पारस पत्थर वाला व्यवहार (बाल-कहानी)

रामपुर नाम के एक खुशहाल गाँव में ‘चंदन’ नाम का एक बच्चा रहता था। चंदन पढ़ने-लिखने में बहुत होशियार था, लेकिन उसमें एक कमी थी, वह बहुत अभिमानी और चिड़चिड़ा था। उसे लगता था कि वह ही सबसे बुद्धिमान है, इसलिए वह किसी और का सम्मान ही नहीं करता था। छोटों से डाँटकर बात करना और बड़ों की बातों को अनसुना करना उसकी आदत बन गई थी। गाँव के किनारे एक पुराने बरगद के नीचे ‘सोमदत्त’ नाम के एक ज्ञानी वृद्ध रहते थे। लोग उन्हें ‘बाबा’ कहते थे। एक दिन गाँव के कुछ बच्चों ने बाबा से शिकायत की, “बाबा! चंदन का व्यवहार बहुत खराब है। वह किसी से सीधे मुँह बात नहीं करता।” बाबा मुस्कुराए और बोले, “चिंता मत करो बच्चों, मेरे पास एक जादुई पत्थर है, उससे मै चंदन का आचरण ठीक कर दूंगा।” अगले दिन बाबा ने चंदन को अपने पास बुलाया। चंदन अनिच्छा से वहाँ पहुँचा और रूखे स्वर में बोला, “बाबा, आपने मुझे क्यों बुलाया? ” बाबा ने शांति से उसकी ओर देखा और एक छोटा सा चिकना सफेद पत्थर हाथ में थामते हुए कहा, “बेटा चंदन, मैंने सुना है तुम बहुत चतुर हो। क्या तुम इस पत्थर को एक हफ्ते तक अपने पास रख सकते हो? लेकिन शर्त यह है कि इस पत्थर पर एक खरोंच भी नहीं आनी चाहिए और यह हमेशा ऐसा ही चमकता बना रहना चाहिए।” चंदन ने लापरवाही से पत्थर लिया और जेब में डाल लिया। उसने सोचा, यह कौन सा मुश्किल काम है। लेकिन अगले दिनों में कुछ अजीब होने लगा। जब भी चंदन किसी पर चिल्लाता या किसी का अपमान करता, वह पत्थर काला और खुरदरा हो जाता। उसे साफ़ करने में चंदन को घंटों लग जाते। एक दिन जब उसने अपनी माँ को पानी न लाने पर झिड़का, तो पत्थर इतना भारी हो गया कि उसकी जेब बहुत भारी लगने लगी । हैरान होकर चंदन बाबा के पास भागा। “बाबा! यह पत्थर तो कोई जादू टोना है । यह कभी काला हो जाता है, कभी भारी। मुझे यह नहीं चाहिए।” बाबा ने उसे पास बिठाया और बोले, “बेटा, यह पत्थर जादू नहीं, बल्कि तुम्हारे ‘आचरण’ का दर्पण है। जब हमारा व्यवहार कड़वा होता है, तो वह हमारे व्यक्तित्व को बोझिल और काला बना देता है। जैसे इस पत्थर को साफ़ करने में तुम्हें पसीना आ रहा है, वैसे ही बिगड़े हुए रिश्तों को सुधारने में पूरी उम्र लग जाती है।” चंदन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने तय किया कि वह अब अपना आचरण सुधारेगा। धीरे धीरे चंदन एक मिलनसार , सबकी मदद को तैयार अच्छा बच्चा बन गया।  कुछ दिन बीत गए। अचानक एक दिन गाँव में एक बड़ी समस्या आ गई। गाँव की इकलौती नहर का बाँध टूट गया और पानी खेतों में भरने लगा। गाँव वाले परेशान थे, लेकिन कोई अकेला उसे ठीक भी नहीं कर सकता था। चंदन ने विनम्रता से गाँव के युवकों को इकट्ठा किया। उसने आदेश देने के बजाय कहा , अगर हम सब मिलकर प्रयास करें, तो सबकी फसल बचा सकते हैं।  चंदन के विनम्र व्यवहार ने जादू का काम किया। जो लोग कल तक उससे बात नहीं करना चाहते थे, वे उसके एक आह्वान पर साथ खड़े हो गए। सबने मिलकर मिट्टी की बोरियाँ रखीं और शाम होने से पहले बाँध ठीक कर दिया। काम खत्म होने के बाद जब चंदन घर लौटा, तो उसने देखा कि उसकी मेज पर रखा वह पत्थर ‘पारस’ की तरह चमक रहा था। वह इतना हल्का था जैसे कोई पंख हो। तभी बाबा चंदन के घर आए। उन्होंने चंदन के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “देखा बेटा! अच्छे व्यवहार का अर्थ केवल नमस्ते करना या मीठा बोलना भर नहीं है, बल्कि दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, विनम्रता और सहयोग का भाव रखना है। तुम्हारा आचरण ही तुम्हारी असली पहचान है। सुंदर चेहरा तो उम्र के साथ ढल जाएगा, लेकिन सुंदर व्यवहार सदा याद रखा जाएगा।” उस दिन के बाद चंदन गाँव का सबसे प्रिय बालक बन गया। उसने सीख लिया था कि आचरण वह सुगंध है जो बिना हवा के भी चारों दिशाओं में फैलती है।

– विवेक रंजन श्रीवास्तव

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