गुयाना की संस्कृति में निहित भगवान राम : सुनील कुमार सिंह

इस आलेख में लेखक सुनील कुमार सिंह ने लैटिन अमेरिका के गुयाना देश में विस्तारित भारतीय संस्कृति की छबियों को प्रदर्शित करते हैं। वर्षों पहले भारत से गए हमारे श्रमिकों ने वहाँ भारतीयता की जो छटा बिखेरी थी, उसकी चमक आज पूरी दुनिया को चकाचौध कर रही है। भारतीय संस्कृति के नायक-उन्नायक भगवान राम की गुयानावासियों के दिलों में उपस्थिति और वहाँ के पूरे समाज में भगवान राम और रामायण के प्रति आस्था तथा इनके प्रति अटूट श्रद्धा एवं भक्ति का जो मंज़र दिखाई दे रहा है, वह हमें आत्मगौरव से सराबोर कर देता है। पाठक इस आलेख को पढ़कर अपने भारतीय होने पर गर्व करेंगे। – डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र

श्री सुनील कुमार सिंह निदेशक, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR), विदेश मंत्रालय, नई दिल्ली हैं। वर्तमान में वे सम्मेलन एवं संगोष्ठियों, पुरस्कार एवं परियोजनाओं तथा ‘वंदे मातरम्’ से संबंधित देश-विदेश में समारोहों एवं कार्यक्रमों के आयोजन में सक्रिय हैं। वे ICCR की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘गगनांचल’ के कार्यकारी संपादक हैं। इससे पूर्व वे ICCR के क्षेत्रीय निदेशक के रूप में दक्षिण क्षेत्र, बेंगलूरु, भोपाल तथा उत्तर क्षेत्र, दिल्ली विश्वविद्यालय आदि में कार्य कर चुके हैं। सितंबर 2016 से जुलाई 2020 तक उन्होंने भारत सरकार के भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, जॉर्जटाउन, गुयाना में निदेशक एवं राजनयिक के रूप में कार्य किया। भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए वर्ष 1991 से अब तक लगभग 35 वर्षों की सेवा में विभिन्न अनुभागों में कार्य करने का व्यापक अनुभव है। सम्मेलनों के लिए लगभग 20 देशों की यात्रा कर चुके हैं। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में उनके लगभग 16-17 आलेख और दर्जनभर कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। निवास : मेरठ/हापुड़

गुयाना की संस्कृति में निहित भगवान राम

दक्षिण (लैटिन) अमेरिका में स्थित गुयाना भारत के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत निकट तथा महत्त्वपूर्ण देश है। ऐतिहासिक रूप से यह ब्रिटिश गुयाना के नाम से जाना जाता रहा है। लगभग दो शताब्दी पूर्व, वर्ष1838 से अंग्रेज़ों ने गन्ने और धान की खेती के लिए भारत के पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और मद्रास क्षेत्रों से बड़ी संख्या में भारतीय मजदूरों को गुयाना ले जाना शुरू किया। दिनांक 5 मई 1838 को पहली बार भारतीय मजदूरों को कोरेंटाइन क्षेत्र के पाल्मरा गाँव में, बरबीस नदी के तट पर उतारा गया। 1838 से 1917 तक यह प्रक्रिया एक 3 और 5 वर्ष के औपचारिक अनुबंध के अंतर्गत अनवरत चलती रही, जिसे गिरमिटिया समझौता कहा गया और इसी कारण ये भारतीय मजदूर ‘गिरमिटिया’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। समय के साथ बढ़ते विरोध, सामाजिक जागरूकता और नैतिक दबाव के परिणामस्वरूप यह अमानवीय प्रथा वर्ष 1917 में समाप्त कर दी गई। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, 1834 में बंधुआ मज़दूरी पर रोक लगने के बाद अंग्रेज़ों को ऐसे श्रमिकों की आवश्यकता थी जो मेहनती, अनुशासित, वफादार और अपेक्षाकृत सस्ते हों। उनकी दृष्टि भारतवासियों पर पड़ी, जो इन सभी कसौटियों पर खरे उतरते थे।
उस समय, भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, जिससे बड़ी संख्या में मजदूरों को लाना संभव भी था और भारतीयों को गन्ना तथा चावल की खेती का पर्याप्त अनुभव भी था। इस प्रक्रिया में अंग्रेज़ों द्वारा नियुक्त एजेंटों ने लोगों को गुयाना और आस-पास के क्षेत्रों—जैसे सूरीनाम—को ‘श्रीराम की भूमि’ बताकर बहकाया गया। दिनांक 5 मई 1838 को एस.एस. होस्पेरस नामक जहाज़ कलकत्ता से 166 भारतीयों को, जिनमें 6 महिलाएँ, 1 मुस्लिम पुरुष और 5 बालिकाएँ भी शामिल थीं, गुयाना के कोरेंटाइन क्षेत्र स्थित पाल्मरा गाँव में उतारा गया। इसी ऐतिहासिक स्थल पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (भारत सरकार) द्वारा स्थापित इंडियन एराइवल मॉन्युमेंट स्थित है। इस भव्य स्मारक में प्रसिद्ध मूर्तिकार राम सुतार द्वारा निर्मित पाँच भारतीय मजदूरों की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जो गिरमिटिया जीवन के संघर्ष, धैर्य और मानवीय गरिमा का सशक्त प्रतीक हैं।
गुयाना का संवैधानिक एवं आधिकारिक नाम को-ऑपरेटिव रिपब्लिक ऑफ गुयाना है। यह देश दक्षिण अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित है तथा इसकी राजधानी जॉर्ज़टाउन है। गुयाना की कुल जनसंख्या लगभग आठ लाख है। यहाँ सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत विविध जनसंरचना देखने को मिलती है, जिसमें छह प्रमुख जातीय समूह—अफ्रीकी, भारतीय, एमरो-इंडियन, ब्रिटिश, पुर्तगाली और चीनी तथा इनके अतिरिक्त कई मिश्रित जातीय समुदाय सम्मिलित हैं। इस बहुलतावादी समाज में अंग्रेज़ी आधिकारिक भाषा है, जबकि क्रियोल (किर्योलिज़) भाषा जनसामान्य में व्यापक रूप से प्रचलित है। प्रशासनिक दृष्टि से गुयाना को दस भौगोलिक क्षेत्रों (जिलों) में विभाजित किया गया है। भौगोलिक स्थिति की दृष्टि से यह देश अटलांटिक महासागर, कैरेबियन सागर और दक्षिण अमेरिकी भूभाग के संगम क्षेत्र में स्थित है। दमेरारा, बर्बिस और एसेक्विबो जैसी प्रमुख नदियाँ इसके प्राकृतिक वैभव को समृद्ध करती हैं।
गुयाना में अनेक दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें विश्व-प्रसिद्ध कायचूर फॉल्स, ओरलांडो फॉल्स, कृत्रिम झीलें और रमणीक समुद्र तट विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। लिंडन, जॉर्ज़टाउन, न्यू एम्सटर्डम और अन्ना रेजिना इसके प्रमुख नगर हैं। यह देश 9° उत्तर अक्षांश तथा 47° से 61° पश्चिम देशांतर के मध्य स्थित है। इसके उत्तर में अटलांटिक महासागर, पूर्व में सूरीनाम, दक्षिण एवं दक्षिण-पश्चिम में ब्राज़ील तथा पश्चिम में वेनेज़ुएला स्थित हैं। लगभग 83,000 वर्ग मील के क्षेत्रफल वाले इस देश की जलवायु सामान्यतः सम-शीतोष्ण है और यहाँ वार्षिक वर्षा लगभग 100 इंच होती है। गुयाना खनिज संसाधनों से भी संपन्न है; बॉक्साइट, सोना और हीरे यहाँ बड़े पैमाने पर पाए जाते हैं। भारत ने वर्ष 1966 में गुयाना के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करते हुए जॉर्ज़ टाउन में भारतीय उच्चायोग की स्थापना की। इसके पश्चात 1972 में भारत सरकार द्वारा प्रथम भारतीय सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की गई, जो निरंतर सक्रिय रहकर भारतीय संस्कृति, योग, संगीत, नृत्य और भाषा के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम बना हुआ है। वर्ष 2017 से यह केंद्र स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र के नाम से जाना जाता है। मुझे सितंबर 2016 से जुलाई 2020 लगभग चार वर्षों तक इस केंद्र में भारत सरकार की नियुक्ति पर निदेशक के रूप में कार्य करने का सुअवसर प्राप्त हुआ, जिस दौरान स्थानीय जनता के साथ प्रत्यक्ष संवाद और सांस्कृतिक सहभागिता का सौभाग्य मिला। उस प्रत्यक्ष अनुभव को मैंने अपने अनेक लेखों में उतारा है, जिनमें से (आई सी सी आर) भारतीय साँस्कृतिक सम्बन्ध परिषद (विदेश मंत्रालय) की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित पत्रिका ‘गगनांचल’ के विशेषांक (आई सी सी आर के 75 वर्ष) में गुयाना में ‘भारतीय संस्कृति’ के नाम से प्रकाशित हुआ है। गुयाना पर मेरा दूसरा आलेख श्री राजेश कुमार मांझी द्वारा सम्पादित पुस्तक “परदेश में हिंदी और भारतीय संस्कृति” में (“गुयाना में हिंदी और भारतीय संस्कृति”) प्रकाशित हुआ है। इस आलेख में वर्णित तथ्यों का सन्दर्भ इन लेखों में देखा जा सकता है।
मुझे याद है कि जब मैं सितंबर के महीने में पहली बार जार्ज़टाउन पंहुचा तो सबसे पहले मिलने वालो में रामकिशुन जी से भेट हुई जिनके केंद्र पर नवरात्रियों का कार्यक्रम होना था। जगह–जगह मंदिर, राम और हनुमान जी की मूर्तियाँ दिखाई दीं। ज्वाइन करने के एक दिन बाद शाम को कृष्णशर्मा जी आये (जिनकी सहभागिता में केंद्र से बाहर अन्य क्षेत्रीय मंदिरों/जगहों पर म्यूजिक, नृत्य और योग की कक्षाएँ होती थीं) जो गुयाना धार्मिक केंद्र के मंदिर पर होने वाले नवरात्रि के रात्रि-पूजन और कार्यक्रम के लिए आमंत्रित करने आये थे। उन्होंने नमस्ते, राम-राम से अभिवादन किया जो मेरे लिए बहुत आत्मीयता का अनुभव था। शाम को मंदिर पर अन्य मूर्तियों के साथ भगवान राम और सीता जी मूर्तियों की पूजा-अर्चना के बाद भाव-विभोर होने वाले भजन-कीर्तन और कथा-वाचन सुने। अनेक भजन और प्रार्थनाएँ भगवान राम और सीता जी की स्तुति में प्रस्तुत की गयी जो बहुत मार्मिक थी। कायर्क्रम के बीच में ही रामचरित मानस का एक प्रसंग सीता स्वयम्बर से सम्बंधित बहुत ही रोचक रूप में सुनाया गया। इंग्लिश में होने के बाबजूद इसको, लोगों द्वारा मन्त्र-मुग्ध होकर सुनने से वहां की संस्कृति में भगवान राम के महत्व और आस्तित्व का सुखद अनुभव हुआ जो पूरे कार्यकाल के दोरान मुझे आत्मबल और प्रेरणा देता रहा। उसी समय मैंने वहां के धार्मिक और साँस्कृतिक परिवेश में राम की प्राथमिकता अनुभव की। पूरी नवरात्रि, फिर दीपावली के मनमोहक आस्था और श्रद्धा से सम्पृक्त कार्यक्रम, उसके बाद दशहरा आदि वहां के आम जीवन में भगवान राम की महत्ता और उनकी व्याप्तता का आभास हुआ ।
वर्ष 1838 से 1917 तक की 79 वर्षों की अवधि में लगभग 2,30,000 भारतीयों को गुयाना लाया गया। यह यात्रा ‘काला पानी’ कही जाती थी, क्योंकि इसे पार करना भौगोलिक और सामाजिक—दोनों दृष्टियों से कठिन माना जाता था। इनमें से लगभग 75,898 अनुबंधित मजदूर अनुबंध समाप्त होने के पश्चात भारत लौट आए, जबकि शेष वहीं बस गए जो आज गुयाना की जनसंख्या, संस्कृति और इतिहास का अभिन्न एवं अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। ये अनुबंधित मजदूर अपने साथ अपना सबसे बड़ा सहारा—आध्यात्मिक आस्था के रूप में रामायण अथवा रामचरितमानस लेकर गए थे। इन्हीं की चौपाइयों के आधार पर उन्होंने मनोरंजन के नए रूप, लोक-संगीत और सामूहिक गायन की परंपराएँ विकसित कीं। भगवान राम और रामायण से प्रेरित-पोषित एवं आस्थामय एक नई संस्कृति वहाँ धीरे-धीरे पनपने लगी। औपनिवेशिक शासन के दौरान, जब अचानक अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषाएँ उन पर थोप दी गईं—जिनका उन्हें कोई पूर्व ज्ञान नहीं था—और हिंदी बोलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, तब वे अपनी बात भी ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते थे। ऐसे कठिन और अमानवीय हालात में भी आपसी अपनत्व बनाए रखने के लिए वे एक-दूसरे को ‘जहाज़ी भाई’ कहकर संबोधित करते और ‘राम-राम’ के अभिवादन से संवाद आरंभ करते थे। इससे उनके दैनिक जीवन और बातचीत में राम तथा रामायण के गहरे महत्व को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उस समय के लोक-गीतों, नृत्यों और संगीत में राम का भाव और स्वभाव प्रारंभ से ही रचा-बसा दिखाई देता है। आज गुयाना में भारतीय मूल की लगभग 45% जनसंख्या निवास करती है, जो भारतीय संस्कृति, परंपराओं और सभ्यता की प्रबल अनुयायी है। गुयाना की गलियों में भारतीय देवी-देवताओं के मंदिर, पूजा-स्थल और मूर्तियाँ सहज रूप से देखने को मिल जाती हैं। दीपावली, होली, नवरात्रि जैसे भारतीय पर्व-त्योहार, पौराणिक कथाएँ, भजन-कीर्तन और सत्संग पूरे गुयाना में श्रद्धा, अनुष्ठान, मंत्रोच्चार और विधि-विधान से पूजा के साथ संपन्न होते हैं। ये केवल पर्व या धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि वहाँ भारतीय संस्कृति के संवाहक और जीवंत प्रतीक हैं। स्थानीय जनता के बीच कार्य करते हुए मैंने स्वयं गुयाना की इस संस्कृति को गहराई से अनुभव किया है। इन्हीं अनुभवों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पूर्ण भारतीयता की स्पष्ट झलक और भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ें होने के कारण गुयाना को ‘मिनी भारत’ कहना सर्वथा उचित है। वहाँ की अनेक जानी-मानी हस्तियों और सांस्कृतिक मनीषियों के सतत प्रयासों, मार्गदर्शन और समर्पित चेतना के कारण भारतीय संस्कृति निरंतर फल-फूल रही है। गिरमिटिया संस्कृति प्रारंभ से ही भगवान श्रीराम और रामायण से प्रेरित एवं पोषित रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राम के प्रति भक्तिपूर्ण धारणा ने टूटे-बिखरे गिरमिटिया समाज को जोड़ते हुए उन्हें एकता के सूत्र में बाँधे रखा। तभी तो अन्य गिरमिटिया लोगों की भांति, गुयाना के लोगों ने भी रामायण को महत्व देते हुए उसे जीवन का मजबूत संबल माना है। वहां गिरमिटिया समाज में प्रचलित है कि–
“रामायण बनी गिरमिटियों की साथी
अंधेरों में जैसे तेल और बाती।”
रामायण के पात्र और उनकी कहानियाँ नई पृष्ठभूमि में लेखकों, विचारों को रचनात्मक प्रेरणा और दिशा देते रहे जो वहां की उभरती और नई सृजित होती हुई संस्कृति और साहित्य का आधार बनी। रामायण की कथाएँ, पात्रों का मंचन, रामायण के बीज से पोषित, उसके फूल और फलो को जगह जगह बिखेर रहा था जिससे राम के प्रति आस्था, पूजा अनुष्ठान और धार्मिकता के मुख्य केंद्र बन गये। गुयाना में भगवान राम अत्यंत सम्मानित और आराध्य माने जाते हैं। यहाँ रामायण तथा भगवान राम की कथाएँ जनमानस में अत्यधिक लोकप्रिय होती गयी। मंदिरों में राम की मूर्तियों की विधिवत पूजा के साथ-साथ कई स्थानों पर विशिष्ट राम मंदिर और रामायण प्रशिक्षण केंद्र स्थापित हो गए, जहाँ श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं तथा रामकथा और रामलीला का नियमित प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। गुयाना में ऐसे प्रमुख मंदिर और प्रशिक्षण केंद्र जिलुग्ट, न्यू एम्स्टर्डम, गुयाना रामलीला संघ, श्री सूर्य नारायण मंदिर, गुयाना हिन्दू धार्मिक सभा, जॉर्जटाउन, परिका, बरबीस तथा एसिकयूबो आदि में स्थित हैं। गुयाना में घर-घर और मंदिरों में राम की मूर्तियाँ विराजमान हैं। राम की पूजा पारिवारिक जीवन का अभिन्न अंग है। राम नवमी, हनुमान जयंती, दीपावली, नवरात्रि और दशहरा जैसे पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। विभिन्न स्थानों पर रामायण के कांडों तथा रामकथाओं पर आधारित सत्संग, पाठ और मंचन निरंतर आयोजित होते रहते हैं। इसी गहरी आस्था का परिणाम था कि वर्ष 2022-23 में अयोध्या राम मंदिर में रामलला की स्थापना का उत्सव पूरे गुयाना में अत्यंत हर्ष और उल्लास के साथ मनाया गया। संस्कृत और रामचरितमानस के पाठ-परंपरा के आधार पर भगवान राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ और जीवन का आदर्श माना जाता है, जो आज भी गिर्मित्य संस्कृति की वैचारिक और नैतिक नींव बने हुए हैं। राम-परंपरा का यह प्रभाव केवल गुयाना तक सीमित नहीं है, बल्कि गुयाना से प्रवास कर गए समुदायों के माध्यम से अमेरिका और कनाडा के अनेक क्षेत्रों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, फ्लोरिडा, कैलिफ़ोर्निया, ह्यूस्टन, डलास, मियामी और टोरंटो जैसे शहरों में राम मंदिरों, रामकथाओं और रामलीलाओं की सशक्त परंपरा आज भी जीवित है जिसमे गुयाना के प्रवासियों का बहुत बड़ा योगदान है। गुयाना के विद्वान कवि पंडित रामलाल जो न्यूयॉर्क में रहते थे अपने कष्टपूर्ण किंतु राममय अनुभवों को कविता के माध्यम से इस प्रकार व्यक्त करते हैं— “धर्म न छोड़ा, भाषा न छोड़ी, संस्कृति रखी बचाई के।” लाल बहादुर शर्मा कहते हैं कि “अब दशरथ राजकुमार खेले सब होरी, राम–लक्ष्मण–भरत–शत्रुघ्न हाथ लिए पिचकारी।” ये पंक्तियाँ गिरमिटिया समाज के उस सांस्कृतिक संकल्प को स्वर देती हैं, जिसने राम और रामायण को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि अस्मिता, नैतिकता और सांस्कृतिक उत्तरजीविता का आधार बनाया। यह लोकपंक्ति इस तथ्य को अत्यंत सशक्त रूप में रेखांकित करती है कि गिरमिटिया भारतीयों ने नए देश और बदले हुए समय में भी भारतीय पर्वों, लोक-स्मृतियों और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखा। दिवाली होली जैसे उत्सव केवल आनंद का माध्यम नहीं थे, बल्कि वे स्मृति, सामूहिकता और सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक भी थे। स्थानीय भाषाओं और गिरमिटिया समुदाय द्वारा बोली जाने वाली भारतीय भाषाओं के मिश्रण से एक नई भाषा का जन्म हुआ, जिसे क्रियोली या ‘किर्योली’ कहा गया। यह भाषा न तो पूर्णतः भारतीय रही और न ही पूरी तरह विदेशी, बल्कि यह उन श्रमिकों की एक नई सांस्कृतिक पहचान बन गई। इस नवगठित बोली में भी भगवान राम की महिमा और उनकी उपस्थिति पूर्ण रूप से विद्यमान रही। राम को कल्याणकारी, दुःखहर्ता, कार्य-सिद्धि के प्रतीक और आराध्य देवता के रूप में देखा गया, जिन्होंने विस्थापन और पीड़ा के बीच समुदाय को संबल प्रदान किया। गुयाना के विद्वान और सांस्कृतिक मनीषी—डॉ. विष्णु विश्राम, पंडित सियारतन तथा पंडित गणेश आदि अनेक —आज भी न्यूयॉर्क, फ्लोरिडा और न्यू-जर्सी जैसे क्षेत्रों में भगवान राम, हनुमान और राम-आधारित भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं तथा इस विषय पर साहित्य-सृजन भी कर रहे हैं। अयोध्या राम मंदिर के उद्घाटन पर गुयाना के जाने-माने लेखक और पत्रकार डॉ. विष्णु विश्राम “भगवान राम मंदिर का उद्घाटन: एक ऐतिहासिक अवसर” के शीर्षक से लिखते हैं कि दिनांक 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में संपन्न इस ऐतिहासिक समारोह में नरेंद्र मोदी की उपस्थिति ने इसे वैश्विक महत्व प्रदान किया। इस अवसर पर गुयाना और कैरेबियन क्षेत्र के हिंदू समुदाय में विशेष उत्साह और आनंद का वातावरण देखने को मिला। जॉर्ज़टाउन, न्यूयॉर्क सहित अनेक स्थानों पर गुयाना मूल के हिंदू समुदाय ने विशेष पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया। यह उद्घाटन केवल भारत तक सीमित एक धार्मिक घटना नहीं था, बल्कि विश्वभर में बसे हिंदू समुदाय के लिए सांस्कृतिक गौरव और ऐतिहासिक पुनर्स्मरण का क्षण बन गया। अमेरिका, गुयाना, कैरेबियन और अन्य देशों में मंदिरों में आयोजित विशेष अनुष्ठानों ने यह स्पष्ट कर दिया कि राम और रामायण आज भी वहां गिरमिटिया संस्कृति की आत्मा और चेतना के केंद्र में विद्यमान हैं। 2008 में यूनेस्को ने रामलीला (फेस्टिवल) को अंतरराष्ट्रीय अमूल्य साँस्कृतिक धरोहर (INTAGIBLE) के रूप में मान्यता दी है जिसको पूरी दुनिया के साथ गुयाना में भी खुशियों के साथ मनाया गया और वहां पर अनेक रामलीला संघों/समितियों की स्थापना हुई जो आज भी रामकथाओं का सक्रिय मंचन कर रही है और प्रशिक्षण दे रही है जिनमें से एक पंडित आदित्य (आनंद/रवि) गुयाना रामलीला समिति है। जीएचडीएस की रामलीला एक साँस्कृतिक केंद्र है जिसकी अध्यक्षा डॉ विन्ध्य प्रसाद जी हैं। उनकी सक्रियता सराहनीय है। पंडित रवि प्रसाद, इवान राधेश्याम, पंडित कृष्ण शर्मा, अश्विनी, बुदराम आदि रामकथाओं और भजनों का निरंतर प्रचार कर रहे हैं।
गुयाना के एक प्रमुख विचारक और पत्रकार लिखते हैं कि गुयाना, कैरेबियन क्षेत्र तथा विदेशों में निवास करने वाले हिंदू रामनवमी के दिन “राम के जन्म” अर्थात भगवान राम के अवतरण का उत्सव अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाते हैं। उल्लेखनीय है कि ‘नवमी’ का बिहारी उच्चारण ‘नौमी’ है, जो हमारे पूर्वजों की भाषाई विरासत का अनुसरण करता है। ‘नौमी’ का अर्थ ‘नवां’ होता है और यही कारण है कि यह पर्व हिंदू पंचांग के प्रथम माह चैत्र (मार्च–अप्रैल) के नौवें दिन मनाया जाता है। लेखक आगे स्मरण करते हैं कि आज भी उन्हें अपने वे पूर्वज याद आते हैं, जो गिरमिटिया मज़दूर के रूप में चीनी के खेतों में कठोर श्रम करने के बाद फ्लैंबो या टॉर्च की मंद रोशनी में रामायण का पाठ किया करते थे। आस्था और संस्कृति उनके लिए उस समाज में एक प्रमुख संबल थीं, जो उन्हें पश्चिमी संस्कृति में ढालने का निरंतर प्रयास कर रहा था। इंडो-कैरेबियन हिंदू आज भी एक-दूसरे को ‘राम-राम’ और ‘सीता-राम’ कहकर अभिवादन करते हैं, जो उनकी धार्मिक भावना और सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता को दर्शाता है। भगवान राम केवल आराध्य ही नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान का भी अभिन्न अंग हैं। समुदाय में अनेक नाम—रामकिसून, रामरूप, रामऔतर, रामलाल, रामटहल, रामडियल, रामलखन, रामसिंह, रामदेव, रामनाथ आदि—इस गहरे राममय सांस्कृतिक प्रभाव को प्रतिबिंबित करते हैं। इस प्रकार रामनवमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि स्मृति, विरासत और सामूहिक अस्मिता का उत्सव बन जाती है। गुयाना के सामाजिक जीवन, कार्य-संस्कृति, व्यवहार, आस्था और प्रार्थनाओं में राम, रामायण और हनुमान का गहरा समावेश दिखाई देता है। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो राम, रामायण या हनुमान से परिचित न हो, या जिसने कभी रामकथा अथवा रामलीला का दर्शन न किया हो। यहाँ के प्रमुख पर्व नामत: राम नवमी, दीपावली, दशहरा और नवरात्रि पूरी भारतीय विधि-परंपरा के अनुसार, विधिवत पूजा-अर्चना और उत्साह के साथ मनाए जाते हैं।
गुयाना की जीवन-पद्धति में संस्कृति, धर्म और आर्थिक जीविका तीनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। आर्थिक गतिविधियों और व्यवसायों में किसी प्रकार की सामाजिक बाधाएँ या सीमाएँ नहीं हैं। इस समाज का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि यहाँ लोग धर्म से पहले संस्कृति को जीते हैं। यही कारण है कि दीपावली, होली, क्रिसमस और ईद जैसे सभी त्योहार सामूहिक रूप से गुयाना की संस्कृति के रूप में मनाए जाते हैं—न कि किसी एक धर्म की पहचान के रूप में, बल्कि गुयाना की साझा संस्कृति के उत्सव के रूप में मनाये जाते है। यहाँ त्योहार आनंद, सहभागिता और सांस्कृतिक एकता का माध्यम हैं, जहाँ लोग यह नहीं देखते कि कौन-सा पर्व किस धर्म का है, बल्कि उसे जीवन के उत्सव की तरह पूरे उल्लास के साथ अपनाते हैं। रामरूप संवाद, आपसी सहानुभूति और गहरा भावनात्मक जुड़ाव
गिरमिटिया समुदाय को निरंतर एक-दूसरे से जोड़ता चला गया। लोग भगवान राम को सत्य और न्याय, करुणा और शांति का प्रतीक मानते हैं, वहीं हनुमान को साहस, शक्ति और निर्माण का स्वरूप।
यही धारणाएँ रामकथाओं, रामलीलाओं और नाटिकाओं के माध्यम से उनके दैनिक जीवन, रहन-सहन और सामाजिक व्यवहार का आधार बनने लगीं और इसी से एक राममयी संस्कृति समाज के बीच पनपती चली गई। वे आपस में एक-दूसरे को ‘जहाज़ी भाई’ कहकर तथा ‘राम-राम’ के अभिवादन के साथ पुकारते थे, जिससे एक गहरा पारिवारिक और सामुदायिक संबंध विकसित हुआ। मनोरंजन और मानसिक संबल के रूप में वे मिल-बैठकर रामायण की चौपाइयाँ, रामकथाएँ, राम-आदर्श, भजन, गीत, किस्से और कहानियाँ सुनाते थे। छोटे-छोटे नाट्य आयोजन किए जाते थे और सीमित संसाधनों के बावजूद वाद्ययंत्रों की ध्वनियों से संगीत और लय की रचना की जाती थी। रामचरितमानस, गीता, महाभारत, पुराण, सत्यनारायण कथा तथा हनुमान से जुड़ी धार्मिक-पारंपरिक कथाएँ और ग्रंथ उनके लिए आध्यात्मिक संबल का प्रमुख स्रोत बन गए। धीरे-धीरे यही पाठ, कथाएँ और सामूहिक अभ्यास उनकी नई मान्यताओं, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बनते चले गए। समय के साथ मंदिरों और विशेष रूप से राम मंदिरों का निर्माण होने लगा। पूजा-पाठ, हवन और आरती जैसे धार्मिक अनुष्ठान प्रचलन में आए। भजन-कीर्तन और सामूहिक धार्मिक कार्यक्रमों ने भारतीयता को जीवंत बनाए रखा। इंडो-भारतीय समाज में संगीत, वाद्ययंत्र, गायन और लोककलाओं का विकास हुआ। जीवनशैली, आचार-विचार और संस्कारों में भारतीय परंपराएँ और अधिक गहराती चली गईं। इस प्रकार रामकथाएँ, रामचरितमानस और सामूहिकता ही सांस्कृतिक चेतना की आधारशिला बन गईं। गलियों और मोहल्लों में मंदिर स्थापित होने लगे, जहाँ सबसे पहले भगवान राम और हनुमान की मूर्तियों को स्थान मिला। आज गुयाना में भगवान राम और हनुमान की मूर्तियाँ न केवल मंदिरों में, बल्कि सार्वजनिक स्थलों पर भी दिखाई देती हैं। रामायण-आधारित झांकियाँ, संगीत, नृत्य-नाटिकाएँ, राम सत्संग और कथाएँ वहाँ के जीवन का मुख्य हिस्सा और आस्था का केंद्र बन चुकी हैं। गुयाना हिन्दू धार्मिक सभा (GHDS) सहित अनेक संस्थाएँ प्रत्येक वर्ष विभिन्न अवसरों पर चौपाई पाठ, चित्रकला, नृत्य, नाटक और गायन जैसी रामायण प्रतियोगिताओं का नियमित आयोजन करती हैं। ये गतिविधियाँ न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ करती हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक राममयी सांस्कृतिक चेतना को निरंतर प्रवाहित करती रहती हैं।
एक अन्य साहित्यिक संदर्भ में उल्लेख मिलता है कि भगवान राम गुयाना के हिंदू समुदाय के जीवन में एक केंद्रीय और प्रेरक व्यक्तित्व हैं। वे धर्म, कर्तव्य और अच्छाई की विजय के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका जीवन और चरित्र दैनिक जीवन की व्यवहारिक नैतिकता, नामकरण परंपराओं (जैसे रामसिंह, रामकिसून), संगीत और भक्ति परंपराओं (राम भजन), प्रमुख त्योहारों (रामनवमी, दीपावली) तथा सांस्कृतिक प्रथाओं—जैसे बैठक गायन, रामायण चौताल और चौपाई—में गहराई से अंतर्निहित है। भगवान राम केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे नैतिक दिशा और सामूहिक गौरव का भी स्रोत हैं—यहाँ तक कि उन परिवारों के लिए भी, जिन्होंने समय के साथ ईसाई धर्म अपना लिया है। रामायण से प्राप्त उनकी कथा अनुशासन, करुणा और सत्यनिष्ठा जैसे मूल्यों का नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करती है। राम से जुड़े त्योहारों में मंदिर-पूजन, पाठ, उपवास और सामुदायिक भोज का आयोजन होता है, जो समुदाय को उनके पूर्वजों की विरासत से जोड़ता है और भारतीय जड़ों को समझने का एक सांस्कृतिक ढाँचा प्रदान करता है। भगवान राम के संदर्भ में पाँच प्रमुख आयाम सांस्कृतिक पहचान: राम की कथा पारंपरिक संगीत, भजनों और लोक-गायन में जीवित रहती है, जो इंडो-गुयाना समुदायों को उनकी विरासत से जोड़ती है, भले ही वे कई पीढ़ियों से भारत से दूर रहे हों। प्रमुख त्योहार: रामनवमी (राम जन्मोत्सव) और दीपावली (अयोध्या वापसी) जैसे पर्व उपवास, प्रार्थना, भजन और सामुदायिक आयोजनों के साथ मनाए जाते हैं। प्रसिद्ध पत्रकार और विचारक श्री विष्णु विश्राम जी ने यह न्यूयॉर्क टाइम्स में “ Religious forever Grip Indo- NY ,Guyanese Hindu for lord Rama Mandir Inauguration-June-19, 2024 (letter to editor) में उदृत किया था। नैतिक मार्गदर्शन: गुयाना के हिंदू समुदाय राम की शुद्धता, उनके नैतिक आचरण, सत्यनिष्ठा और नि:स्वार्थ जीवन के आदर्शों को अपनाने का प्रयास करते हैं। राम की कथा राष्ट्रीय एकता तथा सामाजिक एकता को बढ़ावा देती है। सामूहिक आयोजनों में “वन गुयाना” की अवधारणा को प्रोत्साहित किया जाता है, जहाँ राम का आशीर्वाद सभी समुदायों के लिए माना जाता है। दैनिक जीवन में उपस्थिति: रामकिसून, रामसिंह, रामनारायण जैसे नाम उनके स्थायी और जीवंत प्रभाव को दर्शाते हैं।
रामनवमी के अवसर पर एक अन्य स्थानीय लेखक लिखते हैं— “रामनवमी के इस पावन अवसर पर हम भगवान राम के जन्म का उत्सव मनाते हैं। उनका अवतरण धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए हुआ। भगवान राम का जीवन हमें यह सिखाता है कि सत्य, न्याय और दया को व्यवहार में कैसे उतारा जाए।” लेखक आगे भगवान राम के जीवन के प्रमुख पक्षों को रेखांकित करते हैं—सत्य और न्याय का पालन, दया और करुणा का आचरण, नैतिकता और सदाचार की प्रतिबद्धता तथा सत्य के लिए दृढ़ता (सत्याग्रह)। इन मूल्यों के माध्यम से भगवान राम एक आदर्श मानव जीवन की प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस प्रकार, रामनवमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि नैतिक आत्मचिंतन और सांस्कृतिक निरंतरता का अवसर बन जाती है—जो गुयाना के बहु-सांस्कृतिक समाज में आज भी समान रूप से प्रासंगिक और प्रेरक है।
एक अन्य साहित्यिक संकलन में उल्लेख मिलता है कि रामनवमी, भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में, अच्छाई की विजय और धर्म की स्थापना का संदेश देती है। यह पर्व चैत्र नवरात्रि के समापन का भी प्रतीक माना जाता है, जिसके दौरान शक्ति-परंपरा के अंतर्गत देवी-आराधना की जाती है। भगवान राम का जीवन कर्तव्य-पालन, पारिवारिक उत्तरदायित्व और सामाजिक मर्यादा का आदर्श प्रस्तुत करता है—जहाँ सत्य, दया और न्याय व्यवहारिक जीवन के मूल आधार बनते हैं। रामकथा उनके चौदह वर्षों के वनवास, माता सीता के अपहरण और रावण के साथ निर्णायक युद्ध की स्मृति कराती है। उनका जीवन एक आदर्श पारिवारिक ढाँचा प्रस्तुत करता है—आदर्श पुत्र, भाई, पति और राजा के रूप में। रामनवमी के दिन उपवास, प्रार्थना और रामनाम-जप के माध्यम से शरीर, मन और हृदय की शुद्धि का संकल्प लिया जाता है। यह दिन यह भी स्मरण कराता है कि “राम नाम” का जप शांति, ज्ञान और मोक्ष की ओर ले जाने वाला सहज मार्ग है। यह उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी का प्रिय भजन था— “रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम।” इसके अतिरिक्त, उनके अंतिम शब्द “हे राम” थे। इस प्रकार राम केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि नैतिक चेतना और मानवीय करुणा के भी प्रतीक बनते हैं। शादियों में, गृह प्रवेशों में, रामनवमी, और अन्य अनुष्ठानों में राम कथाएँ, हनुमान चालीसा, सुंदर कांड, चौपाई आदि से संबंधित प्रथाएँ आम और आवश्यक हैं। आरती, भजन, सत्संग, राम कथाएँ/ चर्चाएँ और उन पर आधारित मंचन दैनिक रूप में आम हैं जो निरंतर चलते रहते हैं। पुराने भारतीय वाद्य यंत्र, नामत: ढोलक, हारमोनियम, करताल, मंजीरा मुख्य वाद्ययंत्र प्रचान में हैं।
इसी संदर्भ में एक अन्य लेखक लखराम भागीरथ दिनांक 15 अप्रैल 2019 को “रामलीला: हमारे पूर्वजों से मिली एक आत्मनिरीक्षणात्मक उपहार” शीर्षक से लिखते हुए, 19 अप्रैल 2019 को गुयाना रामलीला संघ द्वारा लियोनारा स्टेडियम में आयोजित रामनवमी कार्यक्रम का उल्लेख किया। एक कैरेबियन समाचार पत्र में प्रकाशित इस लेख में रामलीला को पूर्वजों से प्राप्त आत्ममंथन की सांस्कृतिक विरासत के रूप में रेखांकित किया गया है। लेख के अनुसार रामायण हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय महाकाव्यों में से एक है, जिसकी रचना वाल्मीकि द्वारा की गई मानी जाती है। यह ग्रंथ भगवान विष्णु के अवतार श्री राम के जीवन का वर्णन करता है—जिसमें कौशल राज्य के राजा दशरथ के शासनकाल में कुपित कैकेयी के वरदान के कारण राम का चौदह वर्षों का वनवास हुआ। राम, सीता और लक्ष्मण के वनवास के दौरान आए संघर्षों और विजयों का विस्तृत वर्णन इस महाकाव्य का केंद्रीय तत्व है। रामायण को विश्व के प्राचीनतम और महानतम महाकाव्यों में गिना जाता है। इसकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 16वीं शताब्दी में तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की, जिससे जनमानस में रामकथा और अधिक सुलभ हुई। इसी से अत्यंत लोकप्रिय चौपाइयाँ विकसित हुईं—“मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी” तथा “राम सिया राम, सिया राम जय जय राम” जो गुयाना की हिंदू का एक प्रमुख हिस्सा है। यहाँ बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि हिंदू धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र शैली है—जिसमें राम का उदाहरण सर्वोच्च आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सीमित संसाधनों के बावज़ूद भारतीय समुदाय अपनी राममयी संस्कृति, परंपराएँ और विश्वास इस भूमि पर लेकर आया और यहीं उन्हें विकसित किया।
रामलीला—जो रामकथा का नाट्य रूपांतरण है—पूर्वजों द्वारा धर्म और संस्कृति को जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम बनी। यह परंपरा न केवल भारत में, बल्कि उन सभी क्षेत्रों में प्रचलित रही जहाँ भारतीय समुदाय निवास कर रहा है। लियोनारा नेशनल स्टेडियम में दिनांक 19 अप्रैल, 2019 को गुयाना रामलीला संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम की झलकियाँ (जहाँ मै भी था) जिसकी फोटो-छबियाँ अनुजा रेयादा (ANUJA REYADA) ने कैमरे में क़ैद की थीं।
एक और रिपोर्टर द्वारा लिखा गया कि: लॉर्ड राम अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक हैं। स्टाफ रिपोर्टर द्वारा दिनांक 21 अप्रैल, 2021 को उल्लेख किया गया है कि हमारे प्रिय संपादक, दुनिया भर में गुयाना सहित, भक्त चैत्र या वसंत नवरात्रि के उत्सव का समापन कर रहे हैं–माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती की नौ रातों/दिनों की प्रार्थना के बाद दुर्गा मां के त्रिमूर्ति रूप के प्रति श्रद्धा के साथ। उन्होंने अच्छाई को बहाल करने और बुराई को जीतने के लिए अपने प्रकटीकरण के नौ अलग-अलग रूप स्थापित किए। रामनवमी उचित रूप से इस अवधि की शुभता के समापन को चिह्नित करती है और सूर्य देव अर्थात् सूर्य भगवान को जलांजलि-तिलांजलि दी जाती है, क्योंकि भगवान राम की वंशावली रघुकुल से उतरी है। सूर्य का महत्व उस स्थान से उच्च अक्षांशों में अधिक था जहां से आर्यों ने भारत में प्रवेश किया था।
रामनवमी उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भगवान राम के अवतार को चिह्नित करती है, जो भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं। रामनवमी उत्सव चैत्र के शुक्ल पक्ष के नौवें दिन अर्थात् नवमी तिथि पर पड़ता है, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मार्च या अप्रैल में है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। उनके प्रकटीकरण को रामायण-काल की दिव्य कहानी में गाया गया है, जो हमें भगवान राम के जीवन और शिक्षाओं का संदेश देता है, जिसका अर्थ है, “जो दिव्य रूप से आनंदमय है और दूसरों को आनंद देता है और जिसमें सन्त आनंदित होते हैं—वह दया और करुणा के महासागर, भगवान राम द्वारा चरितार्थ अच्छाई की बुराई पर विजय और अधर्म को हराने के लिए धर्म की स्थापना का प्रतीक है। वह अपने परिवार और प्रजा के प्रति अपने सभी कर्तव्यों को पूरा करने के लिए परिपूर्णता का प्रतीक हैं। कौशल नरेश दशरथ, जो सरजू नदी के किनारे स्थित अयोध्या के राजा थे, नि:संतान थे और उन्होंने ऋषि शृंग द्वारा आयोजित “अश्वमेध” नामक एक यज्ञ किया था। उन्हें अंततः कौशल्या रानी से श्री राम का वरदान मिला और वे एक शक्तिशाली राजकुमार बन गए जिन्होंने सीता माता से विवाह किया। भगवान राम ने अपने भाइयों के प्रति अपने प्यार, दानवों को हटाने के लिए चुनौतियों और सीता माता का अपहरण करने के लिए रावण की प्रतिद्वंद्विता के लिए विभिन्न परीक्षणों का सामना किया। वनवास में उनके 14 वर्षों का निर्वासन, सीता माता और उनके भाई लक्ष्मण के साथ, विभिन्न महत्वपूर्ण घटनाओं और स्थितियों से भरा था, जिससे उन्हें बुरी शक्तियों से दुनिया को मुक्त करने के अपने वचनों को पूरा करने की अनुमति मिली। वहां, उनकी मुलाकात उनके विनम्र भक्त, श्री हनुमान से हुई और उन्होंने पवित्र शबरी के स्थान का भी दौरा किया। दुर्गा मां के आशीर्वाद की तलाश में, भगवान राम लंका के दुष्ट राजा रावण और उनके एक भाई कुंभकर्ण को हराने में सक्षम थे। लंका-राज्य को रावण के धर्मनिष्ठ भाई, विभीषण को सौंपा, जो सभी नागरिकों के आनंद के लिए सुशासन करने में सक्षम थे। वन में उनके प्रवास के अंत में अयोध्या में उनकी वापसी को “दीवाली” के त्योहार के दिन मनाया जाता है। यद्यपि भगवान राम के पास दुनिया की सभी शक्तियां थीं, फिर भी वह शांतिपूर्ण और सौम्य थे। उनके जीवन की सावधानीपूर्वक अनुकरण करते हुए, हम सीखते हैं कि कैसे एक आदर्श पुत्र, एक आदर्श भाई, एक आदर्श पति और सबसे महत्वपूर्ण, एक आदर्श राजा बनना चाहिए, जिन्होंने आदर्श शासन की स्थापना के लिए राज्य किया। उनकी जीवन-शैली से बहुत सारे सबक सीखे जा सकते हैं जिन्हें कार्यान्वित करके गुयाना में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को बेहतर बनाया जा सकता है।
दिव्य ऋषि नारद, जो संत वाल्मीकि से संबंधित हैं, ने कहा है, “श्री राम सभी उदात्त गुणों, (गुणों और सद्गुणों) के अवतार हैं, जो अपनी माता कौशल्या के आनंद को गहराई से बढ़ाते हैं। वह एक अथाह महासागर हैं, और दृढ़ता में, वह राजसी हिमालयी पर्वत की तरह दृढ़ और अपरिवर्तनीय हैं।” राम नवमी का दिन शरीर, हृदय और मन को शुद्ध करने, उपवास, प्रार्थना, भगवान राम का नाम जपने, राम कथा वाचन करने, मंदिरों का भ्रमण करने, भोजन, कपड़े और पैसे के रूप में दान देने और उपहार तथा मिठाइयों के साथ दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ मिलने में बिताया जाता है। कहा जाता है कि उनके नाम (राम नाम) का जाप शुद्धता, शांति, ज्ञान, समझ, आनंद, समृद्धि और अंततः मोक्ष प्राप्त करने का सबसे निश्चित, सबसे तेज़ और सबसे आसान तरीका है। भगवान राम ने स्वयं कहा था कि “मेरे नाम का जाप, परमेश्वर और अन्य देवताओं के हजार नामों के जाप या उनके हजार बार मन्त्रोच्चार के बराबर है।“ भगवान राम वह परिपूर्ण व्यक्तित्व थे जिन्होंने पृथ्वी पर दिव्य अवतार लिया और हमें सिखाया कि धर्म और दैवीय सिद्धांतों के अनुसार जीवन कैसे जीना चाहिए। गुयाना और अन्य वेस्ट इंडियन अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ हैं जो ऐसी समृद्ध संस्कृति को लेकर आए तथा जो रामायण और गीता तथा अन्य पवित्र पुस्तकों से प्रभावित जीवन जीने के लिए सिद्धांतों और प्रथाओं में संरक्षित हैं, जिन्हें वे अपनी विरासत के रूप में सावधानी से लेकर आए थे।
महात्मा गांधी का पसंदीदा भजन था, “रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम।“ जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनका आखिरी शब्द था, “हे राम!” भगवान राम की कृपा गुयाना के प्रत्येक नागरिक पर शांति और आनंद के साथ हो! शुभ रामनवमी! एक अन्य लेखक कहते हैं कि राम और रामायण, प्रवासियों की प्रेरणा के मुख्य स्रोत रहे हैं। इससे उन्हें चैन-सुकून मिलता है; उनमें आशा का संचार होता है और उन्हें धीरज मिलता है। ऐसा करके उन्हें उनके गुलाम/बंधुआ मजदूर के जीवन के कष्ट से मुक्ति मिलती है। भगवान राम और हनुमान के बीच जो सामंजस्य हम देखते है, वह यह प्रतिपादित करता है कि वे दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और यही बात गुयानावासियोंक में आस्था और श्रद्धा के भाव को बढाती है। श्री लाल बिहारी शर्मा, मेयुत्रा बहादुर जैसे लेखकों ने भी राम की महिमा का वर्णन किया है। इस प्रकार, गुयाना के जन-जीवन में भगवान राम न केवल गहराई से रचे बसे है बल्कि वहाँ की संस्कृति, जीवन पद्धति, उत्सव-आयोजनों, आत्मिक उत्थान, हर्षोल्लास में भगवान राम रचे-बसे हैं।

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