अंत भला तो सब भला ( कहानी अनुवाद ) : रेखा राजवंशी

जब किराए की कार झाँसी स्टेशन के बाहर आकर रुकी, प्रिया का भाई अनिल ड्राइवर के पास वाली अगली सीट पर जा बैठा। एंडी ने पीछे का दरवाज़ा खोला, आइवी सबसे पहले अंदर घुसी और खिड़की की ओर खिसक गई। प्रिया ने एंडी की ओर देखा, उसने इशारे से प्रिया को अंदर बैठने के लिए कहा। इसके बाद प्रिया दोनों के बीच में फँस गई — उस कार में जो कच्चे, गड्ढों से भरे और टूटी किनारों वाली सड़क पर उछलती जा रही थी।
प्रिया और आइवी ने सिडनी में एक साथ पढ़ाई की थी और वे संपर्क में थीं। पिछले गर्मियों के बाद से वे नहीं मिली थीं, इसलिए प्रिया उसे देखकर बहुत उत्साहित थी। उन्होंने सिडनी में खूब अच्छा समय बिताया था। प्रिया की आइवी के बॉयफ्रेंड एंडी से भी वहीं मुलाकात हुई थी। प्रिया ने ज़िद करके उन्हें भारत आने पर अपने यहाँ बुलाया था और दिल्ली से खजुराहो की एक छोटी सी साइड ट्रिप का आयोजन किया था।
बातचीत बहुत कम हो रही थी, बस कभी-कभार जब प्रिया या अनिल कुछ देखने लायक चीज़ की ओर इशारा करते। सामने से आती गाड़ियों के झुंड गुजरते जा रहे थे — टाटा या अशोक लेलैंड की रंग- बिरंगी सजी हुई ट्रकें, यात्रियों से भरी बसें, छोटी कारें, साइकिलें, मोटरबाइक्स और वेस्पा स्कूटर, ऑटो- रिक्शा, और बकरियों की गाड़ियाँ। उनकी कार कभी-कभी किसी बेहतर सड़क पर तेज़ हो जाती, पर ज़्यादातर समय वे सरसों, गेहूँ और चारे की फसलों से भरे खेतों के बीच से धीरे-धीरे गुजर रहे थे, जो इधर- उधर फैले गाँवों के बीच सड़क के किनारे थे।
जब कोई गाँव पास आता, तो सड़क पर भीड़ और गाड़ियों की संख्या बढ़ जाती— फल-सब्जियों की दुकानें, ठेले, स्ट्रीट फूड वाले, और चायवाले। तब कार रेंगने लगती। गाँव पार करते ही ड्राइवर फिर से रफ्तार बढ़ा देता।
आइवी खिड़की से बाहर के बदलते नज़ारों को चुपचाप और ध्यान से देखती रही। कुछ देर बाद उसने मुड़कर धीरे से प्रिया से पूछा,
“जो आदमी हमारी ट्रेन के डिब्बे में चढ़ा था, सफेद लंबे कपड़े पहने हुए — तुमने देखा, उसके पास क्या था?”
प्रिया ने सिर हिलाया।
“तुम जानती हो वो कौन था?” प्रिया ने सिर हिलाकर ‘नहीं’ कहा।
“उसके पास एक ऑटोमैटिक राइफल थी! फिर वो उसी राइफल को अपने घुटने से टिकाकर सो गया!” प्रिया ने फिर सिर हिलाया “मुझे पता है।”
“मैं तो बस यही उम्मीद करती रही कि उसकी राइफल का सेफ्टी लॉक लगा हो। सभी लोगों ने अपनी नजरें फेर ली थीं। इतनी सारी सुरक्षा जांच के बावजूद वो आदमी इतनी आसानी से ट्रेन में हथियार लेकर कैसे चढ़ सकता है?”
“साफ है, उसके पास सरकारी अनुमति रही होगी,” प्रिया ने कहा और उसके लहज़े ने इस विषय पर और सवालों की संभावना ही खत्म कर दी।
आइवी समझ गई कि अब और जानकारी लेने का यह सही समय नहीं है।
शाम ढलते-ढलते वे अपनी मंज़िल पर पहुँच गए। नौ घंटे ट्रेन और कार में बैठने के बाद शरीर सीधा करने और टाँगें फैलाने में उन्हें बहुत राहत मिली। एक दरबान मुस्कराता हुआ उनका स्वागत कर रहा था, और एक वेटर ट्रे में ठंडे पेय लेकर पास आ गया। विशाल और प्रभावशाली लॉबी में महँगा प्राचीन फर्नीचर और कालीन सजे थे; बीचों-बीच एक बड़ी सी मूर्ति रखी थी, जिसके चरणों में चमकीले नारंगी गेंदे के फूल बिखे हुए थे।
आइवी और एंडी के कमरे में दो आरामदायक क्वीन बेड थे और साज-सज्जा भी अच्छी थी। आइवी ने फैसला किया कि वह आधे घंटे लेट जाएगी, जबकि एंडी होटल का परिसर, स्विमिंग पूल और ऊपर के बार का जायजा लेने चला गया। जब तक वह वापस लौटा, तब तक आइवी नहा-धोकर डिनर के लिए तैयार हो चुकी थी।
“प्रिया का फोन आया था,” आइवी ने बताया, “उसने सुझाव दिया कि हम आज रात होटल के रेस्तरां में ही खाना खा लें, बाहर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मैं अभी जा रही हूँ, तुम्हें आने में देर हो तो मैं उन्हें बता दूँगी कि तुम थोड़ी देर में आओगे।”
“ठीक है,” एंडी ने कहा और बाथरूम में चला गया।
उन्हें मुस्कराते हुए मेत्रे दी’ ने स्वागत किया और एक टेबल तक पहुँचाया। जब तक एंडी आया, वे लोग मेन्यू से भारतीय और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों में से ऑर्डर देने के लिए तैयार हो चुके थे।
आइवी ने पनीर की डिश चुनी, प्रिया ने एक चाइनीज़ डिश — “बस कुछ भी हो, भारतीय खाना नहीं,” उसने कहा — अनिल ने रिसोट्टो लिया और एंडी ने बिरयानी का चुनाव किया।
“तो, कल हमारा क्या कार्यक्रम है?” एंडी ने पूछा।
“खजुराहो के मंदिर,” अनिल ने मुँह में निवाला रखते हुए जवाब दिया।
“इन मंदिरों में खास बात क्या है?” आइवी ने पूछा।
प्रिया ने अनिल की ओर एक नज़र डाली।
“ये कामसूत्र के मंदिर हैं,” अनिल ने अपने मुँह को नैपकिन से पोंछते हुए कहा।
“प्रिया ने बताया था कि इस हफ्ते आप दोनों हनीमून पर हो — तो फिर वहाँ जाना तो बनता है, है न? अच्छा, तो हमें सुबह जल्दी निकलना होगा। आठ बजे यहीं नाश्ता, और नौ बजे तक निकलने के लिए तैयार रहना।”
अनिल ने डिनर का बिल साइन किया और अगली सुबह मंदिरों की यात्रा के लिए ड्राइवर की पुष्टि करने रिसेप्शन डेस्क की ओर बढ़ गया।
प्रिया अपने कमरे में गई ताकि अपना सामान ठीक से खोलकर रख सके।
आइवी सोने के लिए तैयार थी, लेकिन खजुराहो को सुबह की रोशनी में देखने का इंतज़ार उसे बेचैन कर रहा था। वह और एंडी बिना कुछ कहे कपड़े बदलकर अपने-अपने बिस्तर में जा लेटे।
प्रिया अपने भाई के कमरे में एक आख़िरी ड्रिंक के लिए चली आई।
“तुम्हारे क्या विचार हैं?” अनिल अच्छी तरह जानता था कि सवाल आइवी और एंडी को लेकर है। उसे अब तक ठीक से समझ नहीं आया था कि वह इस यात्रा पर क्यों है — बस इतना कि प्रिया ने कहा था कि उसे साथ चलना होगा। वह मान गया था क्योंकि वह उसकी ग्रेजुएशन सेरेमनी में शामिल नहीं हो पाया था — और उसे इसका एहसास था।
“मेरी मास्टर्स — और तुम, भैया, मेरे यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने के दिन नहीं आए थे, है ना?”
प्रिया ने कहा था।
“मैंने नोटिस किया कि वे दोनों मुश्किल से एक-दूसरे से बात करते हैं या एक-दूसरे की ओर देखते हैं भी नहीं। हर कोई अपनी ही सोच में डूबा हुआ लगता है,” अनिल ने कहा।
“मैं भी यही कह रही हूँ। आइवी बहुत उदास दिखती है। उन्हें इस साइड ट्रिप पर लाने का एक कारण यही था कि शायद कामसूत्र के मंदिरों का उन पर कोई सकारात्मक असर पड़े।”
“तुम्हारा प्रयास सही दिशा में तो है, पर एक हाथ से ताली नहीं बजती। देखते हैं कल क्या होता है।”
प्रिया ने अपना ग्लास उठाया — “कल के नाम।”
नाश्ते के बाद चारों होटल की लॉबी में इकट्ठा हुए, जहाँ उन्होंने अपने गाइड राज से मुलाक़ात की। फिर किराए की कार से वे मंदिरों के द्वार तक पहुँचे।
सुबह की ठंडी हवा में लिपटे हुए, वे पश्चिमी मंदिरों के परिसर में घूमने लगे। राज ने उन्हें शिल्पकला की शानदार उपलब्धियाँ दिखाईं — नौवीं शताब्दी के सबसे पुराने निर्माणों से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी के अपेक्षाकृत नए मंदिरों तक। मूर्तियों और उभरी हुई नक्काशी को देखकर आइवी की साँसें थम-सी गईं। वह खुद को तस्वीरें खींचने से रोक नहीं पाई।
अनिल अपनी गति से चलना पसंद करता था, जबकि एंडी मंदिरों को गहराई से देखने के लिए पीछे रह गया। आइवी और प्रिया राज के साथ आगे बढ़ती रहीं।
“मैडम, आप कहाँ से हैं?” राज ने पूछा।
“ऑस्ट्रेलिया से,” आइवी ने जवाब दिया।
“अरे वाह, किम ह्यूज़ — बहुत अच्छे कप्तान थे,” राज ने मुस्कुराते हुए कहा।
“किम ह्यूज़ और कपिल देव,” आइवी ने सिर हिलाया और मुस्कुराकर राज की मुस्कान का जवाब दिया। राज के पास पहले से तय मज़ाकिया बातचीत का अभ्यास था, एक तरह का कॉमिक रूटीन। इस कोई शक नहीं कि उसके पास अलग-अलग ग्राहकों के लिए अलग-अलग अंदाज़ होते होंगे। दो युवा महिलाओं के साथ होने के कारण वह खुद को खासा स्टार समझ रहा था।
प्रिया को नंदी मंदिर बहुत पसंद आया, वह राज को खींचती हुई अंदर ले गई ताकि वह उसकी तस्वीरें ले सके। आइवी ने एक बोर्ड देखा जिसमें उस रात के साउंड एंड लाइट शो का विज्ञापन था। “हमें वापस आना ही होगा, प्रिया,” उसने कहा।
दोपहर के समय वे सभी फिर से मंदिर के द्वार पर मिले ताकि पूर्वी समूह और जैन मंदिरों की ओर बढ़ सकें। दोपहर की सुनहरी रोशनी में वे एक मंदिर से दूसरे मंदिर की ओर बढ़ते गए, हर मंदिर अनोखा और कुशलता से बना हुआ था। पार्श्वनाथ की काली संगमरमर की मूर्ति अद्वितीय थी।
आइवी जोश में बात करती हुई अनिल के साथ चल रही थी। एंडी राज के साथ आगे निकल गया था। आइवी जब अनिल की ओर कैमरा घुमा रही थी, प्रिया भी पास पहुँच गई। अनिल ने पोज़ दिया और मुस्कुरा दिया, पर थोड़ा संकोच भी झलक रहा था।
बाद में डिनर के समय, आइवी का पूरा ध्यान अनिल पर ही था। यहाँ तक कि प्रिया को भी उससे बात करना मुश्किल लग रहा था।
“साउंड एंड लाइट शो,” प्रिया ने याद दिलाया जब वे रेस्टोरेंट से बाहर निकल रहे थे।
अमावस की रात में, शहर का केंद्र ही एक रोशनी और ध्वनि का शो लग रहा था — नीऑन साइन, स्ट्रीट लाइट्स, पेड़ों और बालकनियों पर लटकती रंग-बिरंगी लाइटें; और आसमान में टिमटिमाते तारे। रेस्टोरेंट्स से आती संगीत की धुनें आवाज़ों की चहल-पहल में घुल रही थीं, जिसमें ट्रैफिक का शोर भी शामिल था। चमेली की ख़ुशबू और मसालों की महक मिट्टी और जानवरों की गंधों के साथ मिल रही थी।
पश्चिमी मंदिरों की शांत ज़मीन पर, जहाँ अब कुर्सियाँ लग चुकी थीं, वे चारों आकर बैठ गए। प्रिया आइवी और अनिल के बीच में आकर बैठ गई।
एक रोशन मंदिर और संगीत के साथ साउंड एंड लाइट शो शुरू हो गया। पेड़ों के बीच लगे एक स्पीकर से गूंजती आवाज़ ने बताया कि ये भव्य मंदिर कैसे बने, फिर सदियों तक जंगल में खो गए, और कैसे उनकी खोज दोबारा हुई। कहानी का केंद्र बनने वाले हर मंदिर को क्रमशः रंग-बिरंगी रोशनी से रोशन किया गया। ‘ऑफ-स्टेज’ आवाजें ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर कैप्टन टी.एस. बर्ट की थीं, जिन्होंने 1838 में इन मंदिरों की खोज की थी, और उनके अंग्रेज़ सहयोगियों की भी आवाजें थीं — जो मज़ाकिया ढंग से ‘पक्का अंग्रेज़’ अंदाज़ में थीं। शो रोमांचक था, भले ही कभी-कभी थोड़ा नाटकीय लग रहा था।
चारों लोग आसमान में बिखरे सितारों और रात की ठंडी हवा का आनंद लेते हुए कार की ओर लौटे।
“थक गए, यार?” प्रिया ने कहा।
“अभी तो रात शुरू हुई है, कुछ हल्का-फुल्का खा सकते हैं,” अनिल ने सुझाव दिया।
उन्होंने नीऑन साइन देखे कि कहाँ बैठा जा सकता है। जब वे एक टेबल पर आराम से बैठ गए, तो प्रिया ने देखा कि आइवी फिर से अनिल के साथ फ्लर्ट कर रही है और उसकी तस्वीरें ले रही है। वह एक बहाना बनाकर अनिल को टेबल से दूर ले गई।
“ये सब क्या कर रहे हो?” प्रिया ने सख्ती से पूछा।
“क्या?”
“ये जो फ्लर्ट-व्लर्ट चल रहा है क्या? मैं तो आइवी और एंडी की रोमांस की चिंगारी फिर से जलाने की कोशिश कर रही हूँ, और तुम उसके हॉलिडे फोटोज़ के लिए पोज़ दे रहे हो?”
“तुम तो बिल्कुल hopeless romantic(निराशाजनक रूप से रोमांटिक व्यक्ति) हो,” अनिल ने शरारती मुस्कान के साथ कहा। “पर तुम्हें एक बात बतानी है। जब हम शो के बाद मंदिर के गेट से बाहर निकल रहे थे, किसी ने आइवी को धक्का दिया और फिर उससे बदतमीज़ी भी की। एंडी तुरंत उसके पास गया और उसे गेट से बाहर सुरक्षित ले गया।”
“तो तुम्हारा मतलब है, अभी भी उम्मीद बाकी है?”
“शायद उन्हें एक मकसद चाहिए — कोई साझा मकसद,” अनिल ने आँख मारते हुए कहा।
प्रिया ने भौंहें चढ़ाईं — “ऐसा कौन सा साझा मकसद ढूंढ सकते हैं हम?”
जब वे वापस टेबल पर पहुँचे, एंडी ने पूछा “सब ठीक है?”
“ऑल इज़ वेल,” प्रिया ने मज़ाक में कहा।
“तो फिर ऑर्डर कर लेते हैं,” एंडी ने कहा — वह एक्शन का आदमी था, खासकर जब चुप्पी असहज हो जाए।
उन्होंने कुछ वेज और कुछ नॉनवेज व्यंजन साझा करने के लिए चुने। वेटर ऑर्डर लेने के बाद चला गया, और वे इंतज़ार करते हुए बैठ गए। माहौल में एक असहज चुप्पी घुली हुई थी।
“तो साउंड एंड लाइट शो कैसा लगा?” प्रिया ने मजबूरी में पूछा।
“बहुत अच्छा,” आइवी ने जवाब दिया। “रंग-बिरंगी रोशनियों का शानदार प्रदर्शन, ढेर सारा ड्रामा और इतिहास भी।”
“मैं सोच रहा हूँ कि ब्रिटिश लोग उनके उच्चारण की नकल पर क्या सोचते होंगे,” एंडी ने कहा।
“अच्छा हुआ कि वो ऑस्ट्रेलियन आर्मी नहीं थी,” अनिल ने कहा। “सोचो ज़रा, स्थानीय लोग ऑस्ट्रेलियाई उच्चारण को समझने की कोशिश कर रहे होते, उनके रंग-बिरंगे मुहावरों की तो बात ही छोड़ो। कई बार तो ऑस्ट्रेलियाई अंग्रेज़ी नहीं बल्कि कोई विदेशी भाषा लगती है — ‘ग’डायन्या, मेट’— पता नहीं कितनी बार सुना तब जाकर समझ आया इसका मतलब क्या है गुड ऑन यू मेट। मुझे हैरानी होती है कि ऑस्ट्रेलियाई लोग आदिवासी समुदाय के लिए तो अंग्रेज़ी सबटाइटल्स डालते हैं, लेकिन आम ऑस्ट्रेलियनों के लिए नहीं — जैसे बाकी सब तो एक-दूसरे को समझ लेते हैं, बस आदिवासी ही रह जाते हैं।” “यह इसलिए होता है ताकि आदिवासी समुदाय को किसी तरह की असुविधा न हो,” आइवी ने अनिल को आश्वस्त किया।
“पर क्या यह भी भेदभाव नहीं है?”
“तो इसे सकारात्मक भेदभाव कह लो,” आइवी ने थोड़ी तीखी आवाज़ में जवाब दिया।
“तो ऑस्ट्रेलियाई लोग सकारात्मक भेदभाव करते हैं, डायलॉग्स में सबटाइटल जोड़कर, लेकिन तुम्हारे आदिवासी समुदाय की हालत देखो — वे जेलों में ज़्यादा हैं, उनकी जीवन प्रत्याशा बहुत कम है, शिशु मृत्यु दर अधिक है, उन्हें उनकी ज़मीनों से बेदखल किया गया है, उनकी भाषाएँ लुप्त हो गई हैं और वे कई पुरानी बीमारियों से जूझ रहे हैं — वहाँ कहाँ है सकारात्मक भेदभाव?”
“कुछ हो रहा है — ये मुश्किल है, जटिल है — समस्याओं को हल करने के लिए नीतियाँ और कार्यक्रम चल रहे हैं। लोगों की सोच बदल रही है — मृत्यु दर पहले से बेहतर है,” आइवी का माथा सिकुड़ गया।
“मेरा सवाल है, क्या एक समृद्ध देश जैसे ऑस्ट्रेलिया के लिए यह बदलाव पर्याप्त तेज़ है?”
“अनिल तो बस बहस करने वाला भारतीय बन गया है,” प्रिया ने माफ़ी मांगती मुस्कान के साथ कहा। “हमें ऑस्ट्रेलिया बहुत पसंद है, तुम जानते हो।”
“ये सवाल वाजिब है, प्रिया। हम सब जानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में नस्लभेद है,” अनिल पीछे हटने वाला नहीं था।
“एक मिनट रुक जाओ, दोस्त,” एंडी ने बीच में टोका। “ऑस्ट्रेलिया में हम सब नस्लभेदी नहीं हैं।”
“बिलकुल नहीं,” प्रिया ने सहमति में सिर हिलाया।
“तुम कहना चाह रही हो कि हम…” आइवी अपनी बात पूरी नहीं कर सकी।
“कोई कुछ ऐसा नहीं कह रहा है,” प्रिया ने बात संभाली।
“मैं किसी एक व्यक्ति पर उंगली नहीं उठा रहा,” अनिल ने बात जारी रखी, “पर…”
“पर क्या?” एंडी ने तीखे लहजे में पूछा।
“यही तो शब्द है जो ऑस्ट्रेलियाई लोग अक्सर बोलते हैं, है ना? ‘मैं नस्लभेदी नहीं हूँ — पर…’ जब मैं ऑस्ट्रेलिया में था, ये बात मुझसे कई बार कही गई थी — प्रिया से भी।”
“पर मैंने कभी नहीं कहा,” एंडी ने विरोध किया, “और न ही आइवी ने।”
“मैं तुम दोनों को दोष नहीं दे रहा।”
“बस आम ऑस्ट्रेलियनों को,” एंडी ने तिक्त स्वर में कहा।
“कुछ ऑस्ट्रेलियनों को,” प्रिया ने माहौल शांत करने की फिर से कोशिश की।
“बहुत से ऑस्ट्रेलियनों को,” अनिल ने उसे सुधारा।
अगर नज़रें मार सकतीं, तो अनिल उसी वक्त ढेर हो गया होता।
“छोड़ दो, आइवी। ये बस खुद को होशियार समझ रहा है,” एंडी ने कहा।
“कम से कम हमारी ट्रेनों में तो कोई ऑटोमैटिक राइफल लेकर नहीं चढ़ता!” आइवी ने झल्लाकर कहा। “मैंने ऐसा कभी नहीं देखा!”
“कम से कम कहें तो, वह वाक़ई असहज करने वाला था,” एंडी ने सहमति जताई।
“और हमारी ट्रेनों में धमाके भी नहीं होते,” आइवी ने जोड़ा।
“हे भगवान, क्या यही बात तुम्हें परेशान कर रही थी?” प्रिया ने पूछा। “तुमने मुझसे बताया क्यों नहीं? किसी मुद्दे को इस तरह उठाना बहुत दुखद तरीका है, है ना? हम इन हालातों के साथ जीना सीख चुके हैं — हिंसा हमारे इतिहास का हिस्सा है — लेकिन हम पैनिक नहीं करते, हम सहज भाव से उसे स्वीकार करते हैं। ऑस्ट्रेलिया को हमसे ये सीख लेनी चाहिए।” “बहस की जगह अगर एक्शन लिया जाए,” अनिल ने सिर हिलाया। “एक तरह से ये अच्छा भी है कि ऑस्ट्रेलियाई लोग सुरक्षा को लेकर इतने सहज हैं — उनकी मासूमियत में एक तरह की सादगी है — लेकिन आज के मुश्किल समय में ये नज़रिया व्यावहारिक नहीं है।”
आख़िरकार उनका खाना आ गया और चारों चुप हो गए। अनिल मज़े से खाने लगा, जबकि बाकी लोग अपनी प्लेट में खाना इधर-उधर करते रहे, कहीं-कहीं से थोड़ा-थोड़ा खाते रहे।
“कल सुबह हम ओरछा के लिए निकलेंगे,” अनिल ने घोषणा की, “वहाँ मकबरों को देखने जाना है। रवाना होने से पहले पास के शिल्पग्राम भी चलना चाहिए। वहाँ प्राचीन भारतीय संस्कृति के उदाहरण मिलते हैं — अलग-अलग तरह के घर, लोक कला, नृत्य वगैरह। यह हमारे होटल से पैदल दूरी पर ही है।”
“ज़रूर देखना चाहिए, समय निकालेंगे,” प्रिया ने राहत की साँस लेते हुए कहा कि बात का विषय बदल गया।
अनिल ने देखा कि आइवी और एंडी ने एक-दूसरे की ओर एक खास नज़रों का आदान-प्रदान किया और मन ही मन मुस्कुरा उठा।
उन्होंने खाने का बिल चुकाया, अपने ड्राइवर को जगाया और होटल तक का सफ़र तनातनी भरे माहौल में पूरा किया।
“तुम्हें क्या हो गया था?” प्रिया ने अनिल से पूछा जब आइवी और एंडी अपने कमरे में चले गए।
“मुझे?” अनिल ने मासूमियत भरे अंदाज़ में पूछा।
“तुम बहुत बेरहम थे!”
“मुझे लगा कि उन दोनों को किसी की ज़रूरत है जो उनके खिलाफ़ हो जाए। तो लीजिए, पेश है शैतान का वकील!” अनिल हँस पड़ा।
प्रिया ने उसकी ओर ग़ौर से देखा। “अब मैं उन्हें कल क्या कहूँ, भैया?”
“पहले देखो तो सही, जाल फँसा भी या नहीं।”
अगली सुबह नाश्ते की बुफे टेबल पर दूसरों का इंतज़ार करते हुए प्रिया ने कई बार अपनी कलाई घड़ी देखी। अनिल भी आया और समय देखा।
“वे लेट हैं,” उसने कहा। “हमें नाश्ता शुरू कर देना चाहिए।”
“शायद वे नाश्ते से पहले पूल में तैरने गए हों,” प्रिया ने कहा। उन्होंने ताज़ा बने डोसे और दार्जिलिंग चाय चुनी। नाश्ते के दौरान उन्होंने मेट्रे डी से कोई संदेश आने के बारे में भी पूछा। उन्होंने धीरे-धीरे नाश्ता किया, फिर भी आइवी और एंडी का कोई अता-पता नहीं था।
अनिल ने कहा, “मैं देखता हूँ कि वे पूल में हैं या नहीं।”
प्रिया ने उनके कमरे का दरवाज़ा कई बार खटखटाया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
जब वे लॉबी में मिले तो अनिल ने सिर हिलाया। “कोई निशान नहीं,” उसने कहा।
“उम्मीद है वे ठीक होंगे,” प्रिया के चेहरे पर चिंता साफ़ झलक रही थी। वह फ्रंट डेस्क पर गई और कर्मचारियों से उन्हें चेक करने को कहा।
“कमरा तो ख़ाली है, मैडम,” युवक ने कहा, “कल रात से ही।”
“वे चले गए?” प्रिया ने पूछा।
“जी मैडम, उन्होंने देर रात चेक आउट किया। सारे बिल चुका दिए और फिर टैक्सी बुलवाई।”
“टैक्सी?”
“जी मैडम।”
अनिल ने अपना बिल चुकाया, और पोर्टर ने उनका सामान बाहर खड़ी कार में रख दिया।
“मैं समझ नहीं पा रही,” प्रिया ने कहा। “मुझे पता है वे तुमसे नाराज़ थे—लेकिन मुझे बिना कुछ कहे चले जाना? मुझे बहुत दुख पहुँचा है—फिर भी मुझे ज़िम्मेदार भी महसूस हो रहा है। वे गए कहाँ होंगे?”
“मुझे कैसे पता होगा?” अनिल ने कहा। “कम से कम उनके पास दिल्ली की ट्रेन की टिकटें तो हैं, एंडी ने होटल वापस आने पर उनसे मांगी थी। कुछ कहा भी था—”अगर हम अलग हो जाएँ तो काम आएँगी।”
“तो आइवी और एंडी ने ये सब पहले से सोचा था?” “हो सकता है अचानक का फ़ैसला हो, महज़ इत्तिफ़ाक़। वे बड़े लोग हैं, प्रिया, संभाल लेंगे खुद को।”
“ओह, तुम्हें तो सब कुछ मालूम है क्या?”
“चिंता मत करो, मैडम,” उनके ड्राइवर ने बीच में कहा, “आपके दोस्त इसी रास्ते के एक और होटल में हैं।”
“मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा। उन्होंने इस होटल को छोड़कर खजुराहो में ही किसी और होटल में कमरा लिया?”
“जी मैडम, ‘ललित होटल’। मैंने ही साहब और मैडम को वहाँ छोड़ा। वे आज वेस्टर्न टेम्पल्स घूमने के लिए कार और गाइड बुक कर रहे थे।”
प्रिया के चेहरे पर हैरानी साफ़ थी, लेकिन उसे इसमें कोई शक नहीं था कि ड्राइवर को सारी ताज़ा खबरें मालूम थीं। “आइवी कम से कम मुझे बता तो सकती थी। क्या उसे नहीं लगता कि मैं चिंता करूँगी? ऐसा तो कोई नहीं करता।”
“शांत हो जाओ। तुम्हारी मुराद पूरी हो गई, है न? तुम चाहती थीं कि दोनों साथ समय बिताएँ। अब उन्हें अकेला छोड़ दो, छुट्टियाँ शांति से मनाने दो। उसे एक एस एम एस भेजो—लिख दो, ‘सिडनी में अगली गर्मियों में मिलते हैं।’
अनिल आराम से कार की सीट पर टिक गया और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान के साथ बोला, “अंत भला तो सब भला।”

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