दिन विशेष कविता : “बुंदेली चौकड़ियां” – प्रभु दयाल श्रीवास्तव पीयूष टीकमगढ़

गोपीं गोविंद के गुन गाबें,
बड़े भोर उठ जाबें।
जुर मिल जे जमुना के जल में,
बुड़की रोज लगाबें।
कात्यायनि मइया की मूरत,
रज सें नित्य बनाबें।
नीर क्षीर नैवेद्य नारियल,
श्री सिंदूर चड़ाबें ।
हे मां आस होय पूरी प्रभु,
कृष्ण परम पति पाबें।
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गोपीं फूलीं नईं समानी,
भइँ अनुकूल भवानी।
रै रै बाम अंग फरकत हैं,
बनत न बोलत बानी ।
हरि चरनन में प्रीत देख कें,
मूरत मन मुसकानी ।
कठिन तपस्या कौ फल दैबे,
प्रकट भईं कात्यानी।
आय सरद पूनें प्रभु मिलहें,
वर दै रइँ वरदानी।
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प्रिय तुम बड़ी ग्यास खों अइयौ,
सोये देव उठइयौ ।
तुम नइँ हते अनालव कातक,
आ कें पुजवा जइयौ।
कदम भेंटबी कुंडेसुर में,
मेला मोय घुमइयौ ।
बीरन आरय छेंकौ खोलन ,
ननदी खों बुलवइयौ।
करें पान्ने हम तुम रुच रुच,
लोल कुचइया खइयौ।
