धरती का दर्द – अनीता वर्मा

आवारा बादल खुशी से गुनगुनाता हुआ नीचे जा रही नदी को देख कर दीवाना हो रहा था। साफ हवाएँ उनके इश्क को देखकर तेजी से बहने लगीं। मौसमों में मोहब्बतें घुल-घुल जा रही थीं। पत्ते हिल-हिल कर अपने होने की बात बता रहे थे। पशु-पक्षी सब अपनी-अपनी धुन में बिना किसी डर के खेल-कूद रहे थे।
नदी ने बादल से पूछा, “तू इतना दीवाना क्यों हो रहा है रे? आज ये पागलपन क्यों?”
बादल ने हँसते हुए कहा, “तू भी तो मुझे सौ साल के बाद हँसती-खिलखिलाती, सुंदर, अल्हड़, नवयौवना सी लग रही है।”
नदी ने कहा, “वह इसलिए कि तू कल बरसा! बहुत बरसा! सौ साल पहले की तरह साफ, सच्चा और चमकता हुआ।”
पेड़-पौधों ने कहा, “हम सब भी तुम्हारे प्यार के साथी हैं।” फूल खिले, कोमल, स्वच्छ दुनिया के वासी। पशु-पक्षियों ने उनकी बात सुनी, तो हँसने लगे—आज ये बेखौफ हैं। इनको इनका संसार मिल गया है।
धरती उन सबकी बात मगन होकर सुन रही थी। कई सालों से उसके भीतर कई जख्म थे। उसकी देने की इच्छा और आदत का सबने दोहन किया था। भीतर कुछ रह-रह कर रिस रहा था। बादल, नदी, हवा सब मिलकर भी उसका दर्द दूर नहीं कर पा रहे थे।
धरती हर रोज सोचती थी कि काश कुछ ऐसा कर सकूँ कि सब उलटा हो जाए, क्योंकि सब कुछ तो अपवित्र हो गया है। कोई भी इस बात को नहीं समझ पा रहा था कि जब माँ दुखी होती है, तो पूरे परिवार पर कष्ट के बादल मंडराने लगते हैं।
और उस दिन से धरती ने सबको प्यार करने से खुद को रोक लिया। ईश्वर से हर रोज उलटफेर की बात करने लगी। ईश्वर ने कहा—“अपनी शक्ति को पहचानो। तुम में वो ताकत है कि तुम स्वयं ही अपने दर्द को दूर कर सकती हो।”
धरती ने रात, सुबह, आकाश, कालरात्रि सब से बात की। निशाचरों ने कहा कि हम सब बदल देंगे। इन इंसानों को पता चलेगा कि हमें इन्होंने कितना कष्ट दिया है। हम संतुलन बनाना जानते हैं। रात को घूमने वाले चमगादड़ों ने अपनी ताकत दिखा दी।
और फिर धरती पर कोरोना आ गया। धरती ने खुद का इलाज खुद ही कर लिया था। अब बाहर सब साफ और स्वच्छ था। अब सब दर्द देने वाले घरों के भीतर थे। इंसान अब अपना इलाज ढूँढ रहा था।

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