वैश्विक हिंदी परिवार के ‘कहानी विशेष’ में मधु पंत की कहानी ‘एक और कुतुबनुमा’ पर विमर्श

मधु पंत हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यकार, प्रख्यात बाल साहित्यकार तथा शिक्षाविद् हैं। वे राष्ट्रीय बाल भवन की पूर्व निदेशक रह चुकी हैं। हिंदी कथा-साहित्य, बाल साहित्य, उपन्यास, कहानी, संस्मरण और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक यथार्थ, स्त्री-चेतना और बाल मनोविज्ञान का सशक्त चित्रण मिलता है। उन्होंने बाल सृजनशीलता, रचनात्मक शिक्षा और साहित्यिक संस्कारों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके साहित्य का अनेक भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है तथा उनकी कृतियाँ देश-विदेश में समान रूप से चर्चित हैं। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है।

फूलों से सजी सेज पर निश्चेष्ट पड़ी है आरती। कोई सिहरन नहीं, कोई रोमांच नहीं, कोई उत्सुकता नहीं, कोई प्रतीक्षा नहीं, आवेग, संवेग, कुछ भी तो नहीं है। यह कैसी सुहागरात है? सारे घर में सन्नाटा है, अजीब सी शांति। कोई आवाज़ नहीं, सिवाय चंद्रकांत की सांसों की आवाज के।….चंद्रकांत.. चंद्रमा की कांति सा सुंदर, शीतल, शांत। चेहरे पर निश्छल स्मित और अनूठी आभा। जिसने भी देखा, आरती के भाग्य को भरपूर सराहा। संस्कारी, सुदर्शन युवक, सरकारी अफसर, घर, जमीन, जायदाद… मां, बेटे का छोटा सा परिवार।

सबने पूर्णमासी की कथा के इतिवृत्त की तरह “जैसे आरती के भाग खुले, सबके खुलें” कहते हुए दादी को बधाई दी। नानी ने “भगवान जब देता है, छप्पर फाड़ कर देता है” कहते हुए शादी का सारा श्रेय खुद लेते हुए, पिछले कुछ वर्षों से वर ढूंढने में परेशान चाचा की सफेद होते बालों की व्यथा कथा, चाची द्वारा बचपन से आरती को पालने, बड़ा करने संस्कारी बनाने में लिए उद्यमों और कष्टों का लेखा जोखा सुनाया। दादी ने आरती को कलेजे से लगाकर, जी भर कर आशीर्वाद दिए। “जुग जुग जिए सीता राम की जोड़ी, तेरा सुहाग बना रहे, अहा! तेरे भाग खुल गए री बिट्टो! अहा कैसी ठंडक सी पड़े है कलेजे में… वरना हूक उठा करे थी। सबेरे से चकरघिन्नी सी लगी रहा करे थी… घर का काम, चूल्हा चौका, नौकरी और फिर सबकी चाकरी। अब तो संच पद गई हियरा में। अब भगवान उठा भी ले तो कोई मलाल नहीं। “मन ही मन हंसी थी आरती।” भगवान जब उठा ही लेगा तो मलाल कैसे और किससे करेगी दादी?….. पर दादी का तो बरसों का गुबार निकला चला जा रहा था।

“तेरी चाची ने चाहे जित्ते भी बैर निकाले हों, पर लड़का तो सोने सा ढूंढ लाई। अहा! देखकर जी अघा गया। भगवान ने आखिर मेरी सुन ही ली। में तो रोज हाथ जोड़कर भगवानजी से कहा करूं थी कि हे परमात्मा, मेरी बिन मां, बाप की लाडो का तू ही खेवनहार है… तू ही इसकी नैय्या पार लगाना …तो सुन ही ली उन्नें।

आरती फिर मुस्कुरा उठी। “ये दादी भी खूब हैं… इनकी समझ से शादी हो गई तो बस कल्याण सही हो गया, बाद में नैय्या चाहे डगमगाती ही क्यों न रहे।

लेकिन दादी के उत्साह का तो कोई अंत ही नहीं था। अतिरिक्त उत्साह से आरती को अपने पास खींचकर, उसकी ठोड़ी उठाकर, उसे निहारती दादी, मानो उसकी हमजोली बन गईं थीं। “क्योंरी, पसंद है न दूल्हा?” और फिर उसके उत्तर का इंतजार किए बिना घोड़ी, बन्ने गाने लगीं थीं “मोती महल से आया मेरा लाल बना”…

आरती किसी भी तरह से कोई उदासी मन में नहीं लाना चाहती थी, आखिर यही तो वह मंत्र था जो दादी ने उसे दिया था, हर हाल में तृप्त रहने का। वह यह सोच कर मन ही मन मुस्कुरा उठी थी कि मोतीमहल से बन्ना आया भी तो कहां?….किराए के दो कमरे वाले क्वाटर में। एक कमरा चाचा-चाची का, बाहर वाला कमरा दिन भर दिन भर बैठने, उठने, बच्चों के पढ़ने के काम आता और रात में चाचा, चाची के बच्चों के सोने के। दादी, पोती रसोई के एक हिस्से में सिमट कर, रह लेते। उस सीमित छोटी सी परिधि ने उम्र के बरसों के अंतराल को मानो पट दिया था और वे सारे रिश्तों की दलहीज लांघ कर, एक दूसरे के राजदार बन गए थे।…. सुख, दुख के साथी। चाची उन दोनों में किसी को भी न छोड़ती, और आरती के पीछे तो वे हाथ धोकर पड़ी रहती। कभी वे आरती को मां, बाप को खा लेने वाली कलमुही कहती, कभी घर में आया राहु का प्रकोप या कभी खोते भाग वाला खोटा सिक्का। आरती के पिता अपने छोटे भाई की अपेक्षा बहुत ऊंचे ओहदे पर थे, मां पढ़ी लिखी, समझदार। दादी बड़े बेटे बहू के पास ही रहती, बेटे के ओहदे के कारण नहीं, बहू के मीठे स्वभाव के कारण। किंतु एक कार दुर्घटना ने दादी, पोती की दुनिया ही बदल डाली। चाची को तो मौका मिल गया,  उन पर निरंतर प्रहार करने का, अपनी खुन्नस निकालने का। वे बार, बार उस घड़ी को कोसती, जब वे इस घर की छोटी बहू बनकर आईं थीं। पहले से ही जेठानी को लेकर जमान में भड़ास थी, अब मौका भी मिला, साथ ही अतिरिक्त जिम्मेदारी उठाने का बोझ उन पर और हावी हो गया। पर आरती, दादी के अमोघ कवच के सहारे दिनोदिन निखार पाती गई, बढ़ती गई। आरती को देखकर, चाची का तन, बदन सुलगने लगता। अपनी तरह अपनी बेसलीकेदार बेटियों के सामने, निखार पाती आरती को देखकर वे जलभुन जाती और उसे प्रताड़ित या अपमानित करने का कोई मौका न छोड़ती। जब तब वे आरती की दुखती रग न छेड़ देती, यह कह कर कि “न  जाने किस मनहूस घड़ी में ये खोटा सिक्का मेरे पल्ले पड़ गया, न काम का, न काज का, मन भर अनाज का।”

ऐसे हर  मौके पर दादी के आंचल की छांह दिलासा देता रहा है उसे। दादी, आरती के दुखी मन पर शब्दों का ऐसा मरहम लगातीं कि चाची के सारे वार धूमिल पड़ जाते। “लाडो, तू तो मेरी हीरे की अनमोल कनी है। हीरे की परख तो पारखी ही जाने है…. देखना जब सात समुंदर पार से मेरी बन्नो का राजकुमार आएगा, मेरे कलेजे में ठंडक पड़ जावेगी। इनकी आंखें भी तभी खुलेगी हां।”

……और अब दूसरों की आंखे नम हों न हों, दादी के अंदर मानो समुंदर बहने लगा था। “देखा चल गया न खोटा सिक्का। मैने कही थी न कि तेरा राजकुमार आएगा, तुझ पर जान निछावर करेगा….तेरे दुख के दिन बीत गए री बिट्टो!” कहते कहते दादी ने गले से लगा लिया था आरती को। आरती के दुख के क्षणों की गुनगुनी धूप ही दादी, उसकी ढाल बन संबल देने वाली दादी ,आज सावन भादो की झड़ी बन गई थीं।

क्या कर रही होगी दादी ….उस रसोई में अकेले? सुबह सुबह चार बजे पानी आ जाएगा…… कौन भरेगा पानी? दादी की नींद न खुले इसलिए वह नल पर एक लंबा कपड़ा बांध कर लटका देती थी और तड़के ही झटपट बेआवाज़ सारा पानी भर डालती थी।…अब क्या होगा दादी का? ठंड में तो दादी के हाथ, पांव भी नहीं चलाते, उसे तो बत्ती का स्विच भी नहीं दिखता… कहीं ठोकर न लग जाए… कहीं गिर न पड़े! सोच, सोच कर आरती का जी न जाने कैसा कैसा हो गया….. और जा दादी को सच्चाई पता चलेगी तो ….. सचमुच में जीते जी मर जाएगी दादी!

अचानक पलंग से उठ पड़ी आरती और अपनी अटैची खोल कर एक पुराना सा बटुआ निकाल लाई और वहीं बिस्तरे पर उसे औंधा उलट दिया। खनखनाते हुए कई सारे सिक्के चारपाई पर फेल गए। रूपये, अठन्निया….एक, एक सिक्के का इतिहास जानती है आरती।

ये वाली अठन्नी तब की है जब पहली बार नानी को देखा था आरती ने। नानी यानी चाची की अम्मा। भोली निष्कपट आरती “नानी नानी” कहती न अघाती और नानी के चारों ओर चकरघिन्नी सी चक्कर काटती। भाग, भाग कर उनका सारा काम करती, मुंह जोहती रहती कि उन्हें किसी चीज को जरूरत न हो और भी भागकर उस काम को सबसे पहले पूरा कर दे। आरती को इस बात का मलाल भी न होता कि नानी जब भी कोई खाने की चीज बच्चो को देती हैं तो उसे सबसे कम या बचाखुचा देती है।… जहां और बच्चों पर लाड, प्यार लुटाती हैं, आरती से सीधे मुंह बात भी नहीं करती। उस दिन जब रसोई की दहलीज पर खड़ी टुकुर, टुकुर देखती आरती के हाथों में नानी ने जब ये वाली अठन्नी पकड़ाई थी, आरती को जैसे स्वर्ग मिल गया था।” अब तो वह भी खट्टी मीठी गोलियां खरीदेगी, जब अनिता और सुनिता वो गोलियां चूसती हैं, तो कैसा पानी सा आता है मुंह में। उन गोलियों को दादी भी चूस सकती है।… गोली चूसने में दांतों की जरूरत जो नहीं होती। …. और फिर उस दिन आरस्तर भागकर पहुंच गई थी, मोती परचून वाले की दूकान पर। मोती ने अठन्नी ली, उलट, पलट कर देखा, और वापस दे दिया आरती के हाथ में, “बिट्टो! ये तो खोटा सिक्का है… इससे कुछ नहीं आ सकता, कहते हुए मोती काका ने एक गोली भी पकड़ा दी, आरती के हाथों में। गोली वहीं वापस रख आरती उलटे पांव वापस आकर, पहली बार जार, जार रोई थी आरती। कारण जानकर चाची ने और जली, कटी सुनाई, “निगोड़ी ने आसमान ही सिर पर उठा लिया। जरा सी बात नहीं हुई और मचा दिया तूफान। अरे, खोटे को खोटा सिक्का मिला तो क्या अनर्थ हो गया? तू तो है ही ऐसी, खोटे सिक्के की तरह, न काम की न काज की, मन भर अनाज की”।

अपमान के घूंट पी जाना उस छोटी उम्र से ही जान गई थी आरती। लेकिन दादी भी खूब थी, चाची के हर प्रहार का ऐसा हल निकालती कि तिलमिला कर रह जाते थी चाची। वे समझ ही न पाती थी कि इतनी प्रतारणा के बावजूद इनके चेहरे बुझे हुए क्यों नहीं हैं, मालिन क्यों नहीं हैं…. विषाद की एक रेखा तक क्यों नहीं झलकती इनके चेहरों पर? किंतु दादी न मालूम जादू की कौन सी घुट्टी पिलाती थीं आरती को कि वह अविचलित सारे व्यंग बाण सह जाती थी। उस दिन भी दादी ने खटाई, नमक और चीनी मिलाकर बनाया चूर्ण उसे खिलाया और बताया, “अरे पगली! ये ही सवाद होवे है खट्टी, मीठी गोलियों का। बस लाल, पीला रंग लगाकर भरमावे हैं, ये चूरन वाले। आरती के हर दुख का ऐसा तोड़ निकालती थीं दादी कि उनके छोटे छोटे टोटके चमत्कृत कर देते थे उसे। आंखें छलछला आईं आरती की। कभी, कभी वह सोचती थी कि…. शायद दादी के पास कोई अनोखा कुतुबनुमा है,…. हर बार सही दिशा खोज निकालती हैं वे।

इसके बाद नानी ने बढ़ा दिया था अपना रेट। अब उन्होंने अठन्नी के बदले रुपैया देना शुरू कर दिया था। आरती ने एक बार और आजमाया था नानी के सिक्के को। इस बार वह फिर गई थी मोती काका की दूकान पर, किंतु खट्टी मीठी गोली लेने के लिए नहीं बल्कि दादी के लिए खांसी ठीक करने वाला काढ़ा लेने। मोती ने अंगूठे पर उंगली चढ़ा कर, उस पर सिक्का रख, टन्न से बजाकर उछाला ऊपर। सिक्का कुछ पिटी सी आवाज के साथ उछाल कर, कुछ कम खनक से जमीन पर गिरा। मोती ने सिर हिलाकर “खोटा है” भर कहा और आरती सिक्का उठा, बिना कुछ कहे सुने, उलटे पांव लौट आई। आरती लाख छिपा ले पर दादी के पास न मालूम कौन सा मंत्र था कि वे आरती का चेहरा देखते ही भांप जाती थीं कि कुछ न कुछ गड़बड़ है। उस दिन भी आरती का फक्क सफेद चेहरा देखते ही दादी भांप गई थीं कि कोई तो बात थी जो आरती के चेहरे में लिखी थी। …. फिर खोद, खोद कर असलियत उगलवा ही ली थी दादी ने। .. और फिर सारी बात को यों उड़ा दिया जैसे कुछ हुआ ही न हो। दादी जब अपने पोपले मुंह से हंसती, गालों पर गड्ढे पड़ते और आरती को बड़ा मजा आता। उस दिन भी दादी खूब हंसी थीं और बोलीं थीं, “बुढ़ापे में तो लोगों की जुबान कटोरी हो जावे है, उन्हें मिसरी मलाई खिलावे हैं और तू मुझे पिलावेगी काढ़ा, कड़ुआ सा काढ़ा?…. सोच सोच के भी उबकाई आवे है”, बुरा सा मुंह बनाया दादी ने। फिर अपने प्रति आरती की मनोभावना को जानकर द्रवित हो गई थीं दादी और उसे गले से लगा लिया था,” पगली! तू मेरी फिकर क्यों करे है? पर…. तू काढ़े से अच्छी चीज भी तो पीला सके है, है कि नहीं?” फिर आरती की प्रश्नसूचक आंखों को देखकर मुस्कुरा कर बोली थीं दादी, अरी, यूं टुकुर, टुकुर क्यों देखे है? अरे बिट्टो! तू पानी में तुलसीजी की पत्ती डालकर, थोड़ी कुटी काली मिर्च डाल और फिर दल दीजो रत्ती भर गुड़….. बस छू मंतर हो जावेगी खांसी। “सचमुच दादी की खांसी गायब हो गई थी इस नुस्खे से।

….. खैर… नानी उसके बाद भी आती रही, आरती के हाथों सिक्के पकड़ाती रही और आरती उन सिक्कों को जमा करती रही। एक दिन दादी के पूछने पर कि वह फेंक क्यों नहीं देती उन सिक्कों को, आरती ने सिर झुकाए, आंखे नीचे किए ही कहा था, “मैं फेकूंगी तो कोई और उठाएगा और फिर नानी की तरह किसी को धोखा देगा और मेरी तरह दुख पाएगा।”,….. सन्न होकर देखती रह गई थी दादी।” इत्ती सी जान, और ये समझ। भगवान बचाए इसे बुरी बलाओं से” और फिर दादी ने ढेरों टोन टोटके कर डाले थे, आरती को बुरी बलाओं से बचाने के लिए। भीतरी बलाओं के लिए तो दादी थीं ही एक अभेद्य कवच के समान। दादी ने ही यह पुरानी मखमली थैली दी थी आरती को। इसी थैली में संजो कर रखती गई थी आरती वे सारे सिक्के।….. फिर तो दादी, पोती के मनोरंजन का साधन हो गया थे वह बटुआ। दोनो एक, दूसरे के सिर से सिर जुड़ाए, सिक्के फैलाकर, पुराने लम्हों को खींच लाते थे अपने पास और फिर खूब हंसते। अनजाने में, अपरोक्ष रूप से हर विषमता मीन हंस कर जीने का मंत्र दे डाला था दादी ने। ये तो दादी ही थीं जो हमेशा आरती का हौसला बुलंद किए रहती, “अरी बिट्टो! कीचड़ में ही कमल खिले है,…. तू भी सबके बीच कमल सी ही दिखे है”, कभी कहती, “पता है सोने में निखार कैसे आवे है? सोना तो तप-तप कर ही निखरे है…. और मेरी सोनचिरैया तो दिन ब दिन निखारती जावे है”।

दादी की हौसलपरस्ती और हर चीज का सकारात्मक। पहलू ढूंढ निकालने की विशेषता का ही फल था कि आरती हर काम में अव्वल होती चली गई…. पढ़ाई, लिखाई, घर का काम, गाना, बजाना, खेल कूद, कुछ भी न छोड़ा उसने। वजीफा लेकर पढ़ती रही और बढ़ती रही…. ये अलग बात थी कि चाची वजीफे का एक एक पैसा गिनवा कर रख लेती, “रोटियां मुफ्त में थोड़े ही आती हैं?…. बचपन से पाल पोस कर यों ही नहीं बड़ा किया है”।

” खुद तो चले गए, हमारे सुर डाल दी बला। वर ढूंढना, दान दहेज जुटाना सब हमारे मत्थे।” कोई भी मौका न छोड़ती चाची।

“बिट्टो! जिसके पास जो होगा वोई तो देगा ना वो? जिसके पास कड़ुआहट हो, वो कड़ूए बोल ही तो देगा। तेरे पास मिठास है तो तू मीठे बोल बोल। बस इत्ता सा हिसाब है ये”, दादी जब यह कहती, तो चकित रह जाती थी आरती दादी के अनुभूत गणित की क्षमता से। जिंदगी का जमा, बाकी कितनी सरलता से समझ और समझा लेती थी दादी। चमत्कृत होकर रह जाती थी आरती दादी के अनोखे दिशा बोध से…. और मुस्कुरा पड़ती थी अपने बचपन की उस कल्पना पर, जब वह दादी के पास किसी जादुई कुतुबनूमा होने की बात सोचा करती थी, जो हर बंद राह की दिशा ढूंढ निकालता हो। दादी के पास कुतुबनुमा हो न हो, भावों का अथाह समुंदर था….. अभावों के बीच रहकर भी, भावों से भरी, धन धान्य से परपूर्ण… ऐसी ही थी दादी।

अभावों की बात से याद आया आरती को, जब कॉलेज की संगीत सभा के लिए बड़ी मुश्किल से चाची के हाथों एक रुपया झड़ा था, रिक्शे के लिए पचास पैसे जाने के और पचास पैसे आने के। कॉलेज पहुंच कर, रिक्शे वाले से वापस लिए पचास पैसे मुट्ठी में दबाए ही भीतर की ओर भाग चली थी आरती। आरती के मधुर कंठ से गूंज उठा था सारा प्रांगण। ढेरों तालियों, शाबाशियों, प्रसंशाओं सहित चांदी पा पदक लिए आरती जब रिक्शे पर बैठी, मानो आसमान में उड़ रही थी। घर पहुंच कर, रिक्शेवाले के हाथों पचास पैसे रख कर, दादी को सब हाल बताने की उतावली में भीतर की ओर भाग रही थी आरती कि रिक्शे वाले की आवाज सुन कर स्तब्ध कड़ी रह गई, “बिटिया! हम गरीब से भी बेईमानी?….ये लो अपना खोटा सिक्का”।

आरती शर्म से पानी पानी हो गई थी, साथ ही यह चिंता कि अब एक और अठन्नी मांगनी पड़ेगी चाची से…. और फिर से सुनने पड़ेंगे ढेरों उलाहने,…. ताने।…. पर रिक्शे वाले को मजदूरी तो देनी ही पड़ेगी। ….. पर सिक्के के खोटे निकलने की बात बताऊंगी तो अपने खोटेपन के भी उपलंभ सुनने पड़ेंगे सोचकर, पहली बार झूठ बोलना पड़ा था आरती को।

“अठन्नी हाथों से गिर गई, रिक्शे वाले को देने के लिए पैसे चाहिए”, सुनते ही चाची ने जीभर भड़ास निकाली।

” अठन्नी गिर गई?…बेहोशी में रहती है हर समय। यहां पैसे का पेड़ लगा है न? जब चाहे हिलाकर, बटोर लो।…. अरे गिर गई थी अठन्नी, तो पैदल नहीं आ सकती थी क्या? पांवों में माहवर लगी थी, घिस तो नहीं जाते न पांव?…. पचास पैसे जरूर दिए चाची ने पर धाराप्रवाह अनर्गल प्रलापों का सिलसिला चलता ही रहा….. शायद लंबे समय के बाद मौका मिला था चाची को।

दादी के मानने पर मानो सब्र का बांध टूट गया और टल टल करती बह चली आंसुओं की धारा। पल्ले से आंसू पोंछती दादी ने बात पलटी, “अरी! इनाम विनाम तो दिखाया नहीं तैने”।

” ये रहा इनाम” कहकर, मुठ्ठी खोल दी आरती ने। खोटी अठन्नी मानो मुंह चिढ़ा रही थी। पूरी बात जानकर मुस्कुरा उठी थी दादी,”मैं समझूं वो रिक्सा वाला चाची का मामा रहा होगा”।

” चाची का मामा?” चौंक उठी थी आरती।

अरे पगली! नानी का भाई… तो हो गया ना चाची का मामा। दादी के पोपाले मुंह पर परहास की वही चिरपरिचित छटा चमक उठी थी। आरती खिलखिलाकर हंस पड़ी थी। बदली छंट कर मानो धूप छिटक आई हो। फिर तो “चाची का मामा” एक ऐसा गुप्त संबोधन बन गया था, जिससे आने वाले कई अवसरों पर दादी, पोती हंस लेते थे।

दादी का यह गुण आरती भी खूब सीख गई थी। बोझिल बात के साथ कोई हल्का फुल्का मजाक या चुटीली सी बात सोचकर वह मन का मलाल धो डालती थी….. पर… यह इतनी बड़ी बात…. इतना बड़ा धोखा? ….. क्या करे आरती? कहां जाए?…. किसे सुनाएं अपनी विपदा?….कहां पीटे अपना सिर?

आरती को याद आया पिछले माह नानी का आना और वह भी एक खास प्रस्ताव के साथ। यह प्रस्ताव था चंद्रकांत की मां का। चाची और नानी में न जानें क्या खुसर फुसर होती रही और फिर दो दिन बाद ही आ गईं चंद्रकांत की मां। आरती तो थी ही ऐसी कि जो देखे उसे भा जाए…. उन्होंने आरती को गले से लगा लिया, ऐसे कि जैसे अपना सगा कोई मिल गया हो। चंद्रकांत की बात चलाने पर जैसे ही उन्होंने कुछ कहना चाहा था, नानी बोल पड़ी थीं, “अरे बहिना! तुम्हें कुछ भी कहने की जरूरत नहीं। उसके बारे में कुछ पूछना क्या? राजकुमारों जैसा रूप, धन धान से भरा घर, जमीन, जायदाद…. हमारी आरती तो रानी बनेगी रानी। अब कुछ कहने, सुनने को बचा ही क्या है? आरती से किसी ने कुछ पूछा ही नही। चंद्रकांत की मां के इस आश्वासन पर। कि आरती नौकरी करे तो ठीक, ना भी करे तो ठीक, था बात आरती को भा गई।…. आरती ने मानो अपनी मौन स्वीकृति दे दी। दादी को भी चंद्रकांत की मां बहुत भली लगीं। जाते जाते वे बात पक्की करने के लिए अपने गले का हार आरती। को पहिना गई।

” भाग खुल गए आरती के। पांच तोले से कम का न होगा।” ईर्ष्या से बोली थीं चाची।

“अरे क्या नहीं है उनके यहां? …. अपनी कोठी, जमीन,जायदाद, सवारी, सरकारी नौकरी, उस पर से गऊ जैसा स्वभाव। नौकर, चाकर सबकुछ। कोई ऐब भी नहीं।…. और मां तो जैसे देवी का रूप। पूरी भक्तन है, ऊंचे बोल तो किसी से बोलती ही नहीं। न परिवार का झंझट न जिम्मेदारी।”

उस बार जाते समय आरती की मुट्ठी में चमचमाते दो सिक्के भी रख गई थी नानी। उनके जाने के बाद आरती ने उंगली को अंगूठे के ऊपर रखकर, उसके ऊपर सिक्का रखकर, टन्न सा खूब बजाया था।

नानी की नजरों का नंबर बदल गयो, दीखे है”, हंसीं थीं दादी।….. वैसे तो दादी की हर हंसी गुनगुनी धूप की याद दिलाती थी पर उस दिन उनकी हंसी के पीछे लहलहा रहा था स्नेह और संतोष का अथाह सागर। स्नेह के उस ज्वार में दादी, पोती दोनो डूब गए थे, ऊपर तक, आकंठ।

उसके बाद तो दिन मानो पंख लगाकर उड़ रहे थे। चंद्रकांत की मां जल्दी से जल्दी शुभ काम कर देना चाहती थीं। उन्हें आरती के अलावा और कुछ भी न चाहिए था…. साक्षात लक्ष्मी जो मिल रही थी।

” जैसे बिना किसी पर बोझ बने पढ़ लिख गई, वैसे ही बिना परेशानी के घर बैठे दूल्हा भी मिल गया। लाखो में एक बिटिया तो जोड़ी का दूल्हा भी।…. दादी ने सोचा।…. और फिर शादी की रस्में, फेरे, विदाई सबकुछ हो गया।

ससुराल पहुंचते ही सास ने कलेजे से लगा लिया था आरती को। एकांत मिलते ही सास उसे खींच लाई थी अकेले कमरे में।

“बेटी तू तो साक्षात लक्ष्मी है, जैसा रूप, वैसा ही गुण और वैसे ही आदर्श विचार। भगवान तुझे खूब खुशियां दे….. तूने इस मां की जनम भर की साध पूरी कर दी। तूने मेरे बेटे की जिंदगी संवार दी। तूने हमारे सारे अरमान पूरे कर डाले। तेरी जैसी लक्ष्मी ही चाहिए थी इस घर को, जो चंद्रकांत के गुणों की पारखी हो, उसकी कमी को अनदेखा कर, उसके भीतर के इंसान को समझ सके”। कुछ अचकचा सी उठी थी आरती यह सब सुनकर। आरती का चेहरा देखकर शायद उसकी सास को महसूस हुआ कि वे शायद कुछ गलत कह बैठी हैं…. शायद कुछ ऐसा कह गईं है, जिसके लिए आरती तैयार न थी।

” तो क्या तुम्हारी चाची ने तुम्हें कुछ नहीं बताया?….. क्या तुम चंद्रकांत के बारे में कुछ भी नहीं जानती?…. मैने तो तुम्हारी नानी और चाची को सब कुछ बता दिया था। चंद्रकांत ने भी हमेशा इसी बात पार बल दिया था कि शादी वह इसी शर्त पर करेगा जब लड़की सब सच्चाई जानकर शादी के लिए हामी भरेगी।…. और जब तुम्हारी नानी ने यह बताया कि आरती सबकुछ जानकर भी शादी के लिए राजी है और उसका यह कहना है कि इंसान की परख तो उसके गुणों से होती है, शारीरिक कमियों से नहीं, और वो भी ऐसी कमी जो अनायास ही उसके हिस्से में आ गई हो तो मैं तो खुशी से झूम उठी थी।….

 फिर जब तुम्हें देखा तो पाया कि तुम तो सच में अनमोल नगीना हो।…. पर बेटी, क्या तुम्हें कुछ नहीं….

“मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं” इतना भर बोल पाई आरती, फिर ऐसा सा लगा मानो गले में कुछ अटक सा गया हो।

सिर पकड़ कर बैठ गईं थी सास।

” हे प्रभु! ये किस मुसीबत में डाल दिया तूने? …. अब मैं क्या करूं? …. ये तो सरासर धोखा हो गया इस बच्ची के साथ।…. बेटी! मेरी काज अब तुम्हारे हाथ है।” परेशानी और चिंता से गहरा उठीं थीं वे।

“बात क्या है… मुझे बताइए तो सही”, भय उत्कंठा और आतुरता से पूछा था आरती ने।

सास की आंखों से जल की धाराएं बह उठीं थीं।

” बेटी, क्या बताऊं .. चंद्रकांत सुन और बोल नही सकता। लेकिन बेटी, वह इतना गुणी, धीर, गंभीर और खुशमिजाज है कि तुम्हें महसूस ही नहीं होगी कोई कमी। उसके हाव, भाव और स्पर्श की भाषा अद्भुत है…. उसकी सोच अनोखी है, घर, बाहर के सारे काम दक्षता और निपुणता से करता है वह।…. तुम्हें कोई कमी या कष्ट महसूस ही नहीं होगा।

आरती के जनों में जैसे किसी ने पिघला हुआ सीसा डाल दिया हो। “हे ईश्वर…..ये कैसा बदला चुकाया चाची और नानी ने?…. किस जन्म की दुश्मनी निकाली उन दोनो ने?……उसकी किस्मत में सदा के लिए बांध दिया खोटा सिक्का….

फफक फफक कर रो पड़ी थी आरती।

आंसुओं से तार थीं सास की आंखें भी, “काश! कुछ घंटों पहले ये बात खुल जाती तो इतना अनर्थ न होता। अब चंद्रकांत के सामने कैसे सिर उठा पाएंगी वे?…. और आरती की तो वे हमेशा की अपराधिनी बनी रहेंगी, “वे सोच रहीं थीं।…. फिर अनायास ही कुछ निश्चय करके उन्होंने कह,” बेटी! मैने तुम्हें बेटी, सिर्फ कहा भर नहीं है, बल्कि बेटी माना है आज से नहीं, बल्कि उस दिन से, जब तुम्हें पहली बार देखा था। तभी से तुम मुझे एकदम अपनी लगी थी। अब जैसा भी। तुम चाहोगी, वही होगा। अगर बहू बनकर रहना चाहो तो सिर आंखों पर बिठा कर रखूंगी। ….. पर यदि बेटी बन कर रहना चाहो तो भी तुम्हारा अपना घर है। तुम्हें उतनी ही इज्जत और प्यार मिलेगा जो मां के घर मिलता है। ….. में समझ गई हूं कि तुमने किन हालातों में चाची के साथ दिन गुजारे होंगे। … उनका तुमसे यह असलियत छिपाना ही सारी बात साफ कर देता है। उनका जानबूझ कर यह बात छिपाना सारी सच्चाई बता गया है।… पर बेटी, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, चंद्रकांत खुद ही आगे बढ़कर मेरे फैसले का समर्थन जाएगा। वह बेहद सुलझा और ठहरा हुआ इंसान है”।

“मुझे कुछ समय दीजिए”, इतना भर ही कह पाई आरती

“ठीक है, तुम आराम करो। रात काफी हो गई है। चंद्रकांत शायद सो गया होगा। उसे मत जगाना, पर रात तो तुम्हें उस कमरे में जाना चाहिए, केवल दिखावे के लिए…. बस आज भर, ताकि घर की बात घर में ही रहे।…. तुम चिंता न करना, चंद्रकांत आहत, आवाज से नहीं जागता। वह आवाज़ों की भाषा तो नहीं सुन सकता, पर आंखों, स्पर्श और स्नेह की ऊष्मा की भाषा बखूबी जानता है”।

तबसे इसी कमरे में है आरती। अपने विचारों के तानों, बानों में उलझी आरती ने एक एक करके सारे सिक्के उसी झोली में वापस डाल दिए।…. नानी और चाची के दिए खोटे सिक्के तो समेट दिए, ….. पर इस खोटे सिक्के का क्या करे आरती?…. एक निराशा भरा शून्य व्याप्त कर गया आरती के मन, मस्तिष्क में।….. ऐसा अनचीन्हा शून्य, जिसमें अंधकार के सिवाय कुछ भी नहीं सूझता। दिशाहीन आरती की मानो सब संवेदनाएं, भावनाएं मर गईं थीं, उस क्षण।

“पर इस पूरे प्रकरण में चंद्रकांत का क्या दोष?….उसकी मां का भी क्या दोष? …. सारी उम्र वह चाची की आंख की किरकिरी बनी रही, फिर भी दादी और आरती ने पल भर के लिए भी नहीं सोचा कि यह शादी भी उनकी शतरंजी चाल का एक हिस्सा होगी। आरती आज तक चाची की हर चाल को मात देती आई थी, आज मुंह की खा ली आरती ने।…. ऐसा कैसा बैर निकाला चाची ने?

खुली आंखों से छत को ताकती आरती को लगा जैसे अचानक ही छत पर चाची का चेहरा उभर आया हो और व्यंग्य व विद्रूप से उसे चिढ़ाता हुआ कह रहा हो, “खोटी को क्या मिलेगा? …. खोटा ही ना?”

उसे लगा मानो आज जीत गई हो चाची। आज तक दादी, पोती के अभेद्य चक्रव्यूह में झांक तक न पाई थी चाची…. पर आज तो सबकुछ नष्ट भ्रष्ट हो गया। दादी, पोती अब तक चाची के सभी बाणों को वापस कर देते थे, चाची की हर व्यगोक्ति में परिहास खोज लेते थे, हर कुटिलता को सरलता से हंसकर झुठला देते थे, उनकी नकारात्मक बातों में कहीं न कहीं से सकारात्मकता खोज लेते थे…. पर आज…. सब कुछ स्वाहा हो गया,… बिखर गई, टूट गई आरती। वह करे भी तो क्या करे? कहां जाए … कहां समाए? धरती फट क्यों नहीं जाती? भूकंप क्यों नहीं आता? बस बेबस मन, ज्वालामुखी की तरह सुलगता जाता है…

तभी आरती को लगा जैसे चाची के चेहरे के ऊपर उभर आया हो दादी का चेहरा…. पोपके मुंह वाला चेहरा, धूप सी हंसी वाला चेहरा, गुनगुनी धूप के आगोश में आरती को अभेद्य कवच की तरह समेट लेने वाला चेहरा, मानो कह रहा हो, “अरे पगली! तू इत्ता दुख काहे मनावे है? क्या जुबान होने से ही सबकुछ हासिल हो जावे है? क्या सुन लेने पे ही सबकुछ मिल जावे है?…. चाची अपनी जुबान कतरानी की तरह चलाती रही…. दुख ही तो पहुंचाया उन्ने। जिस भाषा ने प्यार के दो बोल नहीं बोले, केवल दूसरों का जी जलाया, उस बोली से तो अबोला अच्छा। असली भाषा तो आपसी समझ की होवे है, प्यार की होवे है, एहसास की होवे है। आपस की बातचीत तभी होवे है, जब मन से मन मिले है।…… जो न बुरा कहे, न बुरा बोले, न बुरा सुने, न बुरा सोचे … वही तो है सच्चा इंसान!….. देख आरती देख! चंद्रकांत के चेहरे की ओर देख…. न कहीं छल है, न कपट है, न अभिमान है, न क्रोध है न गुमान। जुबान होवे तो इंसान झूठ बोले, कड़ुआ कहे, गाली, गलौच करे, रोष दिखाए, दूसरों की तौहीन करे…. नीचा दिखाए…. और तू इस बेजुबान की अनदेखी करे? … पगली!”

बदरी फिर से छंट गई थी…. आरती ने जीने का बीजमंत्र पा लिया था। उसे लगा कि उसे एक और कुतुबनुमा मिल गया है…. सही दिशाबोध कराने वाला। पलट कर आरती ने चंद्रकांत की ओर देखा …. भोले शिशु सा, निश्छल, अबोध, मीठे सपनों में खोया,…… दुनिया के विकारों से परे… निर्मल, शांत। उस शांत चेहरे में आरती ने महसूस किया स्नेह की ऊष्मा को। वह एहसास कर रही थी एक नई भाषा का, प्यार की भाषा का। उसने चाहा कि वह जाने स्पर्श की भाषा को….. स्पंदन की भाषा को…. नयनों की भाषा को….. और आरती ने हौले से करवट बदल ली।

             

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