
मेरे जीवन अनुभव में भारतीय संस्कृति का सॉफ्ट पॉवर
अनीता वर्मा
जब भी हम कोई भाषा पढ़ते या पढ़ाते हैं तो सांस्कृतिक विविधता व उसका महत्व स्वयंमेव उससे जुड़ जाता है। सॉफ्ट पॉवर की बात करें तो सॉफ्ट पॉवर में सम्मान (गरिमा), संवाद (संवाद), समृद्धि (साझा समृद्धि), सुरक्षा (क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा), और संस्कृति एवं सभ्यता (सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंध)। सम्मिलित है। इनके साथ साथ समता या समानता के संदर्भ भी महत्वपूर्ण हैं। भारत जैसा देश जो सर्वे भवंतु सुखिना की बात करता है जिसकी कूटनीति के मूल में संस्कृति और समता है उस सॉफ्ट पावर पर चर्चा करने का ये विषय विस्तृत है पर आज मैं अपने अनुभवों के आधार पर संस्कृति और सॉफ्ट पावर की बात करते हुए अरमीनिया में अपने पहले दिन की बात करना चाहती हूँ जब भारत के राजदूत श्री अचल कुमार मल्होत्रा मुझे ब्रूसोव यूनिवर्सिटी के रेक्टर से परिचित करवाने गए तो पूरा मेज़ तमाम तरह के अरमीनियाई मेवों, फलों, फूलों और व्यंजनों से सजा हुआ था। रैकटर महोदय ने स्वागत करते हुए कहा कि मैं जानता हूँ कि भारत में अतिथि देवता होता है पर हम भी अपने देश में अतिथियों का स्वागत बहुत सम्मान से करते हैं तो यहॉं भारत की सांस्कृतिक परंपरा की पहली सॉफ्ट पावर देखने को मिली और उसके बाद मुझे समझ आ गया कि मेरे शिक्षण के मूल में यही रहेगा। बाद में शिक्षण के दौरान ना जाने कितने सांस्कृतिक कार्यक्रम किए, दोनों देशों के त्योहार मनाना, सांस्कृतिक समानताओं पर आधारित नाटक करना मेरे शिक्षण का आधार बनते चले गए। भारतीय सॉफ्ट पावर व कूटनीति के मूल में संस्कृति व सभ्यता बहुत महत्वपूर्ण निभा रही थी।
उन्हीं दिनों मेरी एक कविता-
ओ येरेवान
तुम मेरे होने और हो जाने की बीच
सदियों की सभ्यता की यात्रा हो
या फिर वो पुल हो जो मुझे
मेरे विगत से तुम तक जोड़ता है
सुनो मेरी गर्भनाल जुड़ी है जिस देश से
तुम जुड़ चुके हो उसके अन्तर्मन से
और फिर संस्कृति मेरे शिक्षण को आसान बनाती चली गई।
उसके बाद रोमानिया में बुकारेसट यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए जाना। सांस्कृतिक विरासत और संस्कृति को इस यूरोपीय देश में स्थापित करना आसान नहीं था। पर यहॉं पर भी संस्कृति ने अपनी जड़ों से दोनों देशों के संबंधों को प्रगाढ़ किया था। उन्हीं दिनों जो सॉफ्ट पॉवर का मंत्र यूनेस्को ने भी स्वीकार किया था वो था योग की सॉफ्ट पॉवर। योग और आयुर्वेद का प्रभाव मेरी पावर भी बना। इसके अतिरिक्त साहित्य ने मूल रूप से अपनी निहित शक्ति को विकसित किया। मैं उसी बुकारेसट यूनिवर्सिटी में पढ़ाने गई थी जहां कोलकाता की प्रतिष्ठित महिला साहित्यकार, भाषाविद अमिता बोस प्रोफेसर व लेखक के रूप में प्रतिष्ठित थीं जिनके नाम पर बांग्ला भाषा का विभाग था और जिन्होंने वहां के राष्ट्रीय कवि ऐमिनेस्कयू की कविताओं का अनुवाद किया था। उन्होंने भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांतों को उस देश में स्थापित किया था। वही अमिता बोस जिन्होंने अपना जीवन गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर की सांस्कृतिक परंपरा व मूल्यों को रोमानिया में स्थापित करने में लगा दिया था। बालीवुड से इतर शास्त्रीय नृत्य और संगीत दो देशों के बीच में सम्बन्धों को प्रगाढ़ कर रहे थे। अरमीनिया में जहां बालीवुड और राजकपूर के जादू ने मेरा काम आसान किया था वहीं यहां पर योग, साहित्य, अनुवाद ने हमें जोड़ने का काम किया। इसी बीच मंत्रों का प्रभाव, बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म पर भी चर्चा होती। उन्हीं दिनों कक्षा में पंचतंत्र की कहानियाँ पढ़ने और मंचन करने से लेकर रामायण पर भी चर्चा होने लगी। उन्हीं दिनों भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ने मेरे अनुरोध पर बाल रामायण की कहानी रूप में लिखी गई प्रतियां भेजी गई। रोमानिया में ही रोमा समुदाय के लोगों के साथ भी कुछ अनुभव हुए, जो मूलतः भारत के ओरिजन से माने जाते हैं पर उस पर बात किसी और मंच पर तो अब यह कि हम सभी व्यक्ति एक-दूसरे और अपने साझा भविष्य के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं। आज, भारत की सॉफ्ट पावर, जो उसकी जीवंत सांस्कृतिक विरासत तथा विश्व भर में फैले उसके प्रवासी भारतीयों के माध्यम से प्रदर्शित होती है जो भारत की सहिष्णुता, समावेशिता और संस्कृतियों के आदान-प्रदान के मूल्य, जो हमारी सभ्यता का अभिन्न अंग हैं।
कहने को बहुत कुछ है, उस धरती का अनुभव है- जहां रोमानिया और कोलकाता के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक संबंध बहुत रहें हैं। जहां गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने रोमानिया के कॉन्स्टैंटा बंदरगाह से प्रवेश किया, जहां और उन्हें बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में पीएचडी की डिग्री प्रदान की गई थी। उनकी कुछ रचनाओं का रोमानियाई भाषा में अमिता बोस ने किया। जिन्हें बाद संस्कृति के प्रसार में उनके काम के लिए सम्मान पदक से सम्मानित किया गया था। रवींद्र भारती सोसाइटी ने उन्हें मरणोपरांत रवींद्र पुरस्कार से सम्मानित किया। अमिता बोस ने दोनों देशों-भारत और रोमानिया के बीच एक सांस्कृतिक पुल का निर्माण किया जो इस बात का सूचक है कि देशों के बीच में संस्कृति सॉफ्ट पावर के मूल में रही है और भारत इसमें अग्रणी है। और मैंने उस विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में हिंदी भाषा के लिए व संस्कृति के लिए काम किया है।
गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की पंक्तियों से ही समापत करना चाहती हूँ-
भारत मन की संपदा का प्रतिनिधित्व करता है जो सभी के लिए है। हम दूसरों को अपनी सर्वोत्तम संस्कृति का आतिथ्य प्रदान करने के भारत के दायित्व को स्वीकार करते हैं और दूसरों से उनकी सर्वोत्तम चीजें स्वीकार करने के भारत के अधिकार को स्वीकार करते हैं।”
