एक वात थरथरणारी (अलकनंदा साने )
प्रतिष्ठित कवयित्री अलकनंदा साने हिन्दी और मराठी की सिद्ध साहित्यकार हैं । उन्हें मध्य प्रदेश की पहली हिन्दी पत्रकार होने का गौरव प्राप्त है। जन्मना विरासत में मिली मातृभाषा मराठी और वातावरण – संस्कार से मिली हिन्दी,इन दोनों भाषाओं पर उनका प्रभुत्व है। अलकनंदा जी स्त्री विमर्श की रचनाकार हैं। एक आम स्त्री का अनकहा सुख -दुःख उनकी रचनाओं के केंद्र में होता है। अनुभव की परिपक्वता और गहरी संवेदना से उपजी उनकी कविताऍं, स्त्री के अंतर्मन की उस टीस, उस व्यथा, उस संघर्ष, पुरुष सत्तात्मक सोच से उपजी उस बैचेनी, उस अकेलेपन, अस्मिता को बचाने की उस छटपटाहट को बाहर लाती है, जिसकी ओर सामान्यतः ध्यान नहीं जाता है। यहाॅं उनके मराठी कविता संग्रह ‘ एक वात थरथरणारी ‘ की कुछ कविताओं का मेरे द्वारा किया गया अनुवाद –
1. मेरा नमक अलोना क्यों ?
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तुमने कहा – तुम बहुत अच्छा बोलती हो
पर मेरे सुझावों से
और भी प्रभावी होगा तुम्हारा वक्तव्य
तुमने कहा – तुम्हारे अक्षर सुंदर हैं
जरा मेरी तरह लिखने लगो
तो तुम्हारे शब्दों में वजन आएगा
सुडौल है तुम्हारा चलना
पर मेरे कदमों पर चल कर देखो
कितना शानदार होगा वह…
तुम्हारे गले से निकला गंधार
बहुत कुछ सुरीला है
पर जरा मेरे सुर में गाओ तो…
बहार आ जाएगी
तुम्हारे आविष्कृत नृत्य,
बड़े मोहक हैं
उसमें जरा मेरे बोलों को भी आने दो
तुम जीवन- चित्रों का
सुंदर रेखांकन करती हो
बस उसमें
मैं कहूॅं , वैसे ही रंग भरो
तुम्हारे बनाए व्यंजन
यूॅं तो स्वादिष्ट होते हैं
चाहे जो बनाओ ,
बस मेरी रुचियों का ध्यान रहे
ऐसा ही होता रहा है अब तक…
आखिर मेरा नमक अलोना क्यों… ?
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2. टपकती है बारिश रात भर
………….
रात में साहस को साथ ले कर सोती हूॅं
पौ फटते ही उसे, तकिए के नीचे से
हौले से निकाल,
हाथ में ले कर सूंघती हूॅं
और भर लेती हूँ उसे अपनी संपूर्ण साॅंसों में
फिर झटकार कर अपनी सारी उदासी
बिस्तर से निकल पड़ती हूँ
दिनभर की चहलकदमी के लिए
चढ़ती सुबह के साथ
धीरज भी संग हो लेता है,
किसी जुड़वां भाई की तरह
पर दोनों
अधिक देर तक टिक नहीं पाते मैदान में
शाम होने तक
थक कर चूर हो जाते हैं
और समा जाते हैं मेरी गोद में
मैं उन्हें सहला-पुचकार कर
चूम कर -दुलार कर
जैसे -तैसे लाती हूँ बिस्तर तक
किंतु न जाने कैसे सटक जाता है धीरज
हाथ से निकले जवान बेटे सा
साहस पड़ा रहता है
निश्चेष्ट सा बिस्तर में
और तकिए पर अक्सर
टपकती रहती है बारिश, रात भर।
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3. दिन यूॅं ही खिसकते जाते हैं
…………
सदा से रोटी बेलने वाली औरत का चेहरा
चूल्हे की रोशनी में
उजला सा दिखता है
पर आँखों के नीचे के काले घेरे
कब बढ़ जाते हैं,पता नहीं चलता
दिन यूॅं ही खिसकते जाते हैं
धुले बालों से निकल जाती है धूल- मिट्टी
पर उनमें छिपे सफेद बाल
कब बढ़ जाते हैं, पता नहीं चलता
दिन यूॅं ही खिसकते जाते हैं
संगणक पर तेजी से
अंगुलियाॅं चलाते हुए
हाथों पर झुर्रियाॅं कब पड़ जाती हैं
पता ही नहीं चलता
दिन यूॅं ही खिसकते जाते हैं
दिन भर फुर्ती से दौड़ती -भागती
औरत के हाथ, रात घुटनों पर
धीमे – धीमे से कैसे चलते हैं
पता ही नहीं चलता
दिन यूॅं ही खिसकते जाते हैं।
……………..
4. फिर से बेटी हो कर
….
बेटी से बतियाते हुए
जब मैं पूछती हूँ -“क्या कहा?”
तो वह सहज ही ,
अपने हिसाब से अर्थ निकाल कर
अपनी सोनू के बारे में बताने लगती है।
मैं भी उसे नहीं टोकती
पर कभी -कभी लगता है कि
वह कहे -” माॅं ! तुम्हारी बहुत याद आती है।”
या कहे ऐसा ही कुछ और
उसकी बिटिया की बड़ाई सुनना
भाता है मुझे भी
पर मन करता है कि
कभी तो, कुछ क्षणों के लिए
अपना माॅं होना भुलाकर वह
देर तक बातें करती रहे
फिर से बेटी हो कर ।
………………..
मूल मराठी कविताऍं -अलकनंदा साने
अनुवाद – संध्या टिकेकर
