प्रवासी रचना : “आंदोलन (कहानी-संग्रह “इमली का चटकारा” से)” – डॉ. योजना शाह जैन
“आंदोलन” एक रोमांचक कहानी है जिसमें एक आंदोलन के परिदृश्य को जीवन्त रूप में रूपायित किया गया है. आंदोलन से उद्भूत तबाही और अराजक स्थिति में एक मज़दूर की दिनचर्या को अत्यंत चित्रोपम रूप में प्रस्तुत किया गया है. अवश्य इस कहानी का अनुशीलन करें तथा अपनी प्रतिक्रिया भी कमेंट बॉक्स में दें! – डॉ. मनोज मोक्षेंद्र, संपादक

आंदोलन (कहानी-संग्रह “इमली का चटकारा” से)
आसमान शहरों में नीला कहाँ दिखता है आजकल? पर, आज वो कितना नीला, कितना साफ़ था, नीली चादर की तरह बिछा हुआ उसके सर के ऊपर। सूरज की एक-एक किरण हजारों टुकड़ों में टूट-टूट कर बेइन्तेहाँ सोना बिखेर रही थी। वाकई दिन इतना उजला था या ये उसका भ्रम है? क्योंकि बड़े अरसे बाद आज उसकी आँखें धुँधली नहीं थी। दिल के अन्दर ख़ुशी और उम्मीद का नया सूरज चमक उठा था, जिसे पिछले कई दिनों से ख़ौफ़ और नाउम्मीदी ने निगल लिया था। आज वो सूरज फिर से बाहर आकर मुस्कुरा रहा था। यकीन नहीं हो रहा था उसे कि ये उसी की आँखें हैं, ये उसी शहर का आकाश है और उसी आकाश के फलक पर हर रोज़ चमकने वाला सूरज है।
तबाही की काली आंधी चले इस शहर में अभी चंद रोज़ ही गुज़रे थे। सारा शहर जला दिया था कुछ सरफिरों ने। जलती गाड़ियाँ, जलते घर, जलती दुकानें। वो आग का मंजर एक पल को फिर कौंध गया उसकी आँखों के आगे, फैले आकाश की चोटी पर बैठे सुनहरे सूरज की चादर पर और घुप्प कर निगल गया दो पल में उजाले को। आँखें मसलते हुए उसने एक बार फिर आसमान को ताका। डरावनी यादों ने यकायक फिर काला कर दिया आकाश, बुझा दिया सूरज और ले आया कुछ बदरंगी बादल यादों की पोटली से निकाल।
चंद रोज़ पहले, वो सो रहा था हर रोज़ की तरह चैन से। रात के कुछ घंटे ही तो मिलते थे उसे अपने शरीर को फिर दुनिया की जंग में हर रोज़ तैयार करने के लिए। परिवार से दूर, अनजाने शहर में, रोज़ी-रोटी के लिए मजदूरी करने वाला वो। मजबूर, दिहाड़ी मजदूर। जब पिछले साल गाँव में बाढ़ आई और रहे-सहे रोज़गार के सारे साधन, घर, सब बह गया, तो अपने कई और गाँव वालों के साथ चमकीले शहर की ओर बड़ी उम्मीदों से आया था वो भी। मेहनती था। मजदूर का काम किया, फिर चौकीदार बना और अभी दो महीने पहले ही किसी तरह पैसे जोड़ कर उसने ख़रीदा था उसका अपना ठेला। फलों की ठेली लगाता था वो।
जिस रोज़ ये हुआ उस रोज़ सेब और काले अंगूर से लदालद भरी थी उसकी ठेली। पिछले दो महीने की कमाई का निचोड़ उसके बहूमुल्य सेब और अंगूर। उस रात का सपना बहुत मीठा था। अपनी तीन साल की लड़की के लिए नयी फ्रॉक और बीवी के लिए साड़ी पसंद कर चुका था वो। “बस इस महीने के आखिर में पैसों के साथ ये भी भेजूंगा”, सोचा और थके-टूटे शरीर को उम्मीदों और छोटी छोटी ख़ुशियों के तकिये पे रख मीठी, गहरी नींद सो गया!
पर ये क्या? अगले दिन की उस अलसाई-सी दोपहरी में ये इतने सारे लोगों का हुजूम? जल्दी-जल्दी सब की दुकानें बंद करायी गयी। एक भीड़ बढ़ी चली आ रही थी उसकी ठेली, उसके सेब, अंगूर की तरफ़। भीड़, जिसका कोई चेहरा नहीं होता। जो खुद को एकदम बहुत ताक़तवर मानने लगती है। जिसको आसानी से गुमराह किया जा सकता है। जिसको आसानी से हथियार बनाया जा सकता है। वो नंगी तलवार सी भीड़, काटती चली गई, जलाती चली गई अपने रास्ते में आते सबको। उसकी समझ में कुछ नहीं आया। अपना एक एक सेब, अंगूर गिरता देख उसका दिल चीख़-चीख कर रो रहा था। उम्मीदें टूट रही थीं। उसने उस नंगी तलवार का जरा-सा विरोध क्या करना चाहा, उसे उठा कर वहीँ पटक दिया गया।
गाँव में पानी से बाढ़ आई थी और यहाँ लोगों के पागलपन की बाढ़। जो एक बार फिर उसका सब कुछ खा गयी। मकसद क्या था भीड़ का? सुना उसने उस भीड़ को चिल्लाते हुए-“हमारा हक दो, हमारी मांगें पूरी करो”, कुछ आकर्षण या आरक्षण जैसा कह रहे थे लोग। वो गंवार, नासमझ, अनपढ़ क्या समझता? इतना समझा कि भीड़ जुटी है नंगी तलवार बनके उस जैसे लोगों के सपनों को काट कर अपना हक लेने के लिए। बहुत अच्छा है। यही तो तरीका है। जब तक तलवार नहीं चलेगी, कोई लहूलुहान नहीं होगा, आग नहीं लगेगी, घर नहीं जलेंगे, किसी के सपने नहीं टूटेंगे, ग़रीबों की जान नहीं जाएगी, तब तक कैसा आन्दोलन? थू! शांति से किया जाने वाला भी कोई आन्दोलन होता है?
भीड़ तबाही मचा कर गुजर गई। जैसे गुजरता है अंधड़। और छोड़ गई अपने पीछे उसके जैसे कई कमजोर लोग और उनके छोटे छोटे सपनों के टुकड़े। कुछ टूटे, कुछ जले हुए। चारों तरफ तबाही थी। घुटनों बैठ, मुँह छिपा बहुत देर तक रोया वो। फिर किसी तरह अपने कमजोर बदन को उठाया, देखे अपने चोट के गहरे घाव और अपने आगे दम तोड़ते उसके दबे कुचले सेब, अंगूर, वो फ्रॉक, वो साड़ी, और इस महीने पैसे भेजने का अधूरा वादा।
बहुत कुछ जल गया चमचमाते शहर की सड़कों पर। सब दुखी थे सिवाए उनके जो अपने घरों में बैठकर जोर-जोर से अट्टहास लगा रहे थे अपनी शतरंज की चाल को कामयाब होता देखकर। वो ठेली उसके जीने का इकलौता साधन थी इस शहर में और गाँव में तो कुछ बचा ही नहीं था। ग़ौर फरमाइएगा कि ये बिना इंश्योरंश की ठेली थी, जिसे उस भीड़ रुपी नंगी तलवार ने काट डाला अपने हक को पाने की लड़ाई में।
“तुम्हारा हक? पता नहीं कितना जरूरी है तुम्हारा हक? पर मेरी रोटी पर लात मारने का हक तुम्हें किसने दिया? मेरे सपनों को जलाने का हक तुम्हें किसने दिया?” वो चीखता रहा। पर, किससे पूछे? आखिर किससे पूछे? अंधी, बहरी, बेशक्ल, बेवजूद भीड़ से? या उसको इस्तेमाल कर खेल खेलने वाली चालाक लोमड़ियों से?
उस दिन काले आकाश का सूरज स्याह था! आज का ख़ुशनुमा दिन, पर वो कल था। जो बीत गया। बड़े लोग, अमीर लोग हौसले, पॉजिटिविटी, सकारात्मकता की बातें करते हैं। भाषण देते हैं। पैसे देकर मोटिवेशनल स्पीच सुनने जाते हैं। पर आत्महत्या भी ज्यादातर ऐसे ही लोग करते हैं। जिगरा बड़ा तो गरीबों का होता है, जो बड़ी से बड़ी मुश्किल झेल जाते हैं। खोने के लिए जब ज़्यादा कुछ हो ही ना, तो गिर कर उठना आसान है।
आज बड़े दिनों बाद फिर सुबह हसीन, दोपहर अलसाई और शाम रौनकतरीन थी। आँखों में पानी का धुंधलका नहीं था। शायद इसीलिए आज साफ़ नीला आकाश चमकीले सूरज को अपनी चादर में टाँके, भरपूर सोना उगलते उसके सर पर तन कर खड़ा था। बहुत दिन लगे शहर को सदमे से उबरने में। पर, अब भीड़ अंधी, नंगी तलवार की जगह वापस आँखों वाले इंसानों में बदल गयी थी। लोग सब्जी, फल खरीदने निकले थे और मोल-भाव कर रहे थे उसके सेब अंगूर के लिए।
बहुत खुश था वो। सब कुछ भरा हुआ था आज दिल उम्मीद और खुशियों से, सड़क लोगों से, उसकी ठेली सेब अंगूर से और उसका झोला फ्रॉक और साड़ी से। पर, पिछले कुछ महीनों में जो अधूरा हो गया था–वो था उसका बदन…जिसमें अब एक ही किडनी थी।
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परिचय:
*डॉ. योजना साह जैन, समकालीन साहित्यकार, वक्ता एवं पॉडकास्टर हैं
*फार्माकोलॉजी में डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त डॉक्टर
*अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट जगत एवं उद्यमशीलता का दो दशकों का अनुभव है
*उनकी लेखनी में आधुनिक वैश्विक दृष्टिकोण और भारतीय जीवन-मूल्यों का सहज समन्वय
*तीन पुस्तकें प्रकाशित-उपन्यास: “बनारस मीट्स बर्लिन”; कथा-संग्रह: “इमली का चटकारा” तथा काव्य संग्रह: “कागज़ पे फुदकती गिलहरियाँ”
*योजना साहित्यिक संस्था- “लिपि” (LIPI) यूरोप की अध्यक्ष के रूप में प्रवासी एवं वैश्विक मंचों पर साहित्य संवर्धन हेतु लगातार सक्रिय
*लोकप्रिय पॉडकास्ट, ”राइटफुली योर्स” का संचालन
*सांस्कृतिक एवं सामाजिक अवदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित “जर्मन इंडियन पर्सनैलिटी अवार्ड” से अलंकृत
*संप्रति बर्लिन (जर्मनी) में रहकर स्वतंत्र लेखन एवं पत्रकारिता
