विशेष विमर्श में अतिला कोतलावल की कविताएँ

अतिला कोतलावल का नाम हिंदी भाषा शिक्षक, दुभाषिया, अनुवादक और प्रेरक वक्ता के रूप में जाना-पहचाना है। श्रीलंका की राजधानी से सुदूर पश्चिम जिले के कुलियापिटिय नामक छोटे शहर से उन्होंने अपनी यात्रा प्रारंभ की। हिंदी भाषा तथा भारत देश के प्रति प्रेम उनकी कविताओं में दिखता है। केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा से हिंदी भाषा में
उच्च शिक्षा के साथ भारतीय उच्चायोग से दो बार शतप्रतिशत छात्रवृत्ति उन्होंने हासिल की। हिंदी भाषा के प्रति प्रतिबद्धता से सन् 2000 में उन्होंने हिंदी संस्थान-श्रीलंका की स्थापना की है और श्रीलंका के हजारों विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ा रही हैं। वे श्रीलंका में विगत 25 वर्षों से हिंदी का प्रचार प्रसार कर रही हैं। उन्हें कई सम्मान मिले हैं और विभिन्न पत्रिकाओं में वे प्रकाशित होती रही हैं। – स्वरांगी साने

कैसे भूला जा सकता है

कैसे भूला जा सकता है
कैसे भूला जा सकता है ।
भारत माँ का अनोखा प्यार
माँ के बच्चे थे बड़े मिलनसार
ढूँढ़ता हुआ हिंदी ज्ञान का सागर
ज्ञान के साथ ही पाया अपार
ख़ुशी से भरा प्यारा-सा संसार

कैसे भूला जा सकता है।

आगरा का ताजमहल दिल्ली का लाल किला
राजस्थान, केरल, कानपुर भी बड़ा निराला
हरिद्वार में बहती गंगा की शीतल धारा मिली
ऋषिकेष का राम झूला , लक्ष्मण झूला
बुद्धगया में भगवान बुद्ध का स्मरण मिला
कैसे भूला जा सकता है ।
लड्डू, बर्फी, जलेबी, रसगुल्ले
सडकों पर गरमा गरम पकौड़े
कचौड़ी, पाँव-भाजी, चाट के चहीते
पेट- पूजा करते गली-गली खड़े-खड़े
मुँह में आता पानी जब ये सब याद आते
कैसे भूला जा सकता है ।
रावण की आँखों जैसे बड़े आँवले
ठेलों पर रखे आम थे पीले-पीले
अँगूर के गुच्छे भी बड़े रसीले
मौसंबी, अनार, गन्ने के जूस निराले
गर्मियों में जान थे तरबूज के हवाले
कैसे भूला जा सकता है ।
नीम के नीचे भी गर्मी भरी दुपहरी को
सर्दी में ठिठुरते हुए बिताए रातों को
भारत की मिट्टी को, गलियों को, गाँवों को
वहाँ की झोंपड़ियों को, बड़े से बड़े महलों को
सुनहरे चेहेरे वाले लोगों को, थके-मांदे लोगों को

कैसे भुला जा सकता है ।
दूर-दूर तक दिखने वाले खेतों की हरियाली
गन्ने के खेतों के किये हमें मतवाली
पीले-पीले सरसों के फूलों की फुलवारी
हवा में तिरखती गेहूँ की बालियाँ सुनहरी
प्रकृति ने कर दिया दिलों को मोहकारी
कैसे भूला जा सकता है ।
भारत माँ, ओ भारत माँ करती हूँ यह कामना
अगले जनम में बन जाऊँ तेरे ही बिटिया
तब तक रहूँ तेरी याद में सदा सदा
कैसे भूला जा सकता है

भारत मेरी यादों का घर

भारत, वह धरती जहाँ मिट्टी की हर महक में है कहानी,
जहाँ बहती गंगा, यमुना, सरस्वती, सजीले गीत पुरानी।
विविधता की गोद में पलता हर सपना,
हर कोना रंगों से सजा, अद्वितीय अपना।
कश्मीर के पहाड़ों में सुकून की हवा,
राजस्थान की रेत में इतिहास छिपा हुआ।

पंजाब के खेतों की सौंधी मिठास,
बनारस की गलियों में मोक्ष का आभास।
दक्षिण के व्यंजनों में मसालों की गंध,
केरल की नदियाँ, बनती सुखद संबंध।
गुजरात का गरबा, बंगाल का प्यार,
पूर्वोत्तर की घाटियाँ, करती हर दिल पर वार।
त्योहारों की चमक, परम्पराओं का मान,
हर पल में झलके भारत का सम्मान।
दीवाली के दीये, होली के रंग,
ईद की दुआएँ, क्रिसमस के संग।
मधुर हिंदी भाषा,सुरों का आधार,
हर शब्द में बसता है कोमल सा प्यार।
सिनेमा की जादू, गीतों का रंग,
भारत की धड़कन, हर दिल के संग।
लोग यहाँ के सीधे-सादे, मगर दिल के अमीर,
हाथ जोड़कर स्वागत, आँखों में नमी और स्नेह का नीर।
रस्में और रिवाज़, परम्पराओं का संसार,
हर कदम पर छू जाताहै दिल का तार।

ताजमहल की मोहब्बत, अजंता की कला,
क़ुतुब मीनार की ऊँचाई, लाल किले की गाथा।
हर कोने में छिपा है भारत का खज़ाना।

हर रास्ता कहता है, आत्मा तक जाना।
विदेशी होकर भी जब मैंने भारत को जाना,
माँ की ममता का अहसास हर कोने में पाया।
गावों की गोद में सादगी का प्रकाश,
मंदिर की घंटियों में माँ का मधुर निनाद।

भारत माँ, तुमने दिया मुझे अपनापन,
अपना बना दिया, भर दिया स्नेह जीवन।
यहाँ की मिट्टी, यहाँ का हर इंसान
जैसे छू रहा हो दिल , हर पल कर रहा पहचान।
तुम्हें प्रणाम, ओ माँ, इस दिल से निकलती है पुकार,
तुमसे ही जुडी है मेरी आत्मा, मेरा संसार।
जो पल बिताए तुम्हारी पावन धरा पर,
भारत माँ तुम बनी सदा मेरी यादों का घर ।

अंतिम निर्णय

अंतिम निर्णय
जब समय की अंतिम सीढ़ी पर
जीवन अपना दीप समेटेगा,
जब स्मृतियाँ भी
अपने नाम भूल जाएँगी,
जब शब्दों का शोर
अनन्त मौन में विलीन हो जाएगा—
तब
न कोई जयघोष तुम्हारे साथ होगा,
न कोई निंदा,

न कोई सम्मान-पत्र,
न कोई इतिहास।
तब केवल तुम होगे…
और तुम्हारे कर्म।
यदि लोग
तुम्हारी करुणा में
स्वार्थ की गंध खोजें,
तो उन्हें खोजने दो।
बादल
इसलिए नहीं बरसते
कि धरती उन्हें धन्यवाद देगी।
यदि तुम्हारी सच्चाई
झूठ के सिंहासन पर बैठे लोगों को
चुभने लगे,
तो सत्य का दीप
और ऊँचा उठा देना।
क्योंकि
अंधकार कभी दीपक को नहीं हराता,
वह केवल
प्रकाश का मूल्य सिद्ध करता है।
यदि तुम्हारे हाथों से
निर्मित संसार
एक ही रात में
धूल कर दिया जाए,
तो अपनी हथेलियों की धूल झाड़ना,
मुस्कुराना,
और फिर से
एक ईंट उठाना।
सृष्टि का इतिहास
विनाश से नहीं,

पुनर्निर्माण से लिखा गया है।
यदि तुम्हारी सफलता
किसी की ईर्ष्या बन जाए,
तो अपने पथ की गति मत रोकना।
सूर्य
हर सुबह
उन खिड़कियों के लिए भी उगता है
जो जीवन भर बंद रहती हैं।

आज जो भलाई करोगे,
यदि कल लोग उसे भूल जाएँगे।
तुम भूलने वालों से
अपनी उदारता का हिसाब मत माँगना।
सुगंध
कभी यह नहीं गिनती
कि कितनी साँसों ने
उसे प्रेम से भरा।
नदी
अपना जल
कृतज्ञता के बदले नहीं बहाती।
वृक्ष
छाया देने से पहले
यह नहीं पूछता
कि यात्री उसका अपना है या पराया।
तुम्हारा धर्म
दुनिया का व्यवहार नहीं है।
तुम्हारा धर्म
तुम्हारा कर्म है।
क्योंकि
भीड़ का न्याय

क्षणिक होता है,
समय का न्याय
धीमा होता है,
पर आत्मा का न्याय
अचूक होता है।
इसलिए—
जब संसार
घृणा चुने,
तुम करुणा चुनना।
जब संसार
छल चुने,
तुम सत्य चुनना।
जब संसार
विनाश का उत्सव बनाए,
तुम सृजन का दीप जलाना।
जब संसार
स्वार्थ में डूब जाए,
तुम निस्वार्थ बने रहना।
क्योंकि
कर्म कभी
भीड़ की भाषा नहीं बोलते।
वे केवल
आत्मा की भाषा जानते हैं।

याद रखना—
अंतिम निर्णय में
तुमसे यह नहीं पूछा जाएगा—
तुम्हारे पीछे
कितनी भीड़ चली?

तुम्हारे नाम पर
कितने जयघोष हुए?
तुम्हारी प्रसिद्धि
कितनी दूर तक पहुँची?
तुमसे केवल इतना पूछा जाएगा—
जब तुम्हारे पास
घृणा करने का अधिकार था,
क्या तब भी
तुमने प्रेम चुना?
जब छल
सबसे सरल मार्ग था,
क्या तब भी
तुमने सत्य को
अपने भीतर जीवित रखा?
जब टूट जाना
सबसे सहज था,
क्या तब भी
तुमने किसी और के लिए
आशा का दीप जलाया?

और तब समझ में आएगा—
मनुष्य का सबसे बड़ा युद्ध
दुनिया से कभी था ही नहीं।
वह तो
हर दिन,
हर क्षण,
अपने ही अंतःकरण के सामने
लड़ा गया एक मौन युद्ध था।
जिस दिन यह रहस्य समझ में आ जाए,

उस दिन
विजय बाहर नहीं,
भीतर जन्म लेती है।
और उसी क्षण
जीवन का अंतिम निर्णय
घोषित हो जाता है—
क्योंकि अंत में…
शेष रहता है केवल—
तुम।
तुम्हारा अंतःकरण।
और तुम्हारे कर्मों का अमर प्रकाश।

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