मेघा राठी की उपन्यास “झोले में ज़िंदगी” की अतुल खरे द्वारा पुस्तक समीक्षा


मासूम यादों की सुंदर याद दिलाती, और हमें इस ज़िंदगी की आपाधापी से वापस, कहीं बचपन में ले जाते हुए मेघा राठी जी की नवीनतम कृति है, उपन्यास “झोले में जिंदगी” जिसे समृद्ध पब्लिकेशन द्वारा अत्यंत आकर्षक कलेवर में प्रस्तुत किया गया है । मेघा जी अपने सहज किन्तु सुरुचि पूर्ण लेखन के कारण हिन्दी पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय लेखिका हैं। उनके लेखन की सरलता, आम जन की भाषा शैली सहज बोधगम्य वाक्यांश तथा लेख को सुंदर एवं उच्च साहित्यिक कोटी का दर्शाने हेतु किये जाने वाले विशेषणात्मक शब्दों के अनावश्यक प्रयोग से परहेज उन्हें आम जन का लेखक बनाता है। उनकी साहित्यिक उपलब्धियां पुरुस्कारों एवं प्रकाशित कृतियों की लंबी फेहरिस्त है जो उनकी सहजता को और भी गरिमामय बनाता है।
झोले में ज़िंदगी’ एक ऐसी पुस्तक है जिसे मात्र यादों का संग्रह कहना, उसके दायरे को सीमित करना होगा । यह पुस्तक पाठक को उसके बचपन में ले जाकर खट्टी मीठी यादों की गलियों में आँख मिचोनी के लिए छोड़ देती है और वे यादें पाठक को उन गलियों से गुजरते हुए सकारात्मक यादों से मिलवा कर एक खूबसूरत खुशनुमा एहसास दे जाती है और पाठक सकारात्मक ऊर्जा से भर उठता है। “झोले में ज़िंदगी”, उपन्यास जीवन के विविध रंगों को समेटे हुए कृति है।
सभी के जीवन में बचपन वह समय होता है जिसे हर कोई दोबारा जीना चाहता है और सबसे ज्यादा यादें भी जीवन के उसी सुनहरे बीते हुए कल से जुड़ी होती हैं। प्रस्तुत कथानक, रोचकता के साथ बालमन एवं बाल मनोविज्ञान की गहराई से पड़ताल करता है। बाल मन की जिज्ञासायेँ, बाल सुलभ उत्कंठा, व प्रतिक्रियायेँ पात्रों के माध्यम से रोचकता के संग सुंदरता से कथानक में पिरोई गई हैं। कथानक में यादों के माध्यम से दिखती हैं अलग-अलग पात्रों के गुजरे पलों की कहानी, उनके जिंदगी से जुड़े खट्टे मीठे एहसास, उनके तजुर्बे जिन्हें यूं सँजो रखा है मानो चॉकलेट के चमकीले रैपर्स हो, ऐसी ही यादें है जिन्होंने इस उपन्यास को सजाया है।
प्रस्तुत उपन्यास यादों का वह गुलदस्ता है जिसमें बचपन की मासूमियत, युवावस्था की कच्ची मोहब्बत से जुड़ी भूलें, और फिर उम्र बढ़ने के साथ हासिल तजुर्बे सब एक साथ सजाए हुए हैं। अक्सर हम अपनी ज़िंदगी की भागदौड़ में उन छोटी-छोटी खुशियों को और उनसे जुड़ी कुछ खट्टी मीठी यादों को पीछे छोड़ देते हैं जिन्होंने हमें गढ़ा होता है। मेघा राठी जी का उपन्यास “झोले में ज़िंदगी”, उन्हीं यादों की एक ऐसी पोटली है, जिसे खोलते ही पाठक को अपने बचपन की सोंधी महक आने लगती है। यादों का यह गुलदस्ता अमूमन हर किसी की ज़िंदगी में होता हैं जिसे हर कोई ता उम्र सँजोता संभालता है, कभी कभी गुलदस्ते में उन फूलों को सहलाकर फिर एक बार उन पलों को जी लेता हैं और उनमें से कुछ यादें उन खशनुमा पलों को मानो पुनर्जीवित कर एक नई ऊर्जा से भर देती हैं वहीं कुछ कड़वी यादें हमें जमाने की सच्चाई और चेहरे पर चढ़े नकाबों के संग दोहरी ज़िंदगी जीते लोगों के विषय में भी ताकीद कर जाती हैं।
कहानी की सूत्रधार कहें अथवा कथानायिका एक छोटी बच्ची है जिसकी बाल सुलभ जिज्ञासा और निश्छल चाकलेट प्रेम से यह कथानक प्रारंभ होता है। यह प्रेम केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, वह बच्ची भी आम बच्चों की ही तरह चॉकलेट के चमकीले रैपर्स को सहेजकर रखती है। प्रारंभ में कथानक सम्पूर्ण विस्तार के संग किन्तु तनिक मंथर गति से बढ़ता है पर ज्यों ज्यों कहानी के पृष्ट पलटते जाते हैं रोचकता एवं गति दोनों ही बढ़ते हैं। बात महज चॉकलेट की न होकर उस से जुड़ी एक बच्चे की मानसिक अवस्था, उसकी चाहतों एवं उसके प्रयासों की है उसके विकास के संग आते उसके जीवन के परिवर्तनों को समझने के लिए आवश्यक ज्ञान की है, एवं अत्यंत सहज कथानक के मध्यम से लेखिका ने तरुणी, किशोर एवं युवा होती बच्चियों हेतु विशेषकर उनके अभिभावकों हेतु व्यापक एवं अनुकरणीय संदेश दिया है।
लेखिका ने इन चॉकलेट रैपर्स को ‘यादों’ का प्रतीक बनाया है, यथा रैपर के भीतर की चॉकलेट खत्म हो जाती है लेकिन उन रैपर्स की चमक बनी रहती है, वैसे ही जीवन की अच्छी बुरी घटनाएं बीत जाती हैं पर उनकी अछि बुरी यादें हमेशा बनी रहती हैं। चॉकलेट से जुडने का यह अर्थ कदापि नहीं है की यह उपन्यास केवल मीठी यादों का संग्रह है, कथानक के मध्यम से लेखिका हर कदम पर समाज एवं विशेषकर बच्चियों को आगाह करती प्रतीत होती हैं उस जाल, से जिसमें लड़कियों को प्यार के जाल में फंसाकर उनका शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता है, और कम उम्र की लड़कियां बहलावे में आकर अपना सब कुछ खो देती हैं तथा इस धोखे अथवा छलावे एवं प्रताड़ना के बाद भी वे समाज के डर से अकेलेपन एवं अवसाद की शिकार हो जाती हैं।
कथानक एक मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के इर्द-गिर्द बुना गया है एवं कहानी अपनी प्रस्तुति तथा घटनाक्रम के चलते वास्तविकता के अत्यंत करीब जान पड़ती है। लेखिका ने सुंदर विषय को अत्यंत रोचक विस्तार दिया है,यादों को शब्द रूप में लाने की कल्पना उनकी रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता को दर्शाती है तथा कथानक की इस सहज सरल विशिष्टता के चलते प्रारंभ से अंत तक पाठक प्रत्येक पात्र एवं घटना को अपने तथा अपने जीवन के अत्यंत करीब अनुभव करते हुए स्वयं के बीते पलों को जी लेता है।
घटनाक्रम और पात्रों के साथ कुछ सामान्य जीवन की छोटी छोटी घटनाएं, किन्तु उनसे जुड़ी बड़ी बड़ी बाते कथानक को आगे बढ़ती हैं, यथा पिता का स्थानांतरण होना, सहपाठी का मासूम सा प्यार भरा तोहफा, और प्यार भी ऐसा जिसका न कोई इजहार हुआ न ही कोई कुबूलनामा। छोटी छोटी यादें जो समय के साथ पीछे छूटती जा रहीं हैं लेकिन सब इकट्ठी हो रहीं है उस झोले में। नई जगह पहुंचने से जुड़ी यादें पुरानी जगह छोड़ने का दर्द वहीं सबसे प्यारी सहेली से नाराजगी, और फिर लंबे अरसे बाद उसका माफीनामा, नई जगह पर नए दोस्तों का बनना और उनमें से किसी का प्यार का इज़हार, पहले प्यार की पहली चिट्ठी का मिलना, उस वक्त के दिल के हालात का सुंदर मासूमियत भरा वर्णन, शरीर की कंपकंपी, कानों का गरम, और हथेलियों का ठंडा पड़ जाना, फिर उस पहले प्रेम पत्र का सबकी नजर से छुपा कर रखना, सबसे छुप कर बार बार पढ़ना, वो किताबों में रख कर खत पहुंचाना, दोस्तों के संग के बहाने प्यार से मुलाकातें, तो बीच बीच में प्यार की राह में आती छोटी बड़ी मुश्किल, कुछ सच कुछ झूठी अफवाहें, गिले शिकवे, क्या नहीं है इस में जो आम आदमी की ज़िंदगी में पहले पहले प्यार में नहीं होता और फिर किसी का हो जाने के पहले की मन की उलझन, वह हाल सब ऐसे बयान किया है कि पाठक कथानक से जुड़ाव महसूस करते हुए कथानक को अपनी कहानी मान बैठता है। यह निश्चय ही लेखन की अपार सफलता है जब पात्र और पाठक एक हो जाए।
लेखिका ने एक बच्ची के जीवन के माध्यम से समाज के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर किया है। चॉकलेट और उसके चमकीले रैपर्स पूरी कहानी में एक ऐसी याद के रूप में उसके साथ साथ चलते हैं जिनके इर्द गिर्द जीवन की अन्य यादें बसती जाती हैं। जैसे अमूमन सभी बच्चे सुंदर चॉकलेट रैपर्स को सहेज कर रखते हैं, वैसे ही कथानक की नायिका की यादें भी हैं जो समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं अपितु वह उन्हें समय की धूल से बचाकर सहेजती है।
कथानक बचपन से प्रारंभ होकर पहले स्कूल और फिर कॉलेज के दिनों का जीवंत चित्रण दर्शाता है , जहाँ सहपाठियों के बीच की नोकझोंक, स्कूल के छोटे बच्चों की मासूम शरारतें, और कच्ची उम्र के मासूम प्यारको उसी कोमलता से दर्शाया गया है। वहीं मुख्य पात्र की सबसे प्रिय सहेली का अन्य धर्म से होना एवं उस से घनिष्टता, समाज में परस्पर बढ़ती दूरियों के बीच आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक एकता तथा सौहार्द की एक सुंदर मिसाल पेश करता है। बचपन की दोस्ती में आई दरार का वक्त के साथ भर जाना दोनों ही परिवारों के द्वारा उन्हें दिए गए संस्कारों एवं परवरिश का परिणाम है एवं उनकी पुनः मित्रता सुखद है। बचपन की इन यादों को सहेजते हुए, कहानी प्यार के नाम पर होने वाले धोखे और लड़कियों के शारीरिक व मानसिक शोषण के कड़वे सच को भी अत्यंत स्पष्ट रूप में निडरता से सामने रखती है। विशेष तौर पर इस भाग में परिचितों द्वारा जिस प्रकार बच्चों का शोषण का प्रयास किया जाता दिखलाया गया है, वह अवश्य ही पाठकों को जागरूक करने का कार्य करता है।
कथानक में पारिवारिक सदस्यों और सहपाठियों से भिन्न दो किरदार और हैं जिनकी उपस्थिति महत्वपूर्ण है एक तो झुमकी, जिसे मात्र एक किरदार कहना उसके चरित्र एवं उपस्थिति को पूर्णतः परिभाषित नहीं करता वह मात्र प्रेम में ठगी गई स्त्री की कहानी की पात्र नहीं है बल्कि वह समाज के एक विशेष मानसिकता से पीड़ित, और चेहरे पर सभ्य एवं कुलीनता का नकाब लगाए हुए लोगों द्वारा सताये गए शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है एवं कथानक के द्वारा लेखिका उन लोगों की वास्तविकता, चेहरों के पीछे छिपी कुटिलता और दोगलापन दर्शाती है। वहीं दूसरा अहम किरदार थर्ड जेंडर बद्री का है जो यूं तो अल्प समय के लिए ही कहानी में है किन्तु उसकी अल्पकालीन उपस्थिति में ही उसका प्रभावी चरित्र, उसके जीवन का घटनाक्रम तथा पारिवारिक सदस्यों का उसके प्रति व्यवहार, समाज के लिए संदेश के रूप में व्यापक अर्थ रखता है।
सम्पूर्ण कथानक में एक विषय जिसने विशेष ध्यान आकृष्ट किया, वह है बच्चों से परस्पर संवाद एवं उचित श्रेष्ट संस्कार देने में अभिभावकों की भूमिका, इस विषय को जिस प्रबलता से उभारा है वह सराहनीय है तथा वर्तमान में घटते परस्पर संवाद की कमी को प्रमुखता से उठाती है। हालिया माहौल में जहाँ पीढ़ीयों के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ रहे है, पुस्तक सहजता से अभिभावको को यह समझाइश दे जाती है कि माता-पिता अपने बच्चों पर सिर्फ नियम न थोपे, वरन हर मुश्किल घड़ी में ढाल एवं मार्गदर्शक बनकर उन के साथ खड़े भी हों। वहीं वात्सल्य से ओतप्रोत घर के बुजुर्गों का बच्चों के प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार एवं सांप्रदायिकता से ऊपर उठती सोच, तथा पड़ोसियों के संग घनिष्ठ सौहार्द पूर्ण संबंध, परस्पर एकता, तालमेल एवं सौहार्द की एक अच्छी मिसाल प्रस्तुत करती है। बच्चों के दिलोदिमाग पर भ्रम, झूठ एवं अंधविश्वास के परिणामों को स्पष्टता से रेखांकित करते हुए उन्हें उस से दूर रखने का इशारा करती हुई तथा आस पास के लोगों के लिए सब बच्चे अपने बच्चे समझने जैसी भावना जो वर्षों पहले हुआ करती थी उसे दिखलाती हुई रचना है हालांकि उस वक्त यह एक सामान्य बात थी जो वर्तमान में विलुप्त है और कहीं न कहीं चुभती अवश्य है ।
कैशौर्य अवस्था और फिर तरुणाई के दौर से गुजरते हुए युवा अवस्था तक पहुचते हुए किसी बालिका की तकलीफों, सोच और समझ को भी बखूबी दर्शाया है, यथा उसके दर्द, फिर वह राह चलते छेड़खानी का हो या फिर बेड-टच का, चंद दूषित मनोवृति के बड़ों द्वारा शराफत की आड़ में दी गई प्रताड़नाका हो अथवा सार्वजनिक स्तलों पर हो रहे उत्पीड़न का, बालिका के जीवन के हर मोड़ से जुड़े हर अनुभव को शब्द देने का सफल प्रयास है। बड़ों के बीच छोटे और छोटों के बीच बड़े होने के दर्द, बहुत सी बातों को नासमझने की उम्र और समझने की कोशिशें।
कथानक में एक गंभीर इशारा बेटे की चाहत की ओर भी है। लड़के की चाह में लड़की के होने पर सारा दोष पत्नी पर मढ़ कर उसे प्रताड़ित करने के अंतहीन सिलसिले की शुरुआत और उसी पड़ोस के परिवार के माध्यम से एक मजहब विशेष में तलाक की बुराई जैसे विषयों को रोचकता से कथानक में शामिल कर प्रस्तुत किया है।
मेघा राठी की लेखन शैली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सरलता लगी। वे अपने कहन में कथानक की आवश्यकता अनुसार क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग भी करती हैं जो एक ओर दृश्य को मौलिकता देता है वहीं कहानी को मिट्टी से जोड़ता है और उसे अधिक अपनी बनाता है। तो दृश्य प्रस्तुति में प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन मात्र पृष्ठभूमि न होकर उसका पात्रों की भावनाओं के संग सुंदर तालमेल भी प्रस्तुत करता है।
निश्चय ही पुस्तक यह स्थापित करती है की परिवार का साथ और जीवन से जुड़ी यादों के चंद खुशनुमा किस्से हमें आगे बढ़ने की ताकत देते है साथ ही एक नई उमंग एवं स्फूर्ति का संचार करते हुए मुश्किल जीवन को भी सरल बना देते हैं। साथ ही यह भी कि उपन्यास प्रत्येक पाठक हेतु एक अविस्मरणिय अनुभव होगा।
पुस्तक विवरण : • समृद्ध पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित, • संस्करण : 2026, • मूल्य : 300
