दिन विशेष में डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुँजन’ की कविता “घन गर्जन (सरसी छंद)”

Arjun Gupta 'Gunjan'

चला मगन घन अंबर-पथ पर,
करता अद्भुत शोर।
कहो इसे घन गर्जन या तुम,
कहो प्रणय की डोर॥
घुँघराले घन जटाजूट को,
जगती रही निहार।
घन के बौछारों से खेले,
वसुधा करे विहार॥
प्यास बुझेगी वसुधा की जब,
बरखा हो घनघोर।
कहो इसे घन गर्जन या तुम,
कहो प्रणय की डोर॥
पंख पसारे विपुल विपिन में,
नर्तन करे मयूर।
घन वर्षण की आस लगाए,
आनंदित भरपूर॥
अम्बुद की मधुरिम वाणी अब,
चली गगन के कोर।
कहो इसे घन गर्जन या तुम,
कहो प्रणय की डोर॥
प्रणय निवेदन सुन शुचि घन का,
हुआ मस्त वन मोर।
कितनी दूर अभी हो प्रियतम,
बरसोगे कित ओर॥

मधुर मगन मंजुल मयूर के,
मन में उठे हिलोर।
कहो इसे घन गर्जन या तुम,
कहो प्रणय की डोर॥
अकुलाते नित नद-नाले भी ,
हुए ताप से त्रस्त।
बाट जोहते हैं जलधर का,
अवसादों से ग्रस्त॥
वर्षा रानी का आलिंगन,
पाकर हुए विभोर।
कहो इसे घन गर्जन या तुम,
कहो प्रणय की डोर॥
विपिन विटप के नव पल्ल,व को,
बूँदें लेती चूम।
लहराती हैं उपवन में नित,
नव लतिकायें झूम॥
उमड़-घुमड़ घन नर्तन करता,
फैला नभ के छोर।
कहो इसे घन गर्जन या तुम,
कहो प्रणय की डोर॥

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »