दिन विशेष अनुवाद में ‘डॉ. वसुधा सहस्रबुध्दे’ द्वारा ‘डॉ. शुभंकर कुलकर्णी’ की रचना का हिन्दी अनुवाद
(मूल रचना) – ‘वळण’ : डॉ. शुभंकर कुलकर्णी
कस्तुरीला नववा महिना लागला होता। रोजच्या कामातल्या अडचणी आता तिला जाणवायला लागल्या होत्या। चालू पणेवताना तिला मोठा श्वास घेत येई। त्यामुळे चालू पणेवयलाही बराच वेळ लागत होता। एवढ्यातच ती धापा टाकू लागली। पुढे अजून आख्खा स्वयंपाक बाकी होता। भुकेलीसारखी लागत होती। पण आपण केलं नाही तर खायला मिळणार तरी कसं, ह्याबाबतीत तक्रार करता येते, हेही तिला ठाऊक नव्हतं।
“मी करू का थोडी मदत?” वसूळू आवाजात तिला म्हणाली।
“नको। म्हातारीनं पाहिलं तर राग धरेल. तिनं जे सोसलं, ते सगळं मीदेखील सोसावं, असंच तिला वाटतं।” कस्तुरी पदरानं चेहऱ्यावरचा घाम पुसत म्हणाली।
कस्तुरीचं आयुष्य साधं होतं, पण तिच्या वाट्याला आलेल्या अडचणी मात्र कमी नव्हत्या। शिक्षण नव्हतं, बाहेरच्या जगाचा वावर लागलेला नव्हता; पण उपजतच शहाणी होती, विचारी होती। आयुष्यात सगळ्याच गोष्टींचा विचार करून ती पुढे आली नव्हती। काही गोष्टी अपरिहार्यरीत्या तिच्यासमोर आल्या होत्या। लग्न ही त्यातली एक मोठी गोष्ट होती आणि दुसरी त्याला लागून आलेली म्हणजे गर्भार होणं।
वसूनं आपला अनुभव सांगताना म्हटलं होतं, “अवघडच असतं, पण करतो आपण बायकातं निमूटपणे, आपल्या हिमतीवर…” मलाही जमेल ना? हा प्रश्न कस्तुरीच्या मनात पुन्हा पुन्हा येत होता।
एक दिवस गावात मेडिकल कॅम्प भरला। कस्तुरी आणि वसू तिथे गेल्या। डॉक्टरांनी तपासणी केल्यानंतर कस्तुरीला सांगितलं की बाळंतपणासाठी हॉस्पिटलमध्ये दाखल होणं चांगलं। गावात बाळाला जन्म देताना काही अडचण आली तर कोण पाहणार, असा प्रश्नही डॉक्टरांनी तिच्यासमोर ठेवला।
पण कस्तुरीला माहीत होतं की देवला हॉस्पिटलमध्ये जाणं मान्य होणार नाही। परिस्थिती तशीच होती। गावातल्या काही बायका हॉस्पिटलमध्ये बाळाला जन्म देऊन आल्या होत्या; पण आपल्या नशिबी ती सोय नव्हती।
शेवटी कस्तुरीनं मनाशी ठरवलं—जे होईल ते होईल। आपण त्या झोपडीतच बाळाला जन्म द्यायचा। एकटीनं. कोणाच्याही मदतीशिवाय।
दुसऱ्या दिवशी देव तिला जंगलातल्या एका झोपडीपर्यंत सोडून गेला। “महिन्याभरात येतो परत घ्यायला,” एवढंच तो म्हणाला।
झोपडीच्या आजूबाजूला फळझाडं होती, थोडी भाजीपाला लावलेली होती। आत पाणी, चूल, काही भांडी आणि झोपण्यासाठी आवश्यक तेवढं सामान होतं। कस्तुरीला भीती वाटत होती; पण त्याचबरोबर एक वेगळंच स्वातंत्र्यही जाणवत होतं। आजूबाजूला कोणी नसल्यामुळे तिला थोडं मोकळं वाटत होतं।
दुसऱ्या दिवशी सकाळीच तिच्या पोटात दुखायला लागलं। वेळ आली होती।
ती भराभर कामाला लागली। जमिनीवर चादर पसरली। पाणी भरून ठेवलं। जुनी साडी जवळ ठेवली। गोधडी आणि कपड्यांच्या चिंध्या जवळ ठेवल्या। प्रसवाच्या वेदना वाढत गेल्या। भीती होती, पण त्याहून मोठा होता तिचा निर्धार।
शेवटी बाळाचा जन्म झाला।
कस्तुरीनं बाळाला हातात घेतलं। त्याचा स्पर्श होताच तिच्या चेहऱ्यावर हसू उमटलं। नऊ महिन्यांनंतर पहिल्यांदाच ती इतकी प्रसन्न वाटत होती। बाळाला स्वच्छ करून तिनं जवळ घेतलं।
थोड्या वेळानं तिला जाणवलं की तिचं बाळ मुलगी आहे।
कस्तुरीच्या डोळ्यांसमोर अचानक आपलं संपूर्ण आयुष्य उभं राहिलं—बालपण, लग्न, संसार आणि मग बाळंतपण। तेही याच झोपडीत। तिच्यासारखंच हाल काढत, एकटीनं!
“जे मी सहन केलं ते जाणूनबुजून माझ्या मुलीला का सहन करायला लावायचं?” हा प्रश्न तिच्या मनात आला।
तिनं ठरवलं—आपल्या मुलीला शिकवायचं। तिला त्या पांढऱ्या कपड्यातल्या डॉक्टर मुलींसारखं सुशिक्षित आणि स्वतंत्र बनवायचं। तिचं लग्न लवकर करायचं नाही। तिला स्वतःच्या पायावर उभं करायचं।
रात्रभर कस्तुरी हाच विचार करत राहिली। पुढचं सगळं कसं साकार होईल, याची तिला कल्पना नव्हती; पण निर्णय मात्र पक्का झाला होता।
काही दिवसांनी कस्तुरीनं झोपडी आवरली। पाणी भरून घेतलं। कपड्यांमध्ये शिधा बांधला। गरजेपुरतं सामान उचललं। बाळाला जवळ घेतलं आणि झोपडीचं दार उघडलं।
बाहेर हिरवळीत हरणं चरत होती। ते दृश्य पाहून कस्तुरीला एक वेगळंच समाधान वाटलं। जणू आपल्या नव्या सुरुवातीसाठी शुभेच्छा द्यायलाच ती इथे आली होती।
ती झोपडीच्या दारातून बाहेर पडली। थोडं पुढे गेल्यावर तिला गावाकडे जाणारी पाऊलवाट दिसली। कस्तुरी तिथे थांबली। मागे वळून तिनं त्या झोपडीकडे पाहिलं।
त्या झोपडीनं अगदी छोट्याशा कालावधीत तिचं आणि तिच्या मुलीचं आयुष्य बदललं होतं।
कस्तुरी किंचित हसली आणि तिनं गावाच्या विरुद्ध दिशेला चालायला सुरुवात केली।
हीच तिच्या आयुष्यातली खरी ‘वळण’ होती।
“मोड़”- डॉ. वसुधा सहस्रबुध्दे
कस्तूरी को नौवां चल रहा था। अब हर रोज के काम करना आसान नहीं था। चूल्हा जलाते समय उसकी साँस फूल जाती और वह थक जाती थी। वैसे पूरा खाना बनाना बाकी है और बार बार भूख लग रही थी। लेकिन जब तक वह खाना नहीं बनाती, क्या खाएगी ? पर इसके लिए शिकायत कर सकते हैं, इससे भी वह अनजान थी।
“ मैं करू कुछ मदद ?” वसु धीरे से बोली।
“ नहीं ,बुढ़िया देखेगी तो गुस्सा करेगी। उसे लगता है ,उसने जितनी तकलीफ सही है उस तकलीफ से मुझे भी गुजरना चाहिए। “कस्तूरी चेहरे का पसीना पोछते हुए बोली।
बुढ़िया की एक आंख इधर गड़ी हुई थी। अभी तो कुछ नहीं बोली, जब देवा काम से लौटेगा उसे सबकुछ बताएगी।
“ बुढ़िया के कुछ बोलने से पहले मैं निकलती हूँ। मेरा बच्चा भी अभी जग जाएगा। “ कहते हुए वसु चली गई।
बड़ी मुश्किल से खाना बन गया। बुढ़िया की नजर से छुपा कर उसने रोटी मुँह में दबा दी और मुँह पर पल्लू लेकर बाहर चली गई। मिटटी की दीवार से टेक कर उसने धीरे रोटी खा ली और उसे राहत मिल गई।
इस छोटे से गांव में कुल मिला के पचास घर थे। गांव के एक बाजू में पेड़ काट कर बनाया हुआ आंगन था। उसके बाजू में कस्तूरी का घर था। शाम को गांव के बड़े बुजुर्ग आंगन में बैठ कर गप शप कर रहे थे और बच्चे शोर मचाते हुए खेल रहे थे। कस्तूरी का ध्यान अस्त होने वाले सूरज की ओर था , वह सोच रही थी ,क्या मेरी जिंदगी भी इसी मोड़ पर पहुंच गई है ? अस्त हो रही है…. धीरे धीरे।
कस्तूरी उम्र में छोटी थी लेकिन उसकी समझ अच्छी थी। पढाई भी नहीं हुई ,बाहरी दुनिया से बेखबर। फिर भी बहुत ही समझदार, सयानी थी। लेकिन जिंदगी की बहुत सी बातों के बारे में नहीं सोच सकी। कुछ बातें अनिवार्य रूप से सामने आयी। उसमें से एक बहुत बड़ी बात थी शादी और दूसरी बात थी गर्भावस्था। बच्चे के जन्म के समय क्या-क्या होगा यह सब उसने वसु के मुँह से परसो ही सुना था। तब उसे लगा अब वह सब बिलकुल उसके पास पहुँच गया है।
अपना पूरा अनुभव बताने के बाद उसने कहा,” देखो, मुश्किल तो होता है ,लेकिन हम औरतें अपनी हिम्मत पर ,चुपचाप सब कुछ निभाते हैं। …”
“ मैं भी निभा सकूंगी ..?
अब सूर्यास्त हो चुका था ,फिर भी कस्तूरी अपनी ही धुन में उसी दिशा में देख रही थी। वापस लौटनेवाले देवा को जब उसने देखा ,तब उसकी तंद्रा टूटी। गांव के बाकी लोगों की तरह देवा दिहाड़ी पर काम करता था। आजकल एक ठेकेदार के पास वे सभी लोग लकड़ी तोड़ने का काम कर रहे थे। देवा हर रोज सुबह जंगल में जाता था और निर्देशित की हुई लकड़ियाँ काटकर ट्रक में चढ़ा देता। उस दिन की मजदूरी लेकर शाम को वापस आ जाता। सब लोगों के साथ देवा वापस आ जाता।
देवा को देख कर कस्तूरी अंदर आ गई। रसोई में रखी दो अल्युमियम की थालियां निकाली और खाना परोसा। बुढ़िया भी बिस्तर से उठी और कस्तूरी के पास आकर बैठ गई। हाथ पांव धोकर देवा घर में आ गया और खाना खाने बैठ गया। दोनों ने चुपचाप खाना खाया और बाहर जाकर बैठ गए। बुढ़िया की आवाज कस्तूरी ने सुन ली।
दुष्ट, मेरे बारे में बता रही होगी। अपनी थाली लेकर वह खाने बैठ गई। एक ओर बाहर का संवाद सुन रही थी।
कुछ अस्पष्ट सी बातें सुनाई दे रही थी,.
गद गद आवाज में देवा ने कहा ,” जी अब समय आ गया है।
मतलब मेरी ही बातें चल रही हैं। लेकिन बुढ़िया की आवाज सुनाई नहीं दी।
देवा कह रहा था ,” दो हफ्तों के बाद उसे उधर छोड़ के आएगा। “
अब कस्तूरी समझ गई। यह सच है, मुझे भी जाना है। आँखें पोछते हुए एक ओर वह खाना खा रही थी।
अपना बिस्तर लेकर देवा वरांडे में आ गया। बुढ़िया ने अंदर अपनी गुदड़ी बिछा थी और सो गई। बर्तन मांज कर कस्तूरी अंदर आ गई। फानूस के प्रकाश में उसने अपनी चद्दर बिछा ली और लेट गई। पर कितने दिन हो गए उसे ठीक से नींद नहीं आ रही है। आज भी वही हाल है। वसु की बातें उसके मन में गूंज रही है। ‘ सब कुछ अपने आप को करना पडता है। मदद करने के लिए कोई नहीं होता। बहुत डर लगता है। ‘ लेकिन यह सब निभाना पड़ेगा और कोई रास्ता नहीं है। हिम्मत रखनी पड़ेगी। फिर देर से कभी वह सो गई।
सुबह-सुबह गांव में मेडिकल कैंप लग गया था। स्पीकर पर घोषणा हो रही थी। सुनो सुनो गांव में डॉक्टर आ गए है।
वसु कस्तूरी को बुलाने आ गई और दोनों कैंप की ओर जाने लगीं।
सरकार द्वारा छोटे-छोटे गांव में मेडिकल कैंप लगाने का आदेश होता था। हर वर्ष दो तीन बार नए सीखे हुए डॉक्टर गांव में आकर मुफ्त में इलाज करते। गांव के आंगन में यह कैंप होता था ,सफेद कोट पहने बहुत से डॉक्टर वहाँ उपस्थित होते थे। इलाज के लिए गांव के लोगों की भीड़ हो जाती। गांव की बहुत-सी औरतें बच्चों को टीका लगाने आ जाती। बाकी लोग अपने इलाज के लिए आ जाते। जो लोग यहाँ नहीं आ सकते, उनकी जाँच के लिए उनके घर जाकर इलाज करते। कस्तूरी और वसु भी कतार में खड़ी रही। कस्तूरी को बड़े गांव के इन लोगों का बहुत आकर्षण था। खुद की जांच करना एक बहाना था। इन लोगों का काम देखना उसे बहुत पसंद था। उनकी बात सुनना ,विशेष रूप से लड़कियों को , वे किस तरह पुरुषों के कंधे से कंधा मिला काम कर करती हैं ,उनका बर्ताव ,रुतबा यह सब उसके लिए अद्भुत था। वह वसु से कहती ,
“ यह लड़कियाँ यह सब कैसे कर सकती हैं ?’
अपना नंबर आने पर उसने अपना नाम ,उम्र सब बता दिया। जाँचनेवाली डॉक्टरनी उसे तंबू में ले गई। जांचने पर उसने कस्तूरी से कहा , “ देखिए ,आप और आपका बच्चा दोनों स्वस्थ है। चिंता की बात नहीं है ,परंतु प्रसूति के समय समस्या आ सकती है। इसलिए प्रसूति के लिए अस्पताल में जाना ठीक है, आप हमारे यहाँ आ जाइए। वहाँ आप की अच्छी तरह से देखभाल होगी।
कस्तूरी ने सिर्फ मुंडी हिलाई। अब उनको क्या कहेगी ?
हम इस गांव की परंपरा जानते हैं ,इसलिए सब के सामने नहीं बताया। अगर यहाँ गांव में बच्चे को कुछ तकलीफ हुई तो कौन इलाज करेगा ?”
कस्तूरी चुप रही। वह जानती थी अस्पताल में जाना देवा को मंजूर नहीं होगा और कल रात की बात से स्पष्ट हो गया था।
“ प्लीज आप मेरी बात पर ध्यान दीजिये ,यहाँ जन्मे बालक एक साल से ज्यादा नहीं जी सकते और उनकी माताएं भी बीमार हो जाती हैं। “
कस्तूरी के चेहरे पर मुसकान की हलकी रेखा उभरी और बाहर निकली।
“ क्या कहा ?” वसु ने पूछा
“ प्रसूति के समय अस्पताल आ जाइये। “
वसु हँसने लगी “ फिर उधर ही रहो ,तुम्हारा पति तुम्हे वापस घर में प्रवेश नहीं देगा। “ मजाक करते हुए वसु ने कहा।
यह बात सच थी। गांव की कुछ औरतें प्रसूति के लिए अस्पताल गई थीं। लेकिन वह सुविधा अपने नसीब में नहीं है।
दोनों कुछ देर वहाँ बैठी रही। कैंप का वातावरण साहसी लग रहा था। सब देख कर वह बहुत खुश हुई ,अपनी प्रसूति की चिंता भी भूल गई।
कुछ दिनों बाद नौवां ख़त्म होने को आ गया। अब उसका डर बढ़ने लगा था।
“ कल सुबह काम पर जाते समय तुम्हे झोपडी पर छोड़ दूंगा। “ खाना कहते समय देवा ने कह दिया।
“ मालूम है न क्या-क्या करना पड़ता है ?” बुढ़िया ने पूछा।
“ जी, हाँ। “कस्तूरी ने डरते हुए जवाब दिया।
खाना खाने के बाद कस्तूरी ने दूसरे दिन की तैयारी शुरू की। अपनी छोटी सी संदूक से दो साड़ियाँ निकली। छोटे डिब्बे में सीधा भर दिया। बाकी सब वहाँ होगा। पूरा सामान दरवाजे के पास रख कर वह सोने चली गई। उसने मन ही मन निश्चय किया था। हम वहीं जाएंगे और बच्चे को जन्म देंगे। बिना किसी की मदद के। अकेले।
सुबह हो गई। शांत मन से कस्तूरी काम कर रही थी। उसने खाना बनाया और देवा के साथ जाने के लिए निकली। इतने में वसु आ गई। उसके हाथ में एक गुदड़ी थी। कस्तूरी के हाथ में रखते हुए उसने कहा ,”जरुरी है। “
धीरे से कान में कहा ,” अंदर लड्डू रखे हैं। ‘
उसने कस्तूरी को गले लगाया। उसके हाथ काँप रहे थे। वसु को महसूस हुआ। उसे सीने से लगा कर उसने कहा ,”सब ठीक हो जाएगा। चिंता मत करना। “ वसु अपना पड़ोसन का धर्म बहुत अच्छे से निभा रही थी। वसु ही उसका आधार थी।
मन में कुछ भय लेकर कस्तूरी देवा के पीछे पीछे चल रही थी। गांव की झोपड़ियाँ ख़त्म हुई और खेत दिखने लगे।
तैयार हुई चावल की फसल हवा में डोल रही थी। बीच-बीच में उसकी साडी को छू कर जैसे उसे हिम्मत दे रही थी।
कुछ देर चलने के बाद जंगल शुरू हो गया। पगडंडी बहुत संकरी होगी। और आगे जाने पर देवा रुक गया। उसके पीछे कस्तूरी भी रुक गई। सामने एक चबूतरे पर बनाई हुई एक झोपडी थी। दरवाजे के सामने तीन सीढियाँ थी। देवा के बाजू में वह खड़ी हो गई।
“ रहोगी न ठीक से?” देव ने पूछा।
शादी के बाद पहिली बार देवा ने इस तरह चिंता व्यक्त की थी। देवा बुरा नहीं था ,लेकिन इस तरह पूछताछ करते हैं यह बात ही उसे मालूम नहीं थी।
कस्तूरी ने फिर से , मुंडी हिलाई।
“ एक महीने के बाद तुम्हे लेने आ जाऊंगा। “ कहते हुए देवा निकल गया।
कस्तूरी कुछ आगे बढ़ी। झोपडी के आजू-बाजू में फल के पेड़ थे। दूसरी बाजू में ऐसे ही कुछ सब्जियां थी। लेकिन उन पर किसी का ध्यान नहीं था। इसलिए वह मुरझा गई थी। झोपडी के निकट आने पर विचित्र बदबू आने लगी। उसे मितली सी हुई। धीरे से उसने झोपडी की सीढ़ियां पार की और झोपड़ी का दरवाजा खोल कर अंदर गई। अंदर प्रकाश था। उसने अपना सामान नीचे रखा और झोपडी का मुआयना किया। दरवाजे के पास कुछ चादर तह कर रखी थी। दीवार के पास टीन के डिब्बे थे और उसके बाजू में चूल्हा था। चूल्हे के ऊपर एक खिड़की थी। तीसरी दीवार के पास कुछ और सामान और पानी भरने के लिए बर्तन और घमेला ।
वसु की बातें उसे याद आयी , कलसी लेकर वह पानी लाने गई। झोपडी की दायी ओर चलते हुए उसे झरना दिखाई दिया। पहले उसने ठंडे पानी से मुँह धोया और कलसी भर दी। घर में तो हर रोज यह काम वह करती थी,इसलिए उसे कोई तकलीफ नहीं हुई। आस-पास की लकड़ियाँ इकठ्ठा की और झोपडी में आकर चूल्हा जलाया। रोटी बनाई। प्रसूति अकेले करने का डर था लेकिन आजू बाजू में कोई नहीं है इस खुलेपन से उसे राहत मिली। अब इस तरह कुछ दिन ही सही अकेले रहने का उसे अलग ही आकर्षण लगा। स्वतंत्र , सम्मान के साथ बिलकुल मेडिकल कैंप की लड़कियों की तरह !
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। दूसरे ही दिन उसके पेट में दर्द होने लगा। समय आ गया। उसी अवस्था में उसने कुछ काम निपटाएँ। जमीन पर चादर बिछा दी। बाजु में दो घमेला रख दिए । एक में पानी भर दिया। अपनी पुरानी नरम साडी पास में रखी। बाहर से एक नुकीला पत्थर ले आई। उसे साफ किया और घमेले के पास रख दिया। गुदड़ी और पुराने फटे कपड़े भी बाजू में रखे। दरवाजा खुला रखा और दीवार से टेक कर चादर पर बैठ गई। इतने में वेदना की बड़ी लहर उसके कमर से उठी। मस्तक तक पहुँच गई। एक मिनट में वह ख़त्म हुई ,लेकिन भयानक दर्द था। वह सोच रही थी कब आएगा बच्चा बाहर ,तब तक दूसरी लहर आ गई। धीरे धीरे यह लहरें एक के पीछे एक आने लगी। वह पसीना-पसीना हो गई। जिस गुदड़ी पर बैठी थी उसे अपनी मुट्टियों में कस के पकड़ा। वेदना की तीव्रता के अनुपात में उसकी मुट्ठियां और कस जाती। आधा-पौने घंटे के संघर्ष के बाद बच्चा बाहर आ गया। साडी बाजू हटाकर उसने बच्चे को हाथ में लिया। स्पर्श होते ही वह रोने लगा। कस्तूरी को अब कुछ अच्छा लगा। लेकिन काम बाकी था। वह बहुत कमजोर हो गई। अपनी सामग्री उसने निकट रखी थी। फटे कपड़े को भिगो कर उसने बच्चे को धीरे से पोंछ लिया। बच्चा खून से सना हुआ था। बच्चा साफ हो गया और पानी लाल हो गया। अब उसने बच्चे की नाल जमीन पर रख दी। उसे तोड़ने के लिए नुकीले पत्थर से उस पर आघात किया। वह नहीं टूटी। अपनी चमड़ी कितनी मजबूत होती है। थके हुए हाथों से बारबार घाव करने पर वह टूट गई। जन्म देते समय हुई वेदना से यह वेदना ज्यादा नहीं थी।
बच्चे को साडी में लपेट कर सीने से लगाया। कुछ ही क्षणों में वह शांत हुआ और सो गया। सोये हुए बच्चे की ओर देखकर उसका चेहरा खिल उठा। नौ महीने के बाद पहली बार उसका मन प्रसन्न था। राहत भरी साँस लेकर उसने अपना सिर दीवार से टेक दिया और वह भी सो गई।
कुछ देर बाद वह जग गई। बच्चा सो रहा था। वातावरण में उसे विचित्र बू आ रही थी ,सूखे हुए रक्त की। जब उसने झोपडी में प्रवेश किया था तब उसे यही बदबू आ रही थी। उसकी साडी रक्त से भीग गई थी। अब सब कुछ समेटना चाहिए कहते हुए उसने बच्चे को बिस्तर पर रख दिया। दरवाजे से ठंडी हवा का झोंका आया। आँखें बंद कर के उसने ठंडी हवा का आनंद लिया। फिर आँखें खोल दी और देखती रही। सामने तेंदुआ खड़ा था। वह कस्तूरी की ओर देख रहा था ,दरवाजा खुला था ,वह कभी भी अंदर आ सकता था। अगर दरवाजा बंद करने वह उठती तो भी भय से हमला कर सकता था। वह चुपचाप बैठी रही। कुछ देर बाद उसने कस्तूरी की ओर एक बार देखा और वह चला गया। थोड़ी देर के बाद उसने दरवाजे से बाहर झांक कर देखा और दरवाजा बंद किया। उसे लगा शायद उस पुराने खून की बू से वह आया होगा।
इस हमले के भय से उबरने के बाद उसे अपने शरीर की याद आयी। शरीर में बहुत दर्द था और बहुत भूख लगी थी। उसे वसु ने दिए हुए लड्डू याद आए। मन ही मन वसु को धन्यवाद देते हुए उसने पांच छह लड्डू खा लिए। पानी पी लिया। कुछ चीजे समेटने की शुरुआत की। पहले साडी बदल दी। फिर बच्चे के साथ आया हुआ खून और बाकी सब कुछ खाली घमेला में रखा। झरने पर जाकर चादर धो डाली। झोपडी का सामान उसने पूर्ववत रख दिया। क्योंकि कोई दूसरी औरत अगर प्रसूति के लिए आ जाएगी तो उसे असुविधा नहीं होनी चाहिए। अब उसे अपना पति, सास,अपना गांव याद आया। लेकिन उस घर में जाने की उसे कतई इच्छा नहीं थी। लेकिन अब उसके साथ उसका बच्चा होगा। मानो उसका आधार। यही उसकी जिंदगी होगी। वह पूरी दुनिया को भूल जाएगी। कस्तुरी खुद को समझा रही थी आनेवाली जिंदगी से लड़ने के लिए खुद को मजबूत बना रही थी।
अपने ही घर में बच्चा पलेगा ,ऐसी आदते ,ऐसे ही कष्ट। अगर बेटा है तो हालत कुछ ठीक है लेकिन लड़की होगी तो .. अचानक उसे याद आया उसने बेटा जना है या बेटी, ठीक से देखा ही नहीं। अपने बच्चे के पास गई, बेटा ही हो !वह यह प्रार्थना इसलिए कर रही थी क्योंकि अपनी बेटी के हिस्से में वह उसके जैसे कष्ट नहीं चाहती थी। कस्तूरी ने देखा वह लड़की थी। कस्तूरी के पाँव के नीचे की जमीन सरक गई। बेटी का भविष्य उसकी आँखों के सामने साकार हुआ। बचपन ,शादी ,गृहस्थी और प्रसूति ! वह भी इस झोपडी में ,मेरे जैसे अकेले ,कष्ट सहते हुए … मैंने जो कुछ भी सहा मेरी बेटी को जानबूझ कर सहने के लिए विवश करू ? यह कैसी माँ ? कस्तूरी इस स्थिति से बाहर निकलना चाहती थी। उसका पति कुछ दिनों बाद उसे लेने आ जाएगा। उसके आने से पहले कुछ निर्णय लेना चाहिए।
अगर मैं इसे पढ़ाने में साथ दूँ तो ? लेकिन मेरा पति ,वह क्या कहेगा ?वह भी इस तरह विचार करेगा ?कि गांव की लड़कियों की तरह इसकी जल्दी शादी कर देगा ?और अगर शादी हो गई तो अपना कोई हक़ ही नहीं रहेगा। नहीं, ऐसा नहीं चलेगा। मैं अपनी बेटी को पढ़ाऊंगी। उस सफेद कपड़ों वाले डॉक्टर की तरह स्वतंत्र और सुविद्य। फिर उसकी जिंदगी सार्थक होगी। कस्तूरी पूरी रात यही सोचती रही। यह कैसे संभव होगा उसे नहीं मालूम। बीच में जब बच्चा जग जाता उसे दूध पिलाती ,खुद के लिए कुछ खाना बनाती और फिर सोचने लगती।
जब मैं घर में थी और बच्चे को झोपडी में जन्म देने का विचार कर रही थी ,तब भी मैं डर गई थी। लेकिन यहाँ आयी और अब … मैंने प्रसूति निभाई, बिना किसी की मदद के, अकेली थी। वैसे ही अपनी बेटी का भविष्य भी निभाएंगे। झोपडी के उस अकेले वातावरण में बहुत सोच विचार के बाद उसने अपने मन में एक निश्चय किया। लेकिन वसु ,उसे तो बताना चाहिए …. वह समझ लेगी !
अगली सुबह वह उठी और सब सामान समेटा। झोपडी की सफाई की। पानी भर लिया। सीधा बांध लिया। आवश्यक सामान उठाया और झोपडी का दरवाजा खोल दिया। घास पर आजू-बाजू में हिरण थे ,उन्हें देख कर वह प्रसन्न हुई। मानो उसे शुभकामना देने आए थे। उसने बेटी को उठाया और झोपडी का दरवाजा बंद कर के बाहर निकली। उसकी राह में खड़े हिरण एक ओर हो गए ,मानो उसकी राह खुली हो गई। आगे बढ़ने पर गांव की ओर जानेवाली पगडंडी थी। कस्तूरी रुक गयी। पीछे मुड कर झोपडी की ओर देखा। इस झोपडी ने कुछ कालावधि में उसकी और उसकी बेटी की जिंदगी बदल दी। कस्तूरी मुस्कुराई और मुड़कर गांव की विरुद्ध दिशा में चलने लगी।
