दिन विशेष (कथेतर) में विरहिणी मन और पुरुष – अभिव्यक्ति : संध्या सिलावट
संध्या सिलावट ने इस आलेख में नारी और पुरुष के बीच प्रेम-बीज के अंकुरित होकर इसके विराट रूप में पल्लवित होने के विभिन्न आयामों को चित्रोपम ढंग से वर्णित किया है. उन्होंने प्रेम के सबसे लोकप्रिय पक्ष अर्थात् विरह-वियोग पर विहंगम दृष्टि डाली है. इस प्रयोजनार्थ, हिंदी साहित्य में और विशेषतया हिंदी काव्य में अब्दुल रहमान, जायसी, सूरदास, मीराबाई, घनानन्द, हरिऔध, मैथिलिशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, बच्चन जैसे कवियों द्वारा वर्णित विरह काव्य के दृष्टांतों के माध्यम से इस आलेख को समृद्ध और पठनीय बनाया है. अवश्य इसका अनुशीलन करें! : संपादक-डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र

”विरहिणी मन और पुरुष-अभिव्यक्त”
मनुष्य के जीवन में यौवन काल सबसे अधिक मादक और आकर्षक होता है। युवावस्था में नारी और पुरुष परस्पर आकर्षित होते हैं। आकर्षण प्रेम का रूप ले लेता है। नर-नारी दोनों प्रेम-पाश में उलझ जाते हैं। प्रेमी और प्रेमिका को प्रेम-रस के समक्ष सभी कुछ नगण्य और हीन लगता है। उनके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेम ही होता है। जब दोनों परिस्थितिवश संयोग नहीं कर पाते हैं, एक दूसरे से मिल नहीं पाते हैं, वियोग में रहने हेतु विवश होते हैं, तब प्रेमी और प्रेयसी में मिलन के लिए जो तड़प-बेचैनी, छटपटाहट तथा उत्कंठा होती है, उसी पीड़ा को विरह कहा जाता है।
आजीवन, मनुष्य का प्रियजनों से संयोग-वियोग चलता ही रहता है। मिलन सभी को सुखकर प्रतीत होता है। विरह दुःखदायी है, परंतु इस कष्टकारी विरह या वियोग का अपना ही एक पृथक आनंद है। विरह को प्रेम की कसौटी माना जाता है। मुंशी प्रेमचन्द के शब्दों में-“जो व्यक्ति एकान्त में बैठकर किसी की स्मृति में या वियोग में बिलख-बिलखकर नहीं रोया, वह जीवन के एक ऐसे सुख से वंचित है जिस पर सैकड़ों मुस्कानें न्यौछावर हैं।”
जब से आदि मनुष्य ने प्रेम को समझा होगा तभी से विरह की भी सृष्टि हो गई होगी। इस विरह को ही कविता के जन्म का कारण माना गया है। संपूर्ण संसार के रचनाकार विरह की महत्ता को स्वीकार करते हैं। अंग्रेज कवि शैले कहते हैं-“Our sweetest songs are those that tell of saddest thoughts.”
प्राचीन काल से ही रचनाकार विरह संबंधी कविताएँ रचते आ रहे हैं, कवियों का मन संयोग चित्रण में उतना नहीं लगता है, जितना वियोग चित्रण में। सुख में व्यक्ति बहुत कुछ भूल जाता है, परंतु दुःख की निरंतरता उसे सताती है और अपनों का बिछोह उसे सतत् चुभता है, उसका अकेलापन उसे दुःखी बनाता है। कविवर पंत के शब्दों में–
वियोगी होगा पहला कवि,
आह से उपजा होगा गान ।
उमड़कर ऑंखों से चुपचाप,
बही होगी कविता अनजान ।
जहाँ तक कविता और विरह का नाता है तो यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं है कि कविता का अर्धांश से भी अधिक भाग मात्र विरहानुभूतियों के चित्रण से आप्लावित है। व्यक्ति विरही होते हुए भी अभागा नहीं है। निम्न उक्ति से यह प्रमाणित है-
मिलन अन्त है मधुर प्रेम का और विरह जीवन है।
जब तक विरह है, प्रेम में निरंतरता है, मिलन होते ही इस निरंतरता का अंत होने लगता है।
विरह-वेदना की आग में तपकर ही प्रेम स्वर्ण बनता है। यदि प्रेम शारीरिक आकर्षण और वासना तक सीमित है तो इसकी आयु कम रहती है, जैसे ही प्रेम-पात्र अनुपस्थित होता है प्रेम की भी अनुपस्थिति हो जाती है, प्रेम का अंत हो जाता है। प्रेम की शुद्धता परखने के लिए प्रेम-पात्रों को विरहाग्नि में विदग्ध होना अति आवश्यक है। विरहाग्नि प्रेम की मलिनता को भस्म करके उसे शुद्ध करती है। विरहाग्नि में तपना प्रेमी के लिये अत्यधिक कष्टकारी होता है। विरह में प्रेमियों को होने वाले कष्टों से घबराकर पंत जी ने तो यहाँ तक कह दिया कि वह निष्ठुर भाग्य के क्रूर-विधान का प्रतिपादन होता है-
विरह अहह! कराहते हुए इस शब्द को
निष्ठुर विधि ने अश्रुओं से है लिखा। -पन्त
साहित्य में या अन्य साधनों में विरह की अंतर्व्यथाओं के अंकन करने में यह तथ्य आवश्यक रूप से उल्लेखनीय है कि रचनाकारों की दृष्टि सदा से ही विरहिणी नारियों की व्यथाओं का कथन करने की ओर ही अधिक रही है। विरही पुरुषों की अंतर्व्यथाओं के वर्णन में रचनाकारों का मन नहीं रमता है। हिन्दी साहित्य में अब्दुल रहमान, जायसी, सूरदास, मीराबाई, घनानन्द, हरिऔध, मैथिलिशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा और बच्चन के काव्य में आँसुओं से सिक्त विरह की अंतर्व्यथाओं का वर्णन है।
विरहाग्नि नारी में प्रज्वलित है, परंतु नारी मन में उठने वाले प्रत्येक उद्गार का वर्णन पुरुष रचनाकारों द्वारा किया जा रहा है, मीराबाई और महादेवी को छोड़ दें तो नारी के अंर्तमन में उठने वाले प्रेम से संबंधित प्रत्येक भाव का अंकन पुरुष रचनाकारों द्वारा प्राचीन काल से आजतक जारी है। ये नारी मन को कैसे समझ लेते हैं?, पीड़ा किसी नारी की और उसे पुरुष द्वारा बहुत ही मार्मिक तथा गहराई से नारी की सामाजिक स्थिति का ध्यान रखते हुए व्यक्त किया जाता है।
अब्दुल रहमान-इन्होंने 12वीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं तेरहवीं सदी के प्रारंभ में ’संदेश रासक‘ रचा। खण्ड काव्य की विषय वस्तु ही विक्रमपुर की एक विरहिणी के विरह की कथा है। बाहर गए पति के लिए विरहिणी पथिक को संदेश देती है। उसके संदेश को कवि ने ऋतुवर्णन के द्वारा अंकित किया है। वर्षा वर्णन का प्रसंग देखिए-
झंपवि तम बद्दलिण दसह दिसि छायउ अंबरु।
उन्नविय घुरहुरइं घोर घणु किसयाडंबरु।
णहह मग्गि णहवल्लिय तरल तडयडिवि तडक्कइ।
दद्दुर रउणु रउद्दु सद्दु कुवि सहवि ण सक्कइ।
निबड निरन्तर नीरहर दुद्धर धर धारोह भरु।
किम सहउ पहिय सिहरट्ठियइ दुसहउ कोइल रसह सरु। -(संदेशरासक)
विरह-कातरा प्रिया पथिक से अपने प्रिय को संदेशा भेजती है। वह मेघों का समय है। दसों दिशाओं में बादल छाए हुए हैं, रह-रह के घहरा उठते हैं, आकाश में विद्युल्लता चमक रही है, कड़क रही है, दादुरों की ध्वनि चारों ओर व्याप्त हो रही है-धारासार वर्षा एक क्षण के लिये भी नहीं रुकती। इस कविप्रथा-सिद्ध वर्षा का वर्णन करते-करते विरहिणी कातरभाव से कह उठती है-हाय पथिक, पहाड़ की चोटियों पर से उसने (प्रिय ने) यह सब कैसे सहा होगा?
इससे विरह-कातरा प्रिया का अत्यन्त कोमल और प्रीति-परायण हृदय ही ध्वनित हुआ है। बाह्य प्रकृति तो उसके सहानुभूतिमय प्रेम-परायण हृदय को दिखा देने का साधन भर है। विरहिणी के अंतर्मन का कितना मार्मिक वर्णन कवि ने आज से सैंकड़ों वर्ष पूर्व किया है।
मुँज-जैनाचार्य मेरुतुंग ने 1304 ई. में ’प्रबंध चिंतामणि‘ नामक एक संस्कृत ग्रंथ ’भोजप्रबंध‘ के ढंग का रचा, जिसमें बहुत-से प्राचीन ऐतिहासिक व्यक्तियों और राजाओं के चरित्रों के कथारूप में आख्यान संगृहीत किए। इन्हीं आख्यानों के अंतर्गत बीच-बीच में अपभ्रंश के पद्य भी उद्धृत हैं, जो बहुत पहिले से चले आते थे। कुछ दोहे तो धाराधिपति राजा भोज के चाचा मुंज के रचित हैं। मुंज के दोहे अपभ्रंश के या पुरानी हिन्दी के बहुत पुराने उदाहरण कहे जा सकते हैं। मुंज ने जब तैलप देश पर चढ़ाई की थी, तब तैलप के राजा ने उसे बंदी बना लिया था और रस्सियों से बाँधकर तैलप ले गया था। तैलप के राजा की बहन मृणालवती से मुंज को प्रेम हो गया। इस प्रसंग का दोहा देखिए-
बाह बिछोड़बि जाहि तुहुँ हउँ तेवइँ का दोसु।
हिअयट्विय जइनी सरहि, जाणउँ मुंज सरोसु।।
(बाँह छुड़ाकर तू जाता है, मैं भी वैसे ही जाती हूँ-क्या हर्ज है? हृदय स्थित अर्थात् हृदय से यदि निकले तो मैं जानूँ कि मुँज रूठा है।)
उपर्युक्त दोहा मुंज द्वारा रचित है, जिसमें कवि ने मृणालवती के भावों का वर्णन किया है।
मलिक मुहम्मद जायसी-16वीं शताब्दी के रचनाकार जायसी का पद्मावत हिन्दी-साहित्य में अपने विरह-वर्णन के लिए अनुपम है। अत्यंत भावुक जायसी ने अपने अंतर के प्रेम की पीर को रानी नागमती के विरह अंकन के द्वारा मार्मिक और व्यापक ढंग से किया है। रानी नागमती का पति राजा रत्नसेन पद्मावती को पाने हेतु नागमती को एकाकी बना, योगी हो, सिंघलद्वीप चला जाता है। पति का उपेक्षाभाव उसे विरह-वेदना में डुबो देता है। विरहाग्नि में तपती हुई नागमती कहती है-
जानहुँ अगनि के उठहू पहारा। औ सब लागहि अंग अंगारा ।।
लागिउँ जरै, जरै जस भारू। फिरि फिरि भूजेसि तजिउँ न बारू।।
नागमती को अपने अन्तर की विरहाग्नि ज्वालामुखी पर्वत की अग्नि के समान प्रतीत होती है। लेकिन वह इस प्रेम-दशा से मुक्ति नहीं चाहती। भाड़ की बालू में पड़े दाने की तरह जलने पर भी बार-बार उसी में रहना नागमती को प्रिय है। पति परायण हिन्दू नारी की सतीत्व भावना को अपने उत्सर्ग एवं समर्पण के साथ जायसी ने अंकित किया है।
विरह का वर्णन करने के लिए बारहमासा रचने की परिपाटी है। जायसी ने प्रकृति के अनेकानेक परिवर्तनों के साथ नागमती के विरह की तुलना करते हुए संवेदनशील तथा हृदयग्राही अंकन किया है। साहित्य में विरह दशा में पशु-पक्षियों से अपने मन का दुःख सांझा करना सर्वविदित है, नागमती भी उनसे संवाद करती है और सहानुभूति-संवेदना चाहती है-
पिऊ सौं कहेहु संदेसड़ा, हे भौंरा! हे काग ।
सौ धनि विरहै जरि मुई, तेहिक धुंवा हम लाग।।
उपर्युक्त में कवि ने विरहाग्नि के धूएं से काले पड़ने की ऊहा बड़ी अभिव्यंजक शैली में की है। नागमती की विरहावस्था इतनी दाहक हो जाती है कि-
जेहि पंछी के नियर होइ, कहे विरह की बात।
सोई पंछी जाइ जरि, तरिवरि होइ निपात।।
नागमती अपनी व्यथा की ओर संकेत करती हुई एक सखि से कहती है कि मानसरोवर में जो कमल का फूल खिला था वह प्रेमरूपी जल के अभाव में सूख गया लेकिन यदि प्रिय आकर उसे प्रेम से सींचे तो वह पुनः हरा हो जाएगा-
कँवल जो विगसा मानसर, बिन जल गया सुखाइ।
अबहुं वैलि फिर पहुलै, जो पिउ सीचै आइ।।
जिन के पति घर में हैं। उन्हें देखकर नागमती अपने भाग्य को कोसती है। प्रिय के अभाव में उसे जीवन अर्थहीन व सुखरहित लगता है-
जिन्ह घर कन्ता ते सुखी, तिन्ह गारौ औ गर्व।
कन्त पियारा बाहिरै, हम सुख भूला सर्व।।
विरहिणी नागमती वैशाख में एक ओर सूखते तालों की दरारों को देखती है, दूसरी ओर अपने विदीर्ण होते हुए हृदय को। बरसात में वह एक ओर टपकती ओलती देखती है, उसकी तुलना बहती हुई अपने आँसुओं की अजस्र धारा से करती है। शिशिर में सूखकर झड़े हुए पीले पत्तों की तुलना अपनी पीली पड़ी देह से करती है-तन जस पियर पात भो मोरा, तेहि पर विरह देहि झकझोरा। सावन में नागमती विह्वल हो उठती है, उसे भूमि पर रेंगती हुई वीर बहूटी अपने रक्त के आंसू प्रतीत होती हैं-
रकत के ऑंसु चलहि भुइ टूटी, रेंगि चली जस बीर बहूटी।
इस प्रकार जायसी ने विरह-वर्णन बहुत ही मार्मिक ढंग से किया है। एक पुरुष द्वारा नारी के अंतर्मन का इतनी संवेदनशीलता के साथ वर्णन आश्चर्य में डालने वाला है।
सूरदास- सूर प्रेम की परिपक्वता के लिये विरह को अत्यन्त आवश्यक मानते हैं। ‘सूरसागर’ में भ्रमरगीत प्रसंग में कृष्ण-वियोगिनी गोपियों की विरह-व्यथा अत्यन्त मार्मिक एवं कलापूर्ण है। सूर स्पष्ट कहते हैं-
ऊधौ विरहौ प्रेम करै।
ज्यों बिन गुट पट गहै न रंगहि पुट गहै रसहि परै।।
जो आवौ घट दहत अनल तनु पुनि अमिय भरे।।
राजा कंस के दूत बनकर अक्रूर जी गोकुल में आते हैं। कृष्ण तथा उनके भाई बलराम को गोकुल से मथुरा ले जाते हैं। कृष्ण मथुरा जाकर ब्रज को सूना कर, गोपियों को विरह दे गये। सभी कृष्ण के विरह की व्यथा से प्रभावित दिखाई पड़ते हैं-प्रकृति की जो वस्तुएँ संयोग-दशा में सुखद प्रतीत होती थीं, अब वे कृष्ण के विरह में गोपियों की विरह-व्यथा को बढ़ाती हैं।
बिनु गोपाल बैरिन भई कुंजैं।
तब वै लता लगति तन सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं।
इसी प्रकार कृष्ण के विरह में निरन्तर आंसू बहाती हुई गोपियाँ वर्षा ऋतु के साथ अपने जीवन की अभिन्नता बनाती हुई हमें दिखाई देती हैं।
निसिदिन बरसत नैन हमारे ।
सदा रहति पावस रितु हम पर, जब ते स्याम सिधारे ।
जड़ प्रकृति भी वियोगी को उसके दुःख में साथ देती दिखाई पड़ती है। मनोवैज्ञानिक मान्यता है कि विरह की अवस्था में चित्त स्थिर नहीं रहता और एक ही वस्तु विरही व्यक्ति को कभी अनुकूल, तो कभी प्रतिकूल प्रतीत होती है। विरहाकुल हृदय को ‘पीव-पीव’ की रट रात भर लगाने वाला पपीहा सान्त्वना प्रदान करता है।
बहुत दिन जीवो, पपीहा प्यारो ।
सूर ने गोपियों के अंतर्मन में उठने वाले कृष्ण वियोग के भावों का कुशलता से अंकन किया है, साथ ही प्रकृति को भी वियोग में सम्मिलित दिखाया है।
घनानन्द-घनानन्द ‘प्रेम की पीर’ के कवि हैं। प्रेम उनके हृदय की अनुभूत पीड़ा है। उनमें बाह्य आडम्बर के स्थान पर सच्ची ‘स्वानुभूति’ (आन्तरिक व्यथा) को स्वर मिला है। यह अनुभूति कभी भी कुण्ठित नहीं होती। संयोग और वियोग दोनों पक्षों का समावेश होने पर भी प्रधानता वियोग की ही है। इसमें विरहिणी की चिर प्रतीक्षा व्यंजित है। घनानन्द ने विरहिणी या प्रेमी की आन्तरिक पीड़ा, घुटन, व्याकुलता, अश्रु आदि का बड़ा ही अनूठा वर्णन किया है। प्रेम के रंग में भीगे हुए हृदय को यह अटपटी व्यथा न सोने देती है, न जागने, न हँसने, न रोने, प्रेमी अपने उद्भ्रांत में जीवन-मरण के बीच झूलता है-
अन्तर उदेग-दाह आँखिन प्रवाह-आँसू,
देखी अटपटी चाह, भीजनि दहनि है।
सोइबो न जागिबो हूँ, हंसिबो न रोइबो हूँ,
खोय-खोय आप ही में चेटक लहनि है।।
X X X
जीवन-मरन, जीव-मीच बिना बन्यौ आप,
हाय कौन विधि रची ने ही की रहनि है।
शाही (1628-1673 ई.)-यह अपने दादा इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय के समान कवि और संगीत मर्मज्ञ थे। इन्होंने गजल, कसीदे और मसनवियाँ रची हैं। इनका एक दीवान मिलता हैं। नारी मन के भाव देखिए-
कोई जाव कहो मुँज साजन सात, मैं नेह बंधी तू किता घात।
दिल मेरा अपने सात किया, मुंज बिरहे में दिन रात किया।
दिलदार लगा ना बात किया, तब विखरा सुख हेहात किया।
कए मुंज सू ऐसा किया?
मैथिलीशरण गुप्त- गुप्तजी द्वारा रचित साकेत में उर्मिला विरह सबसे महत्वपूर्ण घटना है। सीता, माण्डवी और श्रुतकीर्ति को पतियों का साथ मिला, पर उर्मिला को विरह सहने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। लक्ष्मण राम के साथ वन जा रहे हैं। वह पति के मार्ग में बाँधा नहीं बनना चाहती, अतः अपने मन को समझाती हुई कहती है-
…हे मन।
तू प्रिय-पथ का विघ्न न बन।
उर्मिला के विरह में गुप्त जी ने स्वाभाविक अंकन किया है। उसका विरह तो गृहस्थ-जीवन की मर्यादा से बंधा हुआ है। वह बिहारी की नायिका की भाँति घर में प्रलय नहीं मचा सकती और न ही जायसी की नागमती की भाँति वन-वन घूमती हुई आँसू बहा सकती है। उसे सब कुछ करना है, सब कुछ सहना है। सखियाँ उसके लिए खीर लाती हैं तो वह खीझकर कहती है-
पिऊं ला, खाऊं ला, सखि, पहनूं ला, सब करूं;
जिऊं मैं जैसे हो, यह अवधि का अर्णव तरूं ।
कहे जो, मानूं सो, किस विध बता, धीरज धरूं ;
अरी, कैसी भी तो पकड़ प्रिय के वे पद मरूं ।
कितनी व्यथा है अन्तिम पंक्ति में।
उसे अपने पति की प्रतीक्षा करनी है। अपने दुःख का शमन करने हेतु प्रोषितपतिकाओं को निमन्त्रण भेजती हैं-
प्रोषितपतिकाएं हों
जितनी भी सखि, उन्हें निमन्त्रण दे आ,
समदुःखिनी मिलें तो
दुःख बंटे, जा, प्रणयपुरस्सर ले आ ।
विरह ने उसे दुःखकातर बना दिया है कि वह किसी को भी दुःखी नहीं देखना चाहती। सखी से दीपक जलाने का निषेध करती हुई वह कहती है-
दीपक-संग शलभ भी
जला न सखि, जीत सत्व से तम को,
क्या देखना-दिखाना
क्या करना है प्रकाश का हमको?
दीपक को देखते हुए वह रात काटना चाहती है, परन्तु रात इतनी लम्बी है कि वह कटती नहीं। अब वह स्वप्न को बुलाती है जिससे प्रिय के संयोग का सुख प्राप्त हो सके-
आओ ही, आओ, तुम्हीं प्रिय के स्वप्न विराट ।
अर्घ्य लिये आंखें खड़ी हेर रही हैं बाट।
सावन में आकाश में उमड़ते बादल उसे किसी के उच्छ्वास के समान प्रतीत होते हैं। पृथ्वी पर मेघ और उर्मिला दोनों पानी बरसाते हैं-
बरस घटा बरसूँ मैं संग,
सरसे अवनी के सब अंग।
निरंतर विरह से हेमन्त ऋतु में उर्मिला शारीरिक दृष्टि से क्षीण हो गई है। वह अपनी तुलना कमलिनी से करती है-
एक अनोखी मैं ही
क्या दुबली हो गई सखी, घर में
देख पद्मिनी भी तो
आज हुई नालशेष निज सर में।
शिशिर ऋतु आई , पर उर्मिला के तो शरीर में ही पतझड़ का वास है। उसके शब्द कितने मार्मिक हैं-
शिशिर, न फिर गिरि-वन में
जितना माँगे पतझड़ दूंगी मैं इस निज नन्दन में,
कितना कम्पन तुझे चाहिये, ले मेरे इस तन में।
विरह वेदना में उसके हृदय की भावनायें विशाल हो गई हैं। उसका स्नेह अपने समीप रहने वाले प्राणियों पर बरस रहा है। मकड़ी पर दया दिखाती हुई अपनी सखी से कहती है-
सखि, न हटा मकड़ी को, आई है वह सहानुभूति वशा,
जालगता मैं भी तो, दोनों की यहाँ समान दशा।
हिंदी फिल्मों में भी हम प्रायः विरह के गीत सुनते हैं, जो पुरुष रचनाकारों द्वारा ही रचे होते हैं। उदाहरण हेतु आम्रपाली फिल्म के निम्न गीत प्रस्तुत है, जिसे शैलेन्द्र ने नगर वधू आम्रपाली के लिए लिखा था जिसमें वह प्रेमी से वियोग में है। प्रेमी की याद उसे रात में सोने नहीं दे रही है तथा वह अपने प्रेमी से मिलने के लिए तड़प रही है। इस अवस्था का निदान भी प्रेमी के पास ही है-
तुम्हें याद करते करते जाएगी रैन सारी
तुम ले गए हो अपने संग नींद भी हमारी
x x x
बिरहा की इस चिता से तुम ही मुझे निकालो
जो तुम न आ सको तो मुझे स्वप्न में बुला लो।
अपने प्रेमी के विरह में रहते हुए आम्रपाली के शरीर और मन में कई प्रकार के भाव आते हैं, उसका मन व शरीर अकारण निढाल रहते हैं। उसके मन-शरीर में उठने वाले इन लक्षणों के प्रत्यक्ष कारण उसके आसपास नहीं है। वह स्वयं ही इन से अनजान है कि मुझे ऐसा क्यों हो रहा है? प्रियतम का स्मरण उसे निरंतर बना रहता है। अतएव वह उसीसे प्रश्न करती है। जिसे शैलेन्द्र ने निम्न प्रकार रचा है-
तड़प ये दिन रात की
कसक ये बिन बात की
भला ये रोग है कैसा
सजन अब तो बता दे
अब तो बता दे, बता दे
X x x
बिना कारण उदासी क्यूँ
अचानक घिर के आती है
थका जाती है क्यूँ मुझको
बदन क्यूँ तोड़ जाती है
बदन क्यूँ तोड़ जाती है
उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि पुरुष रचनाकारों द्वारा ही विरहिणी नारी के विरह-व्यथा को अभिव्यक्त किया जाता है। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ का कहना है कि मेरे हृदय में एक विरहिणी नारी बैठी है जो अपने दुःख के गीत सुनाया करती है। हैरानी होती है यह सुन-पढ़कर कि पुरुष होकर रचनाकार विरहिणी नारी के मन की ऐसी सच्ची तस्वीर कैसे चित्रित कर सकते हैं? कैसे वे विरहिणी के मन का हर कोना झॉंक आते हैं? मन से लेकर शरीर में उठने वाले प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी लक्षणों का ऐसा यथार्थ वर्णन कर देते हैं। संभवतया नारी-पुरुष का मन तो एक ही है, कुछ सामाजिक परंपराएँ तथा व्यवहार उसे समान और एक मानने नहीं देते। ईश्वर ने शरीर पृथक-पृथक रचे हैं, पर मन एक जैसा बनाया है। तभी हमारे यहॉं शिव की अर्धनारीश्वर के रूप में पूजा होती है।
डॉ. नगेन्द्र इस बात को और विस्तार देते हुए कहते हैं कि “विरहिणी अजर अमर है और उनके हृदय में नहीं, सभी कवियों की आत्मा में इसका निवास है। यही विरहिणी कालिदास के हृदय में शकुन्तला, भव-भूति के हृदय में सीता, जायसी की आत्मा में नागमती और सूर के अन्तस् में राधा और मीरा के प्राणों में अरूप होकर रोई थी। मैथिलीशरण के हृदय में वही उर्मिला बन गई।”
