दिन विशेष व्यंग्य : “हम विकास करके  रहेंगे” – डॉ.संदीप अवस्थी

हर कोई विकास की चर्चा कर रहा है। सभी बड़े लोग विकास चाहते हैं। विकास आ रहा है,विकास होगा,विकास खुशहाली लाएगा,सुन-सुनकर सभी हैरान और परेशान। यह विकास कौन है जो आजादी के बाद से अब तक तो नहीं आया? और अब आ रहा है,तो देखें तो कैसा लगता है विकास? हमारे रामनाथ भैया और उनकी बस्ती के सभी लोग तो विकास विकास,प्रगति के भोकाल से ऐसे सहमे कि दुबक गए अपने कच्चे घरों में।
वह घर जिनमें टॉयलेट पक्का था और गैस का चूल्हा भी था, पर सिलेंडर नदारद था। विकास आया भी पर ग्राम प्रधान पति और बीडीओ ने उसे अपने ही यहां ऐसा रोक लिया कि वह अभी तक वहीं बैठा हलवा पूरी,दारू मुर्गा खा खाकर बैठा रहता है। जबकि यह सारे भूमि,माटी और लोक से जुड़े लोग अभी भी इंतजार में हैं कि विकास की एक नजर उन पर भी हो जाए। आधी सदी बीत गई पर नहीं हुआ विकास दर्शन।अनेक लोग इसी आस में अपने जर्जर शरीर,बंजर खेत और बचुआ को नौकरी लगेगी की आस लिए स्वर्गवासी हो गए। नहीं नहीं,जब धरती पर जीतेजी,आंखों के सामने ही नर्क भुगता है जीवन भर तो ऊपर आसमान के पीछे,जहां सब अटकलबाजी है ,वहां क्या स्वर्ग लोगे? वहां कोई इससे अलग हालात थोड़े ही हैं? उल्टे इससे बदतर न हो कहीं तुम्हारे लिए?

आजकल दिल्ली राज्य में विकास आ गया है।लोगों ने बाकायदा वोट देकर और डबल इंजन के साथ बुलाया है। बहुत हो गया अच्छे स्कूल,फ्री बस,वाईफाई,राशन,इलाज पानी,बिजली लूट लिया जनता ने ही सरकार को। इनके चक्कर में और राज्य के लोग भी बिगड़ गए।विकास बैठा बाहर रो रहा की मुझे खीर पूड़ी, एसी,दारू मुर्गे की आदत। यहां मुझे इन गरीबों की झोपड़ पट्टी, कच्ची बस्तियों में सच में विकास करना पड़ रहा। पसीने आ गए दस सालों में ही। मरने जैसा हो गया सूखकर मुंह इन लोगों के जैसा हो गया, कुपोषण का शिकार।  जल्द कुछ नहीं किया तो यहां विकास मर जाएगा इनकी सेवा करते करते l उसे मोटी ऊपरी कमाई,रिश्वत की ऑक्सीजन और स्थाई भ्रष्टाचार का ग्लूकोस चाहिए। तो आखिर विकास को ऑक्सीजन मिली,वह खड़ा होते ही चलने लगा। और पहले ही हफ्ते में ,खजाना खाली है तो फ्री शिक्षा स्कूल, क्लीनिक,बस यात्रा,बिजली पर जांच बैठा दी जो अगले पांच साल जारी रहेगी।
अभी से लोग पछता रहे। पर कुछ के चेहरे खिल गए जिन्हें पिछले बारह वर्षों से एक पाई की रिश्वत,गड़बड़ी का सुख नहीं मिला था वह सब पार्षद, विधायक,बोर्ड,निगमों के अफसर,बाबू, चपरासी सभी के चेहरे ऐसे मानो विकास गोदी में उठाकर उन्हें झूला झुला रहा।
पूरे विश्व में विकास हो रहा।यहां तो गति धीमी है लेकिन वैश्विक नेता इतना इंतजार नहीं करते। ट्रंप गाजा पट्टी,जो बमबारी से खंडहर,रेगिस्तान हो गया है,के विकास का रोडमैप दे चुके। बहु मंजिली इमारतें, बिजनेस केंद्र,मेट्रो,ट्रंप टावर,समुद्र बीच,पर्यटन,ट्रंप की सोने की विशाल मूर्ति,विकास ऐसा ही दिखता है,लोग मानेंगे।

ऐसे ही रूस ने भी विकास की कोशिश की थी यूक्रेन में।पर गलती से वहां की जनता और जेलांस्की राष्ट्रपति की सोच एक ही निकली और वहां विकास को लेकर युद्ध हो गया। पुतिन कहें कि हम करेंगे तुम्हारे देश, घर,गलियों का विकास। आजीवन संसद से राष्ट्रपति बने रहने का बिल पास कर भविष्य सुरक्षित कर चुके पुतिन अब दुनिया भर में विकास करवाना चाहते हैं। पर पहले ही दांव में यूक्रेन ने ऐसा अटका दिया कि लेने के देने पड़ गए। सीरिया, अफगानिस्तान, ईरान, फिलिस्तीन आदि का विकास पहले यह सफलतापूर्वक बड़े दादा कर चुके हैं। समय कम था और विकास को जल्दी तो बमबारी और मिसाइलों से जगह खाली करवानी पड़ी। लाखों की जनसंख्या वहां की कहां गई, कोई नहीं जानता। पर अच्छी और काफी बड़ी जगह बनी है। दुनिया खूबसूरत दिखेगी, अंतरिक्ष से भी।
विकास होकर रहेगा आप चाहे रोक कर देख लो। विकास रुकेगा नहीं बल्कि आपके घर के अंदर तक आएगा, सारा घर हिला देगा और पूरा हुलिया बदल देगा । भले ही इसके लिए आपकी सारी जमा पूंजी, सब कुछ लेकर दो कपड़ों में आपको ही घर,बस्ती से निकाल देगा। विकास हो गया है यहां का और तुम ,तुम्हारा परिवार ही सबसे अधिक अवांछित निकले हो। तुम्हारे ही कारण विकास नहीं हो पाता। तुम मैंगो पीपल,कॉमन मेन विकास के इत्ते बड़े बड़े सपने, उससे भी बड़ी मशीनरी और बुलडोजर के सामने बार बार आ जाते हो। चलो, हटो यहां से और नगर की सीमा से दूर जंगलों के नजदीक अपना डेरा जमाओ।
विकास के फ्रेट कॉरिडोर का तो अनुभव होगा ही सभी को। ऐसी ऐसी घनी, दशकों से बनी बस्तियों के अंदर से रेल लाइन डाल दी। लाखों लोगों को घर छोड़कर विस्थापित कर दिया। विकास वहां आ चुका। जिनके घर खंडहर हो गए, सड़क पर आ गए और मामूली मुआवजा,वह भी जब पचास साल पहले जमीन ली थी, उसके हिसाब से देकर इन्हें भी जंगल,या नगर की सीमा के बाहर नए अंबेडकर नगर, दीनदयालू बस्ती, कृष्णगंज में छोड़ दिया। अभी भी कभी कभी आ जाते हैं कुछ लोग अपने पचास वर्षों की जन्मभूमि को देखने। “वह देखो, जो दो लाइन चमचमा रहीं हैं न, उसी के बाएं बाजू अपना छोटा सा घर था। समझे मेरे बेटे, बेटी,भारत का भविष्य। वह जहां सिंगनल बॉक्स लगा है वह तुम्हारे रामदीन काका का घर होता था। उस पार जो दिख रहा है बिजली ट्रांसफार्मर वह होता था जुम्मन मियां का घर। वह सत्तर साल तक दौड़ते थे बुजुर्ग लोगों की मैराथन, हर्डल रेस सभी में। हमारे शहर के युवा,बुजुर्ग सभी को उनसे प्रेरणा मिलती थी। अपने घर के पिछले हिस्से में वह सभी के लिए खेलकूद और फिटनेस की निशुल्क ट्रेनिंग भी देते थे। विकास की नजर ऐसी लगी कि सब उसकी भेंट चढ़ गया। जुम्मन अल्लाह मियां के पास और खेलकूद, स्वास्थ्य जैसी फालतू की गतिविधियों की विकास के सामने कोई कीमत नहीं है।”
” बाबू,वह देखो,” बच्चे कौतूहल और भय से देखते हुए उसके पीछे सिमट गए। अदानी पोर्ट, एस्सार,मैक्सेल के विशालकाय बॉक्स लादे मजदूर की तरह पचास डिब्बों की मालगाड़ी झूमती हुई आ रही है। दिन भर में पचास गाड़ियां गुजरती हैं यहां से। आसपास के हजारों परिवारों का इनके शोरगुल से जीना,सोना,पढ़ना सब हराम हो गया है। यह विकास के लिए बलिदान,बेघर तो हमें किया गया पर यह एक भी बड़ा डिब्बा आज तक हमारे छोटे से शहर में तो उतरा नहीं? जा कहां रहा है ई ससुर विकासवा?”
मोहन शर्मा,जो पूर्णतः बेरोजगार थे। शहर के हजारों लड़कों की तरह दिन भर ख्याली पुलाव बनाते और गुटका सदैव मुंह में दबाए रहते। शाम को आवारागर्दी करते और हर आयु की स्त्रियों को घूरते रहते।
सरकारी नौकरी में पिता के मेडिकल अनफिट के कारण घुसा दिए गए थे। उन्होंने बताया कि यह सारे बड़े बड़े बॉक्स अमेरिका, इंग्लैंड, चीन, फ्रांस पूरी दुनिया से भारत में भेजे जा रहे हैं। यह सभी मुंबई, अहमदाबाद, दक्षिण के राज्यों, बंगाल में जा रहे, विकास वहां हो रहा अधिक। फिर जो जूठन, उठन बचेगी वह तुम लोगों की तरफ धकेल दी जाएगी। लेकिन बड़े भव्य अंदाज से लोकार्पण करके।
तो भैया, जब यह सब दूर राज्यों में जा रहा तो सीधा पानी के जहाजों या बड़े हवाई जहाजों से वहीं उतरवा लेते, हमारे घर तो नहीं उजड़ते? यह रिटायर्ड मास्टरनी थी,जिन्होंने बीस साल पहले यह जमीन लेकर छोटा सा घर बनाया था। जो विकास की भेंट चढ़ गया था
“अरे मोसी, थोड़ी बहुत कुरबानी, त्याग तो करना पड़ता है न देश की तरक्की में। देश के प्रति भी तो कुछ कर्तव्य है कि नहीं हमारा? ” यह पार्षद था जिसने दोनों तरफ चांदी कूटी थी।और अब उसके दो डंपर,जेसीबी लगी हुई थी किराए पर तीन सालों से। इतना पैसा आ रहा था कि सभी को हिस्सा देने के बाद भी वह दूसरे दो जिलों में भी कॉन्ट्रैक्ट सड़क और पुल निर्माण का हथिया चुका था। खिलाओ और खाने दो का उसका फलसफा था।
“पर भैया,हर बार विकास के नाम पर गरीब आदमी ही कुर्बानी क्यों देता है? देश हर बार हमारे ही बलिदान से क्यों चलता है? यह मोटे ताजे, खा खाकर अघाय हुए लोगों का बलिदान कब होगा? यह कब देश के लिए अपना त्याग देंगे ?”
आपको जवाब मिले तो बताना जरा ।

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