ढलती शाम

धीरे-धीरे घर में आई ढलती शाम

कितनी भूली बातें लाई ढलती शाम

पैरो की आहट आई तो मुझे लगा

तुम्हें ढूँढ कर वापस लाई ढलती शाम

फिर से निकले सूखे फूल किताबो से

आज तुम्हारी ख़ुश्बू लाई ढलती शाम

आसमान में रात सितारे नहीं दिखे

तनहा-तनहा छत पर छाई ढलती शाम

मौजो ने जैसे पूछा फिर साहिल से

क्या मेरे बिन तुमको भाई ढलती शाम

***
-रेखा राजवंशी

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