हे कृष्णा

हे कृष्णा, हे मुरारी
मोहे हर लो मन की पीड़
मन चंचल कैसै मैं बाँधू
कुछ तो भर दो धीर
हे कृष्णा मोहे मन की हर लो पीड़।

में तो केवल माटी की मूरत
देख सकी ना तेरी सूरत
मैं मूरख तुझ को ना जानू
रूप तेरा मैं ना पहचानू
हे कृष्णा मोहे मन की हर लो पीड़।

मेरे तन की काली काया
भेद छिपे ना कैसी माया
विपदा अंधकार है छाया
बस तेरे ही प्रेम का साया
हे कृष्णा मोहे अपनी शरण करो।

प्रभु पड़ूँ मैं तेरी शरणा
मेरी विपदा तुझ को हरना
मन को धीर धरो
प्रभु जी मेरे अवगुण चित ना धरो।

मेरे मन की गति तुम जानो
मेरा मन बस तुम पहचानो
फिर काहे ना धीर धरो।

मेरे कृष्णा आस यही है
मन की केवल प्यास यही है
मुरली मनोहर तुझ को पाऊँ
तेरे भजन जगत में गाऊँ
तेरे दर्शन से प्यास बुझाऊँ
मेरे मन की पीड़ा हर ले
चिंता मेरी हरि तू हर ले।

स्वधर्म का पाठ पढ़ाया
जगत जाल की गहरी माया
यही तो गीता में बतलाया
कैसै मैं नीरस रह जाऊँ
जल बिन मीन भाँति मर जाऊँ
प्रभु तुम्हीं उपचार करोगे
मेरी वीणा में रस भर दोगे
देह नहीं, आत्म का ज्ञान
दृष्टि सूक्ष्म हो, मानव कल्याण

समत्व बुद्दि हम जीवन पायें
राग द्वेष को दूर भगाएँ
स्वार्थ दूर, परमार्थ बड़ाये
जय पराजय पर तोले ना जायें
शरण प्रभु हम तेरी पायें।
तेरे ही गुण गाते जायें।।

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-मधु खन्ना

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