दिन विशेष युवा रचनाकार में सत्यम पाण्डेय ‘सागर’ की कविताएँ

सत्यम पाण्डेय ‘सागर’ महाराजगंज (उत्तर प्रदेश) की माटी में जन्मे एक संवेदनशील रचनाकार हैं, जिन्होंने अपनी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय (प्रयागराज) और वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से शोध कार्य कर रहे हैं तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट महाविद्यालय में अतिथि प्रवक्ता के रूप में अध्यापनरत हैं। उनकी अकादमिक पृष्ठभूमि उनकी कविताओं में गहराई, बौद्धिकता और लोक-संवेदना के रूप में स्पष्ट झलकती है। उनके काव्य-संसार में प्रकृति, प्रेम, विरह, आधुनिक महानगरों का अकेलापन और मृत्यु जैसे शाश्वत सत्य बहुत ही सहजता से पिरोए गए हैं। उनकी कविताओं में जहाँ एक ओर ‘नदी’ और अस्तित्व के दार्शनिक सवाल हैं, वहीं दूसरी ओर शहर की भागदौड़ में खोती प्रेम की सभ्यता और मानवीय रिश्तों की कसक भी गहराई से महसूस होती है। ‘गीत मेरे’ जैसी रचनाओं में वे मृत्यु के यथार्थ और जीवन के मोह के बीच के द्वंद्व को बड़ी मार्मिकता से उकेरते हैं, तो ‘नौका कवि’ के माध्यम से कविता को समाज और जन-सरोकारों से जोड़ने का अनूठा प्रयास करते हैं। इस प्रकार, सत्यम पाण्डेय ‘सागर’ की कविताएँ परंपरा और आधुनिकता के समन्वय के साथ समकालीन हिंदी कविता में एक सशक्त और मौलिक हस्ताक्षर के रूप में उभरती हैं।

Satyam pandey sagar

गीत मेरे

चार कांधे बेवना पर मुझको लेकर चल रहे हैं
साथ कुछ मेरे स्वजन पीछे विरह में जल रहे हैं
और घर में औरतों की चीख गूंजी जा रही है
फिर भला ये मधुर सी ध्वनि अब कहां से आ रही है
कौन है जो वेदना का शंख फुकें जा रहा
कौन ये विरानियों में गीत मेरे गा रहा
क्यों नहीं मुझसे धरा का मोह छोड़ा जा रहा ……

चल रही हैं आंधियां नदिया है अपनी वेग पर
चढ़ गई है देह मेरी अग्नि की आवेग पर
लोग सब घेरे हुए चर्चाएं करते जा रहे हैं
वृद्ध जन मेरे पिता में आस भरते जा रहे हैं
मित्र साथी छटपटा कर हाथ अपने मल दिए
जल गया जब पूर्णतः सब अस्थि लेकर चल दिए

शोक के दस दिवस में कविताओं का वाचन हुआ है
ग्यारही को नाटकों का द्वार पर मंचन हुआ है
हरिकथा में धुल गईं परिवार की सारी व्यथाएं
मौन की वेदी चढ़ीं हैं पित्र हो सब भावनाएं

याचनाएं जल गई प्रवंचना की आग में
गीत मेरे गा रहे हैं वेदपाठी बाग में
मन व्यथित ने इस धरा पर यमपुरी का भेद जाना
फिर ना जाने कौन सा वो लोक जिसमें मुझको जाना
चित्र पर मेरे सुगंधित पुष्प पाटे जा रहे हैं
लोग देकर दान अपने ग्रहण काटे जा रहे हैं
मां कि मेरी श्राद्ध पर ममता की गांठे खोलती है
पिता जी की गहन पीड़ा मौन बनकर बोलती है
और मैं जो निर्दई अंतिम क्रिया का भोज लेकर
लोग कहते हैं सभी गोलोक पथ पर पर जा रहा हूं
पितृ जन में नाम मेरा अबसे जोड़ा जा रहा
फिर भला ये कौन है जो गीत मेरे गा रहा

क्यों नहीं मुझसे धरा का मोह छोड़ा जा रहा….

यही तो चाहती थी तुम …

यही तो चाहती थी तुम
मैं ये भी कर ना पाया
तुम्हारे पाँव की तस्वीर खेंचूँ और फिर मैं
तुम्हारे माँग में सिंदूर सींचूँ और फिर मैं
किसी माली की बगिया से चुराकर
सुगन्धित मोगरे के फूल लाऊँ
तुम्हारे बाल हाथों से सँवारूँ तुम्हारी चूल में गजरा लगाऊँ
ठिठुरती सर्द रातों में अँगीठी किनारे बैठ कर तुम गीत गाओ
तुम्हारे वास्ते मैं चाय लाऊँ
हाँ वो हो चाय जिसमें हो कड़क पत्ती की खुशबू
थोड़ी अदरक व लाची की महक भी
तुम्हारी गोद में सर रख के सोऊँ
घने ज़ुल्फ़ों के झरने में नहाऊँ

तुम्हारे पाँव के बिछुए में अटके मेरे कफ़ बटन कब ?
लगाऊँ आलता हाथों से अपने तब – तब

यही तो चाहती थी तुम
मैं ये भी कर ना पाया
तुम्हारे साथ थी जीने की कसमें
बिछड़ कर खैर मैं भी मर ना पाया

मिले थे गूलरों के फुल से हम जो होते हैं मगर होते नहीं हैं
या फिर ऐसे कहूँ कि चन्दा चाँदनी से जो उसकी होके भी उसकी नहीं है
ये सब कुछ सोचता हूँ
तो ख़ुद को कोसता हूँ
कमा पाया नहीं मैं
फ़क़त दो चार पैसे
नौकरी ने हैं लूटे
ना जाने प्यार कितने
वो लड़की छटपटाहट रह गई है
किसी अनजान डोली चढ़ गई है
मैं अब भी हूँ नकारा नहीं कुछ काम का हूँ
यही इक है कमाई तुम्हारे नाम का हूँ
यही तो चाहती थी तुम ….

तुम्हारे साथ थी जीने की कसमें
बिछड़ कर खैर मैं भी मर ना पाया
यही तो चाहती थी तुम
मैं ये भी कर ना पाया।

नौका कवि

सुनो तुम्हें कवि “बनना” है। तुम पकड़ना किसी डेनिम का मटमैला सा थैला लिए
बिना इस्त्री के झूलते हुए कुर्ता धारी किसी
तीन लखिया प्रोफेसर साब को
सुनो तुम्हें कवि “बनना” है।
तुम निकालना भूसे से चावल के दाने
हाँ दाने जिनसे पेट भर सकेगी हसिए पर बैठी भीड़
बोरियों में भरे दाने पहुंचाना प्रोफेसर साब के यहाँ
सुनो तुम्हें कवि “बनना” है …

अन्य कविता :

१ .

कितनी ही बार मैं गुजरा हूं
तुम्हारे आस-पास से मेरी दोस्त
मगर यूं आज मैं ठहर सा गया
तुम दिखीं ऐसे
जैसे ठहरे हुए पानी में
गूलर टपकने से उठती है हल्की सी हिलोर,
जैसे भागती हुई गिलहरी रुकती, मुड़ती और फिर भागती है

जगमगाते सौरमंडल से तुम्हारे माथे पर
सूर्य के मानिंद तुम्हारी बिंदी
मेरे लिए आकर्षण का पहला केंद्र थी मेरी दोस्त तुम्हें देख
मैं चांद की माफिक हो रहा था ऊर्जा से ओत प्रोत

नन्हें हाथों से हिलती हैं जैसे मंदिरों की घंटियां
तुम्हारी मद्धम चाल से हिल रहे थे
तुम्हारे काली मोतियों वाले झुमके
मैं तुम्हें निहारता रहा ऐसे जैसे
वर्षों की प्रतीक्षा के बाद
गौरी को निहारे होंगे शिव ,

सुर्ख लाल अक्षरों के मध्य तुम्हारे
दूधिया दांतों की क्रीड़ा ऐसे प्रतीत हो रही थी
मानो भागीरथी की सफेद उफनाती धारा
किसी चट्टान को दो भागों में चीरती बढ़ रही हो
अलकनंदा के आलिंगन से
गंगा होने की आतुरता के साथ

मेरी दोस्त मैं आज भी ठहरा हुआ हूं
वहीं उसी वर्षों के प्रतीक्षारत शिव की भांति
पुनः तुम्हें उसी तरह देखने को मेरी दोस्त …

२.

जिन गलियों में विकसित हुई थी प्रेम की सभ्यता
आज उनमें पसर गई है उदासी
नहीं खेलते हैं बच्चे उनमें लुका छिपी का खेल
बूढ़ा हो चला है पलास का वो नौजवान पेड़
जिसमें कभी सिंदूरी फूल खिलते थे
कुम्हला गई है रोज गार्डन की रौनक
जिनकी मौजूदगी में कभी तुमने पढ़े थे प्रेम के पत्र
मनु और श्रद्धा के प्रेम का सौंदर्य
नीरज के गीत
जहां जाना था दुष्यन्त की अंगूठी का भार
वीरान लगता है अब वो बाग
शहर अब सूना सूना सा है

तरक्की की भागदौड़ में बड़ी बड़ी इमारतों ने अपनी जगह बना तो ली है
पर चिट्ठियों के बॉक्स अब भी कहीं कहीं दिख ही जाते हैं
चौराहों को नई शक्ल मिल चुकी है
पर सूरत बिगड़ गई है

कितना कुछ था हमारी बाहों में
इसे और सुंदर बनाने के लिए
जिसे हमने छोड़ दिया
दुनिया भर की भीड़ के लिए उसकी शिकायतों के लिए
तुम्हारा मुझसे दूर जाना यकीनन बुरा था
मगर उससे भी कहीं बुरा था आकर पुनः लौट जाना
तुम्हारा लौट जाना शहर के लिए बाढ़ के बाद फैली महामारी की तरह था

प्रतिक्षाएं किसी काया की मोहताज नहीं होती हैं
मगर शहर के हर बेंच पर तुम्हें आज भी बिलखती मिल जाएगी प्रतीक्षा की इक देह
और फिर जिस दिन तुम्हें ये महसूस होगा कि सब नष्ट हो चुका है
उस क्षण भी भटकती रहेगी उसकी आत्मा इस इंतजार में कि कोई अपना करेगा उसकी अस्थियां विसर्जित
दिलाएगा उसे मुक्ति
इंतजार की एक अनंत चलने वाली यात्रा से

३.

जब भी मैंने देखा नदी मुझे बुला रही थी अपने पास, और पास अपनी दोनों बाहें फैलाए हुए मुझे समेट लेने को
मैं खड़ा रहा किनारे इस सवाल में
नदी इस पार है या उस पार
या दोनों के बीच
बीच में होना कितना होना है
होने की संभावना में सब कुछ बह रहा है कितना अकिंचित कितना अपरिचित
मैं बैठा रहा किनारे पर इसी सवाल के साथ
नदी कहाँ है …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »