मास्टर स्ट्रोक की फिल्म : स्वरांगी साने
‘दर्शकों को एंगेज रखना था, उनका इंटरटेनमेंट नहीं करना था।’ फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल जब यह बात कहते हैं तो वास्तव में वे अपने हुनर में मास्टर प्रतीत होते हैं। एंगेज करना महज व्यस्त रखना नहीं होता, बल्कि जोड़े रखना होता है। आज के निर्देशक मनोरंजन पर अधिक जोर देते हैं, जबकि बीती सदी के निर्देशक अपने दर्शकों के जुड़ाव को अधिक महत्व देते थे। इसी तरह बेनेगल एक बात और कहते हैं कि, ‘आज फिल्मों की रिव्यू लिखी जाती है, समीक्षा नहीं होती। फिल्म अच्छी है या बुरी, चलेगी या नहीं, इसे ट्रेंड मेकर सेट करते हैं।’ खालिद मोहम्मद ने ‘द मास्टर: श्याम बेनेगल’ लगभग 90 मिनट की डॉक्यूमेंट्री बनाई है, जिसे नसीरुद्दीन शाह ने नरेट किया है। यह श्याम बेनेगल के जीवन और सिनेमा पर वर्ष 2022 में बनी डॉक्यूमेंट्री है, जिसे अब यूट्यूब पर देखा जा सकता है। इसमें बताया गया है कि कैसे वे स्कूल से भागकर हॉलीवुड और सोवियत फिल्मों को देखने सिनेमाघर चले जाते थे। फिल्म में उनके उस सफर को भी दिखाया गया है कि कैसे वे विज्ञापन की दुनिया से निकलकर वर्ष 1970 के दशक की ‘इंडियन न्यू वेव’ के बड़े फिल्ममेकर बने।
इसमें ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘भूमिका’ जैसी दमदार क्लासिक फिल्मों से लेकर मुस्लिम महिलाओं पर बनी ट्रिलॉजी (मम्मो’, ‘सरदारी बेगम’ और ‘जुबैदा’) और हिट कॉमेडी ‘वेलकम टू सज्जनपुर’, टीवी सीरीज और सत्यजीत रे पर बनी डॉक्यूमेंट्री से लेकर उनकी आखिरी फिल्म ‘वेल डन अब्बा’ (वर्ष 2010) तक का जिक्र है। पर यह केवल उनकी फिल्मों की सूची प्रस्तुत करने वाली डॉक्यूमेंट्री नहीं, बल्कि ऐसे फिल्मकार को समझने का प्रयास है, जिसने हिंदी सिनेमा में समानांतर और यथार्थपरक सिनेमा की मजबूत जमीन तैयार की। बायोपिक श्रेणी की इस फिल्म में बेनेगल स्वयं अपनी यात्रा और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया तो बताते ही हैं, उनके साथ काम करने वाले अभिनेता-अभिनेत्री, पटकथा-संवाद लेखक, संगीत निर्देशक, सहायक निर्देशक और फिल्म समीक्षक भी उनके बारे में अपनी-अपनी राय देते हैं। शबाना आजमी-स्मिता पाटिल, इसी तरह नसीरुद्दीन शाह-ओम पुरी तथा संगीत निर्देशक वनराज भाटिया-ए.आर. रहमान से जुड़े प्रसंग भी फिल्म में उन्हीं की जुबानी सामने आते हैं।
खालिद ने यह डॉक्यूमेंट्री बेनेगल की महानता का सम्मान करने के लिए बनाई है कि कैसे उन्होंने हिंदी सिनेमा को सिर्फ कमर्शियल होने के दायरे से बाहर निकाला। डॉक्यूमेंट्री की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें बेनेगल को ‘महान निर्देशक’ भर नहीं कहा है। उनके काम को उनके साथ काम कर चुके कलाकारों और सहयोगियों की स्मृतियों के जरिए देखने की कोशिश की गई है। शबाना, जावेद अख्तर, नसीरुद्दीन, ओम पुरी, मनोज बाजपेयी, करिश्मा कपूर, अनिल कपूर, सुरेखा सीकरी और गोविंद निहलानी जैसे कलाकारों एवं फिल्मकारों के अनुभव इसमें बेनेगल की कार्यशैली के अलग-अलग पहलू सामने लाते हैं।
खासकर ग्रामीण समाज, स्त्री जीवन, सामाजिक असमानता और सत्ता-संबंधों को उन्होंने जिस संवेदनशीलता से पर्दे पर रखा, वह उनके सिनेमा की पहचान रही है। बहुत कम निर्देशकों ने सामंती और सामाजिक उत्पीड़न को इतनी गहराई से दिखाया या किरदारों को समझने और दिखाने में इतनी महारत हासिल की है। डॉक्यूमेंट्री में बताया गया है कि वर्ष 1940 के दशक के आखिर में जब श्याम बेनेगल हैदराबाद में कॉलेज छात्र थे, उन्होंने सामंती जमींदारों के खिलाफ तेलंगाना के किसानों के विद्रोह को बहुत करीब से देखा था। आंदोलन का समर्थन करने वाले उनके कई दोस्तों को जेल जाना पड़ा। इस घटना ने बेनेगल की फिल्मों जैसे ‘अंकुर’ (वर्ष 1974), ‘निशांत’ (वर्ष 1975) और ‘मंथन’ (वर्ष 1976) की वैचारिक नींव रखी। ये तीनों फिल्में एक तरह से एक ट्रिलॉजी (तीन फिल्मों की एक कड़ी) थीं, क्योंकि ये सामंती व्यवस्था में हो रहे बदलाव को दिखाती हैं। यह वह दौर था, जब ऋषिकेश मुखर्जी और मनमोहन देसाई रोमांस और कॉमेडी को रजत पटल पर ला रहे थे, तो बेनेगल ने सिनेमा में सामाजिक यथार्थवाद को शामिल किया। उनकी फिल्म-निर्माण शैली सत्यजीत रे और विटोरियो डी सिका से प्रेरित थी, लेकिन उनकी फिल्में पूरी तरह से उनकी अपनी मौलिक थीं।
बेनेगल की पहली फिल्म ‘अंकुर’ ग्रामीण और शहरी दोनों परिवेशों में जाति, क्लास और जेंडर के उलझाव को सरल लेकिन प्रभावशाली ढंग से दिखाती है। बेनेगल ने कॉलेज के दिनों में ही इसकी स्क्रिप्ट लिखी थी, जो एक सच्ची घटना पर आधारित थी। बेनेगल ने खुद कहा है कि राजनीतिक फिल्में ‘वक्त आने पर सही इंसान के सामने आने’ वाली कहावत की तरह बनती हैं। ‘अंकुर’ सामंती संस्कृति के फैलाव, महिलाओं के पुरुषों के अधीन होने और सत्ता के समीकरणों को बदलने की कोशिशों को दिखाती है। डॉक्यूमेंट्री में कहा गया है कि इसके क्लाइमेक्स को दबे-कुचले किसानों की चेतना के जागने के एक सशक्त उदाहरण के तौर पर देखा गया। ‘मंथन’ की कहानी युवा पशु चिकित्सक के इर्द-गिर्द है, जो गरीब ग्रामीणों को प्रेरित करते हैं कि वे अपने बेचे जाने वाले डेयरी उत्पादों पर खुद नियंत्रण रखें, जिससे एक बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा हुआ। इस फिल्म में कच्ची सड़कें, फूस की छतों वाली झोपड़ियां और बैकग्राउंड में असली किसान, आदर्शवाद और यथार्थवाद का शानदार मेल हैं। किसी मूर्तिकार की तरह बेनेगल ने कहानी में ऐसे किरदार गढ़े हैं, जो आपस में मजबूती से जुड़े हैं। बिंदू के रोल में स्मिता पाटिल, गिरीश कर्नाड के डॉक्टर मनोहर राव, जो कोऑपरेटिव डेयरी प्रोजेक्ट के लिए दूध का सैंपल लेने आए हैं, को जिस तरह खरी-खोटी सुनाती हैं, वह हैरान कर देता है। भैंसों की देखभाल करने का नसीरुद्दीन शाह का अंदाज, बातचीत में हाथों का इस्तेमाल, आवाज का उतार-चढ़ाव, डर और शहर वालों के प्रति उनका गुस्सा आदि फिल्म को बेहतरीन बनाते हैं। गांव के दबंग और दूध के कारोबार पर कब्जा रखने वाले अमरीश पुरी अपनी तीखी नजर, धीमी आवाज और सख्त चेहरे से ऐसे बुरे आदमी का बेहतरीन चित्रण करते हैं, जिस पर रोज की पूजा-पाठ का कोई असर नहीं होता। सबसे बड़ी बात यह थी कि 5 लाख गुजराती किसान इस फिल्म के असली निर्माता थे, जिन्होंने दो-दो रुपये जुटाकर फिल्म बनाई थी।
इसके बाद बेनेगल ने मराठी अभिनेत्री हंसा वाडकर की बायोपिक ‘भूमिका’ बनाई। इस रोल के लिए बेनेगल ने शबाना आजमी से संपर्क किया। शबाना आजमी को कहानी तो पसंद आई, लेकिन उन्होंने रोल करने से मना कर दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि वह उस किरदार को पूरी तरह से जी नहीं पाएंगी। फिर यह भूमिका स्मिता पाटिल ने निभाई। इसके बाद बनी सामंतवाद की तीखी आलोचना करने वाली फिल्म ‘निशांत’ पर सेंसर बोर्ड ने रोक लगा दी थी, क्योंकि इसे ‘व्यवस्था के बहुत ज्यादा खिलाफ’ माना गया था। ‘अंकुर’ और ‘मंथन’ में जाति और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों को उठाने के बाद बेनेगल ने ऐसी सामाजिक व्यवस्था को दिखाया है, जिसमें न्याय का नामोनिशान नहीं है। पुलिसवाले कमजोर और डरपोक हैं, स्कूल का टीचर बेबस गुस्से में जी रहा है और आम ग्रामीण बेबस दर्शकों की तरह सब कुछ देख रहे हैं।
डॉक्यूमेंट्री का दिलचस्प पक्ष बेनेगल के व्यक्तित्व को उनके सिनेमा से अलग करके देखने की कोशिश है। वे अत्यंत संयमित और कम बोलने वाले व्यक्ति थे। साथ ही उनके सहयोगियों की बातें उनके भीतर के बेहद सजग और अनुशासित फिल्मकार को उजागर करती हैं। खालिद मोहम्मद के लिए यह फिल्म व्यक्तिगत भी है। वे स्वयं बताते हैं कि बेनेगल के साथ पटकथा लेखन के दौरान उन्होंने कहानी कहने की कई बारीकियां सीखीं। ‘मम्मो’, ‘सरदारी बेगम’ और ‘जुबैदा’ जैसी फिल्मों से उनका रचनात्मक रिश्ता रहा, इसलिए डॉक्यूमेंट्री में प्रशंसा के साथ-साथ आत्मीयता और कृतज्ञता का भाव भी दिखता है।
फिल्म का विषय इतना व्यापक है कि 90 मिनट की अवधि में श्याम बेनेगल की पूरी रचनात्मक यात्रा को समेटना मुश्किल हो जाता है। कुछ जगह डॉक्यूमेंट्री उनकी फिल्मोग्राफी की कालक्रमिक यात्रा जैसी लगने लगती है, पर यही इसकी सीमा भी है और आकर्षण भी। दर्शक को बेनेगल के सिनेमा की पूरी गहराई नहीं मिलती, बल्कि आगे उनकी फिल्में देखने की जिज्ञासा पैदा होती है। यह श्याम बेनेगल की फिल्मों की समीक्षा से अधिक उनके सिनेमाई व्यक्तित्व का दस्तावेज है। फिल्म देखते हुए लगातार लगता है कि श्याम बेनेगल ने सिर्फ फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि भारतीय समाज को देखने का एक अलग सिनेमाई नजरिया विकसित किया।
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सहभागिता: श्याम बेनेगल, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह, जावेद अख्तर, शमा जैदी, नीना गुप्ता, वनराज भाटिया, गिरीश कर्नाड
निर्माण-निर्देशन, पटकथा: खालिद मोहम्मद
भाषा: अंग्रेजी
अवधि: 90 मिनट

