शब्द-सारथी की सहमति में दिव्या माथुर की कहानियाँ – डॉ. मनोज मोक्षेंद्र

MANOJ MOKSHENDRA

(दिव्या माथुर की कहानियां : एक सूक्ष्मावलोकन)

चुनिंदा कथाकार ऐसे होते हैं जो शून्य से शुरू तो होते हैं किन्तु वे किस हद तक चले जाएंगे, इस बारे में कयास लगा पाना बहुत मुश्किल होता है। हिंदी साहित्य की पहली और दूसरी पीढ़ियों के कथाकारों और यहाँ तक कि मंझे हुए कथाकारों में भी, स्थैतिकता और ठहराव है जहाँ वे स्वयं को स्वयं द्वारा बुने गए कथानकों के एक निश्चित दायरे तक ही सीमाबद्ध रख पाते हैं और अपने चिंतन में बहुत आगे नहीं बढ़ पाते हैं। उनकी प्रत्येक अगली कहानी पहले वाले का विस्तार लगती है जिसमें विशेषतया विषय और पात्र एक ही जैसे लगते हैं। उनमें से बहुत कम कथाकार परिवार, पड़ोस तथा अपने समुदाय और समाज का अलग-अलग अथवा पहले से पृथक चित्रण करते हुए आगे बढ़ने का माद्दा रखते हैं। यहाँ उन कथाकारों का नाम लेना उचित नहीं होगा क्योंकि उनके देशकाल और कथानक को परिसीमित करने पर उनके समीक्षकों और आलोचकों पर भी सवालिया निशान लग सकता है जबकि कोई ग़ैर-नामचीन समीक्षक/आलोचक ऐसा कर पाने का दुस्साहस नहीं करना चाहेगा। पर, इस बात से इत्तफाक रखा जा सकता है कि समीक्षकों की नई पीढ़ियां, पुरानी पीढ़ियों के दृष्टिकोण को धता बताते हुए पूर्व-समीक्षित रचनाकारों को अपने समय के चश्में से बड़े आकार-प्रकार में देखना चाहती हैं तथा उनके रचना-संसार को ठिंगना न बनाते हुए एक नई दिशा प्रदान करती हैं। पाठकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और आचार्यों को ऐसे समीक्षक और आलोचक बहुत पसंद आते हैं क्योंकि उनसे ही उन्हें नई दृष्टि मिलती है जो उनके शोध-संधान के लिए महत्वपूर्ण होती है। चुनांचे, आलोचना और समीक्षा के क्षेत्र में उदारवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए किसी कथाकार के कथा-संसार के क्षितिज के पार, चतुर्दिक देखने की ज़ुर्रत की जाए तो इसमें हर्ज़ ही क्या है? स्वयं को संतुष्ट करने के लिए दोनों छोर तो दिखने ही चाहिएं जिससे कि किसी वस्तु-स्थिति का सर्वांगीणता से जायज़ा लिया जा सके।

बहरहाल, हिंदी साहित्य की अद्यतन पीढ़ी की कथाकार दिव्या माथुर की कहानियों में ऐसी कोई बात नहीं है कि बाल की खाल निकालते हुए उनमें क्षितिज के पार, चतुर्दिक देखने की कोशिश की जाए। क्योंकि उनकी कहानियाँ जैसी होती हैं, वैसी दिखती भी हैं और किसी पाठक या समीक्षक को यह कोशिश बलात नहीं करनी पड़ती कि उनमें समाज के इस छोर से उस छोर तक के अक्स को देखने का दुस्साहस उसे करना पड़े। अगर यह छोर दिखता है तो उस छोर को भी देखा जा सकता है। हाँ, बड़ी सहजता और सायसता से। इसलिए पाठक या किसी को भी दिव्या की कहानियों के दोनों छोर स्पष्ट रूप से दिख जाते हैं। बिलाशक, उनकी कहानियों में पात्रों की जटिल मानसिकता तो है; पर, सुस्पष्ट कथानक के ताने-बाने के साथ जो मनोवैज्ञानिक विश्लेषण होता है, वह उनके पात्रों की जटिल मानसकिता को समझने के लिए बहुत आसान बना देता है। उल्लेख्य है कि दिव्या को अपना कथानक बुनते हुए यह भली-भांति पता होता है कि उसका आकार-प्रकार कैसा होगा और एक कथाकार के लिए ऐसा होना आवश्यक भी है; तभी वह अपने विचार-तत्त्व को पुष्ट बना सकेगा और अपने कथ्य के चरम उद्देश्य को सहजता से स्थापित कर पाएगा। इस प्रयोजनार्थ वह कहानी के हर औजार का इस्तेमाल बड़ी सूझबूझ के साथ करती हैं। पात्रों के संवाद और कथोपकथन की सटीकता और सार्थकता पर उनका बकुल ध्यान होता है क्योंकि अधिकतर मामलों में वह इसी तरह से चरित्र का विकास करती हैं और अपने पात्रों को जीभर जी पाती हैं।

यदि ऐसा कहा जाए कि दिव्या ने इस संसार के दोनों गोलार्धों को अपने आनुभविक स्तर पर देखते-भोगते हुए अपने कथा-संसार को व्यापक स्वरूप प्रदान किया है तो यह संपूर्ण सच नहीं है क्योंकि नई दुनिया और पुरानी दुनिया से कहीं अधिक व्यापक और अपरिमेय होती है–मनुष्य की मानसिक दुनिया जिसमें दिव्या सतत यात्रा करती हुई नज़र आती हैं। यदि वह ब्रिटेन-प्रवास नहीं करती तो भी उनके सामाजिक वीक्षण-अनुवीक्षण का दायरा व्यापक होता क्योंकि उनके दृष्टिकोण में मानव-जीवन का हर पक्ष, अपने समस्त उपांगों समेत शामिल होता है। पर, यह तो अच्छा हुआ कि उन्होंने पाश्चात्य जीवन को अत्यंत निटकता से देखते हुए अपने लेखकीय कर्म को एक विशेष परास प्रदान किया है जो लगातार विस्तारित होता जा रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में उनकी कहानियों में पूर्व-पश्चिम की ज़िन्दगियों की टकराहट की ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियां, गूँज-अनुगूँज स्पष्टतया श्रव्य-दृष्टव्य हैं। उनकी कहानियों में दो प्रकार के परिवार और दो तरह के समाज बार-बार उभर कर सामने आते हैं तथा दोनों अपनी जीवन-शैलियों का प्रतिनिधित्व अपनी सामाजिक मान्यताओं के साथ तालमेल बैठाते हुए करते हैं जबकि पाठक को यह समझने में देर नहीं लगती कि कौन-सी जीवन-शैली सामाजिक सेहत के लिए अनुकरणीय है जैसाकि दिव्या भी सोदाहरण यही स्थापित करना चाहती हैं कि फलां जीवन-शैली मानव-जीवन के लिए हितकर है, स्वास्थ्यवर्धक है। इस प्रकार, इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि वह भारतीय समाज और जीवन-शैली को बेहतर मानकर चलती हैं।
लिंग-वर्ग-जाति आधारित दलित चिंतन, वामी विचारधारा और आधी दुनिया को पोषित करने वाला स्त्री-चिंतन ऐसी संकरी गलियां हैं जहाँ से गुजरते हुए दिव्या चुटहिल हो जाती हैं और तब वह झट से इन गलियों का परित्याग करते हुए जीवन के एक अत्यंत चौरस और खुले मार्ग पर आ जाती हैं जहाँ उन्हें सिर्फ मानव का दर्द और कराह तथा मानव-जीवन में अभावों का ठूंठ मंज़र नज़र आता है; कुंठा और संत्रास दिखाई देता है। उन्हें यह बिलकुल नहीं दिखता कि दर्द से कराहते मनुष्य का वर्ग, जाति या लिंग क्या है। कोई भी, कहीं का हो, वह झट उससे सटकर बैठ जाती हैं, बतियाने लगती हैं और उसके चुटहिल अंग, पीर-बेवाई पर मरहम-पट्टी करने लगती हैं, बेरहम समाज से मिले मानसिक आघात को सहलाने लगती हैं। यदि वह क्षुधाग्रस्त है तो उसके लिए कहीं से भी रोटी का इंतज़ाम करने लगती हैं।
दिव्या की कहानियां घर से ही तो शुरू होती हैं; लेकिन, उस घर में पहले से मौजूद दुनियाभर की व्याधियां, शारीरिक-मानसिक दुर्बलताएँ, मानवीय यातनाएं, रक्त-चूसक रीतियां तथा दानवी चेष्टाएँ चींख-चिल्लाकर वैश्विक समस्याओं की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं। घर-परिवार की भौतिक सीमाएं होती हैं; पर, वहां व्याप्त व्याधियों की कोई पराकाष्ठा नहीं होती क्योंकि व्याधियां भौगोलिक या राजनीतिक सीमाएं नहीं पहचानती। वे सार्वभौमिक होती हैं। देशकाल से बहुत आगे होती हैं जिनके निवारण के लिए हर समाज को आगे आना होगा। हाँ, दिव्या अपनी कहानियों में यही आह्वान करती हैं; मुनादी करती हैं कि सृजन का जो भी विनाशक-संहारक है, उसे परास्त किया जाए, गलाफोड़ धिक्कारते हुए–एकजुट होकर, सारे भेदभाव मिटाकर।
ऐसा करते हुए दिव्या की लेखनी में व्यापकता ही नहीं आती, बल्कि उनका व्यक्तित्व भी निखर कर विराट होता जाता है तथा यह तब और होता है जबकि वह मनुष्य से संबद्ध बाह्य जगत और उसके भीतर के अवयवों का सूक्षमता से निरीक्षण करते हुए समाज की बेहतरी के लिए अत्यंत चिंतित होती हैं। सतत मानवीय चिंतन का उनका स्वभाव उनके कथानकों को इतना खाद-पानी देकर उनकी रचनाधर्मिता को उर्वर बनाता है कि उनकी विश्लेषणात्मक क्षमता पाठकों को विस्मित करती जाती है।
दिव्या की कहानियों में केवल ‘ओरिएंटल’ (oriental) और ‘ऑक्सीडेंटल’ (occidental) संस्कृतियों और परंपराओं की टकराहट की टंकार ही नहीं सुनाई देती है, अपितु विलिंगियों के बीच की तीखी नोकझोंक के दहकते तेवर मर्म-स्थल तक को पिघला जाते हैं। इन विलिंगियो के माध्यम से भी दिव्या पौर्वात्य और पाश्चात्य संस्कृतियों के बीच की टकराहट को बिंबित करती हैं। कभी स्त्री भारतीयता की इमेज बनकर आती है तो कभी पुरुष लंपट पश्चिमी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। स्त्री-पुरुष के बीच की यह स्थिति उलट भी होती है जबकि स्त्री बर्तानी समुदाय की होती है और पुरुष किसी भारतीय समुदाय का। इस बाबत उनकी एकाध कहानी, यथा-‘एडम और इव’ में स्त्री और पुरुष पात्रों के क्रिया-व्यापार तथा उनके व्यक्तित्व के लक्षणों से यही बात खुलकर सामने आती है। कहानी ‘आशियाना’ में भी एक तरफ आशा और एडवर्ड तथा दूसरी ओर केशव, भारतीय एवं पश्चिमी संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब दिव्या किसी स्त्री या पुरुष पात्र में उदारता, जीवटता, सहनशीलता और समझौतावादी मानसिकता को रेखांकित करती हैं तो उनके ज़ेहन में बेशक किसी भारतीय पात्र की आदर्श तस्वीर होती है। उनकी कहानी ‘अहसास’ और ‘जो सबके हित में हो’ में कुछ ऐसे ही पात्रों (यथा-ओशो और अमृता) से हमारा साक्षात्कार होता है।
दिव्या की तरह उनकी स्त्री-पात्र भी भारतीय जीवन-शैली की मुरीद हैं – चाहे वह खान-पान की आदत हो अथवा साड़ी जैसे वस्त्रादि (कहानी ‘अंतिम तीन दिन’ में स्त्री-पात्र माया) को पहनने या पहनाने का उतावलापन। यह उतावलापन स्वयं दिव्या में भी दिखाई देता है और तब, जबकि वह कभी-कभार भारत में अपने बंधु-बांधवों या किसी प्रियजन से मिलने आती हैं। हाँ, ब्रिटेन की दिव्या भारत में ऐसी ही नज़र आती हैं; यह कोई पाखंड नहीं है बल्कि उनकी भारतीयता से अविलगेय आत्मीयता है। ऐसे में, उनके आचार-विचार का प्रतिनिधित्व करने वाली उनकी स्त्री-पात्र क्यों न हों? अपने आदर्श स्त्री-पात्रों में तो वह अपना ही व्यक्तित्व घोल देती हैं। आप उनकी कहानी में किसी ऐसी ही स्त्री से मिलिए, आपको दिव्या से साक्षात्कार का पुण्य-लाभ मिल जाएगा। कहानी ‘बचाव’ में आप निदिया से मिलिए; दिव्या का थोड़ा-थोड़ा अक्स तो दिख ही जाएगा।
कथाकार दिव्या की कहानियां बहिर्मुखी और बहुमुखी होती हैं। उन्हें विभिन्न कोणों से जांचिए-परखिए, यह स्पष्ट हो जाएगा कि जो संवाद या कथोपकथन पात्रों की ज़बान से फूटे हैं, वे नपे-तुले हैं; जितने पात्र उनकी किसी कहानी में चित्रित हैं, वे आवश्यकतानुसार हैं; जिस क्रिया-व्यापार में पात्रों को डाला गया है, वह उनके समाज के अनुकूल हैं। अधिकतर कहानियों में पात्रों की अनपेक्षित भीड़ से पाठक घबड़ा जाता है; किन्तु, जब प्रत्येक पात्र के तेवर और व्यक्तित्व से वह शनैः शनैः परिचित होता है तो कहानी और कहानी के पात्रों में उसकी जिज्ञासा बेतहाशा बढ़ती जाती है। तब, पाठक को लगता है कि अरे, इस कहानी के तो सभी पात्र इतने आवश्यक हैं कि उनमें से किसी को भी नहीं छोड़ा जा सकता है। अमुक पात्र नहीं होता तो कथाकार का उद्देश्य मात खा जाता और कहानी अधूरी और बेस्वाद लगती। अस्तु, बहुत-प्राय: पाठक को यह आपत्तिजनक लगता है कि दिव्या अपने विचार-संप्रेषण में इतनी विस्फोटक क्यों हैं और यहाँ तक कि यौन चेष्टाओं के आपत्तिजनक प्रतिरूपों को भी इतने कर्णस्फोटक लहजे में फटकार क्यों लगाती हैं। ऐसा तो उन्हें नहीं करना चाहिए। चुनांचे, वह ऐसा करने में तनिक भी संकोच नहीं करती हैं। जब वह लिखती हैं तो उनके सिर पर दुनिया को अनुकरणीय सबक देने का भूत सवार होता है। जो कहानियां लंबी हो जाती हैं, वह उनकी विवशता नहीं, उनकी कहानियों की विवशता हैं जो यह कहती हैं कि उन्हें इस समापन अवस्था में रखा जाना चाहिए और दिव्या उन्हें वैसी ही सद्गति प्रदान करती हैं। ऐसा आवश्यक भी है क्योंकि दिव्या का ध्यान कहानी-कला के सभी छह औजारों पर केंद्रित होता है। आखिर, वह किसी औजार को छोड़ें तो कैसे छोड़ें! एक वीरांगना-कथाकार तो अपने सभी छह सैनिकों के साथ, शब्द-सारथी की सहमति में, संप्रेषण के चौरस मैदान में छककर लड़ना चाहेगा। सो, दिव्या लड़ती हैं, लड़ती ही जाती हैं।

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