दिन विशेष विमर्श में डॉ. वेद व्यथित की व्यंग्य रचना ‘मन की बात’ और ‘मेरी समझदारी और महानता’

डॉ. वेद व्यथित हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं बहुआयामी रचनाकार हैं। उन्होंने एम.ए. एवं पीएच.डी. की शिक्षा प्राप्त की है। विभिन्न विधाओं में उनकी 16 पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें व्यंग्य, काव्य, खंड काव्य, काव्य नाटक, संस्मरण, आलोचना एवं उपन्यास आदि प्रमुख हैं। उनकी पुस्तकों पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हुआ है। उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, जापानी, फ्रेंच, रूसी, पुर्तगाली, नेपाली एवं पंजाबी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। व्यंग्य लेखन के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ है। वे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सेमिनार की अध्यक्षता कर चुके हैं तथा हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व सदस्य रहे हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों में सहभागिता की है और ऑस्ट्रेलिया एवं कनाडा के भारतीय कंसुलेट में हिंदी भाषा पर व्याख्यान दिए हैं। विदेशों में उनके अनेक रेडियो साक्षात्कार भी प्रसारित हुए हैं।

मन की बात

सबसे बड़े साहब मैं मन की बात करना शुरू किया है तब से कई और लोग भी मन की बात करने लगे हैं। पर यह मन की बात है सबकी अलग-अलग हैं। कुछ लोग किसी के मन की और कुछ लोग किसी के मन की बात करते रहते हैं। पर अपने मन की कोई बात नहीं करता है। बड़े साहब ही कौन अपने मन की बात करते हैं। वह भी औरों की बात ही मन की बातों में बताते हैं या औरों से करवाते रहते हैं।
परंतु मन की बात है बहुत बढ़िया। मन की बात कहने से आदमी कैसा भी हो पिघल जाता है। जब कोई यह कहता है कि मैं आपको अपने मन की बात बता रहा हूं तो आदमी सोचता है कि यह तो बड़ा भला आदमी है और मुझे अपने मन की बात बता रहा है तो यह अपने निकट भी समझ रहा है जो मुझे अपने मन की बात बता रहा है, नहीं तो भला अपने मन की बात बताता ही कौन है। सब के सब बताते कुछ हैं और उनके मन में कुछ और चल रहा होता है। इसी तरह कई कहावतें भी बन गईं जैसे बगल में छुरी और मुंह में राम राम आदि। ऐसे ही कुछ लोगों के मन में कुछ और होता है और बाहर कुछ और होता है और यह बेचारा तो मुझे सीधे अपने मन की बात बता रहा है, कितना भला आदमी है यह, मेरा कितना अच्छा दोस्त है। पर कई बार उल्टा भी होता है। आप उनकी बातों में मत आना कि वह आपको मन की बात बता ही रहा है या बता ही देगा। आपको इस झांसे में आने से पहले सौ बार सोचना भी चाहिए नहीं तो आप धोखा खा सकते हैं।
क्योंकि लोग जिस बात को अपने मन की बात कहते हैं, वह कई बार उनके स्वार्थ से भी जुड़ी हो सकती है जैसे वे कहते हैं कि मेरे मन में है कि मैं आपको कहीं अच्छी सी नौकरी लगवा दूं या कहेंगे कि मेरा मन कर रहा है कि मैं आपके लिए कुछ अच्छा सा काम करूं परंतु वे न तो आपके लिए कोई अच्छी बात करेंगे और न ही कोई अच्छा काम करेंगे अपितु इस बहाने आपको आसानी से बेवकूफ भी बना सकते हैं।
इसके लिए बहुत बढ़िया उदाहरण यह है कि नेता लोग बिना बात जनता के मन की बातें बताने लगते हैं कि जनता ने हमें जिताने का मन बना लिया है। अब उनसे पूछो कि आपको जनता के मन की बात का कैसे पता चला क्योंकि जनता कोई एक आदमी तो है नहीं जिसने अपने मन की बात आपको बता दी हो और न ही आप हजारों लोग लाखों लोगों के मन की बात ही जान सकते हैं क्योंकि सबके मन की बात कैसे जानोगे जबकि आपके पास तो उनके टेलीफोन नंबर तक भी नहीं है और ना ही उनमें से आप की किसी से कोई बात हुई है बात तो छोड़ो बहुत दूर की बात है आप को तो उन सबके पते भी मालूम नहीं है।
परंतु आपको अपने अपने मित्र अपने घेरे में रहने वाली मंडली के मन की बात जरूर पता होगी क्योंकि वह दिन रात आपको खुश रखने और करने के लिए की बातें जो करते हैं। पर आपको यह भी पता है कि यह उनके मन की बात कतई नहीं है। यह तो आप से लाभ उठाने का एक तरीका है या आप उनसे ऐसा कहलवा कर बेशक थोड़ी देर तो खुश हो ही लेंगे और सब को यह बताएंगे कि लोगों को देखो जनता ने मन में हमें ही जिताने का मन बना लिया है। क्योंकि आपके लिए तो आप के चारों ओर ही मडराने वाले लोग ही जनता है।
पर यह जनता कदापि नहीं हो सकती है। जनता तो जनता ही होती है। वह भी आपकी तरह अपने मन की बात कभी नहीं बताती है। वह तो आपके काम देखकर ही अपना मन बनाती है और वह भी अपना मन बनाने मैं पूरा समय लेती है। क्योंकि सारी पार्टियां यही कहती हैं कि जनता ने हमें ही जताने का मन बना लिया है पर जो जनता के मन की बात करते हैं कई बार चुनावों में उनकी जमानत भी जब्त हो जाती है। तब उन के द्वारा कही गई जनता के मन की बात झूठी सिद्ध हो जाती है। पर जनता तो झूठ बोलती नहीं है। यह तो आप ही जनता के नाम पर बार बार झूठ बोलते रहते हैं।
उनका असली कारण है यह है कि न तो आप अपने मन की बात बताते हैं तो जनता ही आपको अपने मन की बात क्यों बताने लगी क्योंकि जनता भी तो जानती है कि इनके द्वारा किए गए वायदे बस यूं ही हवा-हवाई ही हैं। असलियत तो यह जीतकर अपना ही घर भरेंगे क्योंकि यह कई बार इस बात को पहले भी देख चुके हैं, इसलिए भी जरूरी है कि मन की बात को न मान कर काम देख कर अच्छी तरह ध्यान देकर और देश हित को ध्यान में रखकर ही सबको मन की बात करनी चाहिए और वह मन की बात बाहर भी करनी चाहिए ऐसा नहीं कि आप सोचें कुछ। आपके मन में हो कुछ और होगा और बाहर कुछ और होगा तो देश का या समाज का भला कैसे होगा इसलिए जनता के भले के लिए देश और देश के भले के लिए आप सच में ही अपने मन की बात बताएं।, जनता के मन की बात नहीं अपने मन की बात बताएं। यदि वह आपके मन की बात अच्छी तरह से समझ लेगी तो जनता भी आप को अपने मन की बात बता देगी और बता ही नहीं देगी कर के भी दिखा देगी यदि वह नशाखोर स्वार्थी या देशद्रोही नहीं हुई तो।

मेरी समझदारी और महानता

मैं घर में अपने आप को सबसे अधिक समझदार प्राणी मानता हूं। पर वास्तविकता क्या है यह मेरी ही तरह आपको भी पता होगी। क्योंकि आप भी अपने आप को मेरी ही तरह खूब समझदार, इज्जतदार, महान, होशियार आदि आदि मानते ही होंगे। पर जो आपके साथ बीतती है या मेरे साथ बीतती है, वह शायद एक ही जैसी होगी। मैं केवल उन भाइयों की बात कर रहा हूं जो मध्यम वर्ग के हैं। क्योंकि यही बीच के तबके के लोग ऐसे हैं जिनके साथ कभी भी कहीं भी कुछ भी घटता घटता रहता है या घट सकता है और हम इसे आसानी से देखते रहते हैं क्योंकि यह हमारी मजबूरी होती है। क्योंकि घर में हमारे अक्सर कोई झाड़ू पोछा करने वाली काम वाली को छोड़कर कोई और नौकर नहीं होता है, तो इसलिए मुझ पर ही घर के छोटे-बड़े कामों की जिम्मेदारी होती है जिसे हम हाथ बटाना कहते है। पर मैं इस हाथ बटाने को ही असली मुसीबत की जड़ मानता हूँ। यही हमारी ऐसी तैसी करने के लिए काफी होती है क्योंकि मुझे ही सुबह सुबह दूध लेने जाना होता है और दूध लाकर उसे गर्म करने के लिए गैस पर रखना कोई काम थोड़ी है। उसमें कोई पहाड़ थोड़ी तोड़ने पड़ते यहीं या गिनती पहाड़े थोड़ी याद करने पड़ते हैं और न ही कंप्यूटर या लैपटॉप पर कठिन काम करना होता है। बस मुझ को तो दूध को भगोने में डालकर गैस पर रखना ही तो होता है। पर यह कहने में ही आसान लगता है क्योंकि गैस को कितना मंदा रखना है यह भी तो डज्यां रखना पड़ता है। परन्तु अक्सर पांच साथ दिन में एक दो बार यही तो भूल ही जाता हूं कि गैस कितनी है और उस की फ्लेम तेज पर हो रह जाती है, जिसके बाद क्या होता है, यह आपको भी पता है आप कहेंगे क्या हो गया बस दूध ही तो उफ़न गया होगा। परन्तु नहीं भाई दूध उफने की बात नहीं है। यह तो थोड़े से रुपए पैसे का ही नुकसान है जिस की कोई बात नहीं, पर जब दूध उफ़न कर बाहर निकल जाता है और रसोई में फ़ैल जाता है। असली बात तो उस की है यानी जब इस बात को लेकर श्रीमती जी अपने रौद्र रूप में आती हैं और जैसे-जैसे दूध में उबाल आया था तो वैसे ही दूध को और गैस को साफ करते करते उनका जो पारा चढ़ता है। असल बात वह है और साथ में उनका श्लोक उच्चारण तो और भी अधिक खतरनाक होता है क्योंकि इन्हीं श्लोकों में ही तो मेरा असली गुणगान भी होता है कि आपको इतनी भी समझ नहीं है गैस को सिम यानि कम कर के दूध को रखो पर ध्यान तो कहीं और रहता है। दूध उफ़न रहा है तो आप को क्या आप को नुकसान से क्या सारी मलाई बाहर निकल गई है पर आपका क्या जा रहा है और इतनी भी समझ नहीं कि कितना नुकसान हो रहा है। पर कभी घर में ध्यान दिया हो तो। हमेशा से ऐसे ही काम किए हैं। भला मैं कब तक अकेली घर को संभालूँ। पूरी घर गृहस्थी संभालना, घर का सारा दिन धंधा पीटना तो बस मेरा ही काम है इतना सा काम नहीं होता है साहब से मुझे तो तुम्हें संभालना पड़ता है अपने कच्चे बनियान तक तो बाथरूम में लेकर नहीं जाते और फिर चिल्लाते रहते हैं जरा यह पकड़ाना वह पकड़ाना मेरा चश्मा कहां है, मेरा पर्स नहीं मिल रहा, मेरे स्कूटर की चाबी पता नहीं कहाँ है। अब इन से यह पूछो स्कूटर मैं चलाती हूं या चाबी भी मैं ही रखती हूं खुद ही इधर-उधर के रख देते हैं और पूछते मुझसे हैं जैसे मैं तो घर में सब कुछ की जिम्मेदार हूँ। हे भगवान ! जब इस आदमी से अपनी चाबी नहीं संभाली जाती तो यह घर कैसे संभाल लेगा। इस घर का तो भगवान ही मालिक है। कितनी बार कहां है कि गैस को कम कर दिया करो पर मेरी तो सुनते ही नहीं है मैं तो जैसे पागल हूँ मुझे तो कुछ पता ही नहीं है जबकि खुद को कुछ आता जाता नहीं है। घर से तो जैसे कोई मतलब ही नहीं है। सारा दिन बस किताबों में ही लगे रहेंगे या खबरें सुनते रहेंगे। अब भला एक बार खबर सुन ली तो इस से इन की तस्सली नहीं होती है क्योंकि वे तो बार-बार उन्हीं खबरों को दिखाते रहते हैं देखने वाले की भी हिम्मत है जो सारा दिन उन्ही खबरों को देखता रहता है। पता नहीं इस आदमी को समझ किस दिन आएगी।
ऐसे ही घर में जब में सब्जी नहीं होती है तो मुझे ही बाजार से अकेले जाकर सब्जी लानी होती है और जब सब्जी घर आ जाती तो आने के बाद भी पता ही है न फिर क्या होता है। पता नहीं किस किस का इन सब्जियों पर और मुझ पर निकलता है। यह ऐसी सब्जी लानी होती है क्या घर में, पता नहीं वहां सब्जी देखते हैं या किसी और को देख रहे होते हैं। सब्जी वाला जैसी भी गली सड़ी सब्जी को तोल कर पकड़ा देता है बस उसे तो पैसे से मतलब होता है। सब्जी वाले को भी पता होता है कि इस आदमी को कुछ पता नहीं है उसे तो बस पैसे से मतलब होता है वह भी समझ जाता है इस आदमी को कुछ पता नहीं इसे कैसी पकड़ा दो और कितना पैसा मांगेगा ये चुपचाप दे देते हैं। जब कि लोग दस जगह देख कर कितनी बढ़िया सब्जी ले कर आते हैं। पर ये तो बस एक जगह से ही ले कर चल देते हैं। ये तो स्वयं को धन्ना सेठ मान कर चलते हैं न यह देखते हैं कि घर कैसे चलाना है बस मैं ही इस घर को कैसे तैसे चला रही हूँ नहीं तो घर कब का उजड़ जाता। इन के लिए तो सब्जी वाला बेचारा गरीब आदमी है पर इन्हे यह नहीं पता कि वह तुम्हारे जैसों को ही सुबह से शाम तक बेवकूफ बनाते रहते हैं।
इतना ही नहीं एक बार मैं कहीं कार्यक्रम में घूमने गया तो वहां से श्रीमती जी के लिए बड़े प्यार से एक साड़ी खरीद कर लाया था। बस फिर क्या था घर आते ही मुझे वही पुराने नाकारा, अनसमझ और बेवकूफ होने के प्रमाण पत्र हर बार की भांति फिर से थमा दिए गए। भला वहां यही साड़ी मिली व वहां और किसी रंग की साड़ी नहीं दिखी और हाथ लगाकर कपड़ा तो देखा जा सकता था कम से कम कपड़ा तो ऐसा होता जिसे पहना जा सकता हो और भला इतनी महंगी साड़ी है क्या यह, इस से आधी कीमत में तो यहां ही खूब अच्छी साड़ीयाँ मिल जाती हैं, बेशक फंक्शन में पहन जाओ। पता नहीं इन में कब समझ आएगी। जितने मांगे होंगे उतने ही इतनी ही दे दिए होंगे चुपचाप। लोग इतना मोलभाव करते हैं, पर यह तो पैसे की ओर देखते ही नहीं जैसे पैसा ऊपर से बरसता है। वैसे हमेशा हाथ तंग रहता है। पर बाजार में जब इस तरह पैसा उड़ाते हैं तब तो जरा भी नहीं सोचते कि पैसा देखकर खर्च करना चाहिए। पर मेरी ऐसी समझदरी की एक बात हो तो बताऊं। मैं तो ऐसी बातें हैं पिछले कई दशकों से सुनने का आदि हो चुका हूं। अब मुझे इनकी आदत पड़ चुकी है और बेशक बार-बार लोग मुझे इंटेलेक्चुअल या बुद्धिजीवी और महान कहते हैं पर मेरी असलियत तो घर के लोगों को ही पता है। पता तो आपकी भी होगी। बस आप किसी को बता नहीं रहे होंगे मैं बता रहा हूं। बस इतना अंतर है पर एक और यानी सीक्रेट यानी गुप्त बात बता दूं जबकि श्रीमती जी इस तरह कुछ देर तक बड़बड़ातीं हैं तो मुझे अब उनका यह रूप सुहाना लगने लगा है क्योंकि उसके बाद वे मुझ पर दया भाव भी दिखाते हुए कुछ अच्छा सा बनाकर भी खिलातीं हैं। बस फर्क यह है कि बलि के बकरे को पहले खिलाया जाता है और मुझे बलि चढ़ने के बाद प्रसाद मिलता है।

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