स्त्री की बदलती तस्वीर संजोए है: क्लाइडोस्कोप


दिव्या माथुर की “क्लाइडोस्कोप: सतरंगी स्मृतियाँ” मुख्य रूप से प्रवासी जीवन के चालीस वर्षों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। यह निजी जीवन की कथा होते हुए भी कई स्तरों पर गंभीर वैचारिक विमर्श का आधार बनती है। मुख्य रूप से कहूँ तो स्त्री-विमर्श, भाषा-विमर्श, साहित्यिक-सामाजिक और कुछ हद तक राजनीतिक विमर्श भी। इसकी विशेषता यह है कि ये विमर्श सैद्धांतिक ढाँचे में नहीं, बल्कि जीए हुए अनुभवों से उभरते हैं। यहाँ स्त्री एक सशक्त विचार बन कर प्रस्तुत होती है और जीवन एक व्यापक सामाजिक दस्तावेज बन जाता है।
इस पुस्तक की स्त्री कठोर निर्णय लेने वाली और अपने निर्णयों की कीमत चुकाने वाली, साहसी और दृढ़ निश्चयी पात्र के रूप में सामने आती है।
(i) दांपत्य और आर्थिक शोषण का प्रतिरोध
पति का लेखिका की आय पर अधिकार कर लेना और बस आने-जाने लायक खर्च देना, कामकाजी तो क्या किसी भी स्त्री के आत्मसम्मान पर आघात है। यह स्त्री शिक्षा और सशक्तिकरण के बावजूद उसकी आर्थिक परतंत्रता का यथार्थ उजागर करता है।
15 वर्षों तक सुरक्षित नौकरी में बने रहने के बावजूद सब कुछ छोड़कर विदेश जाने का निर्णय स्त्री के बदलते स्वरूप को उजागर करता है जिसमें वह “त्याग” की मूर्ति बनने के बदले आत्मसम्मान के लिए जोखिम उठाने वाली इकाई बनती है।
इस संघर्ष में भावात्मक आंतरिकता का दर्द बार-बार उभरता है जो किसी स्त्रीमन का अतिरिक्त साहस भी बनता है और दबाव भी। यह स्त्री कठोर निर्णय लेती है और उसकी कीमत चुकाती है। वह अपने सम्मान और बच्चों के भविष्य के लिए एक सुरक्षित नौकरी छोड़कर अनजान देश की ओर निकल पड़ती है। यहाँ यह संस्मरण वैचारिक उन्मेष को स्थापित करता है कि परिस्थितियों का दास बने रहना कोई हल नहीं।
विदेश जाते समय के संदर्भ में वे लिखती हैं— “बेटी से आँख मिलाने की हिम्मत नहीं हुई….” यह निर्णय स्त्री के भीतर के उस द्वंद्व को उजागर करता है, जिसे साहित्य में ईमानदारी से कम ही लिखा गया है।
यही संदर्भ लेखिका के अदम्य साहस को भी दर्शाता है, जब 1984 में दिल्ली के दंगाई माहौल के बीच वे अपने छह वर्षीय बेटे के साथ अकेले, बचपन की दोस्त के निमंत्रण पर डेनमार्क चल पड़ती हैं।
1984 के दंगों का प्रत्यक्ष अनुभव राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य को उजागर करता है। यह एक प्रत्यक्ष अनुभव है—जहाँ आग सिर्फ बसों में नहीं लगती, लोगों के भीतर भी लगती है और यह विवरण राजनीतिक आंदोलन के जरिए आम नागरिक की त्रासदी का जीवंत दस्तावेज बनता है कि राजनीतिक घटनाएँ व्यक्तिगत जीवन को किस हद तक विस्थापित करती हैं। इसमें संदेह नहीं कि यह पुस्तक व्यक्तिगत घटनाओं के माध्यम से व्यापक सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को उजागर करती है।
इन घटनाओं में स्त्री के भीतर के भय, असुरक्षा और आत्मरक्षा के मनोविज्ञान को भी बखूबी देखा जा सकता है। डेनमार्क में रात को दरवाजा बंद कर बच्चों को साथ सुलाना, या हर समय असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहना—यह स्त्री के भीतरी भय-लोक को उद्घाटित करता है, जो केवल बाहरी हिंसा नहीं, बल्कि स्मृतिगत हिंसा से भी निर्मित होता है। यानी आप चाहे कहीं चले जाएँ आपकी मानसिकता, आपके भीतर की ग्रंथियाँ और दुखस्वप्न साथ-साथ चलते हैं।
यह संस्मरण किसी की व्यक्तिगत कहानी भर नहीं है। इसमें पिछली सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर वर्तमान तक का इतिहास और विभिन्न देशों की परंपराएँ समाहित हैं। चाहे वह राजस्थान की भूतिया हवेली का रहस्यमयी वातावरण हो या इटली के बोलोन नगर की संकरी गलियाँ, लेखिका पाठक को अपने साथ ऐसे कई स्थानों की यात्रा पर ले जाती हैं जहाँ उन देशों के इतिहास और आत्मा का स्पर्श मिलता है।
विदेश में एकल अभिभावक के रूप में बसने और वहाँ शून्य से शुरुआत करने का संघर्ष इस पुस्तक का केंद्रीय आधार है। डेनमार्क में बिना भाषा जाने नौकरी ढूँढ़ने के कठिन प्रयास से लंदन के भारतीय उच्चायोग में स्थान बनाने की यह यात्रा लेखिका की कर्मठता का प्रमाण है।
डेनमार्क में भाषा न जानने की स्थिति बड़ी मार्मिक बन कर उभरती है। एक संदर्भ दूँ तो सहायता करने के ख्याल से बेकरी तक जाना मगर सैकड़ों प्रकार की ब्रेड देखकर बिना कुछ पूछे-खरीदे असहाय लौट आने की स्थिति बहुत दयनीय हो उठती है। मुझे लगता है, डेनमार्क की बेकरी में खड़ी एक स्त्री—जिसे भाषा नहीं आती—वह सिर्फ ब्रेड नहीं ढूँढ़ रही, वह अपनी जगह ढूँढ़ रही है।
तब समझ आता है कि भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं है, वह हमारे अस्तित्व का हिस्सा है। उसकी अनुपस्थिति अस्तित्व के अस्थायी लोप को रेखांकित करती है।
विदेशों में जाकर जो सांस्कृतिक टकराव सामने आते हैं—वे हमें बताते हैं कि दुनिया कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, पूर्वाग्रह अब भी जीवित हैं।
प्रवासी जीवन बाहर से जितना चमकदार दिखता है, भीतर उतना ही संघर्षपूर्ण और अकेला भी हो सकता है।
लंदन में जीजा जी का व्यवहार देखिए, पड़ोसियों से दूरी रखना, सांस्कृतिक संकीर्णता, बात-बात पर ‘सू’ करने की धमकी देना—यह सब पाठ को रोचक तो बनाते हैं मगर इसमें छुपा असुरक्षा का भाव इस हद तक उभरता है कि वहाँ जाकर व्यक्ति और अधिक रूढ़ और नियंत्रक हो जाता है। प्रवासी जीवन में संस्कृति की टकराहट को बखूबी महसूस किया जा सकता है। हमारे देश को सांप-संपेरों का देश मानने का भ्रम पालने वाली मानसिकता को लेकर भी मन कुलबुलाता है। वैश्विक असमानता और सांस्कृतिक विषमता भी इस पुस्तक में एक महत्वपूर्ण पक्ष के रूप में उभरती है।
अवैध प्रवासियों का कम वेतन पर काम करना, जैसे कई प्रसंग हैं जो पूँजीवादी समाज में प्रवासी श्रम के शोषण को रेखांकित करते हुए श्रम और वर्ग के यथार्थ को बेबाकी से प्रस्तुत करते हैं।
वैश्विक साहित्यिक परिवेश इस पुस्तक का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है जिसके तहत हमें कई साहित्यिक मंचों की झलक मिलती है। देश और विदेश तक की साहित्यिक गतिविधियों की झांकी। दिव्या जी ने हिंदी साहित्य को प्रवासी मंचों पर प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके संस्मरणों में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल, लंदन का हिंदी महोत्सव, साहित्य अकादमी समारोह, भोपाल का विश्व रंग मंच की झलकियाँ दिखाई देती हैं… इन मंचों पर हिंदी केवल भाषा नहीं रहती—वह एक वैश्विक पहचान बन जाती है।
लेकिन… दिव्या जी इन आयोजनों की केवल चमक नहीं दिखाती हैं बल्कि उनके पीछे का यथार्थ भी सामने लाती हैं। जिसके तहत कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं। सबसे बड़ा और अहम तो यह कि क्या हिंदी को अपने देश से ज़्यादा विदेशों में सम्मान मिल रहा है? और क्या साहित्य अब धीरे-धीरे ‘इवेंट’ बनता जा रहा है?
लेखकों से मुलाकातें—कभी आत्मीय, कभी औपचारिक, कभी कटु—हमें यह अहसास कराती हैं कि साहित्य का संसार भी इंसानों से बना है, और इंसान अपनी सीमाओं से मुक्त नहीं होता।
हमें यहाँ नरेंद्र कोहली, रामदरश मिश्र, चित्रा मुद्गल जैसे रचनाकारों के साथ जुड़े प्रसंग मिलते हैं—जो बताते हैं कि बड़े नामों के पीछे भी एक संवेदनशील, संघर्षशील मन होता है।
एक पंक्ति उद्धृत करते हुए पुस्तक की भाषा और शिल्प के बारे में बात रखूँगी— “संस्मरण लिखना… बिना एनेस्थीसिया के चीड़-फाड़ जैसा है।”
डॉ. सूर्यबाला के अनुसार, दिव्या माथुर ने अपने जीवन की सच्चाइयों को किसी सुंदर आवरण में छिपाने के बजाय पूरी पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत किया है। उनका सच ‘आतशी शीशों’ की तरह साफ झलकता है। उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन के कड़वे अनुभवों और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से अपनी लड़ाई को बहुत ही मार्मिकता के साथ साझा किया है। ‘मायाजाल’ जैसे संस्मरण में वे अपनी सर्जरी के दौरान हुए ‘आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियंस’ का बहुत ही सूक्ष्म विवरण देती हैं।
कुलमिलाकर, मैं बस इतना कहना चाहूँगी कि यह पुस्तक एक स्त्री की कहानी जरूर है, लेकिन उससे कहीं अधिक—यह हमारे समय, समाज और साहित्य का आईना है। लेखिका का जीवन पाठकों के लिए प्रेरणा बनता है। उसके संघर्ष और उसका नजरिया जिंदगी की कई भ्रांतियाँ दूर करता है। कई बाधाएँ धुंध की तरह छँट जाती हैं और व्यक्ति घुमक्कड़ की तरह अगली यात्रा का रुख करता है।

समीक्षा :– अलका सिन्हा

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