थीं। हवा हल्की ठंडी थी। दूर कहीं मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।
संध्या ने चारों की ओर देखा और धीरे से कहा,
“हम चारों पहले अलग-अलग घरों में चार उदास औरतें थीं… अब एक घर में चार खुश औरतें हैं।”
शकुंतला जी ने मुस्कुराकर कहा,
“क्योंकि अब यह घर चार दीवारों का नहीं… चार दिलों का है।”
कमला जी ने चाय का कप उठाया,
“और यह हमारी दोस्ती के नाम।”
मीरा ने हँसते हुए कहा,
“और हमारी आज़ादी के नाम।”
चारों के कप आपस में टकराए।
नीचे सड़क पर वही पुरानी खामोशी थी, वही बड़े-बड़े मकान थे।
लेकिन इस घर की छत पर अब अकेलापन नहीं रहता था।
क्योंकि यहाँ चार औरतों ने मिलकर यह साबित कर दिया था कि
साथ सिर्फ रिश्तों से नहीं, अच्छे निर्णयों से भी बनाया जा सकता है।
