रामू की बेटी

(विधा : लघुकथा, काल्पनिक पात्र, समकालीन संदर्भ)

मिथिला प्रदेश बिहार का एक गाँव, शहर से दूर, ग्रामीण संस्कृति का पोषक, मुख्यतः कृषक समाज l बढ़ती
आबादी और रोजगार का परस्पर संघर्ष, शिक्षा की कमी, सीमित संसाधन, ग़रीबी का बोझ l ऐसे ही समाज में रामू
का कृषक परिवार जीवन यापन कर रहा था, वह परिश्रमी था, ग़रीबी रेखा से ऊपर निकलने के लिए सतत
प्रयत्नशील था l रामू की बेटी स्थानीय माध्यमिक विद्यालय में पढ़ती थी, उसे सरकार की तरफ़ से कॉपी किताब और
साइकिल मिली थी l लेकिन सातवीं कक्षा से ऊपर पढ़ने का सपना अधूरा रह गया क्योंकि उच्च विद्यालय गाँव में नहीं
था और कहीं बाहर जाकर पढ़ने का आर्थिक बोझ उठाना परिवार के लिए असंभव था l ग़रीबी का यह दंश चुपचाप
सहन करने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं था l
रामू की बेटी चतुर थी, लगनशील थी, कार्यकुशल थी l उन्हीं दिनों उसने प्रधान मंत्री का रेडियो भाषण “मन की
बात” कई बार सुना था, कभी स्कूल में तो कभी किसी सहेली के यहाँ l उनके आत्मीय संदेश में ग्रामीण बालिकाओं के
उत्थान के लिए विशेष उद्बोधन था, नारी सशक्तिकरण के प्रति संकल्प और सरकारी सहायता का आश्वासन था l
“शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी करना नहीं है बल्कि अपने आंतरिक कौशल द्वारा धन उपार्जन करने की कला का
विकास भी है l ग्रामीण जगत में इसकी अधिक उपयोगिता है जहाँ औपचारिक नौकरी की कमी है l इस दिशा में
जनता को जागरूक करने के लिए अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया गया है l” रामू की बेटी ने अपने आप से तर्क
किया ‘नौकरी के लिए पैरवी, रिश्वत, और हाई स्कूल तक की शिक्षा चाहिए l मेरे पास तो कुछ भी नहीं है, फिर
नौकरी की कामना करना व्यर्थ है l’ वह पिता की खेती में कभी-कभी हाथ बटाती थी, साग-सब्जी बेचने में माँ का
साथ देती थी l उसकी रुचि मिथिला पेंटिंग में थी जिसके लिए साग-सब्जी की बिक्री से हुई आमदनी का एक हिस्सा
वह खर्च करती थी l
कुछ दिनों के बाद जिला विकास पदाधिकारी आने वाले थे जिसका मुख्य उद्देश्य था ग्रामीण महिलाओं को स्व-
रोजगार के लिए प्रेरित करना l गाँव के मुखिया ने इसकी सूचना देते हुए महिलाओं को सपरिवार आने के लिए आग्रह
किया l आज वह दिन था, रामू भी सपरिवार उपस्थित था l पदाधिकारी ने सरकार की विभिन्न योजनाओं का जिक्र
किया और आगंतुओं को अपनी बात निःसंकोच कहने के लिए निवेदन किया l

रामू की बेटी ने कहा, “मैं मधुबनी पेंटिंग करती हूँ लेकिन धन के अभाव में सही रंग और आर्ट-पेपर नहीं ख़रीद
पाती हूँ l यदि कोई सरकारी अनुदान मिल जाता तो मैं मेरी तपस्या सार्थक हो जाती l”
पदाधिकारी : “आजकल मधुबनी पेंटिंग की माँग बढ़ गई है, प्रवासी भारतीयों ने भी दिलचस्पी दिखलाई है l
मुखिया जी पंचायत से थोड़ा अनुदान दे सकते हैं, उनके बजट में इसका प्रावधान है l”
“मुझे इसकी जानकारी नहीं थी l अब प्रयास करूँगी l”
“क्या तुम कोई पेंटिंग लायी हो? मैं देखना चाहूँगा l”
“जी, एक लायी हूँ l”
पदाधिकारी ने देखते हुए कहा, “तुम्हारी कल्पना सराहनीय है, गाँव की प्राकृतिक छबि का सुंदर चित्रण है l इसे
और अधिक आकर्षक बनाया जा सकता है l हाँ, तुम्हारा नाम क्या है?”
“रामू की बेटी के नाम से ही लोग मुझे जानते हैं l मेरी अपनी पहचान नहीं है, केवल नाम से क्या होता है? संभव
है मधुबनी पेंटिंग मुझे अपनी पहचान दे सके l”
ऐसा जवाब सुनकर पदाधिकारी ने ताली बजाकर रामू की बेटी की प्रसंशा की, अन्य लोगों ने भी उनका साथ
दिया l “सरकार के दस्तावेज में एक नाम होना आवश्यक है तभी कोई अनुदान मिल सकता है l”
रामू की बेटी ने धीरे से कहा, “रीता कटुआ l”
“कटुआ क्यों? यह तो इस गाँव का नाम है l”
“मैं पूरे गाँव की बेटी हूँ l यदि भविष्य में अपनी पहचान बना सकूँ तो उसमें पूरा गाँव शामिल होगा l”
यह सुनकर सभा में उपस्थित सब लोगों ने खड़ा होकर रीता का सम्मान किया, उसमें मुखिया जी भी शामिल थे l

पदाधिकारी : “मुखिया जी, पिछले साल किसी को पंचायत से अनुदान मिला था?”
“जी महाशय, चार व्यक्तियों को l उनमें दो महिलाएँ भी थी l”
“क्या उनमें कोई व्यक्ति यहाँ उपस्थित है? कृपया हाथ उठाकर बताएँ l”
सभा में सभी मौन थे, लोग इधर-उधर झाँक रहे थे l मुखिया जी की आँखें झुकी थी; वे पदाधिकारी की नजरों से
बचने की कोशिश कर रहे थे l अर्थ स्पष्ट था !
एक सप्ताह के बाद रीता पंचायत कार्यालय में मुखिया जी के समक्ष थी l उन्होंने कहा, “तुम्हें 200 रुपए का
अनुदान मंजूर हुआ है, अभी 100 रुपए का अग्रिम दे रहा हूँ, ख़रीद की रसीद देने के पश्चात पूरी राशि मिल जायेगी l”
“आपका बहुत धन्यवाद l”
कुछ दिनों के बाद रीता एक मधुबनी पेंटिंग लेकर पुनः मुखिया जी के सामने थी l उसने कहा, “पंचायत के अनुदान
से बनी यह चित्रकला जनता को समर्पित है, कृपया इसे अपने ऑफिस में स्थान दीजिए l”
“बहुत सुंदर दृश्य है, इसमें स्थानीय परिवेश का जीवंत चित्रण है l” एक कोने मे लिखा ‘रामू की बेटी’ देखते हुए
मुखिया जी ने पूछा, “रीता कटुआ क्यों नहीं?” “अभी यही मेरी पहचान है, विशेषकर इस गाँव में l”
वहाँ स्कूल के प्रधान भी मौजूद थे l उन्होंने कहा, “मेरे विद्यालय के लिए भी एक पेंटिंग चाहिए, विद्यार्थियों के
लिए प्रेरणा दायक होगा; उन्हें भी स्व-रोजगार की शिक्षा मिलेगी l” मुखिया जी कैसे पीछे रहते? उन्होंने अपने
निवास के लिए एक प्रति का ऑर्डर दे डाला l रीता के हाथों में अग्रिम भुगतान की राशि भी मिल गई l उसने भावुक
स्वर में कहा, “मेरे लिए आज शुभ दिन है, शिक्षक की प्रसंशा अमूल्य होती है l सौभाग्य है कि आप दोनों महानुभाव
मेरे प्रथम ग्राहक हैं l”
छह महीने बाद l
जिला विकास पदाधिकारी के ऑफिस से रीता को एक पत्र मिला : “अगले महीने नवोदित कलाकारों के लिए एक
प्रदर्शनी का आयोजन है, आप भी इसमें आमंत्रित हैं l आने-जाने का खर्च सरकार वहन करेगी l”
रीता ने दो पेंटिंग बनाई : एक में राधा कृष्ण का मोहक चित्रांकन था और दूसरे में महाभारत का वह दृश्य जिसमें
अर्जुन के सारथी कृष्ण थे l दोनों भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के शाश्वत प्रतीक हैं l
प्रदर्शनी में अनेकों प्रसंशनीय कलात्मक कृतियाँ थीं, दर्शकों में भी देखने-परखने का उत्साह था l रीता की पेंटिंग के
सामने दर्शकों का जमघट लग गया, लोग फोटो शूटकर सोशल मीडिया पर साझा करने लगे l निष्कर्ष स्पष्ट था : रीता
की पेंटिंग मुख्य आकर्षण का केंद्र बन चुकी थी ! इसी बीच विकास पदाधिकारी निरीक्षण करने आये और वे भी दोनों
पेंटिंग को मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे l प्रदर्शनी का समय खत्म ख़त्म होने वाला था, उन्होंने रीता से कहा,”मैं दोनों
पेंटिंग खरीदना चाहता हूँ, तुम्हें अच्छी क़ीमत मिलेगी l” “जी महाशय, आपकी जैसी इच्छा l” कुछ लोगों ने यह सुना
तो उन्होंने भी ऑर्डर दे दिया l “मैं आप सबों की आभारी हूँ l”

करीब एक महीने बाद l
रीता को मधुबनी क्षेत्र के विधायक ने फ़ोन किया : “विकास पदाधिकारी के ऑफिस में मैंने तुम्हारी पेंटिंग देखी है,
अति आकर्षक और ज्ञानवर्धक l मिथिला की पावन धरती पर भगवान राम और सीता का विवाह संपन्न हुआ था,
जिसकी गूँज पूरे भारत में सुनाई देती है l उनके वैवाहिक उत्सव के ऊपर एक मधुबनी पेंटिंग बनाने का आग्रह है,
जिसमें परम्परा और आधुनिकता दोनों का समावेश हो l”
“जी महाशय, यह संदर्भ ऐतिहासिक भी है और समकालीन भी l मैं पूरा प्रयास करूँगी कि पेंटिंग जीवन्त और
दर्शनीय हो l”
“अग्रिम राशि शीघ्र भेज दूँगा l”
रीता ने दो पेंटिंग बनाई l एक राम और सीता के विवाहोत्सव पर आधारित थी, और दूसरी में नव-विवाहित वर-
वधू राजा जनक और राजा दशरथ से आशीर्वाद लेते दिख रहे थे l रंगों के चुनाव और पार्श्वदृश्य की चित्रकारी में
कलाकार की प्रतिभा मुखर हो रही थी l पेंटिंग के कोने में लिखा था ‘रीता कटुआ’ l विधायक महोदय को पेंटिंग भेजते
हुए उसने लिखा, “किसी एक पेंटिंग में राम और सीता के अनुपम विवाहोत्सव को समेटना मुश्किल था इसलिए मैंने
दो पेंटिंग बनाई है l यदि कोई त्रुटि हो तो सूचित करेंगे, कोई भी कलाकृति कल्पना पर आधारित होती है l”
कुछ दिनों के बाद रीता को विधायक महोदय का संदेश प्राप्त हुआ : “सरकार ने मिथिला की संस्कृति को नया
आयाम देने के लिए एक संस्था की स्थापना करने का निर्णय लिया है l महिला कार्यकारी सदस्य के रूप में तुम्हारा
मनोनयन किया गया है l बधाई और मेरी शुभकामनाएँ !”
रीता स्वतः बोल उठी :
“मैं मिथिला की बेटी हूँ, ‘कटुआ’ मेरा गाँव
शिक्षा मेरी रही अधूरी, स्व-रोजगार करती हूँ
निर्धनता की मैं दास नहीं, स्वाभिमान से रहती हूँ
नयी जाग्रति नयी रोशनी, युवावर्ग की नेत्री हूँ !!”

लेखक :— डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव

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