दिन विशेष में सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की लघुकथाएँ
“थ्रिल मेरी जान”
“मैं ठीक तीन बजे आ जाऊँगी तेरे हॉस्टल के गेट पर। तैयार मिलियो।” अंतिम पीरियड समाप्त होते ही नमिता ने अपनी बेस्ट फ्रेड शबाना से कहा।
“तू बड़ी घोंचू है। क्यों आ जाएगी? किसलिए आएगी?”
“कमाल है, मुझसे पूछ रही कि क्यों आ जाएगी? असली घोंचू तो तू है।”
“मैं क्यूँ?”
“अरे, तूने ही तो कहा था कि तेरा ब्वायफ्रेंड बड़ा क्यूट है और इस सन्डे तू मुझे उससे मिलवाएगी।”
“अरे, जाने दे यार। साला मतलबी निकला। भगा दिया मैंने उसे।”
“अभी तीन महीने पहले ही तो तेरी उससे दोस्ती हुई थी, इतनी जल्दी ब्रेकअप? तूने तो बताया था कि बड़ा जोली है और खुलकर खर्चा भी करता है।“
“हाँ, खर्चा तो करता था; पर, जब भी मिलता था; बस, एक ही बात की ज़िद…”
“अरे वो तो सभी करते हैं। इसमें नया क्या है? मेरे वाला भी ऐसा ही है? ज़िंदगी में कुछ पाना है, तो थोड़ा-बहुत तो देना भी पड़ता है। लाइफ इज़ जस्ट गिव एन्ड टेक।”
“वो तो ठीक है; पर, ये साला तो उन बेढंगे दिनों में भी वही जिद कर बैठता था।”
“फिर तो ब्रेकअप ही ठीक था। ऐसों का बस्स, यही इलाज होना चाहिए।”
“हाँ, याद आया, ठीक है, तू आ जइयो तीन बजे। धरने पर चलेंगे। मज़ा आएगा।”
“हम वहां क्या करेंगे? वहां हमारा क्या काम? वो तो इम्तहान में नक़ल के खिलाफ है। नक़ल के बिना तो मैं पास भी नहीं हो सकती। नक़ल से ही तो बढ़िया नंबर आते हैं।”
“अरे उल्लू की पट्ठी। इस तरह के धरने-प्रदर्शनो से इम्तहानों में नक़ल रूक जाती तो सारे पढ़ने और पढ़ाने वालों के सिर गंजे हो जाते और मेरे जैसे आधे से ज्यादा तो पढाई छोड़कर शादी की घुटनभरी जिंदगी में खप जाते।”
“फिर तू, मुझे वहां क्यों ले जा रही है? भीड़ में पसीना बहाने क्यों जाएं?”
“मेरी जान, जिंदगी में कुछ थ्रिल भी तो होनी चाहिए। कोई जंच गया तो दोस्ती के लिए नया कबूतर भी मिल जायेगा।“
“फिर तो चलना ही पड़ेगा।”
फितरत
“कल तो एक अजीब वाकया हो गया ।”
“क्या हुआ?”
“मेरे सपने में एक बुड्ढा आया…उसने अचानक मुझे अपनी बाहों में समेट लिया। मैं घबरा गया। सांस जैसे रुकने को हुई। किसी तरह खुद को उससे अलग किया। बुड्ढा मुझे बहुत देर तक देखता रहा— चुप और बेबस ।”
“फिर?”
“पहले तो मैं डर गया। फिर हिम्मत करके पूछा, “तुम कौन हो?”
बुड्ढे के चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट आ गई। वह धीरे से बोला—“मैं शिवचरण हूँ…तुम्हारे दादा का दादा।“
“अब मैं चौंक गया। मैंने कहा, “ये कैसे हो सकता है? मेरे घर में तो ऐसे किसी नाम का जिक्र हराम है।”
बुड्ढे की आँखों में एक अजीब-सी थकान झलकने लगी ।
“बेटा, नाम बदल देने से रिश्ते नहीं बदलते। तुम्हारी जड़ों में बहुत कुछ दबा दिया गया है…बहुत कुछ भुला दिया गया है।”
मैंने झुंझलाकर कहा, “यह तुम कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो? मेरे खानदान में ऐसा नाम किसी का नहीं है। तुम तो काफिर जान पड़ते हो। तुम मेरे दादा के दादा नहीं हो सकते।”
बुड्ढा चुप रहा। उसने एक लंबी सांस ली, जैसे सदियों का बोझ उसके सीने में दफ़न हो।
“तुम्हारी दादी की दादी की छोटी बहन शांति को कई साल पहले अफगानी उठा ले गए थे। वही शांति मेरी बहन थी। उसके बाद हमारी कहानियाँ बिखर गईं। लेकिन खून कभी झूठ नहीं बोलता।” बुड्ढे की आवाज भारी हो गई थी।
“फिर क्या हुआ?” अचानक कमरे में अंधेरा फैलने लगा। मैं बेचैन हो उठा।
आगे होना क्या था? डर ने मेरी नींद उड़ा दी। मैंने खुद को पसीने-पसीने होते पाया। मेरा बिस्तर भी भींग गया था। मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा।
मैं बोला, “मुझे यह सब नहीं सुनना। सपने सच नहीं होते।”
“सपने सच हों या न हों पर हुआ यही होगा।”
“क्या मतलब?”
“अब मैं किसी खून-खराबे का हिस्सा नहीं बनूँगा। हम सब की रगों में जो लहू है, उसका डीएनए एक ही है।”
इतना सुनते ही यार का खून खौल गया। वह बोला, “इसके पहले की मेरा खज़र तेरे सीने में घुसे, तू यहाँ से दफा हो जा।”
“ये कैसी बात कर रहा है? तू भी मेरा भाई है?”
“भाई-वाई छोड़। तू काफिराना बात कर रहा है, इसलिए सब कुछ हो सकता है।” उसकी आँखों में दरिंदगी तैरने लगी।
इसके पहले कि यार, यार की बात को समझ पाता, अपनी फितरत से मजबूर वह, उस पर झपट पड़ा।
परिचय
- नाम : सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
- जन्म : 9 नवम्बर, 1 9 5 1 ( जगाधरी-हरियाणा)
- शिक्षा : स्नातकोत्तर (प्राणी-विज्ञान), बी.एड. (हिसार-हरियाणा)
- लेखन विधा : लघुकथा, कहानी, बाल-कथा, कविता, बाल-कविता, पत्र-लेखन, डायरी-लेखन, सम-सामयिक विषय आदि
- प्रथम प्रकाशित रचना : कहानी : “लाखों रूपये”, क्राईस्ट चर्च कालेज, पत्रिका, कानपुर (वर्ष–1971)
- आठ लघुकथा संग्रह (आजादी, विष कन्या, तीसरा पैग, सफर एक यात्रा, उतरन, दीवारें बोलती हैं, धारदार कलम, एक नोट की मौत); तीन कहानी-संग्रह; एक बाल कथा-संग्रह, दो काव्य संग्रह, 5.तीन ई-लघुकथा संग्रह; अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन एवं साझा संकलनो में कविता, कहानी, लघुकथाओं, आलेखों का प्रकाशन
- सम्पादन : 1 . ” मृग मरीचिका” (अनियमित पत्रिका के आठ अंकों का सम्पादन और प्रकाशन), 2 . तीन लघुकथा संग्रह (तैरते-पत्थर, डूबते कागज़, दरकते किनारे और इकरा तथा अन्य लघुकथाएं; 3. तीन कहानी संग्रह (अपूर्णा तथा अन्य कहानियां, बेबसी तथा अन्य कहानियां एवं इक्कीसवी सदी की चर्चित कहानियां); 4. पांच लघुकथा संग्रहों का सम्पादन
- पुरस्कार/सम्मान : हिंदी अकादमी (दिल्ली), दैनिक हिंदुस्तान (दिल्ली) सहित अन्य अनेक पुरस्कार; तीन कहानियाँ तथा बहुत सी लघुकथाएं पुरस्कृत
- आजीविका : शिक्षा निदेशालय, दिल्ली के अंतर्गत, 3 2 वर्षों तक जीव-विज्ञान के प्रवक्ता पद पर कार्य करने के पश्चात, नवम्बर 2011 में सेवा-निवृत्ति; उससे पहले भारतीय खाद्य निगम, हिसार में इंस्पेक्टर के पद पर कार्य किया
- संप्रति: स्वतंत्र लेखन ।
