दिन विशेष अनुवाद में स्वरांगी साने की मूल हिंदी कविता का सुधीर देशपांडे द्वारा मराठी अनुवाद

Sudhir deshpaandey

“नर्तकी” : सुधीर देशपांडे

वंदन करीत येईल
नर्तकी
त्यानंतर करेल आमद

वेळेवर वाचेल ही बोलांना
निभावेल मात्रेत

ती बेताल होणार नाही
ती शब्दांबरोबर
तालबद्ध नाचेलही

तिच्या भाव-भंगिमा
कसक मसक
सर्व होतील अविश्वसनीय रूपे
सटीक
करेल लयकारी

बोटांच्या मुद्रांवर दाखवेल हाव
डोळ्यांच्या कडेने भाव

तिचा अभ्यास
तिच्या नाचण्यात स्पष्ट दिसेल

किती मात्रांनंतर मान किती फिरवायची
हे देखील कंठस्थ असेल तिला

ती चुकूनही करणार नाहीं
कोणती ही चूक
वाजतच राहतील
तिचे घुंगरू

जेव्हां ती करेल ठुमरी
तर तिच्या बरोबर
तुम्ही देखील गुणगुणणार
‘हमरी अटरिया पर आओ बलमवा’

तिच्या सादरीकरणात ती प्रत्येक बाब असणार
जी तुम्ही बघू इच्छिणार

स्थिर वरून सुरू होत
द्रुत पर्यन्त पोहोचेल ती
लय वाढेल
चरमवर असेल नृत्य तिचे
ती नटवरी करेल आणि
शुद्ध नर्तन ही
तुम्ही चमत्कृत व्हाल
ती हतप्रभ करेल

टाळ्यांच्या गजरात
ती थांबेल समेवर
जाईल वीथिकेत
परतेल पुन्हा आपल्याच अंधारात

मूल रचना : “नर्तकी” – स्वरांगी साने

वंदन करते हुए
आएगी नर्तकी
उसके बाद करेगी आमद

ठीक समय पर पढ़ेगी बोलों को
निभाएगी मात्राओं में

वो बेताली नहीं होगी
वो शब्दों के साथ चलेगी
तालबद्ध नाचेगी

उसकी भाव-भंगिमाएँ
कसक-मसक

सब होंगे अविश्वसनीय तरीके से सटीक
करेगी लयकारी

अंगुली के पोर से दिखाएगी हाव
आँखों की कोर से दिखाएगी भाव

उसका रियाज़
उसके नृत्य में दिखेगा साफ़-साफ़

कितनी मात्रा के बाद गर्दन को कितना घुमाना है
यह उसे कंठस्थ होगा

वो भूलकर भी नहीं करेगी कोई गलती
बजते रहेंगे उसके घुँघरू

जब करेगी वो ठुमरी
तो उसके साथ
आप भी गुनगुनाएँगे
‘हमरी अटरिया पर आओ बलमवा’

उसकी प्रस्तुति में हर वो बात होगी
जो आप चाहेंगे देखना

ठाह से शुरू कर
वो द्रुत तक पहुँचेगी
लय बढ़ेगी
चरम पर होगा उसका नर्तन
वह करेगी तांडव
करेगी लास्य
नटवरी करेगी
और शुद्ध नर्तन भी

आप चमत्कृत होंगे
वो हतप्रभ करेगी

तालियों की गड़गड़ाहट में
वो थमेगी सम पर
जाएगी विंग्स में

लौटेगी फिर से अपने अँधेरे में।

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