युवा लेखन विमर्श में रवि यादव का कविता पाठ
रवि यादव का जन्म महराजगंज, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने स्नातक की शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय तथा परास्नातक की शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्राप्त की है। वर्तमान में वे लखनऊ विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। उनकी कविताएँ हिंदवी, कृति बहुमत, सदानीरा, इंद्रधनुष, नयापथ आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। ई- मेल : raviyadav7524@gmail.com

गाँव में समय
गाँव की सुबह केवल सूरज के उगने से नहीं होती।
सुबह होती है दुआर बुहारने की आवाज सुनने से।
और दोपहर नहीं होता केवल घड़ी में बारह बज जाने से।
दोपहर होता है सूरज के सीध में आने पर।
जहाँ बच्चे स्कूल से दुपहरिया की छुट्टी में खाना खाने के लिए आते हैं,
रास्ते में महुआ बीनते।
और हथेली के बीच सींक कोंच अनुमान लगा रहे होते हैं
खड़ी दुपहरिया का।
गाँव के बच्चे छाता लेकर धूप से नहीं बचते।
वे छाँव आने पर कस के बांध लेते हैं मुट्ठी
जहाँ उनके ऊपर ठहर जाते हैं नन्हें बादल
छाँव बनकर।
पुरनिया बताते हैं;
चीनी मिल का भोंपू बजने पर
खाना लेकर पहुँचती थीं महिलाएँ
और ट्रेन की आवाज़ सुनकर काम से लौटते थें खेतिहर मजदूर।
शाम होती है
पिता के साईकिल की घंटी की आवाज से।
जहां सुनते ही दौड़ पड़ते हैं नन्हें बच्चे बुनिया
और संतरे वाली मिठाई की चाह में।
कामकाजी महिलाओं,
और किसानों के लिए नहीं होती है फाल्गुन और चैत के महीने में रात
चाँद की रौशनी और पसीने में नहाते
वो करते रहते हैं फसल की कटिया रात भर।
जुगुनुओं की बात कौन करेगा!
जहाँ पेड़ थें
अब वहाँ मकान हैं।
जहाँ जुग्गू चमकते थें
वहाँ अब मरी हुई बल्ब झूलती रहती है।
जुग्गू दिखते ही सलाह दी जाती थी
बंद कर लो कान-
पर हम हथेलियाँ फैलाए, भर लेना चाहते थें पीली रौशनी को पूरा
अपनी मुट्ठी में।
झींगुर के झींगुआने की आवाज़ इतनी तेज थी।
सदैव कौतूहल रहा उसे एक नज़र भर देख लेने की
पूछा करते थें अम्मा से क्या बोल रहा!
फिर कैसे खो गई वो आवाज़ इस शांत आकाश में।
कैसे कट गया वो बईर का पेड़
जो बना रहता था कितने बच्चों के
भुलौना का साधन और
सोहताने का छाँव।
इस भीड़ में उन जुगुनुओं की बात कौन करेगा?
जिनकी पीली रौशनी धीरे धीरे उतर गई पेड़ों से
और खो गई न जाने कहाँ!
