“धरती ने भिजवाई पाती” : ( कविता )
धरती ने भिजवाई पाती
जिसमें पीड़ा और उदासी
झर झर उसके आँसू बहते
तेज गति से तरु जब कटते….
सुनो मनुज! अब मेरी गाथा
कब तक अपनी पीर सुनाऊँ
ज़ख़्म किसे अपने दिखलाऊँ
कब तक गीत रुदन के गाऊँ ….
मत काटो अब वृक्ष धरा पर
यह मेरा हरित शृंगार है
शुद्ध वायु तुम भी तो पाते
जो ज़िंदगी का आधार है…!!
