‘2011 और नैनी झील’ (कविता)

2011, अब,
कैलेंडर से, उतर चुका है।
पर आज भी,
जब, दिसंबर की हवा, चलती है,
मैं, अचानक
नैनी झील के किनारे,

पहुँच जाता हूँ।
देवदार, फिर हिलते हैं,
गुब्बारे वाला बच्चा,

पुकारता है,
वह बूढ़ा नाविक,
धीमे से,

मुस्कराता है।
और मैं,
अब भी, वही यात्री हूँ,
जो पहाड़ों में,
अपने समय का चेहरा,

खोजता फिरता है।
सर्द हवा, आज भी
कानों में कहती है –
“रुद्रेश”
सिर्फ़, सुंदरता मत लिखो,
उन हाथों को भी, लिखो
जो ठंड में,

जलते रहते हैं।”
और मैं,

चुप हो जाता हूँ।

– डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र

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